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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552
आईएसबीएन :9781613010389

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


अगले दिन आधे प्रहर की यात्रा में विमान द्वारा गन्धमादन पर्वत पर जा पहुँचा। मेरे पिताजी तथा अन्य आश्रम-निवासी और मेरी पत्नी सभी मुझको सुरराज के विमान से उतरना देख आश्चर्यचकित रह गये। मैं उनसे मिला और दो घड़ी पश्चात् हस्तिनापुर जाने के लिए तैयार हो गया। मेरी पत्नी ने बताया कि राजकुमार ने किस प्रकार उसका अपमान किया था? वह अपने गृह से निकल राजप्रासाद के बाहरी द्वार से निकलने लगी तो द्वारपाल ने उसको रोक लिया और पकड़कर राजकुमार के पास ले गया। राजकुमार भीष्मजी ने उसको देख पूछा, ‘‘नीललोचना! कैसे आयी हो?’’

मेरी पत्नी ने उत्तर दिया, ‘‘आयी नहीं श्रीमान्! यहाँ पकड़कर लायी गई हूँ। यह तो द्वारपाल से पूछिये कि मुझको क्यों पकड़कर लाया है?’’

‘‘ओह!’’ भीष्मजी ने कहा और कदाचित् परिस्थिति समझ पूछने लगे, ‘‘तुम कहाँ जा रही थीं?’’

‘‘अपने श्वसुर महर्षि गवल्गणजी के आश्रम में।’’

‘‘क्यों? वहाँ क्या काम था?’’

‘‘मेरे पतिदेव की आज्ञा थी कि यदि यहाँ से उनका वेतन मिलना बन्द हो जाये तो मैं उनके पिता के पास चली जाऊँ।’’

‘‘यह तो यहाँ से जाने का कोई कारण नहीं।’’ उनका कहना था।

‘‘ठीक है श्रीमान्! परन्तु यह आपके मेरे पति के प्रति रुष्ट होने का सूचक है और इस स्थिति में मुझको अपना जीवन यहाँ सुरक्षित प्रतीत नहीं होता।’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं नीललोचना! तुम यहां प्रसन्नता से रहो। तुमको कुछ भी कष्ट नहीं होगा।’’

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