भूतनाथ - खण्ड 7 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 7 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 7

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :290
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8366
आईएसबीएन :978-1-61301-024-2

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भूतनाथ - खण्ड 7 पुस्तक का ई-संस्करण

ग्यारहवाँ बयान


दोपहर का समय है। एक घने और भयानक जंगल में जहाँ इस समय भी सूर्य की रोशनी को जमीन तक पहुँचने में मुश्किल हो रही है, पत्थर की चट्टान पर एक साधु सुस्त और उदास चुपचाप बैठा हुआ कुछ सोच रहा है।

यह साधु कौन है? इसकी सूरत तो पहचानी हुई-सी जान पड़ती है और यह स्थान भी कुछ परिचित-सा नजर आता है! हाँ, ठीक है, यह तो वही जगह है जहाँ फलगू के बीच, अखण्डनाथ बाबाजी के टीले पर से, उनकी ‘गुफा’ के अन्दर से आई हुई सुरंग निकलती है। देखिए वह एक भयानक गुफा का जंगली लता-पत्तों से दबा हुआ मुहाना नजर भी आ रहा है और ये साधु भी तो वे ही अखण्डनाथ बाबाजी ही हैं, जिनकी सूरत बना हुआ भूतनाथ उस टीले पर निवास कर रहा है। तब क्या यह भूतनाथ ही है? नहीं-नहीं, वह तो देखिए सामने अपनी असली सूरत में चला आ रहा है और जल्दी-जल्दी कदम उठा रहा है, फिर यह साधु कौन है?

‘‘अब तो बड़ी देर हो गई! मुझे अपने स्थान पर वापस जाना जरूरी है, नहीं लोगों को शक होगा! जान पड़ता है आज भी गुरुजी नहीं आयेंगे!!’’ कहते हुए बेचैनी के साथ उस साधु ने अपने चारों तरफ देखा और तुरन्त उठ खड़ा हुआ क्योंकि उसी समय उसकी निगाह पेड़ों के झुरमुट के बीच में से निकलते हुए भूतनाथ पर पड़ गई। देखते ही वह चौंका और तेजी से उस तरफ बढ़ा, आगे जाकर उसके पैरों पर गिरता हुआ बोला, ‘‘गुरुजी, आप कहाँ हैं और क्या कर रहे हैं? हफ्तों से हम लोग बड़ी बेचैनी के साथ आपकी राह देख रहे हैं, आखिर आप कहाँ थे और क्या कर रहे थे!!’’

भूतनाथ ने बड़े प्रेम से उसे उठाते हुए कहा, ‘‘उठो रामेश्वरचन्द्र उठो! सचमुच मैं बहुत दिनों तक गायब रह गया और तुम लोगों से भेंट तक न कर सका। मगर इस बीच में मैंने अपने दुश्मनों से पूरा बदला लिया और इस समय एक ऐसा काम करता चला आ रहा हूँ कि सुनोगे तो खुश हो जाओगे। उठो और बताओ कि मेरी कुटिया में तो सब ठीक-ठाक है न! तुम मेरी सूरत बने आराम से तो हो? किसी को इसका पता तो नहीं लगा कि भूतनाथ कहीं और चला गया और अपनी जगह रामेश्वरचन्द्र को अखण्डनाथ बाबाजी की सूरत बनाकर छोड़ गया है?’’

रामेश्वरचन्द्र उठा मगर उसके चेहरे का उदासी का भाव दूर न हुआ। वह उसी स्वर में बोला, ‘‘जी नहीं, इसका पता तो किसी को नहीं लगा मगर हम लोग यह जानने को परेशान हैं कि इधर की खबरें भी आपको लगीं या नहीं?’’

भूत० : (पत्थर की चट्टान की तरफ बढ़ता हुआ) कौन-सी खबर? आओ यहाँ बैठो और बताओ कि तुम लोग क्यों परेशान हो तथा यह भी कहो कि आज इस जगह में तुम्हें क्यों देख रहा हूँ क्योंकि मैं तो समझता था कि तुम कुटिया में होगे और इसीलिए गुफा की राह वहीं पहुँचने की नीयत से इधर आया था।

रामे० : (भूतनाथ के सामने बैठता हुआ) वह सब हाल मैं आपको सुनाऊंगा, पहले यह बताइए कि आपने क्या किया और इस समय आपके चेहरे से जो प्रसन्नता जाहिर हो रही है उसका कारण क्या है?

भूत० : सचमुच इस समय मुझ-सा सुखी कोई न होगा! दलीपशाह से मैंने जिस तरह बदला लिया और अन्त में जैसे उसे जहन्नुम में पहुँचा दिया वह तो तुमने सुना ही होगा, अब यह भी देख लो कि मैं क्या सौगात तुम लोगों के लिए लाया हूँ।’’

भूतनाथ ने अपने कपड़ों के अन्दर से एक किताब निकालकर रामेश्वरचन्द्र के सामने रख दी जिसने उसे उलट-पुलटकर देखा और तब पूछा, ‘‘यह क्या चीज है?’’

भूत० : यह तिलिस्म की चाभी है। इस किताब में शिवगढ़ी के तिलिस्म का पूरा हाल लिखा हुआ है और इसकी मदद से हम लोग उसे तोड़कर वहाँ के पूरे खजाने के मालिक बन जायेंगे। बस, अब तुम हम लोगों के मुसीबत के दिन दूर हो गए ही समझो क्योंकि शिवगढ़ी के अन्दर इतना भारी खजाना बन्द है कि जिसे एक-दो आदमी तो क्या सैकड़ों आदमी उम्र-भर बेकदरी के साथ लुटाते हुए भी खर्च नहीं कर सकते और मैं तुम लोगों को बहुत जल्द इतना मालदार कर दूंगा कि जितना तुमने कभी सपने में भी न सोचा होगा।

मगर भूतनाथ की इस खुशी-भरी बातों ने भी रामेश्वरचन्द्र के दिल की कली न खिलाई। उसके चेहरे पर कोई रौनक दिखाई न पड़ी उसने साधारण भाव से पूछा, ‘‘मगर यह किताब तो आपके किसी दुश्मन के हाथ न लग गई थी?आपको कैसे मिली? और आपने मुझसे एक बार कहा था कि बिना दो तिलिस्मी किताबें हुए वह तिलिस्म खोला नहीं जा सकता, तो अब सिर्फ इस किताब की मदद से आप कैसे उस तिलिस्म को खोल और मालदार बन सकेंगे?’’

भूत० : यह किताब वही है जो मैंने जमानियाँ की बड़ी महारानी से पाई थी। यह सोने के एक जड़ाऊ खिलौने के अन्दर बन्द थी और इसे मैं एक तिलिस्मी कुंए के अन्दर हड्डियों के ढेर के पीछे छिपाये हुए था जहाँ से मेरे पुराने दुश्मन रोहतासमठ के पुजारी ने इसे निकाल लिया था। उसके हाथ से यह दारोगा साहब के पास पहुँची और उनके कब्जे से इसे दलीपशाह ले गया जिसके मन में बहुत दिनों से तिलिस्मी खजाना पाने की लालच लगी हुई थी। मैंने दारोगा साहब की मदद से दलीपशाह को मटियामेट कर दिया और उसी के सामानों में यह किताब मुझे मिली, वह दूसरी किताब रिक्तगंथ भी जिसे मैं बड़ी मुश्किल से राजा बीरेन्द्रसिंह के महल से निकालकर लाया था और जिसे दलीपशाह चुरा ले गया था अब मेरे कब्जे में आना ही चाहती है क्योंकि मुझे उसका पूरा-पूरा पता लग चुका है।

रामे० : और वह सोने का उल्लू कहाँ है जिसके अन्दर यह पुस्तक बन्द थी?

‘‘वह भी तुम्हारे सामने बैठा है।’’

यह तेज आवाज जो कहीं पास ही से आई थी चारों तरफ गूंज उठी और इसने भूतनाथ और रामेश्वरचन्द्र दोनों ही को चौंका दिया। भूतनाथ को किसी दुश्मन का ख्याल हुआ। उसका हाथ खंजर की मूठ पर चला गया और उसने तारों तरफ देखते हुए पूछा, ‘‘यह कौन बोला?’’

जवाब मिला-‘‘मैं, जो तुम्हारी बगल ही में खड़ा हूँ मगर तुम मुझे देख नहीं सकते! ऐ रामेश्वरचन्द्र, तुम किस शैतान के फेर में पड़े हुए हो जो तुम्हें भी नष्ट करेगा और खुद तो नष्ट हो ही चुका है! सचमुच यह उल्लू है, सोने का उल्लू और सोने के लिए उल्लू! जिसने इसे माल दिया उसने इससे जो चाहा सो करा लिया और रुपये के लिए इससे जो कुछ बना सो इसने किया! भूतनाथ, क्या तू समझता है कि दारोगा से तूने असली किताब पाई है!! नहीं, उसने तुझे चकमा देकर बेवकूफ बनाया और अपना काम निकालकर एक थोथी चीज तेरे हाथ में पकड़ा दी है, देख तेरी असली चीज यह मेरे पास है!!’’

यकायक एक पटाखे की-सी आवाज आई और इन लोगों के एक बगल ढेर सा धुआं सब तरफ फैल गया जिसने हल्का होकर तिलिस्मी शैतान की सूरत पैदा कर दी। इस आसेब को हमारे पाठक कई बार पहले भी देख चुके हैं अस्तु इस जगह उसका परिचय या नखसिख बयान करने की जरूरत नहीं है।

इस तिलिस्मी सूरत को देख दोनों ही आदमी घबरा उठे मगर उसी समय भूतनाथ ने उसके हाथों में कोई ऐसी चीज देखी जिसने उसके डर को गुस्से में बदल दिया। यह वही सोने का जड़ाऊ उल्लू था जो भूतनाथ के कब्जे से निकल गया था और जिसे वह समझता था कि दलीपशाह ने चुरा लिया है मगर इस जगह उसे उन्हीं हाथों में देख जिसने पहले उसे ले लिया था वह अपने को रोक न सका और खंजर निकालकर उस तरफ बढ़ा। मगर उस शैतान ने उसी समय डांटकर कहा, ‘‘बस खबरदार! जहाँ हो उसी जगह बने रहो, नहीं तो मैं अभी बात-की-बात में तुम्हें भस्म कर दूंगा। तुमने क्या मुझे भी दलीपशाह समझा हुआ है? और देखो, जरा इसे भी तो देखो।’’

तिलिस्मी शैतान ने उस उल्लू के दोनों जड़ाऊ पंख खींचे जिससे वे बाहर की तरफ फैल गये और उसके भीतर छोटी-सी एक जगह नजर आने लगी जिसमें हाथ डाल कोई किताब शैतान ने बाहर निकाली और भूतनाथ को दिखाकर बोला, ‘‘ देखो, असली चाभी यह है! वह नहीं जिसे बेईमान दारोगा से तुमने पाया और जिसके लिए दलीपशाह का लड़का नहीं, तुम्हारा ही लड़का था जिसका तुमने उस भयावनी रात को खून किया। तुम्हारी शान्ता मरी नहीं थी बल्कि अपनी इज्जत बचाने के लिए छिपकर दलीपशाह के यहाँ रहती थी। मगर अफसोस, दौलत की लालच में तुमने उसकी आँखों के सामने उसके और अपने लड़के का खून किया और इस तरह दोहरे पाप के भागी बने क्योंकि इस सदमें को वह बर्दाश्त न कर सकी और उसी जगह अपने लड़के की लाश पर ही अपना दम तोड़ दिया।’’

भूतनाथ चौंक गया, उसका चेहरा पीला पड़ गया और बदन में कंपकंपी आ गई। उसने डर और घबराहट से भरी आंखें रामेश्वरचन्द्र की तरफ उठाईं जिसने उसकी तरफ देख अपना सिर नीचा कर लिया, भूतनाथ ने फिर तिलिस्मी शैतान की तरफ निगाह घुमाई मगर इसी बीच में वह-न-जाने कहाँ गायब हो चुका था।

पागलों की तरह पुनः रामेश्वरचन्द्र की तरफ घूमकर भूतनाथ ने उसका हाथ पकड़ लिया और पूछा, ‘‘यह क्या कह गया, यह क्या कह गया! क्या यह बात सही है?’’

रामेश्वरचन्द्र ने सिर नीचा करके जवाब दिया- ‘‘जी हाँ, बिल्कुल सही!’’ धोखे में हो या जान-बूझकर, आपने अपने हाथ से अपने ही लड़के की जान ली और अपनी सती-साध्वी बेचारी असली स्त्री की भी जान के ग्राहक बने! मैं यह बात आपसे कहने वाला था मगर एक तो मौका न मिला दूसरे मैंने सोचा कि शायद आपको इसकी खबर हो!’’

भूतनाथ ने सुनते ही अपने माथे पर हाथ मारा और उसी जगह जमीन पर गिर गया। थोड़ी देर तक वह पागलों की तरह इधर-उधर देखता रहा मगर फिर बोला-‘‘नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता! तुम्हें धोखा हुआ है रामेश्वरचन्द्र और या फिर तुम मेरे साथ दुश्मनी कर रह हो जो मेरी आत्मा को क्लेश पहुँचाने की नीयत से ऐसी बदखबर मुझे सुना रहे हो।’’

अफसोस के साथ रामेश्वरचन्द्र बोला, ‘‘जी नहीं, मैं बिल्कुल सत्य कह रहा हूँ और इसका यह सबूत भी मेरे पास मौजूद है!’’ इतना कह उसने एक चिट्ठी अपने पास से निकाली और भूतनाथ की तरफ बढ़ाकर फिर सिर नीचा कर लिया। कांपते हुए हाथों में वह कागज पकड़ भूतनाथ उसे जल्दी पढ़ गया और तब एक चीख मारकर उसी जगह बेहोश होकर गिर पड़ा।

रामेश्वरचन्द्र खुद भी कुछ देर तक उसी जगह बैठा रह गया मगर आखिर वह उठा और भूतनाथ को होश में लाने की कोशिश करने लगा। बड़ी कोशिश के बाद मुश्किल से किसी तरह वह होश में आया मगर उसकी अवस्था एकदम पागलों की-सी हो रही थी और वह उसी तरह जमीन पर पड़ा आंसू गिराता हुआ न-जाने क्या बकने लगा।

‘‘हाय, क्या अन्त में आज मेरा इस दुनिया में यही परिणाम होना था! क्या अपने लड़के का खून मुझे अपने ही हाथों करना बदा था! क्या मेरी स्त्री की मौत मेरे ही कारण लिखी थी! इस दुनिया में सुख और धन की खोज करने जाकर मुझे क्या यही मिलने को था! ओफ, इतने दिनों की मेहनत का नतीजा क्या यही हुआ!

‘‘हाय, अब तक मैंने क्या-क्या न किया! कौन-कौन से पातक मेरे हाथों से न हुए! अपने प्यारे से प्यारे दोस्तों का खून मेरे हाथों ने किया। अपने भक्त शिष्यों का खून मैंने किया, अपने मालिक को धोखा मैंने दिया, अपने रिश्चेदारों के साथ बेईमानी मैंने की! क्या-क्या नहीं किया? सब कुछ किया! इस दुनिया में रुपये और सुख की खोज में बुरे-से-बुरे काम जो कुछ हो सकते थे वह मैंने किये, मगर उनका नतीजा क्या निकला? यही कि अपनी स्त्री और लड़के की हत्या मेरे हाथों से हुई। क्या इससे बढ़कर भी और कुछ पातक हो सकता है?’’

इसी तरह की न-जाने कितनी ही बातें बहुत देर तक भूतनाथ बकता रहा। उसकी आँखों से चौधारे आंसू बह रहे थे और उसकी हालत त्रासदायक हो रही थी। रामेश्वरचन्द्र चुपचाप बैठा उसकी हालत पर अफसोस कर रहा था पर उसकी हिम्मत न पड़ती थी कि उसे कुछ समझाये या कहे।

मगर यकायक भूतनाथ चुप हो गया। किसी तरह के एक नये ख्याल ने उसके मन में उठकर उसके आंसू सुखा दिये और वह कुछ और ही सोचने लग गया। जमीन पर पड़ा था सो उठकर बैठ गया। कुछ देर तक किसी गहरी चिन्ता में पड़ा रहा और तब हाथ मारकर बोला, ‘‘बस अब यही करना मुनासिब है, यही एक रास्ता अब मेरे लिए रह गया है।’’

जल्दी-जल्दी भूतनाथ ने अपने कपड़े उतारे, ऐयारी का बटुआ कमर से खोल कर रख दिया, खंजर निकालकर एक बगल रख दिया, वह तिलिस्मी किताब सामने रख दी और कितनी ही दूसरी चीजें भी जो बदन पर जगह-ब-जगह छिपाये रखता था निकालकर सामने रखी। इसके बाद वह रामेश्वरचन्द्र से बोला, ‘देखो रामेश्वरचन्द्र, तुम मेरे सबसे पुराने और सबसे विश्वासी शिष्य हो! तुमसे मैंने कभी कोई बात नहीं छिपाई, मेरा-गुप्त प्रकट सभी भेद तुम्हें रत्ती-रत्ती मालूम है और अब तक बुरा-भला जो कुछ मैंने किया वह भी तुम सब जानते हो। यह आखिरी पातक जो मेरे हाथ से हुआ है मेरे जीवन का घातक सिद्ध होगा।

अब मेरी इस दुनिया में रहने की जरा भी इच्छा नहीं अब, आज के बाद, कोई मुझे न देखेगा क्योंकि मैंने दुनिया से उठ जाने का निश्चय कर लिया, अस्तु मुझे अब जो कुछ कहना है वह सुन लो और जो कुछ देना है वह ले लो। देखो, यह तो एक तिलिस्मी किताब है जो कमीने दारोगा ने मुझे दी है, यद्यपि अब मुझे मालूम हो गया कि वह असली चीज नहीं है जिसकी मुझे खोज थी फिर भी मैं इतना कह सकता हूँ कि इसमें बहुत कुछ हाल तिलिस्म का जरूर लिखा हुआ है। इससे जो काम लेना चाहो तुम लेना।

यह मेरा ऐयारी का बटुआ है। इसमें तरह-तरह की बहुत ही बेशकीमती दवाइयां जिनके लिए और ऐयार बरसों टक्कर मारा करते हैं और नहीं पा सकते मौजूद हैं और बहुत कुछ दौलत भी इसके अन्दर है जो सब कुछ मैं तुम्हें देता हूँ। इसके अन्दर और भी एक कीमती चीज है जिसे पाकर तुम बहुत खुश होगे, उसके भी तुम्हीं योग्य हो और वह भी मैं तुम्हीं को देता हूँ रह गये ये कागज-पत्र, इन्हें तुम सम्हालकर उठा लो और जितना सम्भव हो इन्द्रदेव के पास पहुँचा दो क्योंकि इनमें कई बहुत गहरे-गहरे भेद भरे हैं जिनके जानने के लिए वे ही हकदार रह जाते हैं। तुमसे अगर हो सके तो इसी अखण्डनाथ बाबाजी के भेष में उसी कुटिया में रहना, नहीं, जहाँ चाहे रम जाना। मेरी स्त्री, नानक की मां, दुष्टों के फेर में पड़ गई हैं, मालूम नहीं जीती भी है या मर गईं और तीसरी स्त्री श्यामा के पास रुपये-पैसे की कोई कमी नहीं है। अस्तु इन दोंनो की फिक्र करने की तुम्हें जरूरत नहीं, बस सिर्फ हरनामसिंह, कमला और नानक बच जाते हैं, तुमसे अगर बन सके तो इन पर निगाह रखना नहीं तो फिर जो इनकी किस्मत में बदा होगा सो तो होगा ही। बस अब दो-एक बात तुमसे और कहकर मैं रूखसत होता हूँ।’’

भूतनाथ ने कुछ बातें और भी रामेश्वरचन्द्र से कहीं और तब उठ खड़ा हुआ। अपनी कमन्द उसने हाथ में उठा ली और रामेश्वरचन्द्र को भरपूर छाती से लगाने के बाद चट्टान से उतर एक तरफ का रास्ता पकड़ा रामेश्वरचन्द्र उसके साथ चला मगर उसने डांटकर कहा, ‘‘बस खबरदार, जहाँ हो वहीं रहो और मेरा पीछा करने या मुझको पलटा लाने की कोशिश मत करो।’’ लाचार रामेश्वरचन्द्र को वहीं रुक जाना पड़ा और भूतनाथ घने जंगल में घुस बात-की-बात में आँखों की ओट हो गया।

रामेश्वरचन्द्र उसी चट्टान पर बैठा तरह-तरह की बातें सोचने लगा। अपने गुरु की अवस्था पर ध्यान दे उसका कलेजा मुँह को आ रहा था और बार-बार आंसू आँखों में भर आते थे। बड़ी देर तक वह उसी तरह बैठा रह गया और न-जाने कब तक बैठा रहता अगर किसी के ये शब्द उसके कान में न पड़ते-‘‘क्यों जी रामेश्वर, भूतनाथ कहाँ गया?’’

रामेश्वरचन्द्र ने चौंककर सिर उठाया और देखा कि भूतनाथ के गुरुभाई शेरसिंह, जिन्हें वह अच्छी तरह पहचानता था। उसके सामने खड़े हैं। इन्हें देखते ही वह घबराकर उठा और उनके पैरों पर गिरकर आंसू बहाता हुआ बोला, ‘‘चाचाजी, गुरुजी तो अपनी जान देने की प्रतिज्ञा करके कहीं चले गये।’’

१. भूतनाथ यहाँ पर लिखता है-‘‘मेरा पूरा हाल जानने वालों को बताना नहीं पड़ेगा कि मेरी यह मौत नकली थी। इसमें कोई शक नहीं कि अपने लड़के को अपने ही हाथ से मारने की खबर सुन मुझे बहुत बड़ा धक्का लगा था। पर मैंने उस पर जो निश्चय किया था वह यह न था कि अपनी जान दे बल्कि यह था कि जिन लोगों के सबब से ऐसा हुआ उन्हें पूरी-पूरी सजा दूं, मेरे यहाँ इस कुटिया पर साधु भेष में रहने का हाल कुछ खास-खास आदमियों को मालूम हो चुका था इसलिए उन्हें भी धोखे में डालने और पूरी तरह से छिपकर अपनी कार्रवाई कर सकने के लिए मैंने यह आत्माहत्या का नाटक रचा था जिसके बारे में शुरू से अब तक मेरा यही ख्याल रहा है कि वह कायर और डरपोक लोगों का रास्ता है। मगर मुझे अफसोस है तो यही कि इस जगह मेरी इस नकली मौत ने, शेरसिंह वगैरह मेरे कुछ सच्चे हितेच्छुओं को भी धोखे में डाल दिया और उन्हें थोड़े समय की तकलीफ दी क्योंकि इस समय शेरसिंह की समझ में मैंने सचमुच ही जान दे दी और यही खबर उन्होंने मेरी स्त्री और दोस्तों को दी।’’

शेरसिंह चौंककर बोले, ‘‘हैं! भूतनाथ जान दे देने की प्रतिज्ञा करके कहीं चला गया! सो क्यों? और तुम यहाँ बैठे क्या कर रहे हो जो उसे इस ख्याल से रोकने की कोई कोशिश तुमने नहीं की!’’

रामेश्वर बोला, ‘‘मैंने बहुत कुछ समझाया मगर उन्होंने डांटकर मेरा मुँह बन्द कर दिया और मैं लाचार हो गया।’’

रामेश्वर ने उस दुःखदायी घटना का हाल कहना चाहा जिसके कारण भूतनाथ को ऐसा निश्चय करना पड़ा था, शेरसिंह उसे रोककर बोले, ‘‘रहने दो वह सब हाल मुझे मालूम है, उसे कहने की जरूरत नहीं तुम उठो और मेरे साथ चलकर खोजो कि वह आखिर गया किधर?’’

शेरसिंह की आज्ञानुसार रामेश्वरचन्द्र ने वहाँ फैला हुआ सब सामान उठा लिया और तब दोनों आदमी जंगल में घुसे।

ज्यादा दूर जाने की जरूरत न पड़ी। वहाँ से कुछ ही दूर पूरब में जाकर एक तराई पड़ती थी जहाँ से एक पहाड़ी नदी घनघोर शब्द के साथ नीचे को गिरती हुई बड़ा भयानक दृश्य दिखला रही थी। इस जगह पहुँचते ही रामेश्वरचन्द्र ठिठका और तब शेरसिंह को भी रोक उसने उंगली से सामने की तरफ इशारा किया।

यहाँ पर इनके ठीक सामने ही, कगार के किनारे पर के एक बहुत ही पुराने पीपल के पेड़ की डाल से बंधी लम्बी कमन्द के दूसरे सिरे के साथ उस जगह से पुरसों नीचे की तरफ लटकती हुई एक लाश हवा में झूल रही थी जिसे देखते ही शेरसिंह चौंक पड़े और बोले, ‘‘हैं, क्या यह भूतनाथ है? हाय-हाय मालूम होता है, इस पेड़ के साथ अपनी कमन्द बांध और दूसरा सिरा फन्दे की तरह अपने गले में डाल भूतनाथ पहाड़ से नीचे कूद पड़ा है और इस तरह पर उसने आत्महत्या कर ली है। ‘‘हाय-हाय प्यारे गदाधरसिंह, क्या अन्त में तेरी यही दशा होने की थी!’’

दोनों आदमी उस पीपल की तरफ झपटे पर उसी समय उन्होंने देखा कि कमन्द जिसकी गांठ शायद ढीली पड़ गई थी डाल से खुल गई और अपने साथ लटकती लाश को लिए पचासों पुरसा नीचे जाकर नदी के अतल तल में समा गई। शेरसिंह ने दोनों हाथों से अपना सिर पीट लिया और वहीं जमीन पर गिर आंसू बहाने लगे। रामेश्वरचन्द्र ने भी उनका साथ दिया।

 

।। समाप्त ।।

आगे का हाल जानने के लिये

रोहतासमठ

(दो खण्डों में)


श्री दुर्गा प्रसाद खत्री

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