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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
मैं चुप रहा। मुझको गम्भीर विचार में पड़ा देख सुरराज पुनः कहने लगे, ‘‘कल प्रातःकाल तुम्हारे निवास-गृह की छत पर हमारा विमान तुम्हें गन्धमादन पर्वत को ले जाने के लिए तैयार मिलेगा। वहाँ यदि तुम्हारी इच्छा होगी तो सपत्नीक तुम्हें हस्तिनापुर पहुँचा दिया जायगा। हमारा विचार है कि तुम पत्नी-सहित चले जाओ और धृतराष्ट के विवाह की आशा उनको दोगे तो उस राज्य में पहले से भी अधिक मान पाने लग जाओगे।’’
‘‘परन्तु देवाधिदेव! क्या गांधारराज इस विवाह के प्रस्ताव को स्वीकार करेंगे?’’
‘‘अभी तो यह प्रस्ताव उन्होंने ठुकरा दिया है और एक अन्धे राजकुमार के लिए प्रस्ताव आने पर अपना अपमान समझा है, परन्तु यदि प्रस्ताव लेकर जाओगे तो निश्चय स्वीकृति मिल जायेगी।’’
‘‘परन्तु महाराज, वे ऐसा क्यो करेंगे?’’
‘‘यह हमारा रहस्य है। किसी को भी इस रहस्य के जानने की आवश्यकता नहीं। एक बात तो स्पष्ट ही है कि तुमको पुनः हस्तिनापुर के राजप्रासाद में स्थान दिलवाना है और पहले से भी अधिक मान के साथ। तुम पर राजमाता प्रसन्न होंगी और उनकी कृपा बनी रहेगी। साथ ही धृतराष्ट्र तुम पर जीवन-भर प्रसन्न रहेंगे।’’
मैंने अपने मन में उठ रही योजना सुरराज को नहीं बताई। मैं अभी भी हृदय से चाहता था कि कुरुवंश के विनाश को रोका जाय और इसके लिए प्रयत्न करना चाहता था।
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