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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552
आईएसबीएन :9781613010389

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘आज चन्द्रवंशियों ने कोई ऐसा व्यक्ति दिखाई नहीं पड़ रहा, जिसको राजा के पद पर आसीन किया जा सके। आप तो इस योग्य है, परन्तु कौन कह सकता है कि आप अपनी प्रतिज्ञा भंग करें? इस परिस्थिति में गणराज्य की स्थापना ही एक उपाय रह गया है।’’

‘‘एक उपाय और है।’’ देवव्रतजी ने कहा, ‘‘विचित्रवीर्य की पत्नियों से नियोग द्वारा सन्तान उत्पन्न कराई जाय।’’

‘‘नियोग सन्तानोत्पत्ति का श्रेष्ठ ढंग नहीं माना जाता।’’

‘‘वैदिक काल के लोगों में अथवा वैदिक परम्परा के मानने वालों में ऐसा होगा। हम तो वैदिक परम्परा को नहीं मानते, हमारा धर्म उनसे भिन्न है। हमारा रहन-सहन उनसे पृथक् है।’’

‘‘परन्तु एक बात तो आपको माननी ही पड़ेगी कि महाराज विचित्रवीर्य की पत्नियों का नियोग यदि आपसे हो, तब ही सन्तान चन्द्रवंशीय होगी, अन्यथा वह चाहे किसी को हो, चन्द्रवंशीय राज्य-परिवार कैसे हो जायेगा?’’

‘‘यह इसलिए कि विचित्रवीर्य की पत्नियों के गर्भ से जो होगी।’’

‘‘पत्नी होने से तो पति के परिवार का रक्त उसमें नहीं माना जा सकता। अधिक-से-अधिक उसमें रक्त काशिराज के परिवार का कहा जा सकता है। वे चन्द्रवंशीय नहीं है।’’

‘‘हम इस विषय में राज्य की ओर से घोषणा कर देंगे।’’

‘‘घोषणा करने से क्या प्रकृति अपना नियम बदल देगी? यह प्रकृति का नियम है कि सन्तान से पिता के परिवार की परम्परा चलती है।’’

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