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गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552
आईएसबीएन :9781613010389

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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


‘‘इससे क्या होगा?’’

‘‘राजा बनने के योग्य कोई व्यक्ति जनसाधारण में से उत्पन्न हो जायेगा। जब तक ऐसा प्रतिभाशाली व्यक्ति नहीं मिलता, तब तक गणसभा राज्य-कार्य चलाये।’’

‘‘देखिए संजयजी! मैंने सूर्य को साक्षी रखकर यह वचन दिया था कि मैं अपने पिता के राज्य-कार्य में हस्तक्षेप नहीं करूँगा और न ही विवाह करूँगा, जिससे मेरी कोई कोई सन्तान, मेरी विमाता की सन्तान को राज्यच्युत न कर दे। अतः मेरे लिए तो राज्य, सत्यवती तथा उसकी सन्तान से लेकर किसी को भी देने का प्रश्न उपस्थित नहीं होता। मैं कैसे किसी की वस्तु लेकर अन्य को दे सकता हूँ?’’

‘‘परन्तु महाराज! देश का राज्य किसी की निजी वस्तु नहीं है। यह देशवासियों की है। राजा तो देश का एक कर्मचारी-मात्र ही होता है।’’

‘‘यह आप वैदिक काल की बातें कर रहे हैं। तब से आज तक बहुत काल व्यतीत हो चुका है और मनुष्य ने बहुत अनुभव प्राप्त कर लिया है। क्या आप गाड़ी को पुनः पीछे ले जाना चाहते हैं?’’

‘‘महाराज! बात इसके सर्वथा विपरीत है। वैदिक काल में मनुष्य ने बहुत ठोकरें खाकर राज्य की स्थापना की थी। राज्य के अर्थ न तो राजा का राज्य है, न ही किसी गण-सभा का राज्य। राज्य का कार्य राज्यान्तर्गत प्रजा की बाहरी और भीतरी शत्रुओं से रक्षा करना है। यह सुव्यवस्था स्थापित होने से ही हो सकता है। अतः राज्य किसी देश अखवा प्रदेश में, नगर अथवा उपनगर में, गाँव अथवा मुहल्ले में सुव्यवस्था रखने का नाम है। यह सुव्यवस्था गण-समितियों से हो अथवा राजा, महाराजा अथवा सम्राट् से हो, होनी चाहिए। कभी तो किसी योग्य व्यक्ति के इस भूतल पर पदार्पण में राजा द्वारा सुव्यवस्था रह सकती है और कभी, दुर्भाग्य से जब वैसा व्यक्ति न मिले तो गणराज्य-स्थापना करके रह सकती है।

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