चन्द्रकान्ता सन्तति - 2 - देवकीनन्दन खत्री Chandrakanta Santati - 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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चन्द्रकान्ता सन्तति - 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :240
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8400
आईएसबीएन :978-1-61301-027-3

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चन्द्रकान्ता सन्तति 2 पुस्तक का ई-पुस्तक संस्करण...

पाँचवाँ बयान

पाठकों को याद होगा कि भूतनाथ को नागर ने एक पेड़ के साथ बाँध रक्खा था। यद्यपि भूतनाथ ने अपनी चालाकी और तिलिस्मी खंजर की मदद से नागर को बेहोश कर दिया, मगर देर तक उसके चिल्लाने पर भी वहाँ कोई उसका मददगार न पहुँचा और नागर फिर से होश में आकर उठ बैठी।

नागर : अब मुझे मालूम हुआ कि तेरे पास एक अद्भुत वस्तु है।

भूतनाथ : जो अब तुम्हारी होगी।

नागर : नहीं, जिसके छूने से मैं बेहोश हो गयी, उसे अपने पास क्योंकर रख सकती हूँ! मगर मालूम होता है कि कोई ऐसी चीज़ भी तेरे पास ज़रूर है, जिसके सबब से इस खंजर का असर तुझ पर नहीं होता। ख़ैर, मैं तेरा यह कसूर भी माफ करूँगी, यदि तू यह खंजर मुझे दे दे और वह दूसरी चीज़ भी मेरे हवाले कर दे, जिसके सबब से इस खंजर का असर तुझ पर नहीं होता।

भूतनाथ : मगर मुझे क्योंकर विश्वास होगा कि तुमने मेरा कसूर माफ किया!

नागर : और मुझे क्योंकर विश्वास होगा कि तूने वास्तव में वही चीज़ मुझे दी, जिसके सबब से खंजर की करामात से तू बचा हुआ है?

भूतनाथ : बेशक मैं वही चीज़ तुम्हें दूँगा और तुम आजमाने के बाद मुझे छोड़ सकती हो।

नागर : मगर ताज्जुब नहीं कि आजमाते-आजमाते मैं फिर बेहोश हो जाऊँ क्योंकि तू धोखा देने में मुझसे किसी तरह कम नहीं है!

भूतनाथ : इसका जवाब तुम खुद समझ सकती हो!

नागर : हाँ, ठीक है, यदि मैं थोड़ी देर के लिए बेहोश भी हो जाऊँगी तो तू मेरा कुछ नहीं कर सकता क्योंकि पेड़ के साथ बँधा हुआ है और तेरे हाथ-पैर भी खुले नहीं हैं।

भूतनाथ: और मेरे चिल्लाने से भी यहाँ कोई मददगार न पहुँचेगा।

नागर : हाँ, इसका प्रमाण भी…

कहते-कहते नागर रुक गयी क्योंकि पत्तों के खड़खड़ाने की आवाज़ उसने सुनी और किसी के आने का उसे शक हुआ। नागर ने पीछे घूमकर देखा तो कमलिनी पर नज़र पड़ी जो नागर के दिये घोड़े पर सवार इसी तरफ़ आ रही थी। कमलिनी इस समय भी उसी सूरत में थी, जिस सूरत में नागर के यहाँ गयी थी और उसका पहिचानना मुश्किल था, मगर भूतनाथ की जुबानी नागर को पता लग चुका था, इसलिए उसने कमलिनी को तुरत पहिचान लिया और भूतनाथ को उसी तरह छोड़ फुर्ती से अपने घोड़े पर सवार हो गयी। कमलिनी भी पास पहुँची और नागर की तरफ़ देखकर बोली—

कमलिनी : तुझे तो विश्वास हो गया होगा कि मैं मिर्जापुर चली गयी!

नागर : बेशक, तुमने मुझे धोखा दिया, ख़ैर, अब मेरे हाथ से बचकर कहाँ जा सकती हो? यद्यपि तुम मायारानी की बहिन हो और इस सबब से मुझे तुम्हारा अदब करना चाहिए, मगर तुम्हारी बुराइयों पर ध्यान देकर मायारानी ने हुक्म दे रक्खा है कि जो कोई तुम्हारा सिर काटकर उनके पास ले जायगा, वह मुँहमाँगा इनाम पायेगा। अस्तु, अब मैं तुम्हें किसी तरह छोड़ नहीं सकती। हाँ, अगर तुम खुशी से मायारानी के पास चली चलो तो अच्छी बात है!

कमलिनी : (मुस्कुराकर) ठीक है, मालूम होता है कि तू अभी तक अपने को अपने मकान में मौजूद समझती है और चारों तरफ़ अपने नौकरों को देख रही है।

नागर : (कुछ शरमाकर) मैं खूब जानती हूँ कि इस मैदान में मैं अकेली हूँ, लेकिन यह भी देख रही हूँ कि तुम्हारे साथ भी कोई दूसरा नहीं है। अगर तुम अपने को हर्बा चलाने और ताकत में मुझसे बढ़कर समझती हो तो यह तुम्हारी भूल है और इसका फैसला हाथ मिलाने ही से हो सकता है (हाथ बढ़ाकर) आइए!

कमलिनी : (हँसकर) वाह, तू समझती है कि मुझे उस अँगूठी की ख़बर नहीं, जो तेरे इस बढ़े हुए हाथ में देख रही हूँ, अच्छा ले!

"अच्छा ले" कहकर कमलिनी ने दिखा दिया कि उसमें कितनी तेजी और फुर्ती है। घोड़ा आगे बढ़ाया और तिलिस्मी खंजर निकाल कर इतनी तेजी के साथ नागर के हाथ पर रख दिया कि वह अपना हाथ हटा भी न सकी और खंजर की तासीर से बदहवास होकर ज़मीन पर गिर पड़ी। कमलिनी ने घोड़े से उतरकर भूतनाथ को क़ैद से छुट्टी दी और कहा, "वाह, तुम इतने बड़े चालाक होकर भी इसके फन्दे में आ गये!"

भूतनाथ : मैं इसके फन्दे में न आता यदि उस अँगूठी का गुण जानता, जो उसकी उँगली में चमक रही है, वास्तव में यह अनमोल वस्तु है और कठिन समय पर काम दे सकती है।

कमलिनी : इस कम्बख्त के पास यही तो एक चीज़ है, जिसके सबब से मायारानी की आँखों में इसकी इज्जत है। इसके जहर से कोई बच नहीं सकता, हाँ, यदि यह चाहे तो जहर उतार भी सकती है। न मालूम यह अँगूठी और इसका जहर उतारने की तरकीब मनोरमा ने कहाँ से पायी।

भूतनाथ : मायारानी से और उससे क्या सम्बन्ध?

कमलिनी : मनोरमा उसकी सखियों में सबसे बड़ा दर्जा रखती है और वह इस कम्बख्त को अपनी बहिन से बढ़के मानती है। यह अँगूठी भी मनोरमा ही की है।

भूतनाथ : तो मायारानी ने यह अँगूठी क्यों न ले ली? उसके तो बड़े काम की चीज़ थी!

कमलिनी: उसको भी मनोरमा ने ऐसी ही अँगूठी बना दी है और जहर उतारने की दवा भी तैयार कर दी है, मगर इसके बनाने की तरकीब नहीं बताती।

भूतनाथ : ख़ैर, अब यह अँगूठी आप ले लीजिए।

कमलिनी : यद्यपि यह मेरे काम की चीज़ नहीं है, बल्कि इसको अपने पास रखने में मैं पाप समझती हूँ, तथापि जब तक मायारानी से खटपट चली जाती है, तब तक यह अँगूठी अपने पास ज़रूर रक्खूँगी (तिलिस्मी खंजर की तरफ़ इशारा करके) इसके सामने यह अँगूठी कोई चीज़ नहीं है।

भूतनाथ: बेशक बेशक, जिसके पास यह खंजर है, उसे दुनिया में किसी चीज़ की परवाह नहीं और वह अपने दुश्मन से चाहे वह कैसा जबर्दस्त क्यों न हो कभी नहीं डर सकता। आपने मुझ पर बड़ी ही कृपा की जो ऐसा खंजर थोड़े दिन के लिए मुझे दिया। आह, वह दिन भी कैसा होगा जिस दिन यह खंजर हमेशा अपने पास रखने की आज्ञा आप मुझे देंगी।

कमलिनी : (मुस्कुराकर) ख़ैर, वह दिन आज ही समझ लो, मैं हमेशा के लिए यह खंजर तुम्हें देती हूँ, मगर नानक के लिए ऐसा करने की सिफारिश मत करना।

भूतनाथ ने खुश होकर कमलिनी को सलाम किया। कमलिनी ने नागर की उँगली से जहरीली अँगूठी उतार ली और उसके बटुए में से खोजकर उस दवा की शीशी भी निकाल ली, जो उस अँगूठी के भयानक जहर को बात-की-बात में दूर कर सकती थी। इसके बाद कमलिनी ने भूतनाथ से कहा, "नागर को हमारे अद्भुत मकान में ले जाकर तारा के सुपुर्द करो और फिर मुझसे आकर मिलो। मैं फिर वहीं अर्थात् मनोरमा के मकान पर जाती हूँ। अपने काग़ज़ात भी उसके बटुए में से निकाल लो और इसी समय उन्हें जलाकर सदैव के लिए निश्चिन्त हो जाओ!"

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