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उपन्यास >> पाणिग्रहण पाणिग्रहणगुरुदत्त
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संस्कारों से सनातन धर्मानुयायी और शिक्षा-दीक्षा तथा संगत का प्रभाव
‘‘और मिसेज बिन्द्रा अब क्लाब में क्यों नहीं आती?’’
‘नहीं आती तो बीमार होगी।’’
‘‘देखिये जी! मैं वहाँ की स्त्रियों में बैठ उनकी बातें सुन चुकी हूँ और उनकी बातों से इस परिणाम पर पहुँची हूँ कि वह स्थान न तो मेरे जाने योग्य है, न ही आपके जाने योग्य है।’’
‘‘तुमने किसी ने तंग किया है क्या?’’
‘‘अभी तो नहीं। मैं यह भी जानती हूँ कि मुझको कोई छूकर जीता नहीं बच सकता। इस पर भी वह नौबत आने से पहले ही वहाँ से दूर रहूँ तो क्या यह ठीक नहीं होगा?’’
‘‘तुम कुछ पागल होती जाती हो।’’
‘‘आप यह बताइए कि यदि आप आज वहाँ न जायें तो क्या हानि होने वाली है वहाँ?’’
‘‘आखिर न जाने से क्या लाभ भी क्या होगा?’’
‘‘एक लाभ तो यह होगा कि मुझको आपकी संगत मिलेगी। दूसरे, मैं आज आपके साथ क्लब के विषय में कुछ बातचीत करना चाहती हूँ।’’
‘‘मैं यह सब व्यर्थ समझता हूँ। तुम मेरी बातों में अनुचित हस्तक्षेप करने लगी हो। यह मेरी नौकरी का प्रश्न है। इसमें मैं तुम्हारी बात नहीं मान सकता। पहले भी तुम्हारा वहाँ न जाने से मेरी मान-प्रतिष्ठा में कमी हुई है।’’
‘‘परन्तु देखिये।’’ शारदा ने आग्रहपूर्वक कहा, ‘‘मैं आपकी पत्नी हूँ। आपके कार्यालय के काम को छोड़ आपके जुआ खेलने और शराब पीने में ही तो बाधा बन रही हूँ।’’
‘‘चुप रहो। अपने पति की निन्दा करते तुमको शर्म नहीं आती?’’
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