उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
मैंने आशीर्वाद दिया और आज्ञा की प्रतीक्षा करने लगा। उस भव्य मूर्ति ने मुझको सिर से पाँव तक देख, मुस्कराकर सामने एक चटाई पर, जो उसके आसन से नीचे थी, बैठने का आदेश दिया। मैं बैटा तो वे पूछने लगे, ‘‘आप संजय हैं? महर्षि गवल्गण के सुपुत्र?’’
‘‘जी!’’
‘‘ आप देवलोक किस अर्थ गये थे?’’
‘‘पिताजी का देवेन्द्र से परिचय है। उन्होंने मुझको किसी राज्यकार्य में सेवा पाने के लिए भेजा था।’’
‘‘तो सेवाकार्य पिला?’’
‘‘जी नहीं! सुरराज ने कहा कि उनके देश में रहने के लिए कुछ भी कार्य नहीं। वहाँ राज्य पूरी प्रजा के लिए भोजन, वस्त्र, निवास आदि का प्रबन्ध कर रहा है। सबको अपनी-अपनी रुचि तथा आवश्यकता के अनुसार आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त होती है। उनकी यौनतृषा की पूर्ति राज्य नहीं कर सकता, परन्तु इसके लिए राज्य ने इतनी स्त्रियों का प्रबन्ध कर रखा है कि किसी को इसके लिए कठिनाई नहीं होती। अतः देवेन्द्र कहने लगा कि उनके राज्य में मेरे योग्य कोई कार्य नहीं। सब कार्य वहाँ यन्त्रों द्वारा और बहुत ही कम लोगों के बहुत ही कम परिश्रम से सम्पन्न हो जाते हैं। वहाँ के लोग भी कुछ करने को नहीं रखते। वे सब ललित कलाओं और प्रेम-प्रलाप में ही अपना समय व्यतीत करते हैं। इस कारण देवेन्द्र ने मुझको हस्तिनापुर का मार्ग दिखा दिया। अतः मैं यहाँ आया हूँ।’’
‘‘यहाँ की विपत्ति तो आपने सुनी होगी।’’
‘‘जी हाँ।’’
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