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उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
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इस बार देवलोक में मैं निर्लिप्त नहीं रह सका। यह सुरराज के प्रासाद के अन्तःपुर का मादक वातावरण था अथवा मेरी गृहस्थ- जीवन की मधुर अनुभूति थी, जिसने मुझको विवश कर दिया और देवेन्द्र मुझको अपनी निष्ठा से डिगाने में सफल हो गया। चित्र तो पहले से भी श्रेष्ठ बना और उर्मिला को यह चित्र देखकर अपने को मेरे अर्पण करने में शोक तो दूर, अत्यन्त आनन्द अनुभव हुआ। ऐसा मेरी समझ में आया।
जिस मूल्य पर वह चित्र बना, वह मूल्य तो देवेन्द्र के प्रासाद की प्रत्येक अप्सरा देकर चित्र बनवाने के लिए तैयार हो गई। यदि मैं उनके प्रस्तावों को स्वीकार करने लगता तो मुझको जीवन-भर का कार्य मिल रहा था। परन्तु चित्र समाप्त करने के पश्चात् जब मुझको देवेन्द्र के समक्ष उपस्थित किया गया। उनकी व्यंग्यात्मक हँसी मेरे कानों में पड़ी तो मुझको अपने पतन पर बहुत शोक हुआ। देवेन्द्र ने हँसकर कहा, ‘‘संजय! अब तो हम आशा करते हैं कि तुम प्रति दूसरे-तीसरे वर्ष देवलोक की यात्रा करते रहोगे। यदि प्रतिवर्ष आना चाहो तो हम प्रबन्ध कर सकते हैं। हमारा एक विमान तुम्हें यहाँ ले आया करेगा।’’
‘‘तो क्या श्रीमान् मुझको एक ही दिन में गन्धमादन पर्वत पर और तदनन्तर हस्तिनापुर वापस पहुँचा भी सकते हैं?’’
सुरराज ने उर्मिला के चित्र की ओर देखकर, जो उस समय उनके समक्ष रखा था, कहा, ‘‘तुम्हारी कला के उपहार में हम ऐसा भी कर देंगे। और जब इस स्वर्गलोक की यात्रा की इच्छा हो तो हमारा चिन्तन करने पर हमारा कोई विमान तुमको यहाँ लाने के लिए पहुँच जाया करेगा। यहाँ आने का मूल्य केवल एक चित्र हमारी चित्रशाला को भेंट में देना होगा।’’
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