भूतनाथ - खण्ड 7 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 7 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 7

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :290
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8366
आईएसबीएन :978-1-61301-024-2

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भूतनाथ - खण्ड 7 पुस्तक का ई-संस्करण

दसवाँ बयान


रात आधी से कुछ ज्यादा जा चुकी थी। अजायबघर की छोटी मगर सुन्दर इमारत में इस समय एकदम सन्नाटा और अन्धेरा है, केवल पूरब तरफ वाली कोठरी में से कुछ आहट आ रही है जिसमें जलने वाले एक मामूली चिराग की हल्की रोशनी दरवाजे की उस संध से बाहर आकर फीकी-फीकी कुछ दूर तक फैल रही है जिसमें आंखें लगाये एक आदमी न-जाने कब से खड़ा भीतर की हालत पर गौर कर रहा है।

कोठरी के अन्दर कुछ ज्यादा सामान नहीं है। न कुछ विशेष आदमी ही हैं, बीचोंबीच में काठ की एक चौकी पड़ी हुई है जिस पर बाघम्बर बिछा हुआ है और उस पर मृगचर्म ओढ़े सारे शरीर में भस्म लगाये, सफेद दाढ़ी और सफेद जटा फैलाये, माथे पर त्रिपुण्ड धारण किए एक महात्मा बैठे मोटे-मोटे दानों की हजारा माला फेर रहे हैं, केवल इस माला के दानों की परस्पर की रगड़ या कभी-कभी महात्माजी के होंठों से आप-से-आप निकल पड़ने वाले किसी बीज मन्त्र की ध्वनि ही उस स्थान का सन्नाटा तोड़ती है नहीं तो वहाँ जरा भी शब्द नहीं होता।

काला कम्बल ओढ़े बाहर खड़ा वह आदमी कुछ देर तक तो भीतर की कैफियत देखता रहा और तब उसने गौर से अपने चारों तरफ देखा।सब तरफ सन्नाटा था, कहीं किसी की आहट या किसी आदमी के होने का खटका तक न था, मगर फिर भी उसका मन न माना और वह दबे पांव एक बार उस इमारत-भर में घूम आया, केवल उत्तर तरफ वाली कोठरी को छोड़कर, जो सब तरफ से बन्द थी, बाकी सब जगहों के दरवाजे खुले थे और वह एक-एक करके सब देख आया पर न तो उसे कहीं कोई आदमी ही सोया, बैठा या लेटा दिखा और न किसी तरह का सामान ही कहीं नजर आया। वह सदर दरवाजे तक भी पहुँचा मगर उसे भी साधारण तौर पर भीतर से बन्द पाया जिससे हमें यह सोचना पड़ता है कि यह किसी तरह कमन्द लगाकर या कोई और तरकीब कर यहाँ पहुँचा है, खैर, जो कुछ हो।

सब तरह से घूम-फिर और अपना मन भरकर वह आदमी फिर उसी पहली कोठरी के दरवाजे पर पहुँचा और एक बार अन्दर झांककर देखने और सब कुछ ज्यों-का-त्यों पाने के बाद उसने धीरे-से कोठरी का पल्ला खोला। उसे सन्देह था कि चौकी पर बैठे महात्मा दरवाजा खुलते देख चौंके और कुछ कहेगें पर ऐसा कुछ भी न हुआ यहाँ तक वह उनके बहुत पास तक चला गया और तब उसकी तरह हमने भी देखा कि महात्माजी के नेत्र बन्द हैं और उनके चेहरे पर और आंखों के चारों तरफ लगी हुई भभूत-स्थान-स्थान से गीली होकर अपनी नीरव कथा कह रही है।

काला कम्बल ओढ़े वह आदमी कुछ देर तक यहाँ खड़ा रहा पर उसने देखा कि अपने जप में डूबे उन महात्माजी को उसके आने की कुछ भी खबर नहीं है तो वह कुछ मुस्कराया, उसने बगल के आले पर जलते हुए चिराग की बत्ती तेज की और तब जोर से खांसकर महात्माजी का ध्यान भंग किया, उसके बदन में हल्की फुरहरी आई, उंगलियों तक पहुँचा हुआ सुमेरू हाथ से माथे से लगाया, कुछ अस्पष्ट स्तुति के शब्द सुन पड़े और तब माला रख महात्मा ने अपने नेत्र खोल चारों तरफ देखा, रोशनी के पास किसी आदमी को खड़ा देख उन्होंने पूछा, ‘‘कौन?’’

वह आदमी ठठाकर हँसा, फिर एक कदम उनकी तरफ बढ़कर बोला, ‘‘वाह दारोगा साहब वाह! रूपक तो आपने बड़ा सच्चा रचा है! मगर यह तो बताइए कि इस निराले में ऐसा ढोंग करने की क्या जरूरत थी? इस समय तो कोई भी यहाँ है नहीं जो आपकी इस हालत को देख सके!!’’

हैं, यह क्या बात? क्या वे बाघम्बर पर बैठे महात्मा और कोई नहीं जमानिया के दारोगा साहब हैं!! बेशक वे ही हैं क्योंकि उनका कंठ-स्वर इस बात में सन्देह नहीं रहने देता। इस आदमी की बात सुन उन्होंने कहा-‘‘क्या मैं भूतनाथ की आवाज सुन रहा हूँ या मेरे कानों का भ्रम है? इधर आओ भूतनाथ, अपने दोस्तों को भी पहचान नहीं सकता! आओ और बताओ कि आज इतने दिनों बाद तुम्हें यकायक इस पापी की याद कैसे आ गई!’’

उस आदमी ने काला कम्बल दूर किया और अपना चेहरा रोशनी की तरफ घुमाकर कहा, ‘‘हाँ, मैं भूतनाथ ही हूँ, आप अच्छी तरह देखिये और पहचानिये। जरूर आपकी आंखें और साथ ही कान भी कमजोर हो रहे होंगे जो आपको मेरे यहाँ आने की आहट न लगी और न आपने मुझे देखा ही!’’

दारोगा साहब बोले, ‘‘तुम्हारी बातों में व्यंग्य की ध्वनि है मगर मुझे उसका बुरा नहीं लगा भूतनाथ! मुझ पर चारों तरफ से दोस्त, दुश्मन सभी की ओर से, इतने वाक्बाण छोड़े गये हैं कि मेरा मन जर्जर हो गया है, अब तो मैं रात-दिन भगवान् से अपने पापों के लिए क्षमा मांगता हुआ यही प्रार्थना करता हूँ कि वह मुझे जल्दी-जल्दी इस दुनिया से उठा ले। क्या बताऊं, अगर आत्महत्या करना बड़ा भारी पातक न होता तो मैं वह भी कर गुजरता। पर डरता हूँ कि मुझ पापी की आत्मा जिसका सारा जीवन नारकीय कृत्यों में ही बीता, ऐसा करके कहीं और भी कष्ट में न पड़ जाए। आओ, इधर आओ, लो यह कम्बल लो और इस पर बैठकर तुम भी जो कुछ खरी-खोटी मुझे सुनाना चाहो सुना लो और विश्वास रखो कि तुम चाहे जो कुछ भी कहोगे मैं उसका जरा भी बुरा न मानूंगा, क्यों मैं उसी के योग्य हूँ!’’

भूतनाथ खिलखिलाकर हँसा और तब दारोगा की तरफ बढ़कर उसके बताये हुए कम्बल पर बैठता हुआ बोला, ‘‘बहुत खूब, दारोगा साहब, तारीफ करता हूँ मैं आपकी! क्या सच्चे भाव से आपने ये बातें कहीं हैं!!’’

दारोगा : तुमको मुझे जो कुछ भी सुनाना हो सुना जाओ मगर अन्त में दया कर इतना जरूर बता देना कि तुम आजकल कहाँ छिपे हुए हो जो मेरी इतनी दफे की पुकार भी कारगर न हुई और जमानिया की इस मुसीबत के वक्त भी तुम मेरे काम न आ सके क्योंकि इस बात को मैं नहीं मान सकता कि मेरे सन्देशे तुम तक नहीं पहुँचे होंगे।

भूत० : जरूर पहुँचे थे और तभी तो मैं आया हूँ। आने में जल्दी मैंने नहीं की और सो भी सिर्फ इसलिए कि शायद वैसा करने से आपके काम में विघ्न पड़ता। आपको जरूर यह बात मालूम है कि आप ही की तरह मैं भी आजकल महात्मा और तपस्वी होने का ढोंग रचे हुए एक ऐसे स्थान पर विराज रहा हूँ जहाँ इस समय यद्यपि अपनी सूरत में एक चेले को बैठा आया हूँ फिर भी मेरा जल्दी लौट जाना जरूरी है क्योंकि तरह-तरह के लोग वहाँ आते रहते हैं, अस्तु इस समय भी मैं सिर्फ दो ही एक बातें आपसे पूछूंगा और फिर तुरन्त चला जाऊंगा।

दारोगा : पूछो-पूछो, शौक से पूछो, मुझे सब बातों का सच-सच जवाब देने में जरा भी रुकावट करते न पाओगे।

भूत० : पहला सवाल तो मैं यह करूंगा कि क्या नन्हों आपके ही इशारे से मेरे पास आया और आपकी तथा दलीपशाह की चिट्ठियां मुझे दिखाया करती थी?

भूतनाथ समझता था कि यह सवाल सुनते ही दारोगा चौंक उठेगा मगर उसने जरा पलक तक न हिलाई और तुरन्त जवाब दिया, ‘‘हाँ और नहीं तो क्या।’’ उसके इस जवाब ने बल्कि उल्टा भूतनाथ को चौंका दिया और वह कुछ देर के लिए रुक-सा गया जिसे लक्ष्य कर दारोगा फिर बोला, ‘‘और मुझे यह भी मालूम है कि तुम्हारे दो शागिर्दों ने उसे गिरफ्तार करके तुम्हारे ही किसी गुप्त स्थान में पहुँचा दिया है तथा वह भी तुम्हारा ही कोई शागिर्द था जो आखिरी दफे नन्हों का भेष धर के मेरे पास आया था।’’

दारोगा की यह बात सुन भूतनाथ कुछ परेशान-सा हो गया मगर इस बात को उसने बड़ी खूबी से छिपाया और जरा-सा हँसकर कहा, ‘‘अगर इन बातों की खबर आपको है तो फिर मेरा काम बहुत ही सरल हो गया मगर फिर मैं यह भी आशा करूंगा कि जैसे इस समय तक आपने साफ-साफ बातें कहीं हैं उसी तरह मेरे एक दूसरे सवाल का भी जवाब देंगे।

दारोगा : उसे भी पूछ देखो।

भूत० : अपनी आखिरी चिट्ठी में दलीपशाह को आपका काम कर देने के लिए कौन चीज देने की लालच आपने दिखाई है?

दारोगा : अगर वह चिट्ठी तुमने पढ़ ली है तो तुम खुद ही समझ गये होगे।

भूत० : तो भी, मैं आप ही के मुँह से सुनना चाहता हूँ।

दारोगा : अच्छी बात है, तो सुन लो। वह वही ‘सोने का उल्लू’ है जो बड़ी मायारानी ने तुम्हें दिया था।

भूतनाथ इस बात को सुनकर कांप गया फिर भी उसने अपने पर खूब काबू रखा और बड़ी होशियारी से अपनी आवाज शान्त रखता हुआ बोला, ‘‘वह आपके कब्जे में कैसे आया?’’

दारोगा : (उसी शान्त भाव से, मगर जिसकी तेज निगाहों से भूतनाथ की बेचैनी छिपी न थी) एक ऐसे आदमी के जरिये जो तुम्हारा जानी-दुश्मन है, जिससे बढ़कर तुम्हारा बुरा चाहने वाला कोई नहीं है और जिसके जीते रहने का तुम्हें गुमान तक भी नहीं हो सकता।

भूत० : (घबराकर) वह कौन?

दारोगा : रोहतासमठ का पुजारी।

न-जाने इस नाम में क्या असर था कि भूतनाथ इसे सुनते ही सन्न हो गया। उसका चेहरा पीला पड़ गया और उसकी आंखों के सामने उस वक्त का दृश्य घूम गया जबकि हड्डियों के अन्दर बहुत खोजने पर भी उसे अपनी चीज नहीं मिली थी और तिलिस्मी शैतान ने प्रकट होकर उससे कहा था कि--शिवगढ़ी की चाभी तो मैं ले जा ही रहा हूँ, साथ ही भानुमति का पिटारा भी मेरे कब्जे में आ गया है उसके माथे में चक्कर आ गया फिर भी बड़ी कोशिश से उसने अपने को काबू में किया और दारोगा की तरफ देख जिसकी तेज निगाहें उसके चेहरे पर पड़ रही थीं यों कहा— (१. देखिए भूतनाथ बीसवाँ भाग , दूसरा बयान।)

भूत० : क्या आप सही कह रहे हैं और क्या आपकी बात का मैं यह मतलब लगाऊं कि वह अभी तक जीता है?

दारोगा : बेशक!!

भूतनाथ का सिर नीचा हो गया और बहुत देर तक वह न-जाने क्या सोचता रहा। आखिर उसने आगे बढ़कर दारोगा का हाथ पकड़ लिया और गमगीन आवाज में उससे कहा, ‘‘दारोगा साहब, आप जिस तरह साफ-साफ ढंग से मुझसे बातें कर रहे हैं उससे मुझे विश्वास होता है कि मेरी तरफ से कम-से-कम इस समय किसी तरह का बुरा ख्याल आपके मन में नहीं है और आप मेरी उन बातों को सुनने और समझने को तैयार हैं जो यद्यपि बड़ी ही गुप्त हैं मगर फिर भी जिनका आपसे जिक्र कर देना मैं जरूरी समझता हूँ,’’

दारोगा ने यह सुन कहा, ‘‘तुम्हें जो कुछ कहना हो खुले दिल से कहो मैं खुशी-खुशी सुनूंगा, मगर यह ख्याल रखो कि सवेरा होने में ज्यादा विलम्ब नहीं है और उसके साथ-ही-साथ यहाँ उन कम्बख्त आदमियों की भीड़ लग जाएगी जिनसे मैं लाख कहता हूँ कि मुझे अब जमानिया के राज या उसके काज में किसी तरह की कोई दिलचस्पी नहीं रह गई अस्तु तुम लोग मेरे पास आकर मुझे तंग न किया करो, फिर भी वे नहीं मानते और परेशान करते रहते हैं।’’

भूतनाथ ने यह सुन कहा, ‘‘मैं अपनी बातें बहुत जल्दी समाप्त करूंगा।’’ और तब दारोगा की तरफ बढ़कर धीरे-धीरे कुछ कहने लगा।

भूतनाथ की बातें काफी देर तक होती रहीं और इसके बाद दारोगा ने भी बहुत-सी बाते कहीं जिनका सिलसिला करीब घण्टे-भर तक जारी रहा। इन बातों का तात्पर्य क्या था यह तो हम नहीं जानते फिर भी इतना जरूर कह सकते हैं कि दोनों ने दिल खोलकर बातें कीं और अन्त में दारोगा ने उठकर भूतनाथ को गले से लगाते हुए कहा, ‘‘बस अब मेरा दिल तुम्हारी तरफ से पूरी तरह साफ हो गया और मैं तुम्हें खुशी-खुशी वह चीज देने को तैयार हूँ जो मेरे पास अमानत के तौर पर रख दी गई है। मगर याद रखना तुम्हें अपना वायदा पूरा करना होगा!’’ इसके जवाब में भूतनाथ ने दारोगा का काम पूरा करने की कसम खाई और तब दोनों आदमी उस कोठरी के बाहर निकले। आगे-आगे दारोगा और पीछे-पीछे भूतनाथ उस उत्तर तरफ वाली कोठरी के पास पहुँचे जो बन्द थी। कमर से ताली निकालकर दारोगा ने कुंडे में लगा भारी ताला खोला और तब अन्दर जा और भूतनाथ को भी अपने साथ भीतर कर किवाड़ बन्द कर लिया।

इस छोटी कोठरी के चारों तरफ की दीवारों में छोटी-बड़ी कितनी ही आलमारियां बनी हुई थीं जिनमें से एक के पास दारोगा गया जिसके पल्ले लोहे के थे। अपने गले के साथ लटकती हुई एक छोटी ताली से ताला खोल दारोगा ने उसके मुट्ठे पर हाथ रखा और भूतनाथ से कहा, ‘‘लो, तुम्हारी बहुत ही प्यारी चीज तुम्हारे सामने आती है, होशियार हो जाओ!’’ दारोगा ने दोनों पल्ले खोलकर अलग किये और भूतनाथ को आगे बढ़ने का इशारा किया।

मगर यह क्या? आलमारी एकदम खाली थी और उसमें किसी तरह का सामान न था। दारोगा के मुँह से यह देख ताज्जुब की एक चीख निकल गई और वह भौचक्का-सा होकर इधर-उधर देखने लगा। भूतनाथ ने एक दफे उस खाली आलमारी की तरफ और दूसरी दफे दारोगा की तरफ देखा और तब बिना पूछे ही समझ लिया कि जिस चीज को उसको देने के लिए दारोगा यहाँ उसे लाया था वह कहीं गायब हो गई, वह दारोगा, को हटा खुद आगे बढ़ा और गौर से उस आलमारी के अन्दर देखने लगा मगर वहाँ था ही क्या जो उसे दिखाई पड़ता हाँ, उसके निचले खाने में पड़े एक काले लिफाफे पर उसकी निगाह जरूर पड़ी जो वहाँ पड़ा हुआ था। भूतनाथ के साथ-ही-साथ दारोगा ने भी लिफाफे को देखा और हाथों से दारोगा ने कागज निकालकर पढ़ा तथा उसी के साथ भूतनाथ ने भी उसके मजमून पर निगाह डाली। यह लिखा था-

‘‘दारोगा साहब, सलाम!

मैं समझ गया कि आप कितने बड़े धूर्त और मक्कार हैं! मुझे धोखे में डाल भूतनाथ का काम करना और मुझे उसके फन्दे में फंसाना चाहते थे? समझ लीजिये कि मैं आपके जाल में नहीं फंस सकता। इस आलमारी के अन्दर जो कुछ आपने रखा हुआ था वह तो मैं ले ही चला। साथ-ही-साथ यह भी समझ रखिये कि अब तीन दिन के भीतर आपको और आपके हिमायती भूतनाथ को दुनिया-भर में बदनाम करके आप लोगों की सच्ची कलई खोल दूंगा जिसके लिए आप दोनों अब तैयार हो रहिये।

आपका दोस्त-

दलीपशाह’’

दारोगा तो यह चिट्ठी पढ़ते ही बदहवासी के साथ जमीन पर बैठ गया मगर भूतनाथ ने उसके हाथ से वह कागज ले लिया और एक दफे पुनः गौर से पढ़ा, इसके बाद उसी काले लिफाफे में रख उसने कपड़ों में छिपा लिया और तब गुस्से से दांत पीसता हुआ बिना दारोगा से कुछ भी कहे बल्कि उसे उसी तरह छोड़ वह कोठरी के बाहर निकल गया।

आधी रात का वक्त है। घनघोर बदली छाई है और बिजली क्षण-क्षण में चमकती और कड़े-से-कड़े कलेजों को भी दहलाती हुई बता रही है कि बात की-बात में मूसलाधार पानी बरसना ही चाहता है।

दलीपशाह के आलीशान मकान के पिछवाड़े की तरफ पड़ने वाले बहुत बड़े बाग के एक कोने में, आम की कई बिगहों तक फैली घनी बारी के अन्त में और बांस के सघन कुंज से घिरा हुआ एक छोटा बंगला है जो इस कदर आड़ में पड़ता है कि यहाँ तक आ जाने पर भी उस पर यकायक किसी की निगाह नहीं पड़ सकती।

इसी बंगले के अन्दर जिसमें छोटी-छोटी केवल दो-तीन कोठरियां और सामने एक बरामदा है, भूतनाथ की बेचारी असली पहली स्त्री शान्ता का डेरा है। दलीपशाह की स्त्री ने जो शान्ता की बहिन होती है उसे लाकर यहाँ रखा है और यहाँ वह दुनिया की निगाहों से छिपकर अपने पति की शुभ-कामना करती हुई इस तरह रहती है कि किसी को भी उसके होने की खबर नहीं है बल्कि उसकी जिद्द से लाचार होकर दुनिया में दलीपशाह को यह मशहूर करना पड़ा है कि वह मर गई। ऐसी ही खबर भूतनाथ के भी कानों तक पहुँच चुकी है।

बाहर के बरामदे में दलीपशाह एक चौकी पर शमादान के आगे बैठे हुए कुछ लिख रहे हैं और भीतर कोठरी में उनकी स्त्री और शान्ता बैठी भोजन करती हुई साथ-साथ आपस में कुछ बातें भी करती जा रही हैं। दलीपशाह का छोटा बच्चा शान्ता की गोद में है और शान्ता का छोटा लड़का, भूतनाथ की आखिरी सन्तान, बाहर एक खाट पर उस गहरी नींद में सोया हुआ है जो बहुत जल्द ही उसकी आखिरी नींद साबित होने वाली है। दलीपशाह शायद भूतनाथ ही के संबंध में कोई बात लिख रहे हैं क्योंकि वह पीतल की सन्दूकड़ी जिसे देखने से भूतनाथ का खून सूखता है उनके सामने पड़ी हुई है और आस-पास और भी बहुत-से कागज-पत्र फैले हुए हैं।

बिजली की एक गहरी चमक देख दलीपशाह ने अपनी कलम रोकी और भीतर की तरफ देखकर कहा, ‘‘बहिन शान्ता, अब पानी बरसना ही चाहता है। लड़के का बाहर रहना ठीक नहीं, इसे तुम अन्दर ले जाओ और मैं भी बैठक में चलता हूँ साथ ही इस गठरी को भी लिये जाता हूँ जिसके अन्दर भूतनाथ की किस्मत बन्द है, क्योंकि शेरसिंह ने वायदा किया है कि वह आज रात को श्यामजी को लेकर जरूर मेरे पास पहुँचेंगे। उनके आते ही मैं उन दोनों को यहाँ ले आऊंगा और तुम्हारी आंखें अपने बहुत दिनों से बिछड़े हुए भाई को देखकर ठंडी होंगी। मगर ठहरो, मालूम होता है वे दोनों आ पहुँचे, क्योंकि महाबीर दौड़ा हुआ मुझे कोई खबर देने चला आ रहा है। सिर्फ इसी को मालूम है कि मैं इस समय यहाँ हूँ!’’

अपनी जीवनी लिखता हुआ भूतनाथ यहाँ पर नोट लिखता है-‘‘जितना बड़ा धोखा मुझे इस जगह उठाना पड़ा उतना जिन्दगी-भर में कहीं कभी भी उठाना न पड़ा था और सच तो यह है कि इसने मेरी जिन्दगी ही बर्बाद कर दी। यह एक नाटक था जो हरामजादे दारोगा ने मुझे धोखा देने और दलीपशाह को मेरा दुश्मन बनाकर मेरे ही हाथों उसे चौपट करने के लिए रचा था क्योंकि चन्द्रकान्ता सन्तति के पढ़ने वाले पाठक जानते हैं कि इसके बाद ही मैं दलीपशाह का जानी दुश्मन हो गया और उसे बर्बाद कर देने में कोई कसर न उठा रखी यहाँ तक कि अन्त में उसे गिरफ्तार कर दारोगा के हवाले कर ही दिया, पर असर में यहाँ पूरा जाल रचा गया था।

वह चिट्ठी जो उस काले लिफाफे के अन्दर मुझे मिली (जैसाकि हाल में दलीपशाह, इन्द्रदेव वगैरह से मिलने पर मालूम हुआ है) दलीपशाह के हाथ की लिखी हुई थी ही नहीं बल्कि खुद दारोगा ने जैपाल से लिखवाकर मुझे धोखा देने के लिए उस जगह रखी थी। वास्तव में जैपाल ने दलीपशाह के अक्षर बड़ी खूबी से बनाये थे जिन्होंने मुझे पूरा धोखा दिया और सच तो यह है कि उस वक्त मैं अपनी गर्ज में अन्धा भी हो रहा था। उस आलमारी में कुछ भी न था और दारोगा ने केवल मुझे फंसाने के लिए वह नाटक रचा था क्योंकि उस समय तक वह सोने का उल्लू किसी दूसरे ही शुभ हाथों में जा चुका था जहाँ उसकी असल जरूरत थी और जिसका हाल शायद आगे चलकर पाठकों को मालूम हो।’’

सचमुच ही एक नौजवान दौड़ता आ रहा था जिसने आते ही दलीपशाह से कहा, ‘‘गुरुजी, बड़ा गजब हो गया! भूतनाथ आया है और आपसे अभी मिलना चाहता है।’’

दलीपशाह, जो कोई दूसरी ही खबर सुनने की उम्मीद में थे, यह समाचार सुन जरा-सा चौंके मगर तुरन्त ही हँसकर बोले, ‘‘अरे तो इसमें गजब क्या हुआ! चलो उसे बैठक में बैठाओ मैं अभी आता हूँ। मगर देखो ख्याल रखना कि वे लोग अगर आवें जिनके बारे में मैंने कहा था तो उन्हें भूतनाथ के सामने न लाकर किसी दूसरी जगह बैठाना और मुझे खबर करना!’’

महाबीर बोला, ‘‘जो हुक्म, मगर आप जरा जल्दी ही आइये क्योंकि वह न-जाने क्यों पागल-सा हो रहा है और बड़े ही गुस्से में है!’’ उसे जाने को कह दलीपशाह औरतों की तरफ घूमें और कुछ हँस कर उनसे बोले, ‘‘मै जाऊँ और जरा देखकर आऊं यह पागल इस वक्त क्या करने आया है?’’ शान्ता हाथ जोड़कर बोली, ‘‘लेकिन जो कुछ भी हो, उन पर दया रखियेगा, यही मेरी प्रार्थना है!’’ जिसे सुन दलीपशाह ठठाकर हँसे और तब इशारे से किवाड़ बन्द कर लेने को कहा क्योंकि उसी समय बिजली बड़े जोर से चमकी और उसकी रोशनी में उन्होंने किसी आदमी को काले कम्बल की घोघी लगाए आम की बारी में से निकलकर अपनी तरफ आते पाया। यह आने वाला भूतनाथ था।

क्या अजीब हालत हो रही थी इस समय भूतनाथ की! सिर और दाढ़ी-मूंछ के बाल बड़े-बड़े और वहशियों की तरह पर फैले तथा उलझे हुए। आंखें लाल, बदन में सिर्फ एक लंगोटी लगाए, ऊपर से काला कम्बल ओढ़े था जिस पर से गिरता हुआ पानी यह बता रहा था कि बाहर बारिश शुरू हो गई है। दिल में यह निश्चय रूप से पहचान न सके क्योंकि उसके चेहरे पर एक छोटी-सी नकाब जिससे केवल उसका आधा ही चेहरा छिपा हुआ था, पड़ी थी। इस नकाब और कम्बल पर खून के छींटे पड़े हुए थे और उसके हाथ में खून से तर एक खंजर था जिसे देखते ही दलीपशाह समझ गये कि वह जरूर पहरे पर के आदमियों को जख्मी करता हुआ यहाँ तक पहुँचा है।

मगर इसमे कोई शक नहीं कि दलीपशाह जीवट का आदमी था। भूतनाथ की ऐसी हालत और उसके हाथ का खूनी खंजर देखकर भी वह जरा न डरा बल्कि उठकर खड़ा हो गया और डपटकर बोला, ‘‘कौन हो और किसलिए यहाँ आये हो?’’

आने वाले ने इसका जवाब न दिया और सीधा उस गठरी की तरफ झुका जो दलीपशाह के आगे खुली पड़ी थी और जिसके कागज-पत्र तरफ फैले हुए थे मगर दलीपशाह ने उसी समय हाथ बढ़ा उसकी नकाब खींच ली और तब ताज्जुब से कहा, ‘‘है! भूतनाथ तुम!! मगर यह तुम्हारी क्या हालत हो रही है?’’ लेकिन भूतनाथ ने इसका कुछ भी जवाब न दिया। उसके मुँह से अस्पष्ट स्वरों में कोई बात निकली और वह नीचे की तरफ झुका जहाँ कागजों के बीच में चमकती हुई वह पीतल वाली सन्दूकड़ी दिखाई पड़ रही थी। दलीपशाह की निगाह भी उधर ही को उठ गई और उस सन्दूकड़ी को देखते ही वह भूतनाथ का मतलब समझ गया। हाथ बढ़ाकर उसने भूतनाथ की कलाई पकड़ ली मगर भूतनाथ ने झटका देकर हाथ छुड़ा लिया और एक हाथ से वह सन्दूकड़ी उठाते हुए दूसरे से दलीपशाह पर खंजर का वार किया। अगर दलीपशाह फुर्ती से अपने को बचा न लेते तो इसमें कोई शक नहीं कि खंजर की चोट खाकर बेतरह जख्मी हो जाते। मगर पैंतरे के साथ पीछे हटकर उन्होंने अपने को बचा लिया और साथ ही अपनी कमर से खंजर निकालते हुए डपटकर बोले, ‘‘खबरदार! यह मेरे जिगर का खून है जिसे तुम उठा रहे हो। उसे लेने का इरादा मत करो!’’

भूतनाथ पागलों की तरह ठठाकर हँसा और जल्दी-जल्दी उस सन्दूकड़ी को अपने कपड़ों में छिपाने लगा जिससे एक काला लिफाफा उसकी बगल से निकलकर जमीन पर गिर पड़ा। भूतनाथ का ध्यान उस तरफ नहीं गया और सन्दूकड़ी ठिकाने से रख वह दलीपशाह की तरफ घूमकर बोला, ‘‘यह सन्दूकड़ी तो-जिसे तुम भानुमति का पिटारा कहा करते थे- मेरे हाथ लग गई, अब तुम सीधे से मेरी दूसरी चीज, वह सोने का उल्लू भी दे दो जिसे दारोगा साहब की आलमारी से चुरा लाये हो, नहीं याद रखो मैं तुम्हें कहीं का न छोड़ूँगा!!’’

दलीपशाह चौंककर बोले, ‘‘तुम पागल हो गये हो क्या! किसने तुमसे....?’’ मगर उनकी बात खत्म न हो सकी। भूतनाथ, जो उस समय गुस्से में पागल हो रहा था और जो अपनी एक चीज वहाँ पर पा समझ गया था कि बाकी चीजें भी जरूर इसी के पास होंगी, डपटकर बोला, ‘‘मैं जानता हूँ कि तुम सीधे से मानने वाले नहीं हो! इसीलिए तो मैं खुद यहाँ पहुँचा हूँ। (खाट की तरफ देखकर) यह तुम्हारा बच्चा है न!! (अपना खंजर उसके कलेजे पर रखकर) अभी-अभी वह सोने का उल्लू मुझे दो और साथ ही रिक्तगंथ भी मेरे हवाले करो नहीं तो याद रखो मेरे हाथ का खंजर अभी तुम्हारे बच्चे को यमलोक भेज देगा!!’’

दलीपशाह हँसकर बोले, ‘‘भूतनाथ, पागल मत बनो। किसने तुमसे कह दिया कि ये सब चीजें मेरे पास हैं? तुम व्यर्थ मुझ पर उनके चुराने का इल्जाम लगा रहे हो। विश्वास रखो कि मेरे पास वे चीजें नहीं हैं और साथ ही यह भी समझ रखो कि वह लड़का जिसे तुम....’’मगर भूतनाथ सचमुच ही पागल हो रहा था। उसने दलीपशाह की बातों पर कान न दिया और गुस्से से गरजकर कहा, ‘‘नहीं दोगे तुम मेरी चीज! अच्छा, तो लो....!’’ एक हल्की पतली चीख जो तुरन्त ही खत्म हो गई, हवा में फैली और भूतनाथ का खंजर उस मासूम बच्चे के कलेजे के पार हो गया!

दलीपशाह की आँखों से खून टपक पड़ा और गले से कलेजा दहला देने वाली भयानक चीख निकली। वे झपटकर आगे बढ़े और खंजर का एक भरपूर हाथ इस जोर से भूतनाथ पर चलाया कि अगर कहीं ठिकाने पड़ गया होता तो भूतनाथ के दो टुकड़े नजर आते, पर वह चौंककर कावा काटता हुआ अलग हो गया और बोला, ‘‘अपने लड़के की हालत देखो और याद रखो कि भूतनाथ से दुश्मनी करने का नतीजा क्या होता है!! अभी तो यह श्रीगणेश है, अभी देखो मैं क्या करता हूँ और तुम्हें किस तरह जहन्नुम में पहुँचाता हूँ!’’

भूतनाथ न-मालूम और भी क्या-क्या बकता पर उसका ध्यान यकायक बंट गया जब उसने देखा कि दलीपशाह के कई नौकर-चाकर और शागिर्द हाथों में नंगी तलवारें और मशालें लिए हुए इधर ही को आ रहे हैं। उन पर निगाह पड़ते ही वह पीछे हटा। दलीपशाह क्या कह रहा है इस पर उसने कुछ भी गौर न किया, झपटकर एक छलांग में वह बरामदे के नीचे उतर गया और तब उस आम की घनी बारी में घुसकर बात-की-बात में आँखों की ओट हो गया।

ओफ, भूतनाथ! यह तूने क्या किया! एक निःसहाय, कोमल अबोध बालक का इस तरह खून करते हुए भी तुझे दया न आई? और वह भी कौन, खुद तेरा लड़का! हमने माना कि उस समय तू दारोगा का बहकाया हुआ और अन्धा हो रहा था, गुस्से ने तेरी आँखों पर पर्दा डाल दिया था और तू नहीं जानता कि वह बच्चा तेरा ही है, फिर भी क्या ऐसा करना तुझे मुनासिब था! क्या ऐसे-ऐसे काम करता हुआ तू समझता है कि अपने को नेकनाम बना सकेगा? या सोचता है कि अपनी बदनामी को छिपा सकेगा? विचारता है कि इस दुनिया में सुख और प्रसन्नता का भागी होगा? नहीं। अगर तू ऐसा समझता है तो तेरी गलती है और तू बहुत जल्द अपनी भूल का फल भोगेगा! तू दर-दर की ठोकर खायेगा, गली के कुत्तों को भी तेरी हालत पर तरस होगा और नरक में जाकर तेरी आत्मा को तड़पते हुए युग बीतेंगे! नेकनामी का, अपनी बदकारियों को छिपाने का, रास्ता दूसरा ही है, यह नहीं है जो तूने अख्तियार किया है। खैर मर्जी तेरी, तू समझ या न समझ!

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