भूतनाथ - खण्ड 7 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 7 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 7

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :290
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8366
आईएसबीएन :978-1-61301-024-2

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भूतनाथ - खण्ड 7 पुस्तक का ई-संस्करण

आठवाँ बयान


दारोगा और मुन्दर की चालबाजियों के कारण जमानिया के राजसिंहासन ने जिस तरह के उलट-पलट देखे, भरथसिंह और दलीपशाह तथा अर्जुनसिंह से दारोगा की जिस तरह दो-दो चोंचे हुईं, और राजा गोपालसिंह की नकली मौत जिस प्रकार जाहिर की गई यह सब हाल खुलासा तौर पर चन्द्रकान्ता सन्तति में लिखा जा चुका है और उसके पाठकों को अच्छी तरह याद भी होगा अतएव यहाँ पर उसे दुबारा लिखने की कोई जरूरत नहीं मालूम होती, इस जगह सिर्फ एक जरूरी घटना का हाल लिख देना ही आवश्यक मालूम होता है जिसका जिक चन्द्रकान्ता सन्तति में नहीं आ सका और जिसके कारण ही दारोगा के लिए गोपालसिंह को मार डालना तथा दलीपशाह, अर्जुनसिंह और भरथसिंह आदि को रास्ते से जल्दी-से-जल्दी हटा देना जरूरी हो गया।

रात आधी के लगभग जा चुकी होगी। अपने मकान के एक छोटे कमरे में दारोगा साहब सुस्त और उदास एक गावतकिये का सहारा लिए बैठे हैं और रह-रहकर लम्बी सांस लेते हुए इस तरह चारों तरफ देखते हैं मानों वे किसी ऐसी खौफनाक जगह में जा फंसे हों जिसके बाहर निकलने की कोई राह दिखाई नहीं देती। उनके सामने उनका दोस्त जैपाल बैठा हुआ है मगर दारोगा साहब की यह हालत देख वह भी घबराया सा हो रहा है। बार-बार वह उनसे कुछ पूछना चाहता है मगर मुँह खोलने की हिम्मत नहीं पड़ती और चुप रह जाता है।

आखिर एक दफे हिम्मत कर दारोगा का पंजा पकड़ जैपाल बोला-

‘‘आखिर आप कुछ तो मुझे बताइए कि उस आदमी ने आपको क्या चीज दिखाई जिसने आपकी यह हालत कर दी है और आप क्यों इस तरह बदहवास हो रहे हैं! आखिर मैं भी तो आपका मुहब्बती और दोस्त ही हूँ, आपके लिए जान देने को हमेशा तैयार रहता हूँ! आप क्यों नहीं मुझ पर विश्वास करके मुझसे अपने दिल का हाल कहते!’’

दारोगा एक लम्बी साँस लेकर बोला, ‘‘मेरे दोस्त, मुझसे कुछ पूछो मत कि उस चंगेर में मैंने क्या देखा, बस इतने से ही समझ लो कि जो कुछ मैंने उसमें देखा उसके कारण मेरा अब तक का किया-कराया सब केवल नष्ट ही नहीं हुआ चाहता बल्कि मुझे अपनी जान का भी खतरा हो रहा है, मैं नहीं समझ पाता कि अब मेरी जान किस दुर्दशा से जायेगी।’’

जैपाल० : आप तो मेरा आश्चर्य और भी बढ़ा रहे हैं, भला मैं इस बात को कैसे मान सकता हूँ कि आपके ऐसा आदमी जो इस समय जमानिया का बेताज का बादशाह बन रहा है, जिसके हाथ में हजारों आदमियों की जाने हैं और जमानिया के राजा और रानी जिसकी मुट्ठी में हैं, वह ऐसा पस्त-हिम्मत हो जाएगा कि अपनी जान की तरफ से ना उम्मीद हो जाए और इस तरह की बातें करे जब तक कि कोई बहुत भारी मामला न हो।

दारोगा : यह तो मैं खुद ही कह रहा हूँ कि कोई ऐसी बात हो गई है कि जिससे मैं अपनी जान से नाउम्मीद हो रहा हूँ, तब फिर वह क्या कोई भारी मामला नहीं होगा! तुम भी कैसी पागलो की-सी बातें कर रहे हो!!

जैपाल० : (झुंझलाकर) मैं पागल नहीं हुआ हूँ बल्कि आपका मिजाज खराब हो गया है जो एक पगले की बातों में पड़ और उसके किसी जादू में फंस अपने को इस तरह बेकाबू कर बैठे हैं।

दारोगा : (कुछ देर रुककर) तुम ठीक कहते हो और उस चीज ने ऐसा ही जादू मुझ पर कर दिया है जो उस आदमी ने मुझे दिखाई। मगर मैं देखता हूँ कि तुम बिना सब हाल जाने मेरा पिंड न छोड़ोगे, अस्तु लो मैं बताये देता हूँ कि असल में क्या मामला है, अच्छा श्यामलाल का नाम कभी तुमने सुना है?

जैपाल० : श्यामलाल! कौन श्यामलाल?

दारोगा : तुम भी उसे भूल गये! अरे वही राय गोपालचन्द्र का भतीजा, भरथसिंह का फुफेरा भाई और बड़े महाराज के समय में जमानिया की फौज का सेनापति।

जैपाल० : अच्छा, उसके बारे में कुछ पूछ रहे हैं, उसे क्या मैं कभी भूल सकता हूँ? वही न जिसका साथ गोपालसिंह से बहुत रहा करता था और इन्द्रदेव का भी लंगोटिया दोस्त था।

दारोगा : हाँ-हाँ, वही।

जैपाल० : जिसकी आपके दलीपशाह से भी कोई रिश्तेदारी थी क्योंकि वह अक्सर....

दारोगा : दलीपशाह की मौसेरी बहिन और प्रभाकरसिंह की सगी साली अहिल्या, इन्दुमति की बहिन उससे ब्याही थी।

जैपाल० : ठीक-ठीक, समझ गया, वही अहिल्या जो आपके कामेश्वर की बहिन लगती थी और राजा शिवदत्त जिस पर....

दारोगा : हाँ-हाँ, वही।

जैपाल० : आपको शिकार का बहुत शौक था और इसी शौक ने उसकी जान भी ली क्योंकि एक दिन शेर के शिकार में एक शेर के ही पंजों से सख्त घायल होकर उसने जान से हाथ धोया था। मुझे वह बात अच्छी तरह मालूम है क्योंकि उस शिकार में गोपालसिंह और भरथसिंह भी शामिल थे और उन्हें इस दुर्घटना का इतना दुःख हुआ था कि उन्होंने दो रोज तक खाना नहीं खाया था। वास्तव में गोपालसिंह उसे बहुत ज्यादा प्यारा करते थे। अच्छा तो उसका जिक्र आप क्यों कर रहे हैं?

दारोगा : इसलिए कि उस कार्रवाई की तह में मैं था। श्यामलाल से मेरी दुश्मनी हो गई थी और मैंने ही एक बनावटी लाश रखकर जाहिर किया कि उसे शेर ने मार डाला पर खुद उसे काबू में कर उससे अपना बदला लिया था और अन्त में उसे तिलिस्म में बन्द कर दिया था जहाँ मैं समझ रहा था कि इतने दिनों में वह मर-खप गया होगा और उसका नाम-निशान भी बाकी न होगा, मगर अब मुझे मालूम हुआ कि मेरा ख्याल गलत था। वह अभी तक जीता है और अब तिलिस्म के बाहर होकर मेरी दुर्दशा करने की तैयारी कर रहा है।

जैपाल० : यह बात आपको कैसे मालूम हुई?

दारोगा : उसका वह जड़ाऊ भुजबन्द जो उसकी कलाई में हमेशा पड़ा रहा करता था और जो उसे तिमिस्म में बन्द करते समय भी उसके हाथ में था उस चंगेर के अन्दर मैंने देखा और समझ लिया कि जब यह चीज मौजूद है तो इसका पहनने वाला भी जरूर मौजूद होगा और यही खबर मेरे उस पागल भाई ने मुझे दी!

जैपाल० : मगर आश्चर्य की बात है कि आप एक अकेले और बेबस आदमी से इतना डर रहे हैं....

दारोगा : उसे अकेला या बेबस मत समझो! गोपालसिंह, इन्द्रदेव, कामेश्वर, भरथसिंह और श्यामलाल का किसी जमाने में बड़ा गहरा गुट था। लोग मजाक में अक्सर उन्हें पंच पाण्डव कहा करते थे। श्यामलाल की मौत ने उस समय इन सभी पर ही गहरा असर किया था और अब जब उसके जीते रहने की खबर इन सभी को मिलेगी और ये लोग इस बात को सुनेंगे कि मेरे ही कारण उसकी इतनी दुर्दशा हुई तो वे सब-के-सब मिलकर मेरी जो दुर्गति न कर डालें थोड़ी ही है खासकर गोपालसिंह तो जो अब राजा और खुदमुख्तार हो गया है मुझे सूली चढ़वा दे तो भी ताज्जुब न समझो! तुम उसके प्रकट होने को मामूली बात समझते हो!

जैपाल० : ठीक है। ऐसा सोचना मेरी गलती थी, मगर आपकी उसकी दुश्मनी का कारण क्या हुआ?

दारोगा : बस मेरी ऐयाशी और क्या कहूँ! उन दिनों यह कम्बख्त नागर नई-नई उभरी थी, दयाराम, भूतनाथ और यह श्यामलाल-उस पर बेतरह मर रहे थे बल्कि मैंने तो सुना कि इन्द्रदेव और गोपालसिंह भी उसके आशिकों में से थे पर खैर, इसका कोई सबूत मेरे पास नहीं है। मेरी उस पर तबीयत आ गई थी, मगर थी वह कम्बख्त एक ही चांगली। वह हम सभी को उल्लू बनाये रखना चाहती थी, हर एक पर यही जाहिर करती कि वह बस उसी पर मरती है और बाकी सभी को सिर्फ अपना काम चलाने के लिए उल्लू फंसाये हुई है, उसी के मकान पर मेरी और श्यामलाल की एक दिन कहा-सुनी हो गई और उसने मेरी शान में कुछ ऐसी बातें कह दीं कि जिन्हें मैं बर्दाश्त न कर सका। उसे गोपालसिंह की दोस्ती और जमानिया की सिपहसालारी का घमण्ड था पर मैंने भी दिखला दिया कि मैं कितनी ताकत रखता हूँ, उससे ऐसा बदला लिया कि वह भी जन्म-भर याद रखेगा, मगर इतने दिनों के बाद यह पुराना फोड़ा फिर उभरा है और अबकी शायद मेरी जान ही लेकर छोड़े।

इतना कह दारोगा ने पुनः सिर नीचा कर लिया और कुछ सोचने लगा तथा जैपाल तरह-तरह की बातें कहता हुआ उसे दिलासा देने और उम्मीद बंधाने लगा।

उस कमरे के बाहर जिसमें दारोगा और जैपाल बैठे थे एक दालान था दोनों तरफ ऐसी कोठरियां थी जिनका एक दरवाजा इस कमरे में भी पड़ता था। इस समय इन्हीं में से बाईं तरफ वाली कोठरी के अन्दर दो आदमी जिनका समूचा बदन यहाँ तक कि चेहरा भी काली पोशाक से ढंका हुआ था अंधेरे में दुबके हुए इन दोनों की बातें खूब गौर से सुन रहे थे। जब दारोगा चुप हो गया और जैपाल उसे समझाने-बुझाने लगा तो एक ने दूसरे की तरफ देख बहुत ही धीरे से कहा, ‘‘भाई साहब, देखा आपने! दुष्ट दारोगा असल बात अपने लंगोटिया दोस्त से भी छिपा गया इसने जैपाल पर भी जाहिर न किया कि इसने वास्तव में तिलिस्म की ताली लेने के लिए मेरी वह दुर्दशा की थी और अन्त में उस पर काबू कर भी लिया।’’

उसकी बात सुन दूसरे ने कहा, ‘‘ठीक है यह ऐसा ही चांगला है, मगर अब यहाँ ठहरना मुनासिब नहीं, जिस मतलब से हम लोग यहाँ आये थे वह काम हो गया अस्तु अब चल देना चाहिए। कौन ठिकाना इस कम्बख्त को कुछ शक हो जाए और अपने इस शैतान की आंत जैसे मकान में फंसाकर हम लोगों को गिरफ्तार ही कर ले।’’

पहला बोला, ‘‘जैसी मर्जी आपकी, मगर मेरी इच्छा यही थी कि इसी समय इस कम्बख्त से बदला लेता! जैसी-जैसी तकलीफें इसने मुझे दी हैं मेरा ही दिल जानता है और मैं उन्हें किसी तरह भूल नहीं सकता!’’

दूसरे ने कहा,, ‘‘ईश्वर ने चाहा तो उनकी वैसी ही सजा भी यह पावेगा मगर किसी मौके से, अभी इस वक्त बोलने का समय नहीं है, अच्छा अब आओ!’’

यह आदमी घूमा और दूसरा उसके पीछे हुआ, उसी कोठरी में से ऊपर की मंजिल में जाने के लिए काठ की सीढ़ी लगी हुई थी जिसके जरिये ये दोनों ऊपर निकल गये और तब कितने ही कमरों, दालानों और सीढ़ियों को पार करते हुए मकान के सबसे ऊपर वाली छत पर जा पहुँचे। इस जगह मुण्डेर के साथ कमंद अभी तक लटक रही थी। उस दूसरे आदमी ने नीचे की तरफ झांककर देखा और तब सब तरह सन्नाटा पा कमन्द को झटका दिया। किसी ने जवाब में नीचे से कमन्द को दो दफे हिलाया जिसके साथ ही इसने कहा, ‘‘बस सब ठीक है, आओ!!’’ पहले वह और उसके बाद उसका साथी बारी-बारी से उसी कमन्द की राह नीचे उतर गये और तब कमन्द को भी खींच लिया। नीचे गली के अन्धकार में दबका हुआ एक आदमी न-जाने कब से खड़ा था जिससे इन दोनों ने पूछा, ‘‘क्यों सब ठीक है न?’’ उसने जवाब दिया, ‘‘जी हाँ, सब ठीक है, किसी ने आप लोगों का जाना और आना नहीं देखा।’’ जिस पर इन लोगों ने एक सन्तोष की साँस ली और तब तेजी के साथ एक तरफ को रवाना हो गये।

मगर तीनों में से किसी को भी इस बात की खबर न थी कि इनसे कुछ ही दूर पर के दूसरे मकान के बन्द दरवाजे की आड़ में कम्बल ओढ़े पड़े एक आदमी ने इन सभी की पूरी कार्रवाई देख ली है जो इनके जाते ही उठा और तेजी के साथ दौड़ता हुआ दारोगा साहब के मकान में बने एक चोर दरवाजे के अन्दर घुस गया। यह आदमी कौन है या इसका क्या इरादा है इसका जिक्र छोड़ हम इस वक्त उन्हीं तीनों के पीछे चलते और देखते हैं कि वे सब किधर जाते या क्या करते हैं।

रात आधी से कुछ ज्यादा जा चुकी है। अपने खास बाग वाले महल के एक बड़े कमरे में सुन्दर मसहरी पर राजा गोपालसिंह सो रहे हैं। कमरे में बहुत ही मद्धिम रोशनी हो रही है और सिर्फ एक को छोड़कर और सब दरवाजे भी बन्द हैं मगर उसके बाहर पड़ने वाले दालान में काफी रोशनी ही नहीं हो रही है बल्कि कड़ा पहरा भी पड़ रहा है। चार आदमी ढाल, तलवार और तीर-कमान लिए मुस्तैदी के साथ इधर से उधर घूम रहे हैं और उनमें से कोई-कोई कभी उस भिड़के हुए दरवाजे की दरार में आँख लगाकर भीतर की तरफ देख यह निश्चय भी कर लेता है कि सब ठीक तो है न? यों तो मामूली तौर पर राजाओं के आस-पास पहरा पड़ता ही रहता है पर इधर राजा गोपालसिंह ने न-जाने क्यों अपनी हिफाजत का ख्याल बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है और खास कर रात के वक्त तो वे जहाँ भी सोएं, महल में हथियार-बन्द लौंडियों द्वारा और बाहर विश्वासी सिपाहियों के जरिए अपनी पूरी हिफाजत रखते हैं। राजा साहब किसी सबब से महल में नहीं गये हैं यहीं सो रहे हैं जो राजमहल का एक बाहरी हिस्सा है।

कमरे के सन्नाटे को एक बहुत ही हल्के खटके की आवाज ने तोड़ा। कमरे की उस दीवार के साथ लगा हुआ एक बड़ा शीशा जिधर गोपालसिंह का पलंग था। जरा-सा हिला और तब एक हल्की आवाज देता हुआ पीछे को हट गया जिससे उस जगह एक खिड़की-सी दिखाई पड़ने लगी जिसमें से निकलने वाली एक काली सूरत ने हाथ बढ़ाकर गोपालसिंह को हिलाया।

चौंककर उन्होंने आंखें खोल दीं और उस काली शक्ल को देख घबराकर कुछ कहना ही चाहते थे कि उसने कोई अद्भूत चीज उनको दिखाई और साथ ही होंठ पर उंगली रख चुप रहने का इशारा किया, वह न-जाने कौन-सी चीज थी जिसे देखते ही फिर गोपालसिंह कुछ भी न बोले बल्कि धीरे-से पलंग से उठ उसी खिड़की में चले गये। उनके जाने के बाद उसी काली शक्ल ने पुनः हाथ बढ़ाकर ओढ़ने को इस ढंग से कर दिया कि यकायक देखने वाला यही समझे कि गोपालसिंह मुँह ढांके सो रहे हैं और तब वह भी उस खिड़की के भीतर चला गया, खटके की हल्की आवाज हुई और वह शीशा ज्यों-का-त्यों अपने ठिकाने बैठ गया।

यह जगह जहाँ अब गोपालसिंह थे एक पतली और अन्धेरी सुरंग थी जिसके अन्दर हाथ को हाथ नहीं दिख सकता था मगर उस काली शक्ल ने उनकी कलाई पकड़ ली और आगे की तरफ ले चला। पन्द्रह-बीस कदम से ज्यादा जाना न पड़ा, पुनः एक खटाक् की आवाज आई, सामने एक छोटी खिड़की खुल गई और उसके पीछे एक कोठरी नजर आई जो किसी तरह के साज-सामान से एकदम खाली थी मगर जिसके अन्दर एक ओर जलती हुई लालटेन की हल्की रोशनी उस दुबले-पतले आदमी की सूरत दिखाने को काफी थी जो वहाँ खड़ा था और जिसे देखते ही गोपालसिंह तेजी से झपटकर बढ़े और उसके गले से लिपट गये।

इसमें कोई शक नहीं कि यह आदमी गोपालसिंह का कोई बहुत ही गहरा दोस्त था क्योंकि गोपालसिंह बहुत देर तक इसे अपने गले से लगाये रहे इस बीच में वह दूसरा आदमी जिसने उन्हें जगाया था पास खड़ा मुस्कराता हुआ उनकी तरफ देता रहा मगर अंत में उसे कहना ही पड़ा, ‘‘अब बस कीजिए, अपने दोस्त को छोड़िए और एक जरूरी बात पर ध्यान दीजिए जो बहुत ही गौर से सुनने लायक है क्योंकि हम लोग अभी जाएँगे!’’

गोपालसिंह यह सुन चौंककर अलग हो गए मगर उस आदमी का हाथ पकड़े-ही-पकड़े बोले, ‘‘क्या वह चीज नहीं मिली जिसके लिए आप परेशान थे!’’

इसका जवाब कुछ न दे उस आदमी ने अपना हाथ बढ़ाकर कोई तरकीब ऐसी की कि उस लालटेन की रोशनी बहुत तेज हो गई और तब वहाँ की हर एक चीज साफ नजर आने लगी। अब हमने भी पहचाना कि यह व्यक्ति इन्द्रदेव हैं मगर इस दूसरे आदमी को हम न पहचान सके जिसके साथ गोपालसिंह इतनी मुहब्बत से मिले थे क्योंकि वह हमारे लिए बिल्कुल ही नया था। देखिए, शायद इन लोगों की बातचीत से इसका कुछ परिचय मिले।

गोपालसिंह की बात सुन यह आदमी बोला, ‘‘मिली क्यों नहीं? क्या इन्द्रदेव की मेहनत अकारथ जा सकती है! यद्यपि कम्बख्त दारोगा ने उसे बेठिकाने छिपाया हुआ था पर इन्होंने खोज निकाला और मैंने भी देखते ही कह दिया कि यही चीज है।’’

गोपालसिंह ने यह सुन इन्द्रदेव से कहा, ‘‘क्या मैं भी देख सकता हूँ कि वह कौन-सी ऐसी अनोखी चीज है जिसके लिए आप इस कदर परेशान थे कि तीन रोज वक्त से मुझे अपने दोस्त की सूरत देखने से भी वंचित किए हुए थे! क्या वह चीज इस वक्त आपके पास मौजूद है!!’’

इन्द्रदेव ने इसके जवाब में ‘‘हाँ, है!’’ कहा और तब अपने कपड़ों के अन्दर से कोई चीज निकाल गोपालसिंह के हाथ पर रख दी। गोपालसिंह ने ताज्जुब के साथ उस चीज को देखा। वह आठ अंगुल लम्बा और इससे कुछ कम चौड़ा एक जड़ाउ डिब्बा था जिस पर चारों तरफ कीमती जवाहिरात हीरे-मानिक-पन्ना पुखराज मोती आदि जड़े हुए थे मगर ऊपर की तरफ किसी तरह के मसाले में डूबी हुई एक विचित्र चीज बैठाई हुई थी। गौर से देखने से मालूम हुआ कि यह पन्ने के एक बड़े टुकड़े को तराश कर बनाई हुई कोई चाभी है जो मोम की तरह के किसी मसाले के साथ उस डिब्बे के साथ इस मजबूती से बैठाई हुई है कि जोर करने पर भी अलग नहीं हो सकती।

गोपालसिंह कुछ देर तक गौर से इस डिब्बे और उस विचित्र चाभी को देखते रहे और तब उस दुबले-पतले आदमी की तरफ देखकर बोले, ‘‘क्यों श्यामजी, क्या इसी के लिए हरामजादे दारोगा ने तुम्हें इस कदर तकलीफ दी थी!अवश्य ही उसके लिए यह कोई बहुत ही कीमती चीज होगी, तभी ना उसने तुम्हारे साथ ऐसा बर्ताव किया, क्योंकि इतना तो वह भी जरूर ही समझता होगा कि अगर कभी मेरे कान तक उसकी इन कार्रवाइयों की सुनगुन पहुँची तो मैं उसे बुरी-से-बुरी सजा देने में भी परहेज न करूंगा? मगर क्या आपने इस डिब्बे को खोला भी है!’’

यह सुन श्यामलाल ने जवाब दिया, ‘‘यह चीज बहुत ही थोड़ी देर मेरे पास रही और इस पर ज्यादा तवज्जो नहीं दे पाया, मगर अब इन्द्रदेव की जुबानी सुनता हूँ कि इसके पेट में एक बहुत ही कीमती चीज छिपी हुई है।’’

गोपालसिंह ने यह सुन ताज्जुब के साथ इन्द्रदेव की तरह देखा जो कुछ हँसकर बोले, ‘‘अभी तक मैंने आपसे साफ-साफ नहीं बताया था कि वह कौन-सी चीज है जो दारोगा के कब्जे में हैं और जिसके अपने हाथ में आये बिना उस पर किसी तरह की जोर-जबरदस्ती या जुल्म नहीं किया जा सकता मगर अब, इस चीज के कब्जे में आ जाने के बाद, मैं बेखौफ आपसे कह सकता हूँ कि अब आपको दारोगा से डरने-दबने, उसे तरह देते जाने या उसका जरा भी ख्याल करने की बिल्कुल जरूरत नहीं है और अब आप उससे जिस तरह का चाहें बर्ताव कर सकते हैं। इस चीज का पूरा-पूरा हाल सिर्फ भैयाराजा और महाराजा ही जानते थे, पर मैं अपने बड़े-बुजुर्गों के मुँह से सुनकर इतना कह सकता हूँ कि यह तिलिस्म के उस हिस्से की एक चाभी है जो आपके हाथों से टूटने वाला है और इसके अन्दर क्या है यह भी मैं अभी आपको दिखाये देता हूँ।’’

इतना कह इन्द्रदेव ने हाथ बढ़ाकर उस डिब्बे के सामने की तरफ जड़े एक मोती को किसी खास तरकीब के साथ दबाया जिसके साथ ही उसका ऊपरी हिस्सा ढकने की तरह खुल गया और उसके अन्दर एक छोटी-सी भोजपत्र की बनी हुई पोथी नजर आने लगी जिसे गोपालसिंह ने निकालकर माथे से लगाया और तब दो-एक पन्ने उलट-पलटकर इधर-उधर से देखने के बाद कहा, ‘‘जरूर इस किताब में उस तिलिस्म को तोड़ने की तरकीब लिखी हुई होगी?’’

इन्द्रदेव ने जवाब दिया, ‘‘हाँ, और अब आपको मुनासिब है कि इसे खूब गौर से दो-तीन बल्कि चार बार पढ़ जायें जिसमें अगर कभी यह किताब आपके पास न भी रहे तो भी इसकी खास-खास बात आपके जेहन से उतरे नहीं, यह आपकी चीज है इसे मैं आपके पास ही छोड़े जाता हूँ मगर मुनासिब यही है कि इस चीज की अपनी जान से बढ़कर हिफाजत करें और इसको किसी तरह भी कब्जे के बाहर जाने न दें।बस, इसी को दारोगा के कब्जे से निकालने के लिए मैं इन श्यामलाल को यहाँ रोके हुए था क्योंकि सिर्फ ये ही इसे काबू में कर सकते थे। अब मैं इन्हें लेकर अपने घर जाता हूँ जहाँ इनकी राह बड़ी बेचैनी के साथ इनकी स्त्री और रिश्तेदार लोग कर रहे होंगे। उन लोगों का ख्याल करना भी जरूरी है, कामेश्वर औप प्रभाकरसिंह के सवार पर सवार आ रहे हैं।’

गोपाल० : आपने ऐसी बात कही मैं इन्हें रोकने से मजबूर हो गया मगर फिर भी इतना जरूर कहूँगा कि आप इनको जल्दी-से-जल्दी पुनः मेरे पास ले आवें और या नहीं तो मुझे ही इस बात की इजाजत दें कि मैं वहाँ आकर अपने सब प्रेमियों से मिलूं।

इन्द्रदेव० : नही-नहीं, अभी नहीं, इस मामले में जल्दी करने से सब बात बिगड़ जाएगी। जो काम करना चाहिये खूबसूरती से करना चाहिये अभी तो दारोगा साहब से सभी का सामना कराने और यह पूछने की जरूरत है कि कहिये जनाब, इन बेचारों ने आपका क्या बिगाड़ा था जो आपने इस कदर तकलीफें इन्हें दी?

गोपाल० : माफ कीजिये, बाज आया मैं आपके खूबसूरती से काम करने से! अब तो मैं खुले आम दरबार करके दारोगा पर राय श्यामलाल के साथ दगा करने का इल्जाम लगाऊंगा और उसे जेलखाने भेजवा कर कोई अच्छी सजा तजवीज करूंगा बल्कि उसी के साथ उस कम्बख्त मु....

इन्द्र० : हैं हैं!! अभी आप ऐसा करने की बात भी न सोचिये। अभी आपको सब....

गोपाल० : (झुंझलाकर) अलग रखिये आप अपने सब्र को! (हाथ से श्यामलाल की तरफ बताकर) मेरे ऐसे-ऐसे लंगोटिया दोस्तों पर वह हरामजादा सफाई के हाथ फेरे और मैं सब्र किए बैठा रहूँ, नहीं यह मेरे लिए नहीं हो सकता। अभी तक जो मैं उसकी हरामजदगियों का हाल सुन-सुनकर भी चुपचाप बैठा रह जाया करता था, सिर्फ यही नहीं उस कम्बख्त से दबकर चलता था वह आपके सिर्फ इस कहने पर कि कोई चीज शैतान के पास है जिसके पाये बिना मैं तिलिस्म तोड़ न सकूंगा, अब आपकी कृपा से मैं अनमोल चीज को पा गया हूँ तो अब मुझे कुछ भी परवाह नहीं रह गई है और मैं एक बार अपने दिल की कर गुजरना चाहता हूँ। बस अब मुझ पर दया कीजिए और मुझे रोकने या दबाने की कोशिश न कीजिए।

इन्द्र० : (हँसकर) अरे भाई, मैं कुछ हमेशा के लिए थोड़ी ही आपको कह रहा हूँ! मैं तो सिर्फ कुछ दिन तक आपको और रोके रखना चाहता हूँ, कम-से-कम ....

गोपाल० : जी नहीं, अब कमबेश कुछ भी मैं सुनने को तैयार नहीं!!

गोपालसिंह का हठ देख इन्द्रदेव कुछ चिन्ता में पड़ गये और जरा देर के लिए चुप हो गये। आखिर उन्होंने कहा, ‘‘अच्छा, मेरी सिर्फ एक बात आप सुन लीजिए और जो मन में आवे सो कीजिए!’’

गोपालसिंह और इन्द्रदेव में धीरे-धीरे कुछ बातें होने लगीं जिन्हें हम भी सुन न सके मगर बातों का यह सिलसिला ज्यादा देर तक न रहा और बहुत जल्द ही इन्द्रदेव ने यह कहकर समाप्त किया, जो कुछ मेरे दिल में था मैंने आपको कह सुनाया, अब आपके जी में जो आवे सो कीजिए और दारोगा के साथ जैसा चाहे बर्ताब करिए, मगर मेरी आखिरी राय अब भी यही है कि कम-से-कम तीन दिन तक आप इस मामले में शान्त रहें और जब श्यामजी को घर पहुँचाकर मैं वापस लौट आऊं तब मेरी मौजूदगी में ही जो जी में आवे सो करें, बस, अब चलिए आपको ठिकाने पहुँचा दूं!’’

गोपालसिंह कुछ कहना चाहते थे मगर न-जाने क्या समझकर रुक गये, इन्द्रदेव ने उनका हाथ पकड़ लिया और उसी सुरंग की राह ले जाकर पुनः उनके पलंग तक पहुँचा दिया। इसके बाद वे लौटे और तब श्यामलाल को साथ लिए तिलिस्मी राह से राजमहल और खास बाग के बाहर हो गए।

अफसोस इन्द्रदेव! क्या तुम्हें इस बात की भी खबर है कि तुम्हारे कैलाशभवन के लिए रवाना होते ही गोपालसिंह किस मुसीबत में पड़ जायेंगे? क्या तुम्हें मालूम है कि दारोगा के किसी जासूस ने उसे होशियार कर दिया और वह जान गया कि कोई ऐयार उसके घर में घुसकर वह बहुत ही कीमती चीज निकाल ले गया जिसे वह बड़ी हिफाजत से रखे हुए था और जिसके पाने के लिए गोपालसिंह के दिली दोस्त श्यामलाल पर भी वार करने में चूका न था यद्यपि वह जानता था कि अगर कभी भण्डा फूटा और गोपालसिंह को इन बातों की खबर हुई तो वे उसे सूली दिये बिना न रहेंगे? क्या तुम जानते हो कि दारोगा का ख्याल तुरन्त तुम्हारे और श्यामलाल की तरफ चला जाएगा और वह समझ जाएगा कि यह तुम्हीं लोगों की कार्रवाई हो सकती है, और वह उसी दम एक ऐसी कार्रवाई जारी कर देगा जिसका नतीजा गोपालसिंह और जमानिया के राजसिंहासन के लिए बहुत ही बुरा निकलेगा!

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