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उपन्यास >> पाणिग्रहण पाणिग्रहणगुरुदत्त
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संस्कारों से सनातन धर्मानुयायी और शिक्षा-दीक्षा तथा संगत का प्रभाव
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शारदा इक्के से द्वार पर उतरी तो रमाकान्त ने सबसे पहले देखा। वह आजकल गाँव में ही एक पाठशाला चला रहा था।
उसने शारदा के इक्के से उतरते देखा तो विस्मित रह गया। पढ़ाना छोड़कर वह स्कूल से बाहर निकल आया और भाभी के सम्मुख जा चरण-स्पर्श कर बोला, ‘‘भाभी! मोटर में नहीं आई?’’
‘‘वह खाली नहीं थी।’’ इतना कह शारदा मकान में चली गई।
सौभाग्यवती आई तो शारदा ने चरण-स्पर्श किए। रमाकान्त की पत्नी आई तो शारदा उससे गले मिली। सौभाग्यवती शारदा को भीतर ले गई। बैठते-बिठाते, मार्ग पर और पिछली रात का रुकी शोक तथा रोष फूट पड़ा। शारदा की आँखों में आँसू भर आए। सौभाग्यवती ने देखा तो पूछ लिया, ‘‘अरी, यह क्या? क्या हुआ है?’’
शारदा ने मुख से एक शब्द भी नही निकाला, परन्तु आँखों से आँसू गालों पर टपकने लगे। अब सौभाग्यवती ने देखा कि उसने श्रृंगार नहीं किया था। माथे पर बिन्दी और माँग में सिन्दूर भी नहीं था। इससे उसके मन में भयंकर सम्भावनाएँ उत्पन्न होने लगी थीं। सौभाग्यवती ने शारदा की पीठ पर हाथ फेरते हुए पूछा, ‘‘अकेली क्यों आई हो? तुम्हारा सौभाग्य-सिन्दूर कहाँ गया? क्या हुआ है बहू?’’
शारदा समझ गई कि उससे क्या भूल हो गई है। उसने कहा, ‘‘माँ जी! सब ठीक है। वे भली-भाँति हैं। मैं ही दुर्भागिनी हूँ। लखनऊ से चली आई हूँ। मुझको वहाँ का वातावरण और जलवायु अनुकूल नहीं।’’
‘‘बच्चे कहाँ हैं?’’
‘‘उनके पास, कोठी में ही हैं।’’
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