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उपन्यास >> निर्मला (उपन्यास)

निर्मला (उपन्यास)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :304
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8556
आईएसबीएन :978-1-61301-175

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अद्भुत कथाशिल्पी प्रेमचंद की कृति ‘निर्मला’ दहेज प्रथा की पृष्ठभूमि में भारतीय नारी की विवशताओं का चित्रण करने वाला एक सशक्तम उपन्यास है…


भाल–कितने पैसे देने पड़े?

मोटे–आपके हिसाब में लिख दिये हैं।

भाल–जितनी मिठाइयाँ ली हों, मुझे बता दीजिए, नहीं तो पीछे से बेईमानी करने लगेगा। एक ही ठग है।

मोटे–कोई ढाई सेर मिठाई थी और आध सेर रबड़ी।

बाबूसाहब ने विस्फारित नेत्रों से पंडितजी को देखा, मानो कोई अचम्भे की बात सुनी हो। तीन सेर तो कभी यहाँ महीने भर का टोटल भी न होता था और यह महाशय एक ही बार में कोई चार रुपये का माल उड़ा गये। अगर एक-आध दिन और रह गये तो बधिया बैठ जायगी। पेट है या शैतान की कब्र? तीन सेर! कुछ ठिकाना है! उद्विग्न दशा में दौड़े हुए अन्दर गये और रँगीली से बोले-कुछ सुनती हो, यह महाशय कल तीन सेर मिठाई उड़ा गये। तीन सेर पक्की तौल? रँगीलीबाई ने विस्मित होकर कहा–अजी नहीं तीन सेर भला क्या खा जायगा! आदमी है या बैल?

भाल–तीन सेर तो अपने मुँह से कह रहा है। चार सेर से कम न खाया होगा, पक्की तौल!

रँगीली–पेट में सनीचर है क्या?

भाल–आज और रह गया तो छः सेर पर हाथ फेरेगा।

रँगीली–तो आज रहे ही क्यों, खत का जवाब जो देना हो देकर विदा करो। अगर रहे तो साफ कह देना कि हमारे यहाँ मिठाई मुफ्त नहीं आती। खिचड़ी बनाना हो, बनावे, नहीं तो अपनी राह ले। जिन्हें ऐसे पेटुओं को खिलाने से मुक्ति मिलती हो, वे खिलायें हमें ऐसी मुक्ति न चाहिये।

मगर पंडित विदा होने को तैयार बैठे थे, इसीलिए बाबूसाहब को कौशल से काम लेने की जरूरत न पड़ी।

पूछा-क्या तैयारी कर दी महाराज?

मोटे–हाँ सरकार, अब चलूँगा। नौ बजे की गाड़ी मिलेगी न?

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