चन्द्रकान्ता सन्तति - 2 - देवकीनन्दन खत्री Chandrakanta Santati - 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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चन्द्रकान्ता सन्तति - 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :240
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8400
आईएसबीएन :978-1-61301-027-3

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चन्द्रकान्ता सन्तति 2 पुस्तक का ई-पुस्तक संस्करण...

छठवाँ बयान

आधी रात जा चुकी है, चारों तरफ़ सन्नाटा छाया हुआ है, हवा भी एकदम बन्द है, यहाँ तक कि किसी पेड़ की एक पत्ती भी नहीं हिलती। आसमान में चाँद तो नहीं दिखायी देता, मगर जंगल मैदान में चलने वाले मुसाफ़िरों को तारा की रोशनी, जो अब बहुतायत से दिखायी दे रहे हैं, काफी है। ऐसे समय में गंगा के किनारे-किनारे दो मुसाफ़िर तेजी के साथ जमानिया की तरफ़ जा रहे हैं। जमानिया, अब बहुत दूर नहीं है और ये दोनों मुसाफ़िर शहर के बाहरी प्रान्त में पहुँच चुके हैं।

अब वे दोनों आदमी शहर के पास पहुँच गये, मगर शहर के अन्दर न जाकर बाहर-ही-बाहर मैदान के उस हिस्से की तरफ़ जाने लगे, जिधर पुराने जमाने की आबादी का कुछ-कुछ निशान मौजूद था। यहाँ बहुत-से टूटे-फूटे मकानों के कोई-कोई हिस्से बचे हुए थे, जो बदमाशों तथा चोरों के काम में आते थे। यहाँ बनिस्बत शहर के कमजोर दिमागवालों और डरपोक आदमियों में तरह-तरह की गप्पें उड़ा करती थीं। कोई कहता था कि वहाँ किसी जमाने में बहुत-से आदमी मारे गये हैं और वे लोग भूत होकर अभी तक मौजूद हैं और उधर से आने-जाने वालों को सताया करते हैं। कोई कहता था कि उस ज़मीन में जिन्नों ने अपना घर बना लिया है और जो कोई उधर से आता है, उसे मारकर अपनी जात में मिला लिया करते हैं, इत्यादि तरह-तरह की बातें लोग करते थे। मगर उन दोनों मुसाफ़िरों को जो इस समय उसी तरफ़ कदम बढ़ाये जा रहे हैं, इन बातों की कुछ परवाह न थी।

थोड़ी ही देर में ये दोनों आदमी जिनमें से एक बहुत ही कमजोर और थका हुआ जान पड़ता था, उस हिस्से में जा पहुँचे और खड़े होकर चारों तरफ़ देखने लगे। पास ही में एक पुराना मकान दिखायी दिया, जो तीन हिस्से से ज़्यादे टूट चुका था और उसके चारों तरफ़ जंगली पेड़ों और लताओं ने एक भयानक-सा दृश्य बना रक्खा था। उसी जगह एक आदमी टहलता हुआ नज़र आया, जो उन दोनों को देखते ही पास आया और बोला, "हमारे साथियों ने उस नियत जगह पर ठहरना उचित न जाना और राय पक्की हुई कि एक नाव पर सवार होकर सब लोग काशी की तरफ़ रवाना हो जाँय और उसी जगह से अपनी कार्रवाई करें। वे लोग नाव पर सवार हो चुके हैं और कमलिनीजी यह कहकर मुझे इस जगह छोड़ गयी हैं कि तेजसिंह, राजा गोपालसिंह को साथ लेकर आवें तो उन्हें लिये हुए बालाघाट की तरफ़, जहाँ हम लोगों की नाव खड़ी होगी, बहुत जल्द चले आना।"

पाठक समझ गये होंगे कि ये दोनों मुसाफ़िर तेजसिंह और राजा गोपालसिंह (मायारानी के पुराने कैदी) थे, हाँ, उस आदमी का परिचय हम दिये देते हैं, जो उन दोनों को इस भयानक स्थान में मिला था। वह तेजसिंह के प्यारे दोस्त देवीसिंह थे।

देवीसिंह की बात सुनकर तेजसिंह अपने साथी राजा गोपालसिंह को साथ लिये हुए वहाँ से रवाना हुए थोड़ी देर में गंगा के किनारे पहुँचकर उस नाव पर जा सवार हुए, जिस पर कमलिनी, लाडिली, इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह, तारासिंह, भैरोसिंह और शेरसिंह सवार थे। वह किश्ती बहुत छोटी तो न थी, मगर हल्की व तेज़जाने वाली थी। मालूम होता है कि उसको उन लोगों ने खरीद लिया था, क्योंकि उस पर कोई मल्लाह न था और केवल ऐयार लोग खेकर ले जाने के लिए तैयार थे। तेजसिंह को और राजा गोपालसिंह को देखते ही सब उठ खड़े हुए। कुँअर इन्द्रजीतसिंह ने खातिर के साथ राजा गोपालसिंह को अपने पास बैठाकर किश्ती किनारे से हटाने की आज्ञा दी और बात-की-बात में नाव किनारा छोड़कर दूर दिखायी देने लगी।

इन्द्रजीत : (राजा गोपालसिंह से) मैं इस समय आपको अपने पास देखकर बहुत ही प्रसन्न हूँ, ईश्वर ही ने आपकी जान बचायी।

गोपाल : मुझे अपने बचने की कुछ भी आशा न थी, यह तो बस आपके चरणों का प्रताप है कि कमलिनी वहाँ गयी और उसे इत्तिफाक से मेरा हाल मालूम हो गया।

कमलिनी : मुझे आशा थी कि आपको साथ लिये तेजसिंह सूर्य निकलने के साथ ही हम लोगों से आ मिलेंगे, मगर दो दिन की देर हो गयी और वह दो दिन का समय बड़ी मुश्किल से बीता, क्योंकि हम लोगों को बड़ी चिन्ता इस बात की थी कि आपके आने में देर क्यों हुई। अब सबके पहिले इस विलम्ब का कारण हम लोग सुना चाहते हैं।

गोपाल : तेजसिंह जिस समय मुझे क़ैद से छुड़ाकर उस तिलिस्मी बाग के बाहर हुए, उस समय उन्होंने राजा बीरेन्द्रसिंह का ज़िक्र किया और कहा कि हरामजादी मायारानी ने राजा बीरेन्द्रसिंह और रानी चन्द्रकान्ता को भी इस तिलिस्म में कहीं क़ैद कर रक्खा है, जिनका पता नहीं लगता। यह सुनते ही मैं उन्हें साथ लिये हुए फिर उसी तिलिस्मी बाग में चला गया। जहाँ-जहाँ मैं जा सकता था, जाकर अच्छी तरह पता लगाया, क्योंकि क़ैद से छूट जाने पर मैं बिल्कुल ही लापरवाह और निडर हो गया था।

इन्द्रजीत : यह काम आपने बहुत ही उत्तम किया। हाँ, तो उनका कहीं पता लगा?

गोपाल : (सिर हिलाकर) नहीं, वह ख़बर बिल्कुल झूठ थी। उसने आप लोगों को धोखा देने के लिए अपने ही दो आदमियों को राजा बीरेन्द्रसिंह और रानी चन्द्रकान्ता की सूरत में रँग के क़ैद कर रक्खा है।

कमलिनी : यह आपको कैसे निश्चय हुआ?

गोपाल : हमने स्वयं उन दोनों को आजमाकर देख लिया।

इन्द्रजीत : यह ख़बर सुनकर हम लोगों को हद्द से ज़्यादे खुशी हुई, अब हम लोग उनकी तरफ़ से निश्चिन्त हो गये और केवल किशोरी और कामनी की फिक्र रह गयी।

तेज : बेशक, हम लोग उनकी तरफ़ से निश्चिन्त हो गये। (राजा गोपालसिंह की तरफ़ इशारा करके) इनके साथ दो दिन तक बाग में रहने और गुप्त स्थानों में घूमने का मौका मिला। ऐसी-ऐसी चीज़ें देखने में आयीं कि होश दंग रह गये। यद्यपि राजा बीरेन्द्रसिंह के साथ विक्रमी तिलिस्म में बहुत कुछ तमाशा देख चुका हूँ, परन्तु अब यही कहते बन पड़ता है कि इस तिलिस्म के आगे उसकी कोई हकीकत न थी।

कमलिनी : यह उस तिलिस्म के राजा ही ठहरे, फिर इनसे ज़्यादे वहाँ का हाल कौन जान सकता था और किसकी सामर्थ्य थी कि दो दिन तक उस बाग में आपको रखकर घुमाये? वहाँ का जितना हाल ये जानते हैं, उसका सोलहवाँ हिस्सा भी मायारानी नहीं जानती। ये बेचारे नेक और धर्मात्मा हैं, पर न मालूम क्योंकर उस कम्बख्त के धोखे में पड़ गये।

आनन्द : बेशक, इनका किस्सा बहुत ही दिलचस्प होगा।

गोपाल : मैं अपना अनूठा किस्सा आपसे कहूँगा, जिसे सुनकर आप अफसोस करेंगे। (लाडिली की तरफ़ देखके) क्यों लाडिली, तू अच्छी तरह से तो है?

लाडिली : (गद्गद स्वर में) इस समय मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं! क्या स्वप्न में भी गुमान हो सकता था कि इस जिन्दगी में पुन : आपको देखूँगी? यह दिन आज कमलिनी बहिन की बदौलत देखने में आया।

गोपाल : बेशक बेशक, और ये पाँच वर्ष मैंने किस मुसीबत में काटे हैं, सो बस मैं ही जानता हूँ (कमलिनी की तरफ़ देखकर), मगर तुझे उस तिलिस्मी बाग के अन्दर घुसने का साहस कैसे हुआ?

कमलिनी : 'रिक्तगन्थ' मेरे हाथ लग गया, इसी से मैं इतना काम कर सकी।

गोपाल : ठीक है, तब तो तू मुझसे भी ज़्यादे वहाँ का हाल जान गयी होगी।

इन्द्रजीत : (चौंककर और कमलिनी की तरफ़ देखकर) क्या 'रिक्तगन्थ' तुम्हारे पास है?

कमलिनी : (हँसकर) जी हाँ, मगर इससे यह न समझ लीजिएगा कि मैंने आपके यहाँ चोरी की थी?

तेज : नहीं नहीं, मैं खूब जानता हूँ कि 'रिक्तगन्थ' का चोर कोई दूसरा ही है, आपको नानक की बदौलत वह किताब हाथ लगी।

कमलिनी : जी हाँ, जिस समय तिलिस्मी बाग में नानक अपना किस्सा आपसे कह रहा था, मैं छिपकर सुन रही थी।

इन्द्रजीत : नानक का किस्सा कैसा है?

तेज : मैं आपसे कहता हूँ, ज़रा सब्र कीजिए।

इस समय उस किश्ती पर जितने आदमी थे सभी खुश थे, केवल इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह को किशोरी और कामिनी का ध्यान था। तेजसिंह ने अपने पागल बनने का हाल और उसी बीच में नानक का किस्सा, जितना उसकी जुबानी सुना था, कह सुनाया। तेजसिंह के पागल बनने का हाल सुनकर सभों को हँसी आ गयी। दोनों कुमारों ने नानक का बाकी हाल कमलिनी से पूछा, जिसके जवाब में कमलिनी ने कहा–"यद्यपि नानक का कुछ हाल मुझे मालूम है, मगर मैं इस समय कुछ भी न कहूँगी, क्योंकि उसका किस्सा सुने बिना इस समय कोई हर्ज़ भी नहीं, हाँ, इस समय थोड़ा-सा अपना हाल आपसे कहूँगी।"

कमलिनी ने भूतनाथ, मनोरमा और नागर का तथा अपना हाल जितना हम ऊपर लिख आये हैं, सभों के सामने कहना शुरू किया। अपना हाल कहते-कहते जब कमलिनी ने मनोरमा के मकान का अद्भुत हाल कहना शुरू किया तो सभों को बड़ा ही ताज्जुब हुआ और किशोरी की अवस्था पर इन्द्रजीतसिंह को रुलाई आ गयी। उनके दिल पर बड़ा ही सदमा गुजरा, मगर तेजसिंह के लिहाज से, जिन्हें वे चाचा के बराबर समझते थे, अपने को सम्हाला। गोपालसिंह ने दिलासा देकर कहा, "आप लोग घबड़ाइए नहीं, कम्बख्त मनोरमा के मकान का पूरा-पूरा भेद मैं जानता हूँ, इसलिए मैं बहुत जल्द किशोरी को उसकी क़ैद से छुड़ा लूँगा।"

लाडिली : कमलिनी भी उसी के मकान में भेज दी गयी है।

गोपाल : यह और अच्छी बात है, "एक पन्थ दो काज' हो जायगा?

इन्द्रजीत : (कमलिनी से) अब वह 'रिक्तगन्थ' मुझे कब मिलेगा?

कमलिनी : वह मेरे पास है, उसी की बदौलत मैं आपको उस कैदख़ाने से छुड़ा सकी और उसी की बदौलत आपको तिलिस्म तोड़ने में सुगमता होगी, मैं बहुत जल्द वह किताब आपके हवाले करूँगी।

गोपाल : (चारों तरफ़ देखके कमलिनी से) ओफ, बात-की-बात में हम लोग बहुत दूर निकल आये! क्या तुम्हारा इरादा काशी चलने का है?

कमलिनी : जी हाँ, हमलोगों ने तो यही इरादा कर लिया है कि काशी चलकर किसी गुप्त स्थान में रहेंगे और उसी जगह से अपनी कार्रवाई करेंगे?

गोपाल : मगर मेरी राय तो कुछ दूसरी है।

कमलिनी : वह क्या? मुझे विश्वास है कि आप बनिस्बत मेरे बहुत अच्छी राय देंगे।

गोपाल : यद्यपि मैं इस शहर जमानिया का राजा हूँ और इस शहर को फिर से कब्जे में कर सकता हूँ, परन्तु पाँच वर्ष तक मेरे मरने की झूठी ख़बर लोगों में फैली रहने के कारण यहाँ की रिआया के मन में बहुत कुछ फर्क पड़ गया होगा। यदि ऐसा न भी हो तो भी मैं अपने को जाहिर नहीं किया चाहता और न मायारानी को ही अभी जान से मारूँगा, क्योंकि यदि वह मर ही जायगी तो अपने किये का यथार्थ फल मेरे देखते कौन भोगेगा? इसलिए मैं थोड़े दिनों तक छिपे रहकर उसे सजा देना उचित समझता हूँ।

कमलिनी : जैसी मर्जी।

गोपाल : (कमलिनी से) इसलिए मैं चाहता हूँ कि कुँअर साहब अपना एक ऐयार मुझे दें, मैं उसे लेकर काशी जाऊँगा और किशोरी तथा कामिनी को जो मनोरमा के मकान में क़ैद हैं बहुत जल्द छुड़ा लाऊँगा, तब तक तुम दोनों कुमारों और लाडिली को अपने साथ लेकर मायारानी के उस तिलिस्मी बाग के चौथे दर्जे में जाकर देवमन्दिर में रहो। वहाँ खाने के लिए मेवों की बहुतायत है और पानी का चश्मा भी जारी है। मायारानी को तुम लोगों का हाल मालूम न होगा क्योंकि उसे वह स्थान मालूम नहीं है और न वहाँ तक जा ही सकती है। उसी जगह रहकर दोनों कुमारों को एक दो दफे 'रिक्तगन्थ' शुरू से आखीर तक अच्छी तरह पढ़ जाना चाहिए, जो बातें इनकी समझ में न आवें तुम समझा देना और इसी बीच में वहाँ की बहुत सी अद्भुत बातें भी ये देख लेंगे, इसलिए कि इनको बहुत जल्द वह तिलिस्म तोड़ना होगा, जैसा कि हम बुजुर्गों की लिखी किताब में देख चुके हैं, वह इन्हीं लोगों के हाथ से टूटेगा।

कमलिनी : बेशक बेशक।

गोपाल : और एक ऐयार को रोहतासगढ़ भेज दो कि वहाँ जाकर महाराज बीरेन्द्रसिंह को कुमारों के कुशल-मंगल का हाल कहे और थोड़ी-सी फौज अपने साथ ले आकर जमानिया के मुकाबिले में लड़ाई शुरू कर दे, मगर वह लड़ाई ज़ोर के साथ शीघ्र बखेड़ा निपटाने की नीयत से न की जाय जब तक कि हम लोग दूसरा हुक्म न दें। बस इसके बाद जब मैं अपना काम करके अर्थात् किशोरी और कमलिनी को छुड़ाकर लौटूँगा और तुमसे मिलूँगा तो जो कुछ मुनासिब होगा किया जायगा। हाँ देवमन्दिर में रहकर मौका मिले तो मायारानी को गुप्त रूप से छेड़ती रहना।

कमलिनी : आपकी राय बहुत ठीक है मगर आप क़ैद की तकलीफ उठाने के कारण बहुत ही सुस्त और कमजोर हो रहे हैं, इतनी तकलीफ क्योंकर उठा सकेंगे।

गोपाल : तुम इसकी चिन्ता मत करो! (कुमारों की तरफ़ देखकर) आप लोग मेरी राय पसन्द करते हैं या नहीं?

कुमार : बेशक आपकी राय उत्तम है।

कमलिनी : अच्छा तो अपना तिलिस्मी खंजर जिसका गुण आपसे कह चुकी हूँ, आपको देती हूँ, यह आपकी बहुत सहायता करेगा।

गोपाल : हाँ बेशक यह खंजर ऐसी अवस्था में मेरे साथ रहने योग्य है, परन्तु वह जब तक तुम्हारे पास है, तुम्हें किसी तरह का खतरा नहीं पहुँच सकता इसलिए खंजर को मैं तुमसे जुदा न करूँगा।

इन्द्रजीत : उस खंजर का जोड़ा जो कमलिनी ने मुझे दिया है, मैं आपको देता हूँ, आप इसे अवश्य अपने साथ रक्खें।

गोपाल : नहीं नहीं, इसकी कोई आवश्यकता नहीं।

इन्द्रजीत : आपको मेरी यह बात अवश्य माननी पड़ेगी।

इतना कहकर इन्द्रजीतसिंह ने वह खंजर जबर्दस्ती गोपालसिंह के हवाले किया और किश्ती किनारे लगाने का हुक्म दिया।

गोपाल : अच्छा तो मेरे साथ कौन ऐयार चलेगा?

इन्द्रजीत : जिसे आप पसन्द करें! केवल तेजसिंह चाचा को मैं अपने पास रखना चाहता हूँ, इसलिए कि उनकी जुबानी उन घटनाओं का हाल सुनूँगा जो आपको क़ैद से छुड़ाने के समय हुई होंगी।

गोपाल : (हँसकर) बेशक वे बातें सुनने योग्य हैं।

देवी : आपके साथ मैं चलूँगा।

गोपाल : अच्छी बात है।

इन्द्र : भैरोसिंह को रोहतासगढ़ भेजता हूँ!

गोपाल : बहुत मुनासिब, मगर तेजसिंह के अतिरिक्त और दोनों ऐयारों को अर्थात् तारासिंह और शेरसिंह को अपने साथ मत फँसाये रहिएगा।

इन्द्रजीत : नहीं नहीं, उन दोनों अपने रहने का ठिकाना दिखाकर छोड़ देंगे, ये दोनों चारों तरफ़ घूम-घूमकर ख़बर लगाते रहेंगे।

गोपाल : और मैं भी यही चाहता हूँ। (कमलिनी की तरफ़ देखकर) बाग के चौथे दर्जे में जो देवमन्दिर है, वहाँ जाने का रास्ता तुझे अच्छी तरह मालूम है या नहीं?

कमलिनी : 'रिक्तगन्थ' की बदौलत वहाँ का रास्ता मैं अच्छी तरह जानती हूँ।

इतने में किश्ती किनारे लगी और सब कोई उतर पड़े।

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