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उपन्यास >> पाणिग्रहण

पाणिग्रहण

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :651
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 8566
आईएसबीएन :9781613011065

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संस्कारों से सनातन धर्मानुयायी और शिक्षा-दीक्षा तथा संगत का प्रभाव


परन्तु दुरैया से कोई पत्र नहीं आया। शारदा को गये एक सप्ताह से भी अधिक हो गया था। एक दिन मध्याह्न के समय ऐना और टिमोथी मिलने आयीं। नौकरानी ने उनको बता दिया कि मालकिन गाँव गयी हैं।

‘‘बच्चे भी गये हैं?’’ ऐना ने पूछ लिया।

‘‘जी नहीं। वह एक दिन प्रातः उठीं और बिना किसी को बताये चली गईं।’’

ऐना ने समझा, दाल में कुछ काला है। इससे वह रजनी के घर जा पहुँची। ऐना ने उसको शारदा के गाँव चले जाने की बात बतायी तो रजनी को समझ आया कि दोनों में अवश्य ही झगड़ा हुआ है। इस पर भी उसने इन्द्र के घर जाकर पता करने के स्थान पर इन्द्र की माता को पत्र लिखकर पूछ लिया, ‘‘काकी, सुना है, भाभी गाँव में आयी हुई है। यदि यह ठीक है तो उससे कहो कि क्या वह रजनी बहन को वहाँ नहीं बुलायेगी?’’

पत्र का उत्तर पाँच दिन में आया। शारदा ने लिखा, ‘‘रजनी बहन! मैं लखनऊ से चली आई हूँ। अपने विचार से सदा के लिए। आपके भाई साहब से कहकर नहीं आयी। स्टेशन आने पर यह विचार आया कि कहीं वह गोमती में जाल डलवाकर शव ढूँढ़ने की बुद्धिमत्ता न कर बैठें, इस कारण ड्राइवर द्वारा कहला भेजा था कि यहाँ आ रही हूँ। मैं अब आपको बुलाने की स्थिति में अपने को अनुभव नहीं करती। वैसे कोई लड़की अपने पिता के घर कभी भी आ सकती है। उसका सदा वहाँ स्वागत ही होता है।

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