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चन्द्रकान्ता सन्तति - 1

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :256
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8399
आईएसबीएन :978-1-61301-026-6

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चन्द्रकान्ता सन्तति - 1 पुस्तक का ई-संस्करण...

आठवाँ बयान


रोहतासगढ़ किले के सामने पहाड़ी से कुछ दूर हटकर बीरेन्द्रसिंह का लश्कर पड़ा हुआ है। चारों तरफ़ फौजी आदमी अपने-अपने काम में लगे हुए दिखायी देते हैं। कुछ फौज आ चुकी और बराबर चली ही आती है। बीच में राजा बीरेन्द्रसिंह का कारचोबी खेमा शान-शौकत के साथ खड़ा है, उसके दोनों बगल कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह का खेमा है, सामने और पीछे की तरफ़ दुपट्टी बड़े-बड़े सरदारों और बहादुरों का डेरा पड़ा है। बाज़ार लगने की तैयारियाँ हो रही हैं, लड़ाई का सामान इतना इकट्ठा हो रहा है कि देखने से दुश्मनों का कलेजा दहल जाय।

डेरा खड़ा होने के दूसरे दिन कुँअर इन्द्रजीतसिंह, आनन्दसिंह, तेज़सिंह, देवीसिंह, पण्डित बद्रीनाथ, भैरोसिंह, तारासिंह, जगन्नाथ ज्योतिषी, फतहसिंह (पुराने सेनापति जो नौगढ़ में थे) और नाहरसिंह इत्यादि को साथ लिए राजा बीरेन्द्रसिंह भी आ पहुँचे और सब लोग अपने-अपने खेमे में उतरे। पन्नालाल गयाजी में और रामनारायण तथा चुन्नीलाल चुनारगढ़ में रक्खे गये। इस लड़ाई के लिए सेनापति की पदवी नाहरसिंह को दी गयी। तीसरे दिन और भी फौज आ जाने पर पाँच झण्डे पचास हज़ार फौज का निशान खड़ा किया गया। बहादुरों के चेहरों पर खुशी मालूम होती थी, सब इसी फ़िक्र में थे कि जहाँ तक हो लड़ाई जल्दी छिड़ जाय और बेशक एक ही दो दिन में लड़ाई छिड़ जाने की उम्मीद थी मगर बीरेन्द्रसिंह के लश्कर पर यकायक एक ऐसी आफ़त आ पड़ी कि कुछ दिनों तक लड़ाई रुकी रही। इस आफ़त के आने का किसी को स्वप्न में भी गुमान न था जिसका हाल हम आगे चलकर लिखेंगे।

राजा दिग्विजयसिंह का पत्र लेकर उनका एक ऐयार बीरेन्द्रसिंह के पास आया। बीरेन्द्रसिंह ने पत्र लेकर मुंशी को पढ़ने के लिए दिया, उसमें जो कुछ लिखा था उसका संक्षेप यह है— ‘‘हमारे आपके कभी की दुश्मनी नहीं, तो भी न मालूम आपुस में लड़ने या बिगाड़ पैदा करने का इरादा आपने क्यों किया। ख़ैर इसका सबब जो कुछ हो हम नहीं कह सकते मगर इतना याद रखना कि पचास वर्ष लड़कर भी यह किला आप हमसे नहीं ले सकते, अगर हम चुपचाप बैठे रहें तो भी आप हमारा कुछ नहीं कर सकते, फिर भी हम आपसे लड़ेंगे और मैदान में निकलकर बहादुरी दिखायेंगे। अगर आपको अपनी बहादुरी या जवाँमर्दी का घमण्ड है तो फौज की जान क्यों लेते हैं, एक-पर-एक लड़ के फैसला कर लीजिए। बहादुरों की कार्रवाई देखने के बाद हमसे और आपसे द्वन्द्व-युद्ध हो जाय, आप हम पर फतह पाइए तो यह राज्य आपका हो जाय, नहीं तो आप हमारे मातहत समझे जायँ। अफ़सोस, इस समय हमारा लड़का मौजूद नहीं है, अगर होता तो आपके दोनों लड़कों से वह अकेला ही भिड़ जाता।’’

इस पत्र के जवाब में जो कुछ राजा बीरेन्द्रसिंह ने लिखा हम उसका भी संक्षेप नीचे लिख देते हैं—

‘‘आप हमारे राज्य में घुसकर किशोरी को ले गये क्या यह आपकी जबर्दस्ती नहीं है? क्या इसे लड़ाई की बुनियाद कायम करना नहीं कह सकते? हाँ, अगर आप किशोरी को इज्जत के साथ हमारे पास भेज दें तो हम बेशक अपने घर लौट जायँगे। नहीं तो याद रहे हम इस किले की एक-एक ईंट उखाड़कर फेंक देंगे जिसकी मज़बूती पर आप घमण्ड करते हैं। हम लोग द्वन्द्व-युद्ध करने के लिए भी तैयार हैं, जिसका जी चाहे एक पर एक लड़ के हौसला निकाल ले आपका लड़का मेरे यहाँ क़ैद है, यदि आप किशोरी को हमारे पास भेज दें तो हम उसे छोड़ने के लिए तैयार हैं।’’

इस पत्र के जवाब में रोहतासगढ़ के किले से तोप की एक आवाज़ आयी। अब लड़ाई में किसी तरह का शक न रहा। दोनों तरफ़ के ऐयार अपनी-अपनी कार्रवाई दिखाने पर मुस्तैद हो गये और उन लोगों ने जो कुछ किया उसका हाल आगे चलकर मालूम होगा।

रोहतासगढ़ किले के अन्दर राजमहल की अटारियों पर चढ़ी हुई बहुत-सी औरतें उस तरफ़ देख रही हैं, जिधर बीरेन्द्रसिंह का लश्कर पड़ा हुआ है। कुँअर कल्याणसिंह के गिरफ़्तार हो जाने से किशोरी को एक तरह की निश्चिन्ती-सी हो गयी थी क्योंकि ज़्यादे डर उसे अपनी शादी उसके साथ हो जाने का था, अपने मरने की उसे ज़रा भी परवाह न थी। हाँ कुँअर इन्द्रजीतसिंह की याद वह एक सायत के लिए भी नहीं भुला सकती थी, जिनकी तस्वीर उसके कलेजे में खिंची हुई थी। बीरेन्द्रसिंह की चढ़ाई का हाल सुन, उसे बड़ी खुशी हुई और वह भी अपनी अटारी पर चढ़कर हसरत भरी निगाहों से उस तरफ़ देखने लगी, जिधर बीरेन्द्रसिंह की फौज पड़ी हुई थी, चाहे यहाँ से बहुत दूर हो तो भी किशोरी की निगाहें वहाँ तक पहुँच और भीड़ में घुस-घुसकर किसी को ढूँढ़ निकालने की कोशिश कर रही थीं। इस समय किशोरी के साथ ही लाली थी, जिसने आज कई दिन हुए किशोरी के कमरे में कुन्दन को नारंगी दिखाकर डरा दिया था।

लाली, किशोरी की निगहबानी पर रक्खी गयी थी तो भी वह किशोरी पर मेहरबानी रखती थी। किशोरी ने नारंगीवाले भेद को जानने की कई दफे कोशिश की मगर पता न लगा। उस दिन के बाद कई दफे कुन्दन से भी मुलाक़ात हुई मगर पूछने पर उसने ऐसी कोई बात न कही, जिससे किशोरी का शक दूर हो जाय। नित्य एक घर में रहने पर भी लाली और कुन्दन में किसी तरह की दुश्मनी न दिखायी पड़ी, इस बात ने किशोरी के ताज्जुब को और भी बढ़ा रक्खा था।

इस समय किशोरी के साथ सिवाय लाली के दूसरी कोई और औरत न थी। ये दोनों बीरेन्द्रसिंह के लश्कर की तरफ़ बड़े गौर से देख रही थीं कि यकायक किशोरी को फिर वही नारंगीवाली बात याद आयी और थोड़ी देर तक सोचने के बाद वह लाली से पूछने लगी—

किशोरी : लाली, उस दिन की बात जब मैं याद करती हूँ, उस पर विचार करती हूँ तो कुन्दन की दग़ाब़ाजी साफ़ झलक जाती है। कुन्दन अगर सच्ची होती तो तुम्हें मारने के लिए न झपटती या हक़ीक़त में अगर वह उस समय यहाँ से भाग जानेवाली होती तो उसके काम में विघ्न पड़ जाने से उसे रंज होता, सो उसके बदले में वह खुश दिखायी देती है।

लाली : नहीं, वह एकदम झूठी भी नहीं है।

किशोरी : क्या उसकी बातों का कोई हिस्सा सच भी था?

लाली : ज़रूर था।

किशोरी : वह क्या?

लाली : यही कि वह भी इस किले में उसी काम के लिए लायी गयी है, जिस काम के लिए आप लायी गयी हैं।

किशोरी : यानी तुम्हारे राजकुमार के साथ ब्याहने के लिए।

लाली : हाँ।

किशोरी : अच्छा उसकी और कौन-सी बात सच थी?

लाली : इन सब बातों को पूछकर क्या करोगी, इस भेद के खुलने से बहुत बड़ी बुराई पैदा होगी?

किशोरी : नहीं नहीं, मेरी प्यारी लाली, मेरी जुबान से वह बात कोई दूसरा कभी नहीं सुन सकता और मैं उम्मीद करती हूँ कि तुम मुझसे उसका हाल साफ़-साफ़ कह दोगी। उस दिन से मुझे विश्वास हो गया है कि तुम मेरी दर्दशरीक हो, अस्तु अगर मेरा ख़याल ठीक है तो तुम उसका हाल मुझे ज़रूर बता दो जिससे मैं हरदम होशियार रहूँ।

लाली : अब वह तुम्हारे साथ बुराई कभी न करेगी।

किशोरी : तो भी मेहरबानी करके...

लाली : ख़ैर बता देती हूँ, मगर ख़बरदार इसका ज़िक्र किसी दूसरे के सामने कभी मत करना!

किशोरी : ऐसा मैं कदापि नहीं कर सकती और तुम खुद ही जानती हों कि इस महल में सिवाय तुम्हारे कोई भी ऐसा नहीं है कि जिससे मैं दो बातें करती होऊँ।

लाली : अच्छा तो सिवाय उस बात के जो मैं ऊपर कह चुकी हूँ बाक़ी कुल बातें उसकी झूठ थीं। वह इस मकान से भागा नहीं चाहती थी, वह तो हमारे कुमार के साथ ब्याह होने की उम्मीद में खुश है, मगर जिस दिन से तुम आयी हो उस दिन से वह फ़िक्र में पड़ गयी है क्योंकि वह खूबसूरती और इज्जत में तुमको अपने से बहुत बढ़के समझती है और हक़ीक़त में ऐसा ही है। उसे यह ख़याल सता रहा है कि राजकुमार से पहिले किशोरी की शादी हो लेगी तब मेरी होगी और ऐसी अवस्था में किशोरी बड़ी रानी कहलावेगी और उसी के लड़के गद्दी के मालिक समझे जायेंगे, इसी से वह इस फ़िक्र में थी कि तुम्हें मार डाले मगर किसी ऐसे ठिकाने पर ले जाकर जिसमें उस पर कोई शक न कर सके।

किशोरी : छीः छीः!

लाली : मगर अब वह तुम्हारे साथ बुराई नहीं कर सकती।

किशोरी : और वह नारंगीवाला भेद क्या है?

लाली : वह मैं नहीं कह सकती। मगर तुम उसी से क्यों नहीं पूछतीं, अब तो वह हरदम तुम्हारी खुशामद किया करती है।

किशोरी : मैं उससे पूछ चुकी हूँ।

लाली : उसने क्या कहा?

किशोरी : उसने कहा कि लाली ने नारंगी दिखाकर यह नसीहत दी कि देखो इसमें कई फाँकें हैं, मगर एक साथ रहने और छिलके से ढँके रहने के कारण एक ही गिनी जाती है, कोई कह नहीं सकता कि इसमें कै फाँकें हैं, इसी तरह हम लोगों को भी रहना चाहिए।

लाली : ठीक तो कहा।

किशोरी : वाह वाह! तुमने तो उसी का साथ दिया, एकदम छोकरी बनाकर भुलावा देने लगीं!

लाली : (हँसकर) ख़ैर घबराओ मत, सब मालूम हो जायगा।

इतने में सीढ़ियों पर किसी के चढ़ने की आहट मालूम हुई और दोनों उस तरफ़ देखने लगीं। कुन्दन ने पहुँचकर दोनों को सलाम किया और हँसी-हँसी में लाली की तरफ़ देखकर बोली, ‘‘एक आदमी तुम्हें खोजता हुआ आया है, वह कहता है कि लाली ने मेरी किताब चुरायी है, वह किताब जो किसी के खून से लिखी गयी है।’’

कुन्दन के इन शब्दों में न मालूम क्या भेद भरा हुआ था कि सुनते ही लाली का रंग उड़ गया। ख़ौफ़ के मारे उसके तमाम बदन में कँपकँपी पैदा हो गयी और मालूम होता था कि किसी ने उसके तमाम बदन का खून खैंच लिया है। थोड़ी देर तक वह अपने हवास में न रही अन्त में हाथ जोड़ के उसने कुन्दन से कहा—

लाली : कुन्दन, मुझसे बड़ी भूल हुई, मुझ पर रहम खा, मैं तमाम उम्र तेरी लौंडी बनकर रहूँगी!

कुन्दन : क्या गुलामी की दस्तावेज मेरे आँचल पर लिख देगी?

कुन्दन के इस दूसरे जुमले ने तो लाली को एकदम ही बदहवास कर दिया। अबकी दफे वह अपने को किसी तरह न सम्हाल सकी, उसका सर घूमने लगा और वह चक्कर खाकर ज़मीन पर गिर पड़ी।

लाली का यह हाल देख कुन्दन चुपचाप वहाँ से चली गयी, मगर उसकी सूरत से मालूम होता था कि वह अपनी कार्रवाई पर खुश है या उसने लाली के ऊपर अपनी हुकूमत पैदा कर ली है। उसका मुँह सिकोड़कर सिर हिलाना कहे देता था कि वह लाली पर कुछ और भी जुल्म किया चाहती है।

बेचारी किशोरी का अजब हाल था। नारंगीवाला भेद जानने के लिए वह पहिले ही परेशान थी, अब इस दूसरे भेद ने और भी कलेजा ऐंठ दिया। उसने बड़ी मुश्किल से अपने को सम्हाला और लाली को उसी तरह छोड़ छत के नीचे उतर आयी तथा अपने कमरे से एक गिलास जल लाकर लाली के मुँह पर छींटा दिया। थोड़ी देर में लाली होश में आयी और बिना कुछ बात किये रोती हुई अपने रहने की जगह में चली गयी और किशोरी भी अपने कमरे की तरफ़ रवाना हुई।

जिस कमरे में किशोरी रहती थी वह एक खुशनुमा बाग़ बीचोबीच में था। इस बाग़ के चारों कोनों में छोटी-छोटी चार इमारतें और भी थीं, एक में वे कुल औरते रहती थीं जो किशोरी की हिफ़ाजत के लिए मुक़र्रर की गयी थीं। उन औरतों की अफसर लाली थी। दूसरे मकान में दो-तीन लौंडियों के साथ लाली रहती थी। तीसरा मकान अमीराना ठाठ से रहने के लिए कुन्दन को मिला हुआ था, चौथे मकान में जो सबसे छोटा था, ताला बन्द था मगर बारी-बारी से कई औरतें नंगी तलवार लिये उसके दरवाज़े पर पहरा दिया करती थीं। बाग़ जनाने महल में था और किसी ग़ैर का यहाँ आना या यहाँ से किसी का निकल भागना बड़ा ही मुश्किल था।


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