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उपन्यास >> पाणिग्रहण पाणिग्रहणगुरुदत्त
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संस्कारों से सनातन धर्मानुयायी और शिक्षा-दीक्षा तथा संगत का प्रभाव
‘‘क्या निन्दा की है मैंने? मैंने तो यही कहा है न कि जुआ खेलना और शराब पीना आपके दफ्तर के काम से कोई सम्बन्ध...।’’
इन्द्रनारायण ने चट से एक चपत उसके मुख पर दे मारी। साथ ही कह दिया, ‘‘यह बकवास तुम्हारे मस्तिष्क में किसने भर दी है?’’
शारदा के लिए यह नया अनुभव था। इस समय वह तेईस वर्ष की आयु की हो चुकी थी, परन्तु किसी ने उसके मुख पर चपत कभी नहीं मारी थी। इससे एक क्षण तो वह भौचक्की हो खड़ी रह गयी। फिर कुछ विचार कर वह चुपचाप अपने कमरे में चली गई।
इन्द्रनारायण भी अब पश्चात्ताप करने लगा। उसने क्रोधवश ही चपत लगाई थी। जब शारदा अपने कमरे में चली गई तो काफी देर तक विचारमग्न वह खड़ा रहा। पश्चात् यह विचार कर कि रात को आकर वह शारदा को मना लेगा, वह मोटर में बैठ चला गया।
शारदा अपने कमरे में बैठी अपने कर्तव्य पर विचार कर रही थी। रात के दस बजे तक वह वैसे ही बैठी रही। बैरे ने भोजन के लिए बुलाया तो भी वह नहीं उठी। उसने कह दिया कि वह आज भोजन नहीं करेगी।
अब उसने निश्चय कर लिया था कि वह यह कोठी छोड़ देगी। उसकी इन्द्रनारायण के साथ नहीं निभ सकेगी। तो वह कहाँ जाये? क्या मायके चली जाये? नहीं, वह दुरैया जायेगी और अपने श्वशुर के घर पर उनकी बहू बनकर अधिकार सहित रहेगी। उसे भरोसा था कि रामाधार उस पर विश्वास कर घर पर रखेगा।
इन्द्रनारायण क्लब से लौटा तो भी शारदा अपने कमरे में थी। उसने दरवाजा खटखटाकर शारदा को पुकारा, परन्तु न तो शारदा ने कोई उत्तर दिया, न ही उसने द्वार खोला। इन्द्रनारायण यह समझ कि वह सो गई है, अपने कमरे में चला गया और कपड़े बदलकर सो गया।
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