चन्द्रकान्ता सन्तति - 2 - देवकीनन्दन खत्री Chandrakanta Santati - 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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चन्द्रकान्ता सन्तति - 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :240
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8400
आईएसबीएन :978-1-61301-027-3

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चन्द्रकान्ता सन्तति 2 पुस्तक का ई-पुस्तक संस्करण...

चौथा बयान

शाम का वक्त है। सूर्य भगवान अस्त हो चुके हैं, तथापि पश्चिम तरफ़ आसमान पर कुछ-कुछ लाली अभी तक दिखायी दे रही है। ठण्डी हवा मन्द गति से चल रही है। गरमी तो नहीं मालूम होती लेकिन इस समय की हवा बदन में कँपकँपी भी पैदा नहीं कर सकती। हम इस समय आपको एक ऐसे मैदान की तरफ़ ध्यान देने के लिए कहते हैं, जिसकी लम्बाई और चौड़ाई का अन्दाज करना कठिन है। जिधर निगाह दौड़ाइए सन्नाटा नज़र आता है, कोई पेड़ भी ऐसा नहीं जिसके पीछे या जिस पर चढ़कर कोई आदमी अपने को छिपा सके, हाँ, पूरब तरफ़ निगाह कुछ ठोकर खाती है और एक धुँधली चीज़ को देखकर ग़ौर करने वाला कह सकता है कि उस तरफ़ शायद कोई ऊँचा टीला है। ऐसे मैदान में तीन औरतें घोड़ियों पर सवार धीरे-धीरे उस तरफ़ जा रही हैं जिधर उस टीले या छोटी पहाड़ी की स्याही मालूम हो रही है। यद्यपि उन औरतों की पोशाक जनाना वजः की है, महर फिर भी चुस्त और दक्षिणी ढंग की है। तीनों के चेहरे पर नकाब पड़ी हुई है तथापि बदन की सुडौली और कलाई तथा नाजुक उँगलियों पर ध्यान देने से देखनेवाले के दिल में यह बात ज़रूर पैदा होगी कि तीनों ही नाजुक, नौजवान और खूबसूरत हैं। इन औरतों के विषय में हम अपने पाठकों को ज़्यादे देर तक खुटके में न डालकर, इसी समय इनका परिचय दे देना उत्तम समझते हैं। वह देखिए ऊँची और मुश्की घोड़ी पर जो सवार है वह मायारानी है, चोगर आँखों वाली सुफेद पचकल्यान घोड़ी पर जो पटरी जमाये है, वह उसकी छोटी बहिन लाडिली है, जिसे अभी तक हम रामभोली के नाम से लिखते चले आये हैं और सब्ज़ी घोड़ी पर सवार चारों तरफ़ निगाह दौड़ा-दौड़ाकर देखनेवाली धनपति है। ये तीनों आपुस में धीरे-धीरे बातें करती जा रही हैं। लीजिए तीनों ने अपने चेहरों पर से नकाबें उलट दीं, अब हमें इन तीनों की बातों पर ध्यान देना उचित है।

माया : न मालूम, वह चण्डूल कम्बख्त तीसरे नम्बर के बाग में क्योंकर जा पहुँचा! इसमें तो कुछ सन्देह नहीं कि जिस राह से हम लोग आते-जाते हैं, उस राह से वह नहीं गया था।

लाडिली : तिलिस्म बनानेवालों ने वहाँ पहुँचने के लिए और कई रास्ते बनाये हैं, शायद उन्हीं रास्तों में से कोई रास्ता उसे मालूम हो गया हो।

धनपति : मगर उन रास्तों का हाल किसी दूसरे को मालूम हो जाना तो बड़ी भयानक बात है।

माया : और यह एक ताज्जुब की बात है कि उन रास्तों का हाल जब मुझको, जो तिलिस्म की रानी कहलाती हूँ, नहीं मालूम तो किसी दूसरे को कैसे मालूम हुआ!!

लाडिली : ठीक है, तिलिस्म की बहुत-सी बातें ऐसी हैं, जो तुम्हें मालूम हैं, मगर नियमानुसार तुम मुझसे भी नहीं कह सकती हो, हाँ उन रास्तों का हाल जीजाजी* को ज़रूर मालूम था। अफसोस, उन्हें मरे पाँच वर्ष हो गये, अगर जीते होते तो... (* जीजाजी से मतलब मायारानी के पति से है जो लाडली का बहनोई था।)

माया : (कुछ घबड़ाकर और जल्दी से) तुम कैसे जानती हो कि उन रास्तों का हाल उन्हें मालूम था?

लाडिली : हँसी-हँसी में उन्होंने एक दिन मुझसे कहा था कि बाग के तीसरे दर्जे में जाने के लिए पाँच रास्ते हैं, बल्कि वे मुझे अपने साथ वहाँ ले चलकर नया रास्ता दिखाने को तैयार भी थे, मगर मैं तुम्हारे डर से उनके साथ न गयी।

माया : आज तक तूने यह हाल मुझसे क्यों न कहा!

लाडिली : मेरी समझ में यह कोई ज़रूरी बात न थी, जो तुमसे कहती।

लाडिली की बात सुन मायारानी चुप हो गयी और बड़े ग़ौर में पड़ गयी। उसकी अवस्था और उसकी सूरत पर ध्यान देने से मालूम होता था कि लाडिली की बात से उसके दिल पर एक सख्त सदमा पहुँचा है और वह थोड़ी देर के लिए अपने को बिलकुल भूल ही गयी है। मायारानी की ऐसी अवस्था क्यों हो गयी और इस मामूली -सी बात से उसके दिल पर चोट क्यों लगी, इसका सबब उसकी छोटी बहन लाडली भी न समझ सकी। कदाचित् यह कहा जाए कि वह अपने पति को याद करके इस अवस्था में पड़ गयी, सो भी नहीं हो सकता, क्योंकि लाडली खूब जानती थी कि मायारानी अपने खूबसूरत हँसमुख और नेक चाल चलनवाले पति को कुछ भी नहीं चाहती थी। इस समय लाडली के दिल में एक तरह का खुटका पैदा हुआ और शक की निगाह से मायारानी की तरफ़ देखने लगी, मगर मायारानी कुछ भी नहीं जानती थी कि उसकी छोटी बहिन उसे किस निगाह से देख रही है। लगभग दो सौ कदम चले जाने के बाद वह चौंकी और लाडली की तरफ़ ज़रा-सा मुँह फेरकर बोली, "हाँ, तो वह उन रास्तों का हाल जानता था।"

लाडिली के दिल में और भी खुटका हुआ बल्कि इस बात का रंज हुआ कि मायारानी ने अपने पति या लाडली के प्यारे बहनोई की तरफ़ ऐसे शब्दों में इशारा किया जो किसी नीच या खिदमतगार तथा नौकर के लिए बर्ता जाता है। लाडिली का ध्यान धनपति की तरफ़ भी गया जिसके चेहरे पर उदासी और रंज की निशानी मामूली से कुछ ज़्यादे पायी जाती थी और जिसकी घोड़ी भी पाँच-सात कदम पीछे रह गयी थी। मगर मायारानी और धनपति की ऐसी अवस्था ज़्यादे देर तक न रही, उन दोनों ने बहुत जल्द अपने को सम्हाला और फिर मामूली तौर पर बातचीत करने लगीं।

धनपति : अब वह टीला भी आ पहुँचा, देखा चाहिए बाबाजी से मुलाकात होती है या नहीं!

माया : मुलाकात अवश्य होगी क्योंकि वे कहीं जाते नहीं, मगर अब मेरा जी नहीं चाहता कि वहाँ तक जाँऊ या उनसे मिलूँ।

लाडिली : सो क्यों! तुम तो बड़े उत्साह से उनसे मिलने के लिए आयी हो!

माया : ठीक है, मगर अब जो मैं सोचती हूँ तो यही जान पड़ता है कि बेचारे बाबाजी इन सब बातों का जवाब कुछ भी न दे सकेंगे।

लाडिली : ख़ैर जब इतनी दूर आ चुकी हो तो अब लौट चलना भी उचित नहीं।

माया : नहीं, अब मैं वहाँ न जाऊँगी!

इतना कहकर मायारानी ने घोड़ी फेरी, लाचार होकर लाडिली और धनपति को भी घूमना पड़ा, मगर इस कार्रवाई से लाडिली के दिल का शक और भी ज़्यादे हुआ और उसे निश्चय हो गया कि मेरी बात से मायारानी के दिल पर गहरी चोट बैठी है, मगर इसका सबब क्या है, सो कुछ भी नहीं मालूम होता।

मायारानी ने जैसे ही घोड़ी की बाग फेरी वैसे ही उसकी निगाह तेजसिंह पर पड़ी जो तीर और कमान हाथ में लिये बहुत दूर से कदम बढ़ाये इन तीनों के पीछे-पीछे आ रहे थे। मायारानी तेजसिंह को अच्छी तरह जानती थी। यद्यपि इस समय कुछ अँधेरा हो गया था परन्तु मायारानी की तेज़ निगाहों ने तेजसिंह को तुरन्त पहिचान लिया और इसके साथ ही वह तलवार खैंचकर तेजसिंहपर झपटी।

मायारानी को नंगी तलवार लिये झपटते देख तेजसिंह ने ललकार के कहा, "ख़बरदार, आगे न बढ़ना, नहीं तो एक ही तीर में काम तमाम कर दूँगा!"

तेजसिंह के ललकारने से मायारानी रुक गयी, मगर धनपति से रहा न गया। वह तलवार खैंचकर यह कहती हुई आगे बढ़ी, "मैं तेरे तीर से डरने वाली नहीं!"

तेज : मालूम होता है, तुझे अपनी जान प्यारी नहीं, इसे खूब समझ लीजियो कि तेजसिंह के हाथ से छूटा हुआ तीर खाली न जायगा।

धनपति : मालूम होता है कि तू केवल एक तीर ही से हम तीनों को डराकर अपना काम निकालना चाहता है। अफसोस इस समय मेरे पास तीर-कमान नहीं है, यदि होता तो तुझे जान पड़ता कि तीर चलाना किसे कहते हैं?

तेज : (हँसकर) न मालूम तूने औरत होने पर भी अपने को क्या समझ रक्खा है? ख़ैर, अब मैं एक कमसिन औरत पर तीर न चलाऊँगा।

इतना कहकर तेजसिंह ने तीर तरकस में रख लिया तथा कमान बगल में लटकाने के बाद ऐयारी के बटुए में से एक छोटा-सा लोहे का गोला निकालकर सामने खड़े हो गये और धनपति को वह गोला दिखाकर बोले, "तुम लोगों के लिए यही बहुत है, मगर मैं फिर कहे देता हूँ कि मुझपर तलवार चलाकर भलाई की आशा मत रखियो!"

धनपति : (मायारानी की तरफ़ इशारा करके) क्या तू जानता नहीं कि यह कौन हैं?

तेज : मैं तुम तीनों को खूब जानता हूँ और यह भी जानता हूँ कि मायारानी सैंतालीस नम्बर की कोठरी को पवित्र करके बेवा हो गयी और इस बात को पाँच वर्ष का जमाना हो गया।

इतना कहकर मुस्कुराते हुए तेजसिंह ने एक भेद की निगाह मायारानी पर डाली और देखा कि मायारानी का चेहरा पीला पड़ गया और शर्म से उसकी आँखें नीचे की तरफ़ झुकने लगीं। मगर यह अवस्था उसकी बहुत देर तक न रही, तेजसिंह के मुँह से यह बात निकलने के बाद जैसी ही लाडिली की ताज्जुब-भरी निगाह मायारानी पर पड़ी, वैसे ही मायारानी ने अपने को सम्हालकर धनपति की तरफ़ देखा।

अब धनपति अपने को रोक न सकी, उसने घोड़ी बढ़ाकर तेजसिंह पर तलवार का वार किया। तेजसिंह ने फुर्ती से वार खाली देकर अपने को बचा लिया और वही लोहे की गोला धनपति की घोड़ी के सर में इस ज़ोर से मारा कि वह सम्हल न सकी और सर हिलाकर ज़मीन पर गिर पड़ी। लोहे का गोला छिटककर दूर जा गिरा और तेजसिंह ने लपककर उसे उठा लिया।

आशा थी कि घोड़ी के गिरने से धनपति को भी कुछ चोट लगेगी, मगर वह घोड़ी पर से उछल कुछ दूर जा रही और बड़ी चालाकी से गिरते-गिरते उसने अपने को बचा लिया। तेजसिंह फिर वही गोला लेकर सामने खड़े हो गये।

तेज : (गोला दिखाकर) इस गोले की करामात देखी? अगर अबकी फिर वार करने का इरादा करोगी तो यह गोला तेरे घुटने पर बैठेगा। और तुझे लँगड़ी होकर मायारानी का साथ दे देना पड़ेगा। मैं यह नहीं चाहता कि तुम लोगों को इस समय जान से मारूँ, मगर हाँ, इस समय जिस काम के लिए आया हूँ, उसे किये बिना लौट जाना मुनासिब नहीं समझता।\

माया : अच्छा बताओ तुम हम लोगों के पीछे-पीछे क्यों आये हो और क्या चाहते हो?

तेज: (लाडिली की तरफ़ इशारा करके) केवल इनसे एक बात कहनी है और कुछ नहीं।

लाडिली : कहो, क्या कहते हो?

तेज : मैं इस तरह नहीं कहा चाहता कि तुम्हारे सिवाय कोई दूसरा सुने, इन दोनों से अलग होकर सुन लो, फिर मैं चला जाऊँगा। डरो मत, मैं दग़ाबाज़ नहीं हूँ, यदि चाहूँ तो ललकार कर तुम तीनों को यमलोक पहुँचा सकता हूँ, मगर नहीं, तुमसे केवल एक बात कहने के लिए आया हूँ, जिसके सुनने का अधिकार सिवाय तुम्हारे और किसी को नहीं है।

कुछ सोचकर लाडिली वहाँ से हट गयी और कुछ दूर जाकर तेजसिंह की तरफ़ देखने लगी, मानों वह तेजसिंह की बात सुनने के लिए तैयार हो। तेजसिंह लाडिली के पास गये और बटुए में से एक चीठी निकाल उसके हाथ में देकर बोले, "इसे जल्द पढ़ लो, देखो मायारानी को इसका हाल न मालूम हो!"

लाडिली ने बड़े ग़ौर से चीठी पढ़ी और इसके बाद टुकड़े-टुकड़े करके फेक दी।

तेज : इसका जवाब?

लाडिली : केवल इतना ही कह देना कि 'बहुत अच्छा'!

अब तेजसिंह को ठहरने की कोई ज़रूरत न थी। उन्होंने उत्तर का रास्ता लिया, मगर घूम-घूमकर देखते जाते थे कि पीछे कोई आता तो नहीं। तेजसिंह के जाने के बाद मायारानी ने लाडिली से पूछा, "वह चीठी किसकी थी और उसमें क्या लिख था!" लाडिली ने असल भेद तो छिपा रक्खा मगर कोई विचित्र बात गढ़कर उस मायारानी की दिलजमई कर दी।

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