चन्द्रकान्ता सन्तति - 2 - देवकीनन्दन खत्री Chandrakanta Santati - 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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चन्द्रकान्ता सन्तति - 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :240
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8400
आईएसबीएन :978-1-61301-027-3

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चन्द्रकान्ता सन्तति 2 पुस्तक का ई-पुस्तक संस्करण...

पाँचवाँ बयान

दिन दोपहर से ज़्यादे चढ़ चुका है, मगर मायारानी को खाने-पीने की कुछ भी सुध नहीं है। पल-पल में उसकी परेशानी बढ़ती ही जाती है। यद्यपि बिहारीसिंह, हरनामसिंह और धनपति ये तीनों उसके पास मौजूद हैं, परन्तु समझाने-बुझाने की तरफ़ किसी का भी ध्यान नहीं। उसे कोई भी नहीं दिलासा देता, कोई धीरज नहीं बाँधता और कोई भी यह विश्वास नहीं दिलाता कि तुझ पर आयी हुई बला टल जायगी, यहाँ तक कि किसी के मुँह से यह भी नहीं निकलता कि सब्र कर, हम लोग ऐयारी के फन में होशियार हैं, कोई-न-कोई काम अवश्य करेंगे।

ऊपर के बयानों को पढ़कर पाठक समझ ही गये होंगे कि मायारानी की तरह उसकी धनपति और उसके दोनों ऐयार बिहारीसिंह तथा हरनामसिंह भी किसी भारी पाप के बोझ से दबे हुए हैं और ऊपर की घटनाओं ने उन तीनों की भी जान सुखा दी है। ये तीनों ही बदहोश और परेशान हो रहे हैं, इन तीनों को भी अपनी-अपनी फिक्र पड़ी है और इस समय इन तीनों के अतिरिक्त कोई चौथा आदमी मायारानी के सामने नहीं है, फिर उसे कौन समझावे-बुझावे? इनके सिवाय कोई चौथा आदमी उसके भेदों को जानता भी नहीं और न वह किसी को अपना भेद बताने का साहस कर सकती है। मायारानी की उदासी से चारों तरफ़ उदासी फैली हुई है। लौंडियों, नौकरों और सिपाहियों को भी चिन्ता ने आकर घेर लिया और कोई भी नहीं जानता कि क्या हुआ या क्या होनेवाला है।

बहुत देर तक चुप रहने के बाद बिहारीसिंह ने सिर उठाया और मायारानी की तरफ़ देखकर कहा–

बिहारी : एक तो बीरेन्द्रसिंह के ऐयार स्वयं धुरन्धर हैं, जिनका मुकाबला कोई नहीं कर सकता, दूसरे कमलिनी की मदद से उन लोगो का साहस और भी बढ़ गया है।

धनपति : इसमें कोई सन्देह नहीं कि आजकल जो खराबी हो रही है, वह सब कमलिनी ही की बदौलत है, जिसका हम लोग कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते।

माया : अफसोस, वह कम्बख्त इस तिलिस्मी बाग के अन्दर आकर अपना काम कर जाय और किसी को कानों कान ख़बर न हो! हाय, न मालूम हम लोगों की क्या दुर्दशा होने वाली है! क्या करूँ, कहाँ भागकर जाऊँ, अपनी जान बचाने के लिए क्या उद्योग करूँ।

धनपति : अभी एकदम से हताश न हो जाना चाहिए, बल्कि देखना चाहिए कि इस मुनादी का क्या असर रिआया के दिल पर होता है।

माया : हाँ, मुझे ज़रा फिर से समझाके कह तो सही कि मुनादीवाले को क्या कह के पुकारने की आज्ञा मेरी तरफ़ से दी गयी है? उस समय मैं आपे में बिल्कुल न थी, इससे कुछ समझ में न आया।

धनपति : आपकी तरफ़ से मैंने दीवान साहब को हुक्म दिया, जिसका बन्दोबस्त उन्होंने पूरा-पूरा किया। मेरे सामने ही उन्होंने चार डुग्गीवालों को तलब किया और समझाकर कह दिया कि वे लोग शहर-भर में पुकारकर इस बात की मुनादी कर दें कि 'सरकारी ऐयारों को मालूम हुआ है कि बीरेन्द्रसिंह का एक ऐयार राजा गोपालसिंह की सूरत बनकर शहर में आया है, जिन्हें बैकुण्ठ पधारे पाँच वर्ष के लगभग हो चुके हैं, और रिआया को भड़काया चाहता है। जो कोई उस कम्बख्त का सिर काटकर लावेगा, उसे एक लाख रुपया इनाम दिया जायगा'।

माया : ठीक है, मगर देखा चाहिए कि इसका नतीजा क्या निकलता है।

बिहारी : दो दिन के अन्दर-ही-अन्दर कुछ काम न चला तो समझ लेना चाहिए कि इस मुनादी का असर उलटा ही होगा।

माया : ख़ैर, जो कुछ नसीब में लिखा है, भोगूँगी, इस समय बदहवास होने से तो काम नहीं चलेगा। मगर यह तो कहो कि तुम दोनों ऐयार ऐसी अवस्था में मेरी सहायता किस रीति से करोगे?

बिहारी : मेरे किये तो कुछ न होगा। मैं खूब समझ चुका हूँ कि बीरेन्द्रसिंह के ऐयारों तथा कमलिनी का मुकाबला मैं किसी तरह नहीं कर सकता। देखो तेजसिंह ने मेरा मुँह ऐसा काला किया कि अभी तक रंग साफ़ नहीं होता। न मालूम उसे कैसे-कैसे मसाले याद हैं। इसके अतिरिक्त तुम्हें अपने लिए शायद कुछ उम्मीद हो मगर मैं तो बिल्कुल ही नाउम्मीद हो चुका हूँ और अब एक घण्टे के लिए भी यहाँ ठहरना बुरा समझता हूँ।

माया : क्या तुम वास्तव में वैसा ही करोगे, जैसा कह चुके हो?

बिहारी : हाँ, बेशक मैं अपनी राय पक्की कर चुका हूँ, मैं इसी समय यहाँ से चला जाऊँगा और फिर मेरा पता कोई भी न लगा सकेगा।

माया : (हरनामसिंह की तरफ़ देखकर) और तुम्हारी क्या राय है?

हरनाम : मेरी भी वही राय है, जो बिहारीसिंह की है!

माया : खूब समझ-बूझकर मेरी बातों का जवाब दो।

हरनाम : जो कुछ समझना था, समझ चुका।

माया : (कुछ सोचकर) अच्छा मैं एक तरकीब बताती हूँ, अगर उससे कुछ काम चले तो फिर जो कुछ तुम्हारी समझ में आवे करना या जहाँ जी चाहे जाना।

बिहारी : अब उद्योग करना वृथा है, मेरे लिए कुछ भी न होगा!

माया : नहीं नहीं, घबराओ मत, तुम जानते हो कि मैं इस तिलिस्म की रानी हूँ और इस तिलिस्म में बहुत-सी अद्भुत चीज़ें हैं। मैं तुम दोनों को एक चीज़ देती हूँ, जिसे देखकर जिसका मतलब समझकर तुम दोनों स्वयं कहोगे कि 'कोई हर्ज़ नहीं, अब हम लोग बात-की-बात में लाखों आदमियों की जान ले सकते हैं'।

हरनाम : बेशक, तुम इस तिलिस्म की रानी हो और तुम्हारे अधिकार में बहुत-सी अनमोल चीज़ें हैं, परन्तु जब तक हम लोग उस वस्तु को देख नहीं लें, जिसके विषय में तुम कह रही हो तब तक किसी तरह का वादा नहीं कर सकते।

माया : मैं भी तो यही कर रही हूँ, तुम दोनों मेरे साथ चलों और उस चीज़ को देख लो, फिर अगर मन भरे तो मेरा साथ दो नहीं तो जहाँ जी चाहे चले जाओ।

हरनाम : ख़ैर, पहिले देखें तो सही वह कौन-सी अनूठी चीज़ है, जिस पर तुम्हें इतना भरोसा है।

माया : हाँ, मेरे साथ चलो, मैं अभी वह चीज़ तुम दोनों के हवाले करती हूँ।

मायारानी उठ खड़ी हुई और धनपति तथा दोनों ऐयारों को साथ लिये हुए वहाँ से रवाना हुई। बाग में घूमती वह उस बुर्ज के पास गयी जो बाग के पिछले कोने में था और जिसमें लाडिली और कमलिनी की मुलाकात हुई थी। उस बुर्ज के बगल ही में एक कोठरी स्याह पत्थर से बनी हुई थी, मगर यह मालूम न होता था कि उसका दरवाज़ा किधर से है, क्योंकि पिछली तरफ़ तो बाग की दीवार थी और बाकी तीनों तरफ़ वाली कोठरी की स्याह दीवारों में दरवाज़े का कोई निशान न था। मायारानी ने बिहारी से कहा, "कमन्द लगाओ क्योंकि हम लोगों को इस कोठरी की छत पर चलना होगा।" बिहारीसिंह ने वैसा ही किया। सबसे पहिले मायारानी कमन्द के सहारे उस कोठरी पर चढ़ गयी और इसके बाद धनपति और दोनों ऐयार भी उसी छत पर जा पहुँचे।

ऊपर जाकर दोनों ऐयारों ने देखा कि छत के बीचोबीच में एक दरवाज़ा ठीक वैसा ही है, जैसा प्रायः तहखानों के मुँह पर रहता है। वह दरवाज़ा लकड़ी का था, मगर उस पर लोहे की चादर मढ़ी हुई थी और उसमें एक साधारण ताला लगा हुआ था। मायारानी ने हरनामसिंह से कहा, "यह ताला मामूली है, इसे किसी तरह खोलना चाहिए।"

बिहारीसिंह ने अपने ऐयारी के बटुए में से लोहे की एक टेढ़ी सलाई निकाली और उसे ताले के मुँह में डालकर ताला खोल डाला, इसके बाद दरवाज़े का पल्ला हटाकर किनारे किया। मायारानी ने दोनों ऐयारों को अन्दर जाने के लिए कहा, मगर बिहारीसिंह ने इनकार किया और कहा, "पहिले आप इसके अन्दर उतरिए तब हम लोग इसके अन्दर जायँगे, क्योंकि यहाँ की अद्भुत बातों से हम लोग बहुत डर गये हैं।" लाचार होकर मायारानी कमन्द के सहारे उस कोठरी के अन्दर उतर गयी और इसके बाद धनपति और दोनों ऐयार भी नीचे उतर गये।

ऊपर का दरवाज़ा खुला रहने से कोठरी के अन्दर चाँदना पहुँच रहा था। यह कोठरी लगभग बीस हाथ के चौड़ी और इससे कुछ ज़्यादे लम्बी थी। यहाँ की ज़मीन लकड़ी की थी और उस पर किसी तरह का मसाला चढ़ा हुआ था। कोठरी के बीचोबीच एक छोटा-सा सन्दूक पड़ा हुआ था। धनपति का हाथ पकड़े मायारानी एक किनारे खड़ी हो गयी और दोनों ऐयारों की तरफ़ देखकर बोली, "तुम दोनों मिलकर इस सन्दूक को मेरे पास ले आओ।"

हुक्म के मुताबिक दोनों ऐयार उस सन्दूक के पास गये, मगर सन्दूक का कुण्डा पकड़ के उठाने का इरादा किया ही था कि उस ज़मीन का एक गोल हिस्सा जिस पर दोनों ऐयार खड़े थे, किवाड़ के पल्ले की तरह एक तरफ़ से अन्दर की तरफ़ यकायक धँस गया और वे दोनों ऐयार ज़मीन के अन्दर जा रहे, साथ ही एक आवाज़ ऐसी आयी, जिसके सुनने से धनपति को मालूम हो गया कि दोनों ऐयार नीचे जल की तह तक पहुँच गये।

इसके बाद ज़मीन का वह हिस्सा जो लकड़ी का था, फिर बराबर हो गया और सन्दूक भी उसी तरह दिखायी देने लगा।

यह हाल देख धनपति डर के मारे काँपने लगी और मायारानी की तरफ़ देखके बोली, "क्या यह कोई कूँआ है?"

माया : हाँ, यह कूँआ है और ऐसे नमकहरामों को सजा देने के लिए बनाया गया है! दोनों बेईमान ऐयार मेरा साथ छोड़के अपनी जान बचाया चाहते थे। हरामज़ादे, पाजी, नालायक अब अपनी सजा को पहुँचे।

धनपति : इतने दिनों तक आपके साथ रहने पर भी इस कूएँ का हाल मुझे न मालूम था।

माया : यहाँ के बहुत से भेद अभी तुम्हें नहीं मालूम हैं, ख़ैर, अब यहाँ से चलना चाहिए।

धनपति को साथ लिये मायारानी उस कोठरी के बाहर निकली और दरवाज़ा बन्द करने के बाद कमन्द के सहारे उतरकर अपने खास सोने वाले कमरे में चली आयी। मायारानी की लौंडियों ने मायारानी को दोनों ऐयारों धनपति के साथ उस कोठरी की तरफ़ जाते देखा था, मगर अब केवल धनपति को साथ लिये लौटते देख उनको ताज्जुब हुआ लेकिन डर के मारे कुछ पूछ न सकीं।

सन्ध्या का समय हो गया। मायारानी अपने कमरे में जाकर मसहरी पर लेट गयी। उस समय बहुत-सी लौंडियाँ उसके सामने थीं, मगर इशारा पाकर सब बाहर चली गयीं केवल धनपति वहाँ रह गयी।

धनपति : आपने बहुत जल्दी की, बेचारे ऐयारों की जान व्यर्थ ही गयी।

माया : वे दोनों कमीने इसी लायक थे। इसीलिए मैं उनसे बार-बार पूछ रही थी, जब देख लिया कि वे अपने विचार पर दृढ़ हैं तो लाचार...

धनपति : ख़ैर, जो कुछ हुआ सो अच्छा हुआ लेकिन अब क्या करना चाहिए? अफसोस यह है कि ऐसे समय में बेचारी मनोरमा भी नहीं है।

माया : (लम्बी साँस लेकर) हाय, बेचारी मनोरमा मेरी सच्ची सहायक थी पर उसे भी तेजसिंह ने गिरफ़्तार कर लिया। इसी ख़बर के साथ नागर ने कहला भेजा था कि भूतनाथ के काग़ज़ात अपने साथ लेकर उसे छुड़ाने जाती हूँ, मगर उस बात को भी बहुत दिन बीत गये और अभी तक मालूम न हुआ कि नागर के जाने का क्या नतीजा निकला। तेजसिंह ने उसे भी गिरफ़्तार कर लिया हो तो ताज्जुब नहीं, सच तो यह है कि भूतनाथ के मारने में मनोरमा ने बड़ी जल्दी की।

धनपति बेशक भूतनाथ के मारने में उसने भूल की, भूतनाथ से बहुत-कुछ काम निकलने की आशा थी।

इतने ही में बाहर से आवाज़ आयी, "थी नहीं बल्कि है!" मायारानी ने दरवाज़े की तरफ़ देखा तो नागर पर निगाह पड़ी।

मायारानी : आह, इस समय तेरा आना बहुत ही अच्छा हुआ, आ मेरे पास बैठ जा।

नागर : (मायारानी के पास बैठकर) मैं देखती हूँ कि आज आपकी अवस्था बिल्कुल बदली हुई है, कहिए मिजाज तो अच्छा है?

माया : अच्छा क्या है, बस दम निकलने की देर है।

नागर : (घबड़ाकर) सो क्या?

माया : अब आयी है तो सबकुछ सुन ही लेगी पहिले अपना हाल तो कह कि मेरी प्यारी सखी मनोरमा को छुड़ा लायी या नहीं और चौखट के अन्दर पैर रखते ही तैने यह क्या कहा था कि 'थी नहीं बल्कि है।' क्या भूतनाथ मारा नहीं गया? क्या वह ख़बर झूठ थी?

नागर : हाँ, वह ख़बर झूठी थी, मनोरमा ने भूतनाथ की जान नहीं ली और न उसे तेजसिंह ने गिरफ़्तार किया है, बल्कि वह कमलिनी की कैदी है।

माया : तो वह औरत जो मनोरमा की ख़बर लेकर तेरे पास आयी थी, झूठी थी?

नागर : वह स्वयं कमलिनी थी, मनोरमा को क़ैद कर चुकी थी और मुझे भी गिरफ़्तार किया चाहती थी, वह तो असल में भूतनाथ के काग़ज़ात ले लेने का बन्दोबस्त कर रही थी, बल्कि यों कहना चाहिए कि मैं उसके धोखे में भी आ गयी। उसने मुझे गिरफ़्तार कर लिया और भूतनाथ के बिल्कुल काग़ज़ात भी मुझसे लेकर जला दिये।

माया : यह बहुत ही बुरा हुआ, अब भूतनाथ बिल्कुल हम लोगों के कब्जे से बाहर हो गया ख़ैर, जीता है, यही बहुत है। यह कह कि तेरी जान कैसे बची?

इसके बाद नागर ने अपना पूरा-पूरा हाल मायारानी के सामने कहा और उसने बड़े ग़ौर से सुना। अन्त में नागर ने कहा, "इस समय भूतनाथ को अपने साथ ले आयी हूँ जो जी-जान से हम लोगों की मदद करने के लिए तैयार है।"

यह सुनकर कि भूतनाथ अब हम लोगों का पक्षपाती हो गया और नागर के साथ आया है, मायारानी बहुत ही खुश हुई और उसे एक प्रकार की आशा बँध गयी। उसने धनपति की तरफ़ देखकर कहा, "ताज्जुब नहीं कि वह बला मेरे सिर से टल जाय, जिसके टलने की आशा न थी।"

नागर : आपने अपना हाल तो कुछ कहा ही नहीं! यह जानने के लिए मेरा जी बेचैन हो रहा है कि आप क्यों उदास हो रही हैं और आप पर क्या बला आयी है?

माया : थोड़ी देर में तुझे सबकुछ मालूम हो जायगा, पहिले भूतनाथ को मेरे पास बुला ला, मैं स्वयं उससे कुछ बात किया चाहती हूँ!

मायारानी ने अपना बिल्कुल हाल अर्थात् तेजसिंह के पागल बनके जाना, उन्हें बाग के तीसरे दर्जे में क़ैद करना, चण्डूल का यकायक पहुँचना और उसकी अद्भुत बातें तथा लाडिली का दगा दे जाना आदि नागर से कहा, मगर अपने पुराने कैदी के छूटने का और दोनों ऐयारों को मार डालने का हाल छिपा रक्खा, हाँ, उसके बदले में इतना कहा कि, "बीरेन्द्रसिंह का एक ऐयार मेरे पति की सूरत बनाकर आया है, जिन्हें मरे पाँच वर्ष के लगभग हुए, उसी को गिरफ़्तार करने के लिए बिहारीसिंह और हरनामसिंह गये हैं।'

नागर : मगर यह तो कहिए कि चण्डूल आपके तथा बिहारीसिंह और हरनामसिंह के कान में क्या कहा।

माया : बहुत पूछने पर भी बिहारीसिंह और हरनामसिंह ने नहीं बताया कि चण्डूल ने उनके कान में क्या कहा था।

नागर : और आपके कान में क्या कहा?

माया : मेरे कान में तो उसने केवल इतना ही कहा था कि 'आठ दिन के अन्दर ही यह राजा इन्द्रजीतसिंह का हो जायगा और तू मारी जायगी'। ख़ैर, जो होगा देखा जायगा, अब भूतनाथ को यहाँ ले आ, उससे मिलने की बहुत ज़रूरत है।

नागर : बहुत अच्छा, तो क्या इसी जगह बुला लाऊँ?

माया : हाँ हाँ, इसी जगह बुला ला। वह तो ऐयार है, उससे पर्दा काहे का।

नागर कुछ सोचती-विचारती वहाँ से रवाना हुई और भूतनाथ को जिस फाटक पर छोड़ गयी थी, साथ लेकर बाग के अन्दर घुसी। पहरेवालों ने किसी तरह का उज्र न किया और भूतनाथ इस बाग की हर-एक चीज़ को अच्छी तरह देखता और ताज्जुब करता हुआ मायारानी के पास पहुँचा। नागर ने मायारानी की तरफ़ इशारा करके कहा, "यही हम लोगों की मायारानी हैं।" और भूतनाथ ने यह कहकर कि "मैं बखूबी पहिचानता हूँ' मायारानी को सलाम किया।

मायारानी ने भूतनाथ की उतनी ही खातिरदारी और चापलूसी की, जितनी कोई खुदगर्ज आदमी उसकी खातिरदारी करता है, जिससे कुछ मतलब निकालने की आवश्यकता होती है।

माया : तुम्हारी स्त्री तुम्हें मिल गयी?

भूतनाथ : जी हाँ, मुझे मिल गयी और यह उस इनाम का पहिला नमूना है, जो आपकी ताबेदारी करने पर मुझे मिलने की आशा है।

माया : नागर ने जो कुछ प्रतिज्ञा तुमसे की है, मैं अवश्य पूरी करूँगी। बल्कि उससे बहुत ज़्यादे इनाम हरएक काम के बदले में दिया करूँगी।

भूतनाथ : मैं दिलोजान से आपके काम में उद्योग करूँगा और कमलिनी को बुरा धोखा दूँगा। वह जितना मुझपर विश्वास रखती है, उतना ही पछताएगी, परन्तु आपको भी कई बातों का खयाल रखना चाहिए।

माया : वह क्या?

भूतनाथ : एक तो जाहिर में मैं कमलिनी का दोस्त बना रहूँगा, जिसमें उसे मुझ पर किसी तरह का शक न हो, यदि आपका कोई जासूस मेरे विषय में आपको इस बात का सबूत दे कि मैं कमलिनी से मिला हुआ हूँ तो आप किसी तरह की चिन्ता न कीजिएगा।

माया : नहीं नहीं, ऐसी छोटी-छोटी बातें मुझे समझाने की कोई ज़रूरत नहीं है, मैं खूब जानती हूँ कि बिना उससे मिले किसी तरह का काम न चलेगा।

भूतनाथ : बेशक बेशक, और इसी वजह से मैं बहुत छिपकर आपके पास आया करूँगा।

माया : ऐसा ही होना चाहिए, और दूसरी बात कौन-सी है?

भूतनाथ : दूसरे यह कि मुझसे आप अपने भेद न छिपाया कीजिए, क्योंकि ऐयारों का काम बिना ठीक-ठीक भेद जाने नहीं चल सकता।

माया : मुझे तुम पर पूरा भरोसा है, इसलिए मैं अपना कोई भेद तुमसे न छिपाऊँगी।

भूतनाथ : अच्छा, अब एक बात मैं आपसे और कहूँगा।

माया : कहो!

भूतनाथ : नागर की जुबानी यह तो आपको मालूम ही हुआ होगा कि काशी में मनोरमा के तिलिस्मी मकान के अन्दर किशोरी के रखने का हाल कमलिनी जान गयी है।

माया : हाँ, नागर वह सब हाल मुझसे कह चुकी है।

भूतनाथ : ठीक है, तो आपने यह भी विचारा होगा कि किशोरी को उस मकान से निकालकर किसी दूसरे मकान में रखना चाहिए।

माया : हाँ, मेरी तो यही राय है।

भूतनाथ : मगर नहीं, आप किशोरी को उसी मकान में रहने दीजिए, इस बात की ख़बर मैं किशोरी के पक्षपातियों को दूँगा, जिसे सुनकर वे लोग किशोरी को छुड़ाने की नीयत से अवश्य उस मकान के अन्दर जायँगे, उस समय उन लोगों को ऐसे ढंग से फँसा लूँगा कि किसी को पता न लगेगा और न इसी बात का शक किसी को होगा कि मैं आपका तरफ़दार हूँ।

माया : तुम्हारी राय तो बहुत अच्छी है, मैं इसे पसन्द करती हूँ और ऐसा ही करूँगी।

भूतनाथ : अच्छा तो अब आप यह बताइए कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह वगैरह के साथ आपने क्या बर्ताव किया, जो आपके यहाँ क़ैद हैं?

माया : (ऊँची साँस लेकर) अफसोस, कमलिनी उन लोगों को यहाँ से छुड़ा ले गयी और मेरी छोटी बहिन लाडिली भी मुझे धोखा दे गयी, जिसका खुलासा हाल मैं तुमसे कहती हूँ।

मायारानी ने अपना कुल हाल जो नागर से कहा था, भूतनाथ को कह सुनाया मगर अपने पुराने कैदी का हाल और यह बात कि चण्डूल ने उसके कान में क्या कहा था, भूतनाथ से भी छिपा रक्खा और उसके बदले में वह कहा जो नागर से कहा था, मगर भूतनाथ ने उस जगह मुस्कुरा दिया, जिससे मायारानी समझ गयी कि भूतनाथ को मेरी बातों में कुछ शक हुआ।

माया : जो कुछ मैं कह चुकी हूँ, उसमें एक बात झूठ थी और एक मैंने छिपा ली।

भूतनाथ : (हँसकर) वह बात शायद मुझसे कहने योग्य नहीं है!

माया : हाँ, मगर अब तो मैं वादा कर चुकी हूँ कि तुमसे कोई बात न छिपाऊँगी, इसलिए यद्यपि उस बात का भेद अभी तक मैंने नागर को भी नहीं दिया, मगर तुमसे ज़रूर कहूँगी, परन्तु इसके पहिले तुमसे पूछूँगी, क्योंकि बहुत देर से उसके पूछने की इच्छा लगी है, पर बातों का सिलसिला दूसरी तरफ़ हो जाने के कारण पूछ न सकी।

भूतनाथ : ख़ैर, अब पूछ लीजिए।

माया : मनोरमा को कमलिनी की क़ैद से छुड़ाने के लिए तुमने क्या विचारा है?

भूतनाथ : मनोरमा को यद्यपि मैं सहज ही में छुड़ा सकता हूँ, परन्तु उसे भी इस ढंग से छुड़ाया चाहता हूँ कि कमलिनी को मुझ पर शक न हो, अगर उसे ज़रा भी शक हो जायगा तो वह सम्हल जायगी, क्योंकि वह बड़ी धूर्त और शैतान है।

माया : सो तो ठीक है, मगर कोई बन्दोबस्त तो करना ही चाहिए।

भूतनाथ : हाँ हाँ, उसका बन्दोबस्त बहुत जल्द किया जायगा।

माया : अच्छा तो अब वह भेद की बात भी तुमसे कहती हूँ, जिसे मैं अभी तक बड़ी कोशिश से छिपाये हुए थी, यहाँ तक कि अपनी प्यारी सखी मनोरमा को भी उस विषय में आज तक मैंने कुछ नहीं कहा था। (नागर की तरफ़ देखकर) लो, तुम भी सुन लो।

मायारानी दो घण्टे तक अपने गुप्त भेद की बात भूतनाथ से कहती रही और वह बड़े ग़ौर से सुनता रहा और अन्त में मायारानी को कुछ समझा-बुझाकर और इनाम में एक हीरे की माला पाकर वहाँ से रवाना हुआ।

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