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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552
आईएसबीएन :9781613010389

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


जब मैं अपने गृह के द्वार पर पहुँचा तो मैंने देखा कि उस पर राज्य की ओर से मुद्रांकित ताला पड़ा हुआ है। यह देख मैं राजकुमार भीष्मजी के गृह की ओर चल पड़ा। मेरे विमान में लौटने की सूचना उनको पहले ही मिल चुकी थी। अतः मेरे सूचना भेजते ही मुझको भीतर बुला लिया गया। मैं नमस्कार कर बैठा तो भीष्मजी ने प्रश्न-पर-प्रश्न पूछने आरम्भ कर दिये। मैंने कहा, ‘‘महाराज! सुरराज के साथ हुई लम्बी-चौड़ी वार्त्तालाप के पश्चात् यह निश्चित हुआ है कि वे हमारे और गान्धारों के झगड़े में किसी प्रकार से बाधक नहीं होंगे। वे चाहते हैं कि हमारे गान्धार-राज्य के साथ मित्रतापूर्ण सम्बन्ध बने रहें। गान्धार राज्य द्वारा हमें कर तो मिलना ही चाहिए, क्योंकि पश्चिम की ओर से आक्रमण पर हम उनकी रक्षा करते हैं।’’

‘‘हमको विदित हुआ है कि देवराज के कहने पर ही महाराज सुबल ने हमें कर देने से इन्कार कर दिया था।’’

‘‘महाराज! गान्धार-राज भी चन्द्रवंशीय हैं। अतः आपके भाई बन्ध हैं। इस नाते वे आपके समान हैं। यदि वे कर देंगे तो इसलिए नहीं कि आपके अधीन है, प्रत्युत इस कारण कि वे हमसे दुर्बल हैं और हमने उनकी रक्षा का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लिया है। अतएव मेरा निवेदन है कि उनसे पुनः कर की माँग करनी चाहिए। मुझे विश्वास है कि वे मान जायेंगे। साथ ही आप राजकुमार धृतराष्ट्र के लिए गान्धारराज की कन्या गान्धारी को माँग लीजिये।’’

‘‘यह तो वे अस्वीकार कर चुके हैं।’’

‘‘इन्कार तो वे कर देने से भी कर चुके हैं। कदाचित् अब पुनः माँग करने पर वे मान जायें।’’

‘‘सुरराज का कहना है कि दो देशो में मैत्री-सम्बन्ध बनाये रखने के लिए विवाह-सम्बन्ध हो जाना चाहिए, अतः कोई योग्य राजदूत भेजा जाये तो काम बन सकता है।’’

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