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उपन्यास >> पाणिग्रहण पाणिग्रहणगुरुदत्त
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संस्कारों से सनातन धर्मानुयायी और शिक्षा-दीक्षा तथा संगत का प्रभाव
शारदा रात-भर करवटें लेने के पश्चात् चार बजे उठी। इस समय तक उसका मन स्थिर हो चुका था और वह मन-ही-मन अपने मार्ग पर चलने का निश्चय कर चुकी थी। उसने स्नान किया, साधारण-से कपड़े पहने और कोठी से निकल ड्राइवर को उसकी कोठरी में जाकर जगाया। उससे कहा, ‘‘जल्दी करो। मुझको स्टेशन जाना है।’’
‘‘ड्राइवर पाँच मिनट में तैयार होकर गाड़ी निकाल लाया। शारदा उसमें सवार हो स्टेशन जा पहुँची। वहाँ उतर उसने ड्राइवर को कहा, ‘‘साहब से कह देना कि मैं दुरैया जा रही हूँ। आने के विषय में वहाँ से लिखूँगी।’’
ड्राइवर जानता था कि साहब दुरैया के रहने वाले हैं। परन्तु वे जब भी गाँव जाते थे तो गाँव तक मोटर में ही जाया करते थे। आज मालकिन को रेल से जाते देख विस्मय करने लगा। वह अभी वहाँ खड़ा विचार कर रहा था कि शारदा तीसरे दर्जे के टिकटघर की ओर चली गयी। शारदा ने टिकट लिया और भीतर प्लेटफार्म पर चली गयी, तो वह कोठी को लौट आया। साहब अभी जागे नहीं थे। बच्चे उठे तो नौकरानी ने उनको नहलाकर, कपड़े पहना, नित्य की भाँति माँ के पास भेज दिया। वे माँ के पूजा के कमरे में गये। वह वहाँ नहीं थी। उन्होंने नौकरानी से पूछा, तो वह भी मालकिन को ढूँढ़ने लगी।
वह यह समझ कि मालकिन कहीं बाहर काम से गयी होगी, कोठी के बाहर आकर चपरासी से पूछ रही थी, तो ड्राइवर ने, जो साहब के उठने की प्रतीक्षा कर रहा था, नौकरानी को कह दिया, ‘‘मालकिन दुरैया गयी हैं। मैं उनको स्टेशन तक छोड़कर आया हूँ।’’
इन्द्रनारायण उठा तो नौकरानी ने बता दिया कि ड्राइवर कहता है कि मालकिन दुरैया चली गयी हैं। इन्द्रनारायण ने ड्राइवर को बुलाकर पूछा तो उससे यह जानकर कि शारदा थर्ड क्लास का टिकट लेकर गयी है, वह बहुत चिन्तित हुआ। वह समझ नहीं सका कि वह रूठकर गई है या उसे त्यागकर। इस पर भी उसने उसके पीछे-पीछे गाँव जाने का विचार नहीं किया। वह सोच रहा था कि गाँव से शारदा अथवा उसके माता-पिता का कोई पत्र अवश्य आयेगा।
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