लोगों की राय

उपन्यास >> अवतरण

अवतरण

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :590
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9552
आईएसबीएन :9781613010389

Like this Hindi book 4 पाठकों को प्रिय

137 पाठक हैं

हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।


मैंने पुनः नमस्कार किया और वहाँ से चला आया। मेरे बाहर निकलते ही एक प्रतिहार मेरे पास आकर कहने लगा, ‘‘आप चलकर अपना निवास-स्थान देख लीजिए और जाकर पंथागार से अपना सामान ले आइयेगा।’’

‘‘किसकी आज्ञा से यह निवास स्थान मिल रहा है?’’

‘‘मुझको प्रसादाध्यक्ष की आज्ञा हुई है। अभी-अभी महाराज कुमार ने आज्ञा दी है कि आप राजप्रसाद के एक पार्श्व में ही रहेंगे।’’

मुझको इतनी सतर्कता से प्रबन्ध होते देख अचम्भा हुआ। इतना शीघ्र तो देवलोक में भी प्रबन्ध नहीं हो सका था। मेरे मन में विचार उठा कि कुछ तो बात है इन लोगों में, अन्यथा इतना बड़ा राज्य चल न सकता। मैं विचार करता था कि तीन-चार क्षण ही पूर्व मुझको निवास-स्थान देने की आज्ञा हुई थी और इसी बीच मेरे लिए निवास-स्थान का प्रबन्ध कर मुझको दिखाने का प्रबन्ध भी कर दिया गया है।

मैं प्रतिहार के साथ चल पड़ा। मुझको हस्तिनापुर के राजप्रासाद के पश्चिम् में बने बीसियों निवास-गृहों में से एक में ले जाया गया। गृह दो भूमि का था। नीचे की भूमि पर बैठक थी, जो भली-भाँति सजी हुई थी। शौचालय, स्नानागार, अतिथि-गृह तथा अश्व रखने का स्थान था। ऊपर के तल पर दो आगार तथा भोजनालय एवं वस्त्रादि पहनने के आगार थे। सबमें सामान उचित सजावट के साथ लगा था। मैं अपना निवास-स्थान देख सन्तुष्ट था। यह स्थान उस स्थान से अधिक सुखप्रद प्रतीत हो रहा था, जो मुझको देवलोक में मिला था। इस बात से मेरे मन पर चन्द्रवंशियों का अच्छा ही प्रभाव पड़ा।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book