उपन्यास >> अवतरण अवतरणगुरुदत्त
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हिन्दुओं में यह किंवदंति है कि यदि महाभारत की कथा की जायें तो कथा समाप्त होने से पूर्व ही सुनने वालों में लाठी चल जाती है।
‘‘यदि हम आपकी सेवाएँ लेनी चाहें तो आप क्या कार्य करेंगे?’’
‘‘मैं अर्थशास्त्री हूँ और राज्य-कार्य का संचालन कर सकता हूँ।’’
‘‘राज्य-कार्य तो हमारे सैनिक चलाते हैं। उनके बलबूते पर ही हमारा साम्राज्य गांधार से लेकर कामरूप तक चल रहा है। हमारे सैनिक के भय से ही सब राज्य स्वयमेव कर भेज देते हैं। अतः राज्यकार्य के लिए एक ब्राह्मण की आवश्यकता नहीं।’’
‘‘क्षमा करें महाराज! इसको राज्य-कार्य नहीं कहते। यह तो समर-कार्य है। यह आपत्तिकाल में करने योग्य कार्य है। राज्य का कार्य तो कोटि-कोटि प्रजा को धर्म, काम, मोक्ष की उपलब्धि कराना है।’’
वह सुनकर देवव्रत खिलखिलाकर हँस पड़ा। मैं अन्यमनस्क भाव से उसका मुख देखता रह गया। उसने कहा, ‘‘धर्म तो राज्य-नियम है। यह हम अपनी प्रजा की और अपने राज्य की परम्पराओं को देखकर निश्चय कर देते हैं। इसके लिए किसी बड़े अर्थशास्त्री की आवश्यकता नहीं। अर्थ तो हमारे वैश्यगण प्रचुर मात्रा में उत्पन्न कर रहे हैं। एक ब्राह्मणकुमार को इस विषय में कष्ट करने की आवश्यकता नहीं। काम के लिए भी हमने प्रायः सब बड़े-बड़े नगरों में बहुत उत्तम प्रबन्ध कर रखा है। इस हस्तिनापुर में ही दस सहस्त्र वेश्याएँ रहती है। सबको अपनी-अपनी इच्छा और रुचि-अनुसार काम-तृप्ति का अवसर मिल जाता है। इन सब की प्राप्ति के पश्चात् केवल मोक्ष की प्राप्ति रह जाती है और हम समझते हैं कि राज्य को इस काम में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।’’
एक ऐसे व्यक्ति के मुख से, जिसके लिए मन में भारी आदर हो, उक्त वार्ता को सुनकर मैं गम्भीर विचार में मग्न हो गया। मुझको बार-बार सुरराज का यह कहना स्मरण हो रहा था कि यह वंश नाश को प्राप्त होगा और इसी की अंत्येष्टि शीघ्रातिशीघ्र करने के लिए मैं हस्तिनापुर पहुँचूँ। तो क्या सुरराज का कहना ठीक था? मुझे इसका विनाश करने के लिए क्या करना है, यही सोचने लगा था।
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