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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘नहीं श्रीमान्! मेरे पति की असंदिग्ध शब्दों में यही आज्ञा है। अब उनके लौटने पर ही मैं लौटूँगी?’’
‘‘तो तुम हमारी आज्ञा का उल्लंघन करोगी?’’
‘‘मेरे लिए मेरे पति आपसे ऊँची पदवी रखते हैं। वे मेरे देवता हैं।’’
‘‘यदि हम तुमको न जाने दें?’’
‘‘तो आप अधर्माचरण के अपराधी होंगे। आपके राज्य में किसी निरपराध को दण्ड देना अधर्म है।’’
‘‘तुम हमारी आज्ञा का उल्लंघन कर अपराध तो कर रही हो।’’
‘‘आपकी अधर्मयुक्त आज्ञा तो अमान्य ही है। उसको न मानना ही धर्म है।’’
इस पर भीष्मजी निरुत्तर हो गये और वह यहाँ चली आयी। उसका कहना था, ‘‘अब हम वहाँ गये तो मुझे भय है कि कुछ अनिष्ट न हो जाये।’’
मेरे उसको आश्वासन दिलाने पर कि अब कुछ नहीं होगा, वह चलने के लिए तैयार हो गई। हम विमान में गये। हस्तिनापुर पहुँच विमान राजभवन के बाहर उतरा और हमें छोड़ तुरन्त वापस चला गया। विमान को देख राजभवन के सब कर्मचारी दौड़ते हुए वहाँ आकर एकत्र होने लगे, परन्तु उनके उस स्थान पर पहुँचने से पूर्व ही विमान वापस आकाश में उड़ चुका था। मुझे विमान में से उतरते देख सब चारों ओर से मुझे घेरकर खड़े हो गये और विमान के विषय में पूछने लगे, ‘‘महाराज! यह क्या था? यह कैसे चलता है? किसका है?’’ आदि।
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