भूतनाथ - खण्ड 7 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 7 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 7

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :290
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8366
आईएसबीएन :978-1-61301-024-2

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भूतनाथ - खण्ड 7 पुस्तक का ई-संस्करण

नौवाँ बयान


उपरोक्त घटना के दूसरे ही दिन राजा गोपालसिंह के सख्त बीमार हो जाने और तीसरे दिन मर जाने की खबर चारों तरफ फैल गई जिसने जमानिया में एकदम तहलका मचा दिया।

चन्द्रकान्ता सन्तति पढ़ने वाले पाठक भरतसिंह और दलीपशाह के किस्से के द्वारा और खुद गोपालसिंह की भी जुबानी इस मामले का खुलासा हाल जान गये हैं अस्तु इस जगह हमें वे सब बातें विस्तार के साथ लिखने की कोई भी जरूरत नहीं और इसीलिए अब हम सिर्फ उन्हीं बातों का जिक्र करते हैं जिनके लिखने की इस भूतनाथ के किस्से में जरूरत है, मगर हाँ, इतना कहे बिना हम नहीं रह सकते कि गोपालसिंह की इस नकली मौत के सिलसिले में कम्बख्त मुन्दर और धूर्त दारोगा ने वह रूपक साधा कि राज्य और राजमहल के उन बहुत थोड़े-से आदमियों को छोड़ जिनको कि इस घटना के भीतरी हाल की जानकारी थी बाकी शहर और राज्य-भर के तमाम लोगों को यह विश्वास हो गया कि राजा साहब के मरने का सबसे भारी गम इन्हीं दोनों को हुआ है। महल में मुन्दर ने पहले तो गोपालसिंह की लाश के साथ ही जल मरने की कोशिश की मगर जब लोगों ने ऐसा न करने दिया तब खाना-पीना, नहाना-धोना सब कुछ त्याग दिया और केवल एक कम्बल ओढ़ और एक बिछाकर राजा साहब की तस्वीर सामने रखे उनके नाम की माला फेरते हुए सात दिन और सात रात तक एक ही आसन से बैठे रहकर सब पर यह जाहिर कर दिया कि अगर राज-कर्मचारियों ने उसे गोपालसिंह की चिता पर उनके साथ जलकर सती नहीं होने दिया है तो वह इस प्रकार अन्न-जल और निद्रा का त्याग कर बहुत जल्दी ही वे जिस लोक में होंगे वहीं जाकर उनके साथ मिलने की तैयारी करेगी। और इधर हमारे दारोगा साहब ने भी कुछ कम नाटक नहीं रचा।बड़े महाराज की मृत्यु के समय जैसा कुछ रंग वे लाये थे उससे कहीं बढ़कर इस समय उन्होंने दिखाया और हर तरह से सभी पर साबित कर दिया कि अब इस पाप-भरी दुनिया में रहने की इच्छा उनकी जरा भी नहीं है और वे भी यही चाहते हैं कि किसी प्रकार उनके दुःखमय जीवन का अन्त हो जाए।मगर खैर, समझने वाले सब कुछ समझते और जानते ही थे और इन दोनों व्यक्तियों की कार्रवाइयों ने जमानिया की प्रजा और राजकर्मचारियों को चाहे जिस कदर भी धोखे में डाला हो पर इन्द्रदेव। दलीपशाह भूतनाथ, प्रभाकरसिंह या कामेश्वर और श्यामलाल आदि पर इसका कोई असर न पड़ा और ये लोग चुपचाप अपनी कार्रवाई में लगे रहे। इन्द्रदेव क्या सोच या कर रहे थे इसकी तो हमें खबर नहीं मगर भूतनाथ जिस फेर में था उसका पता हमें है और हम उसी का जिक्र इस जगह करना चाहते हैं।

रात लगभग पहर-भर के जा चुकी होगी। भूतनाथ की कुटिया में एकदम सन्नाटा है क्योंकि आज अपनी तबीयत खराब होने का बहाना करके उसने उन सभी को ही धता बताया है जो साधु-महात्मा समझकर इसके पैरों की धूल के लिए अक्सर शाम के वक्त यहाँ आ इकट्ठे हुआ करते थे। इस समय बाहर वाली कोठी में साधु का बाना धारण किये हुए उसके केवल दो-तीन शागिर्द मात्र ही एक धूनी के चारो तरफ बैठे धीरे-धीरे कुछ बातें कर रहे हैं और या फिर भीतर वाली कोठरी में, जो अपने नीचे दरवाजे तथा नीची पाटन की बदौलत ‘गुफा’ के नाम से प्रसिद्ध है अकेला पड़ा भूतनाथ कुछ सोच रहा है।

इस समय भूतनाथ के मन में क्या-क्या बातें घूम रही हैं इसका कहना बहुत ही कठिन है। हम केवल इतना ही बता सकते हैं कि वह बहुत देर से इसी तरह अधलेटा पड़ा अपने ख्याल में इस तरह गर्क हो रहा है कि उसे इस बात की भी खबर नहीं है कि किसी ने एक खास इशारा करके बाहरी दरवाजा खुलवाया है और अब उसकी ‘गुफा’ के दरवाजे पर आकर खड़ा हुआ इस बात की राह देख रहा है कि ‘महात्मा’ का ध्यान उस पर पड़े और वह भीतर घुसे, मगर जब उसे इस बात की राह देखते खड़े बहुत देर हो गई और भूतनाथ ने सिर न उठाया तो आखिर लाचार होकर उसने धीरे-से खांसा जिस पर भूतनाथ का ध्यान टूटा और उसने उधर देखकर कहा, ‘कौन है?’’ उसने जवाब दिया- मैं हूँ, बलदेव!’’ जिसे सुनते ही चौंककर भूतनाथ बोला, ‘‘हाँ तुम! आ गये? बड़ी जल्दी लौट आये!! अच्छा इधर आओ और सुनाओ क्या खबर है?’’

वह आदमी गुफा के भीतर चला गया और अब उस दीये की रोशनी में जो भूतनाथ के सिरहाने जल रहा था, यह देख हमें बहुत ताज्जुब हुआ कि यह एक औरत है और औरत भी कौन? वही हमारी जानी-पहचानी नन्हों! यह क्या मामला है खैर देखिये, जो कुछ भेद है आप ही खुल जाएगा।

भूतनाथ बोला, ‘‘आओ बलदेव, इधर निकल आओ बताओ क्या खबर लाए! मगर पहले इस दीये को जरा तेज कर दो। मैं देखूँ तुमने कौन शक्ल बनाई है!

आने वाले ने रोशनी तेज कर दी और भूतनाथ ने गौर से उसकी शक्ल देखने के बाद कहा, ‘‘बेशक अच्छा भेष धरा है। मैं समझता हूँ दारोगा तुम्हें कभी पहचान न सका होगा। हाँ, दलीपशाह को कुछ शक हो गया तो मैं नहीं कह सकता क्योंकि वह कम्बख्त बड़ा ही धूर्त है और उसकी निगाह बड़ी तेज है।

बल० : यही डर तो मुझे भी था मगर भाग्यवश ऐसा न हुआ। जब मैं दलीपशाह के पास पहुँचा तो तबीयत कुछ खराब होने के कारण उन्हें पलंग पर पड़े पाया और उन्होंने मुझ पर ज्यादा ध्यान न दिया बल्कि साधारण तौर पर दो-चार बातें कर दारोगा की चिट्ठी ली और पढ़कर जवाब लिख देने के बाद तुरन्त ही बिदा कर दिया। मगर दारोगा साहब से मेरी बहुत देर तक खुलकर बातें होती रहीं फिर भी वे मुझे बिल्कुल पहचान न सके।

भूत० : अच्छा, तो अब खुलासा बता जाओ कि क्या हुआ?

बल० : आपकी आज्ञानुसार हम दोनों ने नन्हों का पीछा किया। वह यहाँ से निकलकर सीधी मिर्जापुर की तरफ रवाना हुई और जब हमें विश्वास हो गया कि उसका इरादा दलीपशाह ही के घर जाने का है तो हमने उसे गिरफ्तार कर लिया और तब एक आड़ की जगह ले जाकर मैंने अपनी शक्ल उसके जैसी बनाई तथा उसके कपड़े वगैरह भी पहन ठीक उसी की तरह बन गया। उसके जैसा ऐयारी वाला बटुआ खुद लगाने बाद उसे अपने भाई के सुपुर्द कर मैं दलीपशाह के पास पहुँचा। जो कुछ करना था वह आपने समझा ही दिया था अस्तु मैंने दारोगा साहब की चिट्ठी उन्हें दी। वे अपने कमरे में पलंग पर लेटे हुए थे और नौकरों से मैं सुन चुका था कि उनकी तबीयत कुछ खराब है, अस्तु मेरा डर बहुत कुछ कम हो चुका था। उन्होंने चिट्ठी पढ़ी और दारोगा साहब के बारे में दो-चार मामूली सवाल किए, तब खुद अपने हाथ से चिट्ठी का जवाब लिखकर मुझे दिया और बोले कि ‘इस समय मेरी तबीयत खराब है, यह चिट्ठी दारोगासाहब को दे देना और कह देना कि बाकी बातों का जवाब मुलाकात होने पर खुद दूंगा, मैंने भी कोई बात छेड़ना उचित न समझा और वहाँ से चलकर अपने भाई के पास जा पहुँचा जो नन्हों की हिफाजत करता हुआ मेरी राह देख रहा था।

भूत० : दलीपशाह की चिट्ठी कहाँ है?

बल० : असली चिट्ठी तो दारोगा को दे दी मगर उसकी नकल मेरे पास मौजूद है।

इतना कह बलदेव ने एक मोड़ा हुआ कागज निकालकर भूतनाथ को दिया उससे उसे चिराग की रोशनी में पढ़ा, यह लिखा हुआ थाः-

‘‘दारोगा साहब–

आपका खत मिला, राजा गोपालसिंह की मौत ने मुझे एकदम बेकाबू कर दिया है और मुझे कुछ सूझ नहीं रहा है कि क्या करूं, क्या न करूं। आपको तो जरूर ही उनके उठ जाने का बहुत गहरा गम हुआ होगा पर मुझ पर उनका जितना प्रेम था उसका हाल भी आप अच्छी तरह जानते हैं, अस्तु इस समय मैं कुछ भी करने-धरने लायक नहीं हूँ, आप कुछ दिन सब्र कीजिए, मेरी तबीयत आजकल खराब रहती है, जरा ठीक होने पर मैं खुद ही आपसे मिलूंगा और इस बारे में बातें करूंगा, लेकिन इतना मैं कह सकता हूँ कि अगर आपका शक सही निकला और इस कार्रवाई में भूतनाथ का कोई हाथ पाया गया तो मैं उसके साथ कड़ी-से-कड़ी कार्रवाई जो कर सकूंगा करने में परहेज न लगाऊंगा और इस बात का जरा भी लिहाज न करूँगा कि वह मेरा रिश्तेदार है। मगर हाँ, यह तो अभी आपने बताया ही नहीं कि मैं आपका काम कर डालूं तो आप मुझे क्या देंगे?

आपका—

दलीपशाह’’

भूतनाथ ने चिट्ठी पढ़कर हाथ से मसल डाली और क्रोध की मुद्रा से कहा, ‘‘अच्छा कम्बख्त, ठहर जा और देख कि तू मुझसे कड़ा बर्ताव करता है या मैं तुझे मिट्टी में मिला देता हूँ! अच्छा बलदेव, कहो तब क्या हुआ?’’

बल० : आपकी आज्ञानुसार नन्हों को हम लोगों ने लामा घाटी में पहुँचाया और तब दारोगा साहब की तरफ रवाना हुए। उसी अजायबघर में उनसे भेंट हुई। आप जानते होंगे कि राजा साहब के मरने के बाद से उन्होंने शहर में रहना एकदम छोड़ दिया है। उसी बंगले में रहते हैं, कपड़ा-लत्ता क्या भोजन तक त्याग कर एकदम साधुओं का ढंग अख्तियार किया है, केवल एक कोपीन लगाये शरीर में विभूति लपेटे, बाघम्बर पर बैठे मृगछाया ओढ़े रहते हैं और दिन-रात भगवद् स्मरण किया करते हैं, केवल सुबह-शाम एक घंटा रियासत का जरूरी काम जो उनके सामने आ जाता है उसे देखते हैं बाकी किसी वक्त कोई उनसे भेंट नहीं कर सकता।

भूत० : जरूर उसने ऐसा ही रूपक साधा होगा, वह अव्वल दर्जे का ढोंगी है। बड़े महाराज की मौत के समय भी उसने ऐसा ही नाटक रचा था, खैर, तो तुम्हारी उससे भेंट हुई?

बल० : जी हाँ, उसी अजायबघर की एक कोठरी में रात के वक्त वे मुझसे मिले। सफर का हाल पूछा, आपकी और दलीपशाह की कैफियत दरियाफ्त की....

भूत० : मेरी कैफियत?

बल० : जी हाँ, आपकी। उसकी बातों से मुझे मालूम हो गया कि नन्हों उसी की भेजी हुई आपके पास आती है और उसके इशारे से उसकी और दलीपशाह की चिट्ठियां आपको दिखाई जाती हैं। बल्कि गुरुजी, मुझे तो यह भी सन्देह होता है कि कम्बख्त दारोगा नन्हों के जरिये आपको किसी जाल में फंसाना चाहते हैं।

भूत० : यही तो मेरा भी ख्याल हो रहा था, यही सोच मैंने तुम्हें नन्हों को गिरफ्तार करने को कहा था। अच्छा, तुम्हारी-उसकी क्या-क्या बातें हुई और कैसे तुम्हें यह शक हुआ?

बल० : जब मैंने दलीपशाह का खत उसे दिया तो पहला सवाल उसका यही हुआ- ‘‘क्या चिट्ठी भूतनाथ को दिखला चुकी हो?’’ मैंने जवाब दिया- ‘‘जी नहीं, मैं मिर्जापुर से सीधी इधर ही चली आई’’ जिस पर वह बोला, ‘‘तुमने गलती की! खैर, यह खत जो अब मैं लिख देता हूँ उसे दिखाये बिना मत जाना।’’ उसने दलीपशाह की चिट्ठी का एक जवाब मुझे लिखकर दिया और तब देर तक तरह-तरह की बातें करता रहा। मगर गुरुजी, उसकी बातों से मुझे यह विश्वास होता है कि वह किसी भारी चिन्ता में पड़ा हुआ है और सचमुच यह चाहता है कि आप और अगर आप नहीं तो दलीपशाह उसकी मदद करे। वह आप लोगों से अपना कोई भारी-भरकम काम निकलवा लेने की उम्मीद रखता है और साफ-साफ यह कहता है कि अगर आपमें से कोई या दोनों ही उसकी मदद पर तैयार न हुए तो वह कहीं का न रहेगा मैं तो समझता हूँ कि अगर आप एक दफे उनसे मिले तो जरूर कोई मतलब का बात मालूम होगी।

भूत० : मैं यही सोच रहा हूँ और चाहता हूँ कि उससे मिलूं। खैर उसने क्या चिट्ठी लिखी है जरा दिखलाओ।

बलदेव ने यह सुन एक चिट्ठी जो खरीते के अन्दर रखी हुई थी भूतनाथ की तरफ बढ़ाई। खरीता खोल भूतनाथ ने खत निकाला और पढ़ा। यह लिखा था–

‘‘मेरे प्यारे दोस्त दलीपशाह,

‘‘मुझे नन्हों से यह जान बहुत अफसोस हुआ कि आपकी तबीयत खराब हो गई है। मैं इसी उम्मीद में था कि आपसे भेंट होगी और मैं अपना शक पूरा-पूरा बयान कर सकूंगा, खैर, इस हालत में आपको तकलीफ देना भी मैं पसन्द नहीं करता और खुद ही आपसे मिलने आना चाहता हूँ, आप बताइये कि कहाँ किस दिन और किस समय मैं आपके दर्शन करूं। आपसे कहने की जरूरत नहीं कि मेरी निगाह में यह काम इतना जरूरी है कि राजा साहब की मौत का गम भी मुझे रोक नहीं सकता और मैं जल्दी-से-जल्दी अपने दिल का हाल आपको सुना देना चाहता हूँ क्योंकि मुझे यह भी शक है कि न-जाने किस दिन दुश्मनों का वार मुझ पर हो जाए और वह भेद मेरी छाती के अन्दर ही छिपा रह जाए।

‘‘चिट्ठी में कुछ कहते डर-सा लगता है। यद्यपि एक विश्वासी व्यक्ति के हाथ भेज रहा हूँ तो भी कौन ठिकाना दुश्मनों के हाथ पड़ ही जाए, अस्तु इस जगह सिर्फ इतना ही इशारा किये देता हूँ कि जिस चीज को बड़ा भारी पातक करके भूतनाथ ने जमानिया की बड़ी महारानी से पाया था वह मेरे हाथ लग गई है और मैं उसे आपको दे देने को तैयार हूँ बशर्ते कि आप मेरा काम पूरा कर दें।’’

इस चिट्ठी के नीचे दारोगा का दस्तख्त और मोहर थी जिस पर भूतनाथ ने बड़े गौर से निगाह डाली और तब खत हाथ में लिए किसी चिन्ता में पड़ गया। बलदेव ने उससे कुछ कहना चाहा मगर जब देखा कि वह गहरे सोच में डूबा हुआ है तो चुप रह गया।

बहुत देर तक भूतनाथ की यही हालत रही तथा और अभी न-जाने कब तक वह सोच-सागर में निमग्न रहता अगर गुफा का दरवाजा खुलने की आहट उसके कानों में न पड़ती। दरवाजा खोलकर किसी नये आदमी के भीतर आने ने उसका ध्यान भंग किया और उसने चौंककर कहा, ‘‘कौन? रामेश्वरचन्द्र! तुम इतनी जल्दी कैसे लौट आए! तुम्हारी यह हालत क्या हो रही है! क्या तुम जख्मी हो?’’

यह आने वाला सचमुच ही भूतनाथ का शागिर्द रामेश्वरचन्द्र था जो सीधा भूतनाथ के पास पहंचा और घबराहट-भरी आवाज में बोला, ‘‘गुरुजी-गुरुजी, गोपालसिंह अभी मरे नहीं हैं और यद्यपि बहुत बड़े खतरे में है फिर भी हम लोग अगर कोशिश करें तो उनको बचा सकते हैं!!’’

भूतनाथ चौंक गया और एक ताज्जुब की आवाज उसके मुँह से निकल पड़ी अधलेटा पड़ा था, सो उठ बैठा और ताज्जुब से साथ रामेश्वरचन्द्र से बोला, ‘‘हैं! यह तुम क्या कह रहे हो?’’

रामेश्वर बोला, ‘‘मैं बहुत ठीक कह रहा हूँ! उनके मरने की एकदम झूठी खबर मुन्दर और हरनामसिंह वगैरह ने मिलकर उड़ाई है। असल में वे कहीं छिपा दिये गये हैं और लोगों को एक बनावटी लाश दिखलाकर जला दी गई है, मैं यह बात बहुत पक्के तौर पर कहता हूँ!!’’

भूतनाथ चौंक पड़ा मगर अपने को शान्त रखे हुए उसने कहा, ‘‘अच्छा तुम जरा ठंडे हो, कपड़े बदलो और कुछ मलहम-पट्टी करो, तब मुझे बताना कि क्या मामला है और कैसे तुमने यह बात जानी?’’ जिसके जवाब में रामेश्वचन्द्र बोला, ‘‘मेरी चोट का ख्याल न करें और मेरी बातें सुनकर तुरन्त निश्चय करें कि अब हम लोगों को क्या करना चाहिए क्योंकि देर होने से मुमकिन है कुछ गड़बड़ी हो जाए।’’

भूतनाथ ने यह सुन रामेश्वरचन्द्र को अपनी बगल में बैठने का इशारा किया और धीरे-धीरे बातें करने लगा।

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