भूतनाथ - खण्ड 7 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 7 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 7

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :290
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8366
आईएसबीएन :978-1-61301-024-2

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भूतनाथ - खण्ड 7 पुस्तक का ई-संस्करण

सातवाँ बयान

संध्या होने में अभी घण्टे-भर से ज्यादा की देर फिर भी मौसम पर ध्यान दे जंगली चिड़ियों ने अपने घोंसलो की ओर लौटना शुरू कर दिया है और उस जंगल में सन्नाटा बढ़ता जा रहा है जिसमें एक छोटे टीले के ऊपर बैठी हुई दो औरतें आपस में कुछ बातें कर रही हैं, हमारे पाठक इन दोनों औरतों को पहचानते हैं क्योंकि इनमें से एक तो बेगम है और दूसरी नन्हों।

उस टीले की जड़ के साथ एक छोटा-सा नाला बह रहा है जिसके किनारे इन दोनों औरतों के घोड़े लम्बी बागडोरों से बंधे चर रहे हैं। नाले के दूसरी तरफ घना जंगल है जिसमें, से कभी-कभी किसी जंगली जानवर की आवाज आ जाती है। इन दोनों औरतों का मुँह उसी जंगल की तरफ है और बातें करते-करते बीच-बीच में इनके उस तरफ देखने से यह भी जाहिर होता है कि शीघ्र ही उस तरफ से कोई आने वाला है जिसका ये इन्तजार कर रही हैं, ये दोनों शैतान की खालायें क्या बातें कर रही हैं इन्हें सुनना चाहिए।

नन्हों : दारोगा साहब को तुमसे बहुत कुछ उम्मीद थी क्योंकि उन्हें तुम्हारी और दलीपशाह की पुरानी मुहब्बत का हाल मालूम था और वे समझते थे कि तुम जरूर कुछ-न-कुछ कर सकोगी।

बेगम : मैं खुद यही सोचती थी क्योंकि एक जमाना था जब वह मुझ पर मरता और मेरे लिए जान देने को तैयार रहता था। इसी भरोसे मैं उसके यहाँ गई और उस पर अपना जाल रचना चाहा मगर अफसोस, कुछ काम तो बना नहीं उल्टा उसने मुझे बेइज्जती के साथ निकाल दिया।

नन्हों : तुम जल्दीबाजी कर गई होगी, तुमको उसका रुख देखते हुए टटोलकर चलना वाजिब था!

बेगम : अजी तो क्या तुम मुझे पूरा बेवकूफ ही समझती हो! वैसा ही तो मैंने किया ही था। अपनी तरफ से तो मैंने उस पर यह भी जाहिर न होने दिया कि मैं उसके पास उससे मिलने आई हूँ। वह रोज सुबह घोड़े पर हवा खाने निकलता है और आठ-दस कोस का चक्कर लगाकर तब घर वापस होता है। मैंने पहले से पता लगाकर ऐसा नाटक रचा कि जिस समय वह घर लौट रहा था उसी समय मैं दो तेज घोड़ों के रथ पर कई नौकरों के साथ उधर से जा रही थी कि यकायक घोड़े भड़के और कोचवान की गलती से रथ सड़क के नीचे जाकर उलट गया जिससे मैं सख्त चोट खा गई। दलीपशाह मेरी मदद को आया और मुझे पहचानने पर मुझे अपने घर ले गया क्योंकि मेरी हालत सफर के लायक न रह गई थी।

नन्हों : (मुस्कराकर) चालाकी तो खूब की! तब फिर क्या हुआ? रिक्तगन्थ का पता लगाने के लिए तुमने क्या किया? शायद उस मामले में तुम कुछ उतावली कर गई हो!

बेगम : नहीं, सो भी मैंने नहीं किया। कई दिनों तक जबकि मैं बीमार पड़ी थी और चलने-फिरने लायक भी नहीं थी, मैं यही सोचती रह गई कि कैसे पता लगाऊं कि किताब इसके पास है कि नहीं और अगर है तो कहाँ है। इसके लिए कई बार छिप-छिपकर उसकी बातें सुनने की भी मैंने कोशिश की क्योंकि यह तो तुम समझ ही गयी होगी कि मेरी चोट और बीमारी का बहाना सब नकली था। मगर बिल्कुल पता न लगा आखिर एक दिन जब मेरी उसकी बातचीत हो रही थी तो भूतनाथ का जिक्र चल पड़ा। वह बोला कि भूतनाथ मर गया, नहीं तो गोपालसिंह को इस समय उससे बहुत मदद मिलती। मैंने कहा कि वह मरा नहीं बल्कि कहीं छिपकर बैठा है, उसने इसका सबूत मांगा, मैं बोली सबूत की क्या जरूरत, वह खुद ही दो-चार दिन में तुमसे मिलेगा क्योंकि उसकी एक बहुत ही प्यारी चीज तुम्हारे कब्जे में आ गई है। इस पर वह चौंका और घबराकर पूछने लगा-सो कौन-सी चीज? मैंने कहा-किसी के खून से लिखी किताब। इस बात को सुन उसके मुँह का रंग जिस तरह बदल गया उससे मैं समझ गई कि जरूर वह किताब उसी के पास है मगर फिर और कुछ पता न लग सका क्योंकि इतना सुनते ही वह मेरे पास से उठ गया और थोड़ी ही देर बाद मैंने उसे घोड़े पर सवार हो कहीं जाते देखा। मैं समझी कि वह कुछ देर में लौट आवेगा मगर वह न लौटा और नौकरों से पूछने पर मालूम हुआ कि पन्द्रह रोज के लिए कहीं गया है। मैं शायद दो-चार रोज वहाँ रहकर उसका इन्तजार करती पर उसी दिन शाम को उसके एक शागिर्द ने मुझसे कहा कि मेरे लिए पालकी और कहारों का प्रबन्ध हो गया है, कल बहुत सुबह ही मुझे चले जाना होगा, इसे सुन मुझे बहुत गुस्सा आया और मैं बोली, ‘‘पालकी और कहारों की क्या जरूरत? मेरे पास अपनी सवारी मौजूद है और कल के बदले आज ही मैं यह घर छोड़ देती हूँ!!’’ इसके बाद रहना गलती थी, मैं उसी शाम को वापस लौट आई। बस यही तो सारा किस्सा है, अब बताओ तुम क्या कर रही हो?

नन्हों : मैं दूसरी तरकीब पर चल रही हूँ। भूतनाथ जहाँ छिपा है वह जगह मुझे मालूम है....

बेगम : तुम्हें मालूम है!! कहाँ है वह?

नन्हों : अभी नहीं बतलाऊंगी, अगर ज्यादा आदमी वहाँ पहुँचने लगे और उसे कुछ शक हो गया तो सब भंड़ाफोड़ हो जाएगा।

बेगम : तुम्हारे जाने से उसे शक न हुआ और मेरे जाने से शक हो जाएगा!

नन्हों : अजी तो मैं इस तरह भद्देपन से उसके पास थोड़ी ही गई हूँ। वह एक सिद्ध महात्मा के रूप में एक जगह रहता है, मैं उसकी भक्त और शिष्या के रूप में उस के पास जाती हूँ और उसकी बहुत पूजा-सेवा करती हूँ, वह समझता है कि मैं उसे नहीं पहचानती और उसे कोरा बाबाजी समझकर ही यह सब कर रही हूँ,

बेगम : तो इस तरह तुम्हारा काम कैसे बनेगा?

नन्हों : बड़े मजे में और बनेगा क्या बन गया है! मैं असली रूप में उससे मिलती हूँ और प्रकट में कोई बात उससे छिपाती नहीं, मैंने उस पर प्रकट किया हुआ है कि मैं दारोगा साहब का गुप्त भेदिया हूँ, दारोगा साहब आजकल दलीपशाह से मदद के लिए बातचीत चला रहे हैं, यह तो तुम्हें मालूम ही होगा। १ अस्तु उनकी चिट्ठी लाने ले-जाने का काम मेरे ही सुपुर्द है यह मैंने उस पर जाहिर किया है। अक्सर वह, यह जाहिर करता हुआ कि मानो मजाक में ऐसा कर रहा है, उनकी चिट्ठियां मांगता है और मैं भी इसे एक सन्त महात्मा की सनक समझने का-सा भाव दिखाती हुई बेखटके दिखा देती हूँ और इस तरह पर, उन चिट्ठियों के जरिये से अपना काम बना रही हूँ क्योंकि दारोगा साहब उन चिट्ठियों में वहीं बातें लिखते हैं जो मैं उनसे लिखने को कहती हूँ। (१. चन्द्रकान्ता सन्तति में दलीपशाह ने अपना किस्सा कहते समय इस पत्र-व्यवहार का हाल कहा है।)

बेगम : (ताज्जुब से) अच्छा! यह तरकीब तो तुमने खूब निकाली! और वह इस जाल को समझ नहीं रहा है!

नन्हों : बिल्कुल नहीं, और इसे धोखा समझने के कारण ही उसे क्या मिल सकता है! खास दारोगा साहब के हाथ की लिखी चिट्ठी मैं उसे दिखाती हूँ और उसके बाद खास दलीपशाह के हाथ का लिखा हुआ उस चिट्ठी का जवाब इसमें धोखे की जगह ही भला कहाँ या क्या हो सकता है।

बेगम : बेशक यह तो ठीक ही कहती हो। बलिहारी है तुम्हारे सूझ की। क्या इस वक्त भी कोई चिट्ठी तुम्हारे पास मौजूद है? उसे देख सकती हूँ?

‘‘हाँ-हाँ, क्यों नहीं!’’ कहकर नन्हों ने अपनी अंगिया में हाथ डाला मगर उसी समय सामने की तरफ कुछ देखकर चौंक पड़ी और बोली। ‘‘हैं! यह लो दारोगा साहब तो खुद ही चले आ रहे हैं।’’ बेगम ने भी चौंककर उस तरफ देखा और तब यह कहती उठ खड़ी हुई-‘‘हाँ, ठीक तो है!’’

वास्तव में सामने के घने जंगल के अन्दर से निकलकर जमानिया के दारोगा साहब इसी तरफ को आ रहे थे, वे एक मजबूत मुश्की घोड़े पर सवार थे और उनके साथ उनके दोस्त जैपालसिंह भी थे जिनके घोड़े पर पीछे की तरफ एक बड़ी गठरी भी रखी हुई थी। जिस समय नन्हों और बेगम टीले पर से उतरकर नीचे तक पहुँची उसी समय ये दोनों भी उनके पास आ पहुँचे और नन्हों को देखते ही दारोगा और जैपाल घोड़े से उतर पड़े। दारोगा के चेहरे से परेशानी जाहिर हो रही थी और उसके घोड़े की हालत देखने से जाहिर होता था कि कहीं दूर से सफर करता हुआ आ रहा है। दारोगा ने आगे बढ़ बेचैनी के साथ नन्हों का हाथ पकड़ लिया और पूछा। ‘कहों उससे भेंट हुई? उसने कुछ जवाब दिया?’’ नन्हों ने मुस्कराते हुए जवाब दिया। ‘‘जी हाँ।’’ और तब एक चिट्ठी निकालकर दारोगा साहब के हाथ पर रख दी। यह चिट्ठी जो उस तरह की थी जैसी अक्सर एक रियासत से दूसरी रियासत को भेजी जाती है, एक खलीते के अन्दर थी जिसे दारोगा ने जल्दी-जल्दी खोला और पढ़ा, यह लिखा हुआ था-

‘‘मेरे प्यारे दोस्त दारोगा साहब-

‘‘आपका खत मिला। आपने एक ताज्जुब की बात लिखी है जो अगर सही हो तो मेरे लिए बहुत बड़ी खुशी का सबब भी हो सकती है मगर अफसोस तो यही है कि मुझे उस पर विश्वास ही नहीं होता। भला जिस आदमी को इतने दिनों से जमाना मुर्दा समझे हुआ है उसके जीते-जागते होने की भला क्या उम्मीद की जा सकती है!

‘‘फिर भी जैसाकि आप लिखते हैं, अगर आप मुझे यह यकीन करा दें कि मेरा लगोंटिया दोस्त श्यामलाल जीता है और मैं उसे सही-सलामत देख सकता हूँ तो मैं वह खूनी किताब आपके हवाले करने के लिए तैयार हूँ!

आपका—

दलीपशाह’’

इस चिट्ठी के नीचे दलीपशाह का खास निशान और मोहर की हुई थी जिसे दारोगा साहब ने गौर से देखा और तब नन्हों की तरफ देखकर कहा, ‘‘क्या यह चिट्ठी तुमने उसको दिखाई?’’ नन्हों ने कहा, ‘‘हाँ!’’ जिस पर दारोगा बोला, ‘‘इसे पढ़कर उसने कुछ कहा?’’ नन्हों बोली, ‘‘इस बारे में तो कुछ भी नहीं, मगर कुछ ऐसी बातें आप-से-आप उसके मुँह से जरूर निकल पड़ीं जिन्होंने मुझे ताज्जुब में डाल दिया। मगर आप थोड़ी देर के लिए कहीं बैठ जाएं तो उन्हें आपसे कह सुनाऊं!’’

दारोगा यह सुन एक साफ चट्टान की तरफ बढ़ा जो नाले के किनारे बड़ के एक बहुत बड़े और पुराने पेड़ के नीचे पड़ी हुई थी और उसी पर बैठ इन चारों में आपस में कुछ सलाह-बात होने लगी। बातें बहुत देर तक होती रहीं यहाँ तक कि रात की अंधियारी चारों तरफ घिर गई जंगल खौफनाक मालूम होने लगा। आखिर जब जैपाल ने सभी का ध्यान इस तरफ दिलाया तब इनकी बातों का सिलसिला टूटा। दारोगा साहब ने अपनी जस्ते की कलम से एक कागज पर कुछ लिखकर नन्हों को दिया और तब उस गठरी में से जो जैपाल के साथ थी, कोई चीज निकाल उसे देने के बाद और भी कई बातें समझाईं जिसके बाद वह मजलिस बर्खास्त हुई। दारोगा, जैपाल और बेगम अपने-अपने घोड़ों पर सवार हो एक तरफ को रवाना हुए और अकेली नन्हों दूसरी तरफ चली जिसे अपने काम की धुन में इस बात का कोई भी डर न था कि जंगल अकेला सुनसान और भयानक है और दरिन्दे जानवरों का खतरा कदम-कदम पर है।

अब हम थोड़ी देर के लिए नन्हों का साथ छोड़ते हैं और भयानक टीले पर चलते हैं जहाँ भूतनाथ का डेरा है। पाठक भूले न होंगे कि गयाजी के पास फलगू नदी के बीच के एक भयानक टीले के ऊपर एक तपस्वी साधु के भेष में भूतनाथ विराज रहा है और दुनिया से अलग रहता हुआ भी अपने जासूसों और शागिर्दों के जरिये सब तरफ की रत्ती-रत्ती खबर रखता है, इस समय हम उसकी तरफ चलते और देखते हैं कि वह क्या कर रहा है।

आधी रात से ज्यादा जा चुकी है मगर भूतनाथ की आंखों में नींद नहीं है वह अपनी उसी भीतर वाली कुटिया में धूनी के सामने आसन जमाये बैठा है और उसके दो-तीन विश्वासी शागिर्द उसके सामने बैठे हुए हैं जिनसे वह धीरे-धीरे कुछ बातें कर रहा है।

यकायक कुटिया के बाहरी दरवाजे पर थपकी की आवाज सुन भूतनाथ की बातों का सिलसिला टूटा और उसने एक शागिर्द की तरफ देखकर कहा, ‘‘बलदेव, देखो तो कौन है!’’

बलदेव उठकर बाहर चला गया और एक दूसरे शागिर्द ने भूतनाथ की इच्छानुसार उस चिराग की रोशनी तेज कर दी जो एक बगल में जल रहा था। इसी समय बलदेव एक आदमी को साथ लिए हुए भीतर आया जिसे देखते ही भूतनाथ ने खुश होकर कहा, ‘‘वाह जी रामेश्वरचन्द्र, तुम तो खूब मौके पर आये! इस समय मैं तुम्हारा ही इन्तजार कर रहा था।’’

रामेश्वरचन्द्र ने साधुरूपी भूतनाथ के पैरों पर सिर रखा और उसने आशीर्वाद देकर सामने बैठने का इशारा करते हुए कहा, ‘‘बेशक यही बात है और मैं केवल बहुत दूर ही से नहीं आ रहा हूँ बल्कि एक बड़ी ही भयानक खबर भी अपने साथ ला रहा हूँ।’’

भूत० : (चौंककर) सो क्या?

रामे० : राजरानी बनकर मुन्दर का दिमाग एकदम बदल गया। उसने अपने बाप हेलासिंह को तो मरवा ही डाला था....

भूत० : हाँ, यह खबर तो मैं सुन चुका हूँ

रामे० : अब वह राजा गोपालसिंह के जान की ग्राहक बन बैठी है। अगर उनकी हिफाजत न की गई तो दो-चार दिन के अन्दर ही आप सुन लीजिएगा कि वे इस दुनिया से उठ गये!

भूत० : (घबराकर) हैं! यह तुम क्या कह रहे हो!!

रामे० : मैं बहुत सही कह रहा हूँ।

भूत० : किस तरह तुम्हें यह बात मालूम हुई?

रामे० : खास कम्बख्त मनोरमा की जुबानी। आपको यह खबर तो लगी ही होगी कि दारोगा की बदौलत मनोरमा का आना-जाना राजमहल तक हो गया है जहाँ उसने मुन्दर पर वही रंग गांठ लिया है जैसा दारोगा गोपालसिंह पर जमाये हुआ है।

भूत० : हाँ, मुझे यह बात मालूम है और मैं अक्सर अफसोस के साथ सोचा करता हूँ कि गोपालसिंह की बुद्धि को क्या हो गया है जो वह रंडियों और बदकारों को अपने महल में आने की इजाजत देकर अपने पैर में आप कुल्हाड़ी मार रहा है, क्योंकि मैंने यह भी सुना है कि मनोरमा का कोई भाई है जो मुन्दर का पहले ही से कृपापात्र था और मनोरमा की बदौलत अब महल में भी आने-जाने लगा है।

रामे० : तो आपने पूरी बात नहीं सुनी, वह केवल आने ही जाने नहीं लगा। मुन्दर उस पर इस कदर मोहित हो गई कि उसने उसे लौंडी का भेष बनाकर अपने महल में रख लिया है और इस बात का पता किसी को भी यहाँ तक की दारोगा साहब को भी नहीं है, धनपति के नाम से वह मशहूर है और रिश्ते में वह मनोरमा का भाई नहीं बल्कि भांजा है। मैंने उसे देखा है। उसकी शक्ल-सूरत बिल्कुल जनानी है मगर उसके बदन में ताकत बहुत है, मुन्दर पर उसका ऐसा रंग जम गया है कि वह उसके लिए एकदम दीवानी हो रही है और शायद उसी की राय से या सम्भव है कि खुदमुख्तार होकर खुद तिलिस्म की रानी बनने की लालच से अब वह गोपालसिंह को इस दुनिया से उठा देना चाहती है।

भूत० : यह तुम्हें कैसे मालूम हुआ?

रामे० : मैंने मनोरमा की एक लौंडी से दोस्ती पैदा कर ली है और उससे मिलने के बहाने अक्सर उसके यहाँ आता-जाता हूँ जिससे छिपे तौर पर मनोरमा की बातें सुनने का मुझे कभी-कभी मौका मिल जाया करता है। कल नागर उससे मिलने आई थी और मनोरमा की उसकी खूब घुल-मिलकर बातें हो रही थीं जिसे मैंने सुन लिया और यह खबर पाई। मनोरमा की जुबानी ही मुझे यह भी पता लगा कि दारोगा साहब इस बात की इजाजत नहीं दे रहे थे नहीं तो अब तक कभी की मुन्दर अपने वाली कर गुजरी होती और इसीलिए उसने मनोरमा के सुपुर्द यह काम किया था जैसे हो दारोगा को इस बात के लिए राजी कर ले। मनोरमा और नागर की बातचीत से जाहिर हुआ कि दारोगा साहब ने इस बात की इजाजत दे दी और मेरी समझ में तो अब बेचारे गोपालसिंह कुछ ही दिनों के मेहमान है।

भूत० : अफसोस, यह तो तुमने बहुत ही बुरी खबर सुनाई, तब फिर क्या करना चाहिए?

भूतनाथ ने अपना सिर नीचा कर लिया और देर तक-न-जाने क्या-क्या सोचता रहा, आखिर बहुत देर के बाद एक लम्बी सांस लेकर अपना सिर उठाया और रामेश्वरचन्द्र से बोला। ‘‘चाहे जिस तरह भी हो गोपालसिंह की जान बचानी होगी। इसके लिए मैंने कई बातें सोची हैं। आओ आगे बढ़ आओ और मेरी बातें सुनो। (बाकी शागिर्दों से) तुम लोग भी खसक जाओ क्योंकि तुम्हें मैं कई नाजुक काम सौंपना चाहता हूँ।’’

बहुत देर तक भूतनाथ अपने शागिर्दो के साथ तरह-तरह की बातें करता और उन्हें न-जाने क्या-क्या समझाता रहा नहीं कह सकते कि उनके मन में इस समय क्या-क्या बातें उठ आई थीं या वह किस-किस काम का बांघनू बांध रहा था मगर इतना कह सकते हैं कि इस बातचीत और सलाह-मशविरे में उसने बहुत ज्यादा समय लगा दिया और रात दो घण्टे से ज्यादा नहीं रह गई थी जब उसके शागिर्द उसकी आज्ञानुसार उस जगह के बाहर हुए और सब तरफ फैल गए।

अकेला भूतनाथ अपनी जगह पर बैठा रहा, पर इस समय भी वह किसी सोच में डूबा हुआ था और उसका चिन्तित मन तरह-तरह के बांधनू बांध रहा था। हम नहीं कह सकते कि रामेश्वरचन्द्र की लाई हुई खबर ने उसे क्यों इस कदर परेशान कर दिया था या अब वह किस फिराक में पड़ा हुआ था मगर कम-से-कम उसका चेहरा यह जाहिर कर रहा था कि वह किसी गम्भीर चिन्ता में निमग्न है, अभी वह न-जाने कब तक इसी तरह बैठा रहता मगर किसी के पैरों की आहट ने उसे चैतन्य किया और सिर उठाने पर उसने अपने एक शागिर्द को देखा जो उसके साथ साधु के भेष में बराबर यहाँ रहता हुआ उसकी सेवा किया करता था। भूतनाथ ने इशारे से पूछा,‘‘ क्या है?’’ जिसके जवाब में उसने फूलों से भरा हुआ एक चंगेर उसके सामने रखते हुए कहा, ‘‘अभी एक लड़का इसे दे गया और कहता गया है कि इसमें महात्माजी की एक बहुत ही प्यारी चीज है।’’

ताज्जुब करते हुए भूतनाथ ने वह चंगेर हाथ में उठाया। सुन्दर और खुशबूदार फूलों से वह भरा हुआ था जिसकी गमक चारों ओर फैल रही थी, उसने उसके अन्दर हाथ डाल एक मुट्ठी फूल उठाये मगर उसी समय चौंक पड़ा क्योंकि उसके हाथ में कोई ठंडी नुकीली चीज लगी। उसने गौर से देखा, तब शागिर्द से रोशनी पास लाने को कहा।

दीये की रोशनी में फूलों को हटा भूतनाथ ने उस चंगेर में देखा। नीचे की तरफ कोई चमकती हुई चीज उसे दिखाई पड़ी जिस पर एक निगाह पड़ने के साथ ही वह चौंक पड़ा, उसने फिर गौर से उस चीज को देखा और तब चिल्लाकर बोल पड़ा, ‘‘हैं! यहाँ यह कैसे? तब क्या वह अभी तक जीता है!! जरूर ऐसा ही होगा! ओफ, तब नहीं तो अब गई बेचारे गोपालसिंह की जान!!’’

चंगेर भूतनाथ के हाथ से गिर पड़ा और वह बदहवास-सा होकर दोनों हाथों से अपना मुँह ढांप लम्बी सांसे लेने लगा।

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