चन्द्रकान्ता सन्तति - 2 - देवकीनन्दन खत्री Chandrakanta Santati - 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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चन्द्रकान्ता सन्तति - 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :240
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8400
आईएसबीएन :978-1-61301-027-3

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चन्द्रकान्ता सन्तति 2 पुस्तक का ई-पुस्तक संस्करण...

छठवाँ बयान

मायारानी का डेरा अभी तक खास बाग (तिलिस्मी बाग) में है। रात आधी से ज़्यादे जा चुकी है, चारों तरफ़ सन्नाटा छाया हुआ है, पहरेवालों के सिवाय सभों को निद्रादेवी ने बेहोश करके डाल रक्खा है, मगर उस बाग में दो औरतों की आँखों ने नींद का नाम-निशान भी नहीं। एक तो मायारानी की छोटी बहिन लाडिली, जो अपने सोने वाले कमरे में मसहरी के ऊपर पड़ी कुछ सोच रही है, और थोड़ी-थोड़ी देर पर उठकर बाहर निकलती और सन्नाटे की तरफ़ ध्यान देकर लौट जाती है, मालूम होता है कि वह मकान या बाग के बाहर जाकर किसी से मिलने का मौका ढूँढ़ रही है और दूसरी मायारानी जो निद्रा न आने के कारण अपने कमरे में टहल रही है। उसे भी तरह-तरह के खयालों ने सता रक्खा है। कभी-कभी उसका सर हिला जाता है, जो उसके दिल की परेशानी को पूरी तरह से छिपा रहने नहीं देता, उसके होंठ भी कभी-कभी अलग होकर दिल का दरवाज़ा खोल देते हैं, जिससे दिल के अन्दर क़ैद रहने वाले कई भेद शब्द-रूप होकर धीरे-से बाहर निकल पड़ते हैं।

जब चारों तरफ़ अच्छी तरह सन्नाटा हो गया तो लाडिली ने काले कपड़े पहिरे और ऐयारी का बटुआ कमर से लगाने के बाद कमरे से बाहर निकलकर इधर-उधर टहलना शुरू किया। वह उस कमरे के पास आयी, जिसके अन्दर मायारानी तरद्दुद और घबराहट से निद्रा न आने के कारण टहल रही थी। लाडिली छिपकर देखने लगी कि मायारानी क्या कर रही है। थोड़ी देर के बाद मायारानी के मुँह से निकले हुए शब्द लाडिली ने सुने और वे शब्द ये थे–"वह इस रास्ते को जानता है....वह भेद जिसे लाडिली नहीं जानी....आह, धनपत की मुहब्बत ने..."

इन शब्दों को सुनकर लाडिली घबड़ा गयी और बेचैनी से अपने कमरे में लौट आने के लिए तैयार हुई, मगर उसके दिल ने उसे वहाँ से लौटने न दिया, परन्तु इसके बाद मायारानी कुछ ज़्यादे बेचैन हुई और अपनी मसहरी पर जाकर लेटी रही। आधी घड़ी से ज़्यादे न बीती थी कि मायारानी की साँस ने लाडली को उसके सो जाने की ख़बर दी और लाडिली वहाँ से लौटकर बाग में टहलने लगी। घूमती-फिरती और अपने को पेड़ों की आड़ से बचाती हुई, वह बाग के पिछले कोने में पहुँची जहाँ एक छोटा-सा मगर मजबूत बुर्ज बना था इसके अन्दर जाने के लिए छोटा-सा लोहे का दरवाज़ा था, जिसे उसने धीरे से खोला और अन्दर जाने के बाद फिर बन्द कर लिया। भीतर बिल्कुल अन्धेरा था। बटुए में से सामान निकालकर मोमबत्ती जलायी और उस कोठरी की हालत अच्छी तरह देखने लगी। यह बुर्जवाली कोठरी वर्षों से ही बन्द थी और इस सबब से इसके अन्दर मकड़ों ने अच्छी तरह अपना घर बना लिया था, मगर लाडिली ने इस कोठरी की गन्दी हालत पर कुछ ध्यान न दिया। इस कोठरी की ज़मीन चौखूटे पत्थरों से बनी हुई थी और छत में छोटे-छोटे दो-तीन सूराख थे जिनमें से आसमान में जड़े हुए तारे दिखायी दे रहे थे। पहिले तो लाडिली इस विचार में पड़ी कि बहुत दिनों से बन्द रहने कारण इस कोठरी की हवा खराब होकर जहरीली हो गयी होगी, शायद किसी तरह का नुकसान पहुँचे, मगर छत के सूराखों को देख निश्चिन्त हो गयी और मोमबत्ती एक किनारे जमाकर ज़मीन पर बैठ गयी। आधी घड़ी तक यह सोच-विचार में पड़ी रही, इसके बाद हलकी आवाज़ के साथ कोने की तरफ़ ज़मीन का एक चौखूटा पत्थर किवाड़ के पल्ले की तरह खुलकर अलग हो गया और नीचे से अपनी असली सूरत में कमलिनी निकलकर लाडली के सामने खड़ी हो गयी। कमलिनी को देखते ही लाडिली उठ खड़ी हुई और बड़ी मुहब्बत से उसके साथ लिपटकर रोने लगी तथा कमलिनी की आँखें भी आँसू की बूँदें गिराने लगीं, कुछ देर बाद दोनों अलग हुईं और ज़मीन पर बैठकर बातचीत करने लगीं।

लाडिली : मेरी प्यारी बहिन, इस समय मेरी खुशी का अन्दाजा कोई भी नहीं कर सकता। मुझे तो इस बात का बड़ा ही रंज था कि तुमने मुझे अपने दिल से भुला दिया, जिसकी आशा कदापि न थी, मगर आज शाम को तुम्हारे हाथ की लिखी हुई उस चीठी ने मुझमें जान डाल दी, जो तेजसिंह के हाथ मुझ तक पहुँचायी गयी थी।

कमलिनी : नहीं नहीं, अभी तक मैं तुझे उतना ही प्यार करती हूँ, जितना यहाँ रहने पर करती थी, परन्तु इस समय आशा कम थी कि मेरे लिखे अनुसार यहाँ आकर तू मुझसे मिलेगी, क्योंकि बड़ी बहिन मायारानी मेरी जान की ग्राहक हो रही है और तू पूरी तरह उसके कब्जे में है।

लाडिली : प्यारी बहिन, चाहे मायारानी का दिल तुम्हारी दुश्मनी से भरा हुआ क्यों न हो, मगर मेरा दिल तुम्हारी मुहब्बत से किसी तरह खाली नहीं हो सकता। तुम्हारी चीठी पाते ही मैं बेचैन हो गयी और हज़ारों आफ़तों की तरफ़ ध्यान न देकर बेखटके यहाँ चली आयी। क्या अब भी तुम्हें...

कमलिनी : हाँ हाँ, मुझे विश्वास है, और मैं खूब जानती हूँ कि अगर तेरे दिल में मेरी मुहब्बत न होती तो तू मेरे लिखने पर यकायक यहाँ न आती।

लाडिली : मुझे इस बात की शिकायत करने का मौका आज मिला कि तुमने इस घर को तिलांजुली देते समय अपने इरादे से मुझे बेख़बर रक्खा।

कमलिनी : तो क्या मेरा इरादा जानने पर तू मेरा साथ देती?

लाडिली : (जोर देकर) ज़रूर साथ देती! हाय, यहाँ रहकर जैसी तकलीफ में दिन काट रही हूँ, वह मेरा ही जी जान रहा है। ऐसे-ऐसे भयानक काम मुझसे लिये जाते हैं जिसे मैं मुख्तसर में कह नहीं सकती, लाचार होकर और झख मारकर सबकुछ करना पड़ता है, क्योंकि इस बात को मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि मायारानी के गुस्से में पड़कर मैं अपनी जान भारतवर्ष के किसी घने जंगल में छिपकर भी नहीं बचा सकती।

कमलिनी : इसका सबब यही है कि तू तिलिस्मी हाल से बिल्कुल बेख़बर और भोली है, बल्कि वास्तव में रामभोली है।

लाडिली : (चौंककर) क्या तुम जानती हो कि मैं रामभोली बनने पर लाचार की गयी थी?

कमलिनी : मुझे अच्छी तरह मालूम है, अभी तक नानक मेरे साथ रहकर मेरा काम कर रहा है।

लाडिली : हाय, जब वह तुम्हारे साथ है तो ज़रूर एक दिन सामना होगा। उस समय शर्म से मेरी आँखें ऊँची न होंगी, उस बेचारे के साथ मैंने बड़ी बुराई की।

कमलिनी : लेकिन मैं खूब जानती हूँ कि इसमें तेरा कोई कसूर नहीं। ख़ैर, इस बात को जाने दे, मुझे तेरी मुहब्बत यहाँ तक खैंच लायी है, मैं इस समय यह पूछने आयी हूँ कि अब तेरा क्या इरादा है, क्योंकि इस तिलिस्म की उम्र अब तमाम हो गयी और मायारानी अपने बुरे कर्मों का फल भोगा ही चाहती है।

लाडिली : (हाथ जोड़कर) मैं यही चाहती हूँ कि तुम मुझे अपने साथ रक्खो, जिसमें मायारानी का मुँह देखना नसीब न हो। मैं जानती हूँ कि यह तिलिस्म अब टूटा ही चाहता है, क्योंकि इधर थोड़े दिनों से बड़ी-बड़ी अद्भुत बातें देखने में आ रही हैं, मगर मुझे शक है तो इतना ही कि तिलिस्म तोड़ने वाले कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह इस समय मायारानी की कैदी हो रहे हैं और कल इन दोनों का सिर ज़रूर काटा जायगा।

कमलिनी : यह बात मुझे भी मालूम है, मगर सवेरा होने के पहिले ही मैं उन दोनों को छुड़ाकर ले जाऊँगी।

लाडिली : यदि ऐसा हो तो क्या बात है! वे दोनों कैसे नेक और खूबसूरत हैं। जिस समय मैंने आनन्दसिंह को देखा...

इतना कहकर लाडिली चुप हो रही, उसकी आँखें नीची हो गयीं और उसके गालों पर शर्म की सुर्खी दौड़ गयी। कमलिनी समझ गयी कि यह आनन्दसिंह को चाहती है।

कमलिनी : मगर उन दोनों को छुड़ाने के लिए कुछ तुझसे भी मदद चाहती हूँ।

लाडिली : तुम्हारी आज्ञा मानने के लिए मैं हर तरह से तैयार हूँ।

कमलिनी : तू उस कैदख़ाने की ताली मुझे ला दे, जिसमें दोनों कुमार क़ैद हैं।

लाडिली : मैं उद्योग कर सकती हूँ, मगर वह तो हरदम मायारनी की कमर में रहती है।

कमलिनी : उसके लेने की सहज तरकीब मैं बताती हूँ।

लाडिली : क्या?

कमलिनी : (कमर से तिलिस्मी खंजर निकालकर और दिखाकर) यह तिलिस्म की सौगात है, हाथ में लेकर जब इसका कब्ज़ा दबाया जायगा तो बिजली-सी चमक पैदा होगी, जिसके सामने किसी की आँख खुली नहीं रह सकती। इसके अतिरिक्त इसमें और भी दो गुण हैं, एक तो यह कि जिसके बदन से यह लगा दिया जाय, उसके बदन में बिजली दौड़ जाती है, और वह तुरत बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़ता है और दूसरे यह हर एक चीज़ को काट डालने की ताकत रखता है।

कमलिनी ने खंजर का कब्ज़ा दबाया। उसमें से ऐसी चमक पैदा हुई कि लाडिली ने दोनों हाथों से आँखें बन्द कर लीं और कहा, "बस बस, इस चमक को दूर करो तो आँखें खोलूँ!"

कमलिनी : (कब्ज़ा ढीला करके) लो चमक बन्द हो गयी, आँखें खोलो।

लाडिली : (आँखें खोलकर) मेरे हाथ में दो तो मैं भी कब्ज़ा दबाकर देखूँ! मगर नहीं तुम तो कह चुकी हो कि यह जिसके बदन से छुलाया जायगा वह बेहोश हो जायगा, तो मैं इसे कैसे ले सकूँगी और तुम पर इसका असर क्यों नहीं होता?

हम ऊपर लिख आये हैं कि कमलिनी की कमर में दो तिलिस्मी खंजर थे और उनके जोड़ की दो अँगूठियाँ भी उसकी उँगलियों में थी। उसने एक अँगूठी लाडिली की उँगली में पहिराकर उसका गुण अच्छी तरह समझा दिया कि जिसके हाथ में यह अँगूठी रहेगी, केवल वही इस खंजर को अपने पास रख सकेगा।

लाडिली : जब ऐसी चीज़ तुम्हारे पास है तो वह ताली तुम स्वयं उससे ले सकती हो।

कमलिनी : हाँ, मैं यह काम खुद भी कर सकती हूँ, मगर ताज्जुब नहीं कि मायारानी के कमरे तक जाते-जाते मुझे कोई देख ले और गुल करे तो मुश्किल होगी। यद्यपि मेरा कोई कुछ कर नहीं सकता और मैं इस खंजर की बदौलत सैकड़ों को मारकर निकल जा सकती हूँ, मगर जहाँ तक बिना खून-खाराबा किये काम निकल जाय तो उत्तम ही है।

लाडिली : हाँ ठीक है, अब तो विलम्ब न करना चाहिए।

कमलिनी : तो फिर जा, मैं इसी जगह बैठी तेरी राह देखूँगी।

खंजर के जोड़ की अँगूठी हाथ में पहिरने के बाद लाडिली ने तिलिस्मी खंजर ले लिया और बुर्ज का दरवाज़ा खोल वहाँ से रवाना हुई। कमलिनी को आधे घण्टे से ज़्यादे राह न देखना पड़ा, इसके भीतर ही ताली लिये हुए लाडिली आ पहुँची और अपनी बड़ी बहिन के सामने ताली रखकर बोली, "इस ताली के लेने में कुछ भी कठिनाई न हुई। मुझे किसी ने भी न देखा। चारों तरफ़ सन्नाटा छाया हुआ था, मायारानी बेख़बर सो रही थी, ताली लेते समय वह जाग न उठे, इससे यह तिलिस्मी खंजर एक दफे उसके बदन से लगा देना पड़ा, बस तुरत ही उसका बदन काँप उठा, मगर वह आँखें न खोल सकी, मुझे विश्वास हो गया कि वह बेहोश हो गयी। बस मैं ताली लेकर चली आयी, मगर अब यहाँ ठहरना उचित नहीं।

कमलिनी : हाँ, अब यहाँ से चलना और उन कैदियों को छुड़ाना चाहिए।

लाडिली : मगर उन कैदियों को छुड़ाने के लिए तुमको इसी बाग की राह कैदख़ाने तक जाना होगा!

कमलिनी : नहीं, वहाँ जाने के लिए दूसरी राह भी है जिसे मैं जानती हूँ!

लाडिली : (ताज्जुब से कमलिनी का मुँह देख के) जीजाजी यहाँ के बहुत से रास्तों और सुरंगों तथा तहखानों को जानते थे, मालूम होता है कि तुमने उन्हीं से इसका हाल जाना होगा?

कमलिनी : नहीं, यहाँ की बहुत-सी बातें किसी दूसरे ही सबब से मुझे मालूम हुईं, जिसे सुनकर तू बहुत ही खुश होगी, हाँ, यदि जीजाजी हम लोगों से जुदा न किये जाते तो यहाँ की अजीब बातों के देखने का आनन्द मिलता। मायारानी को भी यहाँ के भेद अच्छी तरह मालूम नहीं हैं।

लाडिली : जीजाजी हम लोगों से जुदा किये गये इसका मतलब मैं नहीं समझी।

कमलिनी : तू क्या समझती है कि गोपालसिंहजी (मायारानी के पति) अपनी मौत मरे।

लाडिली : (कुछ सोचकर) मुझे तो यही विश्वास है कि उन्हें जहर दिया गया। मैंने स्वयं देखा कि मरने पर उनका रंग काला हो गया था और चेहरा ऐसा बिगड़ गया था कि मैं पहिचान न सकी। हाय, हम दोनों बहिनों पर उनकी बड़ी ही कृपा रहती थी!

कमलिनी : उनकी कृपा किस पर नहीं रहती थी! (कुछ सोचकर) ख़ैर, आज मैं तुझे इस बाग के चौथे दर्जे में ले चलकर एक तमाशा दिखलाऊँगी।

लाडिली : (ताज्जुब से) क्या चौथे दर्जे में तुम जा सकती हो?

कमलिनी : हाँ, मैं यहाँ के बहुत से भेदों को जान गयी हूँ और सब जगह घूम-फिर सकती हूँ।

लाडिली : अहा, तब तो मैं ज़रूर चलूँगी! जीजाजी अक्सर कहा करते थे कि इस बाग के चौथे दर्जे में अगर कोई जाय तो उसे मालूम हो कि दुनिया क्या चीज़ है और ईश्वर की सृष्टि में कैसी विचित्रता दिखायी दे सकती है।

कमलिनी : अच्छा अब चलकर पहिले कैदियों को छुड़ाना चाहिए।

इतना कहकर कमलिनी उठी और मोमबत्ती हाथ में लिये हुए उस सुरंग के मुहाने पर गयी, जिसका मुँह चौखूटे पत्थर के हट जाने से खुल गया था और जिसमें से वह कुछ ही देर पहिले निकली थी। नीचे उतरने के लिए सीढ़ियाँ मौजूद थीं, दोनों बहिनें नीचे उतर गयीं। आख़िरी सीढ़ी पर पहुँचने के साथ ही वह चौखूटा पत्थर एक हलकी आवाज़ के साथ अपने ठिकाने पहुँच गया और सुरंग का मुँह बन्द हो गया।

 

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