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चन्द्रकान्ता सन्तति - 1

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :256
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8399
आईएसबीएन :978-1-61301-026-6

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चन्द्रकान्ता सन्तति - 1 पुस्तक का ई-संस्करण...

तेरहवाँ बयान


कुँअर इन्द्रजीतसिंह तो किशोरी पर जी-जान से आशिक हो चुके थे। इस बीमारी की हालत में भी उसकी याद इन्हें सता रही थी और यह जानने के लिए बेचैन हो रहे थे कि उस पर क्या बीती, वह किस अवस्था में कहाँ है और अब उसकी सूरत कब किस तरह देखनी नसीब होगी। जब वे अच्छी तरह दुरुस्त नहीं हो जाते, न तो खुद कहीं जाने के लिए हुक़्म ले सकते थे और न किसी बहाने से अपने प्रेमी साथी ऐयार भैरोसिंह को ही कहीं भेज सकते थे। इस बीमारी की हालत में समय पाकर उन्होंने भैरोसिंह से सब हाल मालूम कर लिया था। यह सुनकर कि किशोरी को दीवान अग्निदत्त उठा ले गया बहुत ही परेशान थे मगर यह ख़बर उन्हें कुछ-कुछ ढाँढस देती थी कि चम्पा, चपला और पण्डित बद्रीनाथ उसके छुड़ाने की फ़िक्र में लगे हुए हैं और राजा बीरेन्द्रसिंह को भी यह धुन जी से लगी हुई है कि जिस तरह बने शिवदत्त की लड़की किशोरी की शादी अपने लड़के के साथ करके शिवदत्त को नीचा दिखावें और शर्मिन्दा करें।

कुँअर आनन्दसिंह ने भी अब इश्क के मैदान में पैर रक्खा, मगर इनकी हालत अजब गोमगो में पड़ी हुई थी। जब उस औरत का ध्यान आता जी बेचैन हो जाता था मगर जब देवीसिंह की बात को याद करतें कि वह डाकुओं के एक गिरोह की सरदार है तो कलेजे में अजीब तरह का दर्द पैदा होता था और थोड़ी देर के लिए चित्त का भाव बदल जाता था, लेकिन साथ ही इसके सोचने लगते थे कि नहीं अगर वह हम लोगों की दुश्मन होती तो मेरी तरफ़ देखकर प्रेम-भाव से कभी न हँसती और फूलों के गुलदस्ते और गजरे सजाने के लिए जब उस कमरे में आयी थी तो हम लोगों को नींद में गाफ़िल पाकर ज़रूर मार डालती। पर फिर हम लोंगों की दुश्मन अगर नहीं तो उन डाकुओं का साथ कैसा!

ऐसे-ऐसे सोच-विचार ने उनकी अवस्था खराब कर रक्खी थी। कुँअर इन्द्रजीतसिंह, भैरोसिंह और तारासिंह को उनके जी का पता कुछ-कुछ लग चुका था मगर जब तक उसकी इज्जत, आबरू और जात-पाँत की ख़बर के साथ-साथ यह भी मालूम न हो जाय कि वह दोस्त है या दुश्मन, तब तक कुछ कहना-सुनना या समझाना मुनासिब नहीं समझते थे।

राजा बीरेन्द्रसिंह को अब ये चिन्ता हुई कि जिस तरह वह औरत घर में आ पहुँची कहीं डाकू लोग भी आकर लड़कों को दुख न दें और फ़साद न मचावें। उन्होंने पहरे वग़ैरह का अच्छी तरह इन्तज़ाम किया और यह सोच कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह अभी चन्दुरुस्त नहीं हुए हैं कमज़ोरी बनी हुई है और किसी तरह लड़-भिड़ नहीं सकते, इनको अकेला छोड़ना मुनासिब नहीं, अपने सोने का इन्तज़ाम भी उसी कमरे में किया और साथ ही एक नया तथा विचित्र तमाशा देखा।

हम ऊपर लिख आये हैं कि इस कमरे के दोनों तरफ़ दो कोठरियाँ हैं, एक में सन्ध्या पूजम का सामान है और दूसरी वही विचित्र कोठरी जिसमें से वह औरत पैदा हुई थी। सन्ध्या पूजावाली कोठरी में बाहर से ताला बन्द कर दिया गया और दूसरी कोठरी का कुलाबा वग़ैरह दुरुस्त करके बिना बाहर ताला लगाये उसी तरह छोड़ दिया गया जैसे पहिले था, बल्कि राजा बीरेन्द्रसिंह ने उसी दरवाज़े पर अपना पलँग बिछवाया और सारी रात जागते रह गये।

आधी रात बीत गयी मगर कुछ देखने में न आया, तथा बीरेन्द्रसिंह अपने बिस्तर से उठे और कमरे में इधर-उधर घूमने लगे। घण्टे भर बाद उस कोठरी में से कुछ खटके की आवाज़ आयी, बीरेन्द्रसिंह ने फौरन तलवार उठा ली और तारासिंह को उठाने चले गये मगर खटके की आवाज़ पा तारासिंह पहिले ही सचेत हो गये थे, अब हाथ में खंजर ले बीरेन्द्रसिंह के साथ टहलने लगे।

आधी घड़ी के बाद जंजीर खटकने की आवाज़ इस तरह पर हुई जिससे साफ़ मालूम हो गया कि किसी ने इस कोठरी का दरवाज़ा भीतर से बन्द कर लिया। थोड़ी ही देर बाद पैर की धमाधमी की आवाज़ भीतर से आने लगी, मानों चार-पाँच आदमी भीतर उछल-कूद रहे हैं। बीरेन्द्रसिंह कोठरी के दरवाज़े के पास गये और हाथ का धक्का देकर किवाड़ खोलना चाहा मगर भीतर से बन्द रहने के कारण दरवाज़ा न खुला, लाचार उसी जगह ख़ड़े हो भीतर की आहट पर गौर करने लगे।

अब पैरों की धमाधमी की आवाज़ बढ़ने लगी और धीरे-धीरे इतनी ज़्यादे हुई कि कुँअर इन्द्रजीतसिंह और आनन्दसिंह भी उठे और कोठरी के पास जाकर खड़े हो गये। फिर दरवाज़ा खोलने की कोशिश की गयी मगर न खुला। भीतर जल्द-जल्द पैर उठाने और पटकने की आवाज़ से सभों को निश्चय हो गया कि अन्दर लड़ाई हो रही है। थोड़ी ही देर बाद तलवारों की झनझनाहट भी सुनायी देने लगी। अब भीतर लड़ाई होने में किसी तरह का शक न रहा। आनन्दसिंह ने चाहा कि दरवाज़े का कुलाबा तोड़ा जाय मगर बीरेन्द्रसिंह की मरजी न पाकर चुपचाहट खड़े आहट सुनते रहे।

यकायक धमधमाहट की आवाज़ बढ़ी और तब सन्नाटा हो गया। घड़ी-भर तक ये लोग बाहर खड़े रहे मगर कुछ मालूम न हुआ और न फिर किसी तरह की आहट आवाज़ ही सुनायी दी। रात सिर्फ़ दो घण्टे बल्कि इससे भी कम बाक़ी रह गयी थी। पहिरेवाले टहलकर अच्छी तरह से पहरा दे रहे हैं या नहीं यह देखने के लिए तारासिंह बाहर गये और सभों को अपने काम पर मुस्तैद पाकर लौट आये। इतने ही में कमरे की दरवाज़ा खुला और भैरोसिंह को साथ लिये देवीसिंह आते दिखायी पड़े।

ये दोनों ऐयार सलाम करने के बाद बीरेन्द्रसिंह के पास बैठ गये मगर यह देखकर कि यहाँ अभी तक ये लोग जाग रहे हैं ताज्जुब करने लगे।

देवी : आप लोग इस समय तक जाग रहे हैं!

बीरेन्द्र : हाँ, यहाँ कुछ ऐसा ही मामला हुआ जिससे निश्चिन्त हो सो न सके।

देवी : सो क्या

बीरेन्द्र : ख़ैर तुम्हें यह भी मालूम हो जायगा, पहिले अपना हाल तो कहो। (भैरोसिंह की तरफ़ देखकर) तुमने उस औरत को पहिचाना

भैरो : जी हाँ, बेशक वही औरत है जो यहाँ आयी थी, बल्कि वहाँ एक औरत दिखायी दी।

बीरेन्द्र : यहाँ से जाकर तुमने क्या किया और क्या-क्या देखा सो कुलासा कह जाओ।

भैरोसिंह ने जो कुछ देखा था कहने के बाद यहाँ का हाल पूछा। बीरेन्द्रसिंह ने भी यहाँ कि कुल कैफ़ियत कह सुनायी और बोले, ‘‘हम यही राह देख रहे थे कि सवेरा हो जाय और तुम लोग भी आ जाओ तो इस कोठरी को खोलें और देखें कि क्या है, कहीं से किसी के आने-जाने का पता लगता है या नहीं।’’

कोठरी खोल दी गयीः एक हाथ में रोशनी और दूसरे हाथ में नंगी तलवार लेकर पहिले देवीसिंह कोठरी के अन्दर घुसे और तुरन्त ही बोल उठे—‘‘वाह-वाह, यहाँ तो खून खराबा मच चुका है!’’ अब बीरेन्द्रसिंह, दोनों कुमार और उनके दोनों ऐयार भी कोठरी के अन्दर आ गये और ताज्जुब भरी निगाहों से चारों तरफ़ देखने लगे।

इस कोठरी में जो फ़र्श बिछा हुआ था वह इस तरह से सिमट गया था जैसे कई आदमियों के बेअख्तियार उछल-कूद करने या लड़ने से इकट्ठा हो गया हो, ऊपर से वह खून से भी तर हो रहा था। चारों तरफ़ दीवारों पर भी खून के छीटें और लड़ती समय हाथ बहककर बैठजाने वाली तलवारों के निशान भी दिखायी दे रहे थे। बीच में एक लाश पड़ी हुई थी मगर बेसिर की, कुछ समझ में नहीं आता था वह लाश किसकी है। कपड़ों में सिर्फ़ एक लंगोट उसकी कमर में था। तमामबदन नंगा जिसमें अन्दाज़  से ज़्यादे तेल लगा हुआ था। दाहिने हाथ में तलवार थी मगर वह हाथ भी कटा हुआ सिर्फ़ ज़रा-सा चमड़ा लगा हुआ था, इस पर भी तना कम कि अगर कोई खैंचे तो अलग हो जाय। सबसे ज़्यादे परेशान करने वाली एक चीज़ और दिखायी दी।

दाहिने हाथ की कटी हुई एक कलाई जिसमें फौलादी कटार अभी तक मौजूद थी, दिखायी पड़ी। आनन्दसिंह ने फौरन उस हाथ को उठा लिया और सभों की निगाह भी गौर के साथ उस पर पड़ने लगी। यह कलाई किसी नाजुक हसीन और कमसिन औरत की थी। हाथ में हीरे का जडाऊ कड़ा और ज़मीन पर मानिक की दो तीन बारीक जड़ाऊ चूड़ियाँ भी मौजूद थीं, शायद कलाई कटकर गिरती समय ये चूड़ियाँ हाथ से अलग हो ज़मीन पर फैल गयी हों।

इस कलाई के देखने से सभों को रंज हुआ और झट उस औरत की तरफ़ ख्याल दौड़ गया जिसे उस कोठरी में से निकलते सभों ने देखा था। चाहे उस औरत के सबब से ये कैसे ही हैरान क्यों न हों मगर उसकी सूरत ने सभों को अपने ऊपर मेहरबान बना लिया था, ख़ास करके कुँअर आनन्दसिंह के दिल में तो वह इनके जान और माल की मालिक ही होकर बैठ गयी थी, इसलिए सबसे ज़्यादे दुःख छोटे कुँअर साहब को हुआ। यह सोचकर कि बेशक यह उसी औरत की कलाई है कुँअर आनन्दसिंह की आँखों में जल भर आया और कलेजे में एक किस्म का दर्द पैदा हुआ, मगर इस समय कुछ कहने या अपने दिल का हाल ज़ाहिर करने का मौका न समझ उन्होंने बड़ी कोशिश से अपने को सम्हाला और चुपचाप सभों का मुँह देखने लगे।

पाठक, अभी इस औरत के बारे में बहुत कुछ लिखना है इसलिए जब तक यह मालूम हो जाय कि यह औरत कौन है, तब तक अपने और आपके सुभीते के लिए हम इसका ‘किन्नरी’ रख देते हैं।

राजा बीरेन्द्रसिंह और उनके ऐयारों ने इन सब अद्भुत बातों को जो इधर कई दिनों में हो चुकी थीं छिपाने लिए बहुत कोशिश की मगर हो न सका। कई तरह पर रंग बदल कर यह तमाम बात शहर में फैल गयी। कोई कहता था ‘महाराज के मकान में देव और परियों ने डेरा डाला है’! कोई कहता था ‘गयाजी के भूत-प्रेत इन्हें सता रहे हैं’! कोई कहता था ‘दीवान अग्निदत्त के तरफ़दार बदमाश और डाकुओं ने यह फ़साद मचाया है’! इत्यादि बहुत तरह की बातें शहरवाले आपुस में कहने लगे मगर उस समय उन बातों का ढँग ही बिल्कुल बदल गया, जब राजा बीरेन्द्रसिंह के हुक़्म से उस सिरकटी लाश को जो कोठरी में से निकली थी उठवाकर सदर चौक पर रखवा दिया और उसके पास एक मुनादीवाले को यह पुकारने के लिए बैठा दिया कि—‘अग्निदत्त के तरफ़दार डाकू लोग जो शहर के रईसों और अमीरों को सताया करते थे ऐयारों के हाथ गिरफ़्तार होकर मारे जाने लगे, आज एक डाकू मारा गया है, जिसकी लाश यह है’।


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