उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘वह सब भ्रम-मात्र है।’’
इस तर्क में अब मेरे लिए कुछ कहने को नहीं रहा था। मुझको तो देवेन्द्र की भविष्यवाणी स्मरण हो आई थी कि चन्दवंशीय राज्यपरिवार का यह स्वभाव-सा बन गया प्रतीत होता है कि वह क्षत्रिय तो है, साथ ही वह समझता है कि ब्राह्मण तथा विद्वानों का स्थान भी लेने योग्य है। उस समय परिवार की सम्मति देने वाला कोई विद्वान् ब्राह्मण उनके पास नहीं था। मुझको भी वे सेवा में ले रहे थे, बिना कोई सेवा-कार्य मुझसे लेने के विचार से।
जब मैंने देखा कि युक्ति से काम न लेकर केवल भावना से और वह भी स्वार्थमय भावना से कार्य किया जा रहा है तो मैं चुपचाप बैठ आज्ञा की प्रतीक्षा करने लगा। देवव्रत कुछ काल तक गम्भीर भाव में बैठे रहे। फिर बोले, ‘‘अच्छा संजयजी! हम आपको राजप्रासादा के एक पार्श्व में निवास दिलवा देते हैं और प्रसादाध्यक्ष को आपकी सुख-सुविधाओं का प्रबन्ध कर देने का आदेश देते हैं।’’
कुछ क्षण ठहर, मुस्कराते हुए उन्होंने पुनः कहा, ‘‘आप अर्थशास्त्री है। इस कारण आप शीघ्रातिशीघ्र चन्द्रवंशीय अर्थमीमांसा समझ लीजिए। तब फिर हम आपसे कार्य लेंगे। अब आप जा सकते हैं।’’
मैंने नमस्कार की और जाने लगा तो उन्होंने ठहरा लिया और कहा, ‘‘देखिए, आप माता सत्यवतीजी से बात करिये। वास्तव में राज्य उनका है और वे जैसा उचित समझेंगी, आज्ञा देंगी।’’
‘‘इसका अर्थ’’, मैंने पूछा, ‘‘क्या यह है कि मेरी नियुक्ति भी उनकी स्वीकृति के पश्चात् ही मानी जायेगी?’’
‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है। विशेष रूप में जब आप वेतन कुछ भी नहीं ले रहे। मेरा अभिप्राय राज्य के लिए उत्तराधिकारी ढूँढ़ने से है।’’
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