भूतनाथ - खण्ड 7 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 7 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 7

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :290
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8366
आईएसबीएन :978-1-61301-024-2

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भूतनाथ - खण्ड 7 पुस्तक का ई-संस्करण

पाँचवाँ बयान


अजायबघर से रवाना होकर दारोगा साहब अपने घर नहीं गये बल्कि सीधे नागर के मकान पर पहुंचे। गलियां अन्धेरी और सुनसान हो रही थीं मगर उस हिस्से में अभी तक भी थोड़ी-बहुत चहल-पहल थी जिधर नागर का मकान था, फिर भी दारोगा साहब पर किसी की निगाह न पड़ी क्योंकि उन्होंने रथ का पर्दा चारों तरफ से गिराया हुआ था और रथ को देखते ही नौकरों ने फाटक खोलकर उसके भीतर होते ही बन्द कर दिया था। वह छोटी खिड़की भी बन्द कर दी गई जिसके जरिए फाटक बन्द रहने पर भी लोगों की आवाजाही होती थी। रथ जब भीतर जाकर नागर के रहने वाले मकान के दरवाजे पर रुका तब पर्दा हटाकर दारोगा साहब उसके बाहर हुए और बिना किसी तरफ एक भी निगाह डाले चट से मकान के अन्दर दाखिल हो गए। नागर को इनके पहुंचने की इत्तिला हो चुकी थी और वह इनकी अगवानी के लिए दरवाजे पर मुस्तैद थी अस्तु वह इन्हें लिए सीधे सबसे ऊपर वाले बंगले में पहुंची जहाँ इस समय जैपाल भी बैठा इनके आने की राह देखता हुआ उन बोतलों तथा प्यालों की निगहबानी कर रहा था जो दारोगा साहब का इन्तजार कर रहे थे।

दारोगा को देखते ही जैपाल उठ खड़ा हुआ और इनकी अगवानी के लिए आगे बढ़कर बोला। ‘‘आपको आने में बहुत देर होती देख हम लोग तो सोच रहे थे कि आज शायद न आ सकें। मगर मालूम होता है कि कोई नई बात हुई है क्योंकि आपके चेहरे से कुछ परेशानी जाहिर हो रही है!!’’

दारोगा साहब ने गद्दी पर बैठते हुए कहा, ‘‘बेशक ऐसा ही है और जब तक बीबी नागर हम लोगों के लिए कुछ खाने-पीने का इन्तजाम करती हैं उसी बीच मैं तुम्हें सब हाल सुनाता हूँ!’’ नागर समझ गई कि दारोगा साहब तखलिये में जैपाल से कुछ बातें करना चाहते हैं अस्तु उनके आराम के लिए कुछ तकिये उनके चारों तरफ रख वह भोजन का इन्तजाम करने का जिक्र करती हुई नीचे चली गई और दारोगा साहब ने जैपाल को अपने पास आ जाने का इशारा किया। दोनों में धीरे-धीरे इस तरह बातें होंने लगी :-

दारोगा : कहो भरथसिंह वाले मामले में क्या हुआ?

जैपाल० : (अफसोस के साथ गर्दन हिलाकर) कुछ नहीं, जो जाल हम लोगों ने फैलाया था उसमें वह फंसा नहीं!

दारोगा : सो क्या?

जैपाल० : जिधर हम लोगों ने सब तैयारी कर रखी थी उसने उधर जाने से इन्कार किया और यहाँ तक जिद्द बाँधी कि मेरे साथ आने की नौबत ही न आई। हम लोग बैरंग वापस लौट आए।

दारोगा : इसका क्या सबब हुआ? क्या किसी ने उसे होशियार कर दिया।

जैपाल० : अब तो यही शक करना पड़ता है चाहे हम लोगों की तैयारी कितनी भी होशियारी से क्यों न की गई हों! खैर, वह वन का गीदड़ जाएगा किधर?

आज नहीं कल, कल नहीं परसों! आखिर हमारे हाथ में आएगा ही तो कभी-न-कभी।

दारोगा : हाँ, मगर यह काम जल्दी होना चाहिए, अगर देर होगी तो इस बीच में वह न-जाने क्या गजब बर्पा कर दे! गोपालसिंह को उस पर बहुत विश्वास है और यद्यपि इस दफे मुन्दर ने उसे उल्लू बना दिया है पर किसी दूसरे मौके पर भी वह ऐसा कर सकेगी यह सम्भव नहीं।

जैपाल० : जी हाँ, यह तो ठीक है मगर मैं उधर से बेफिक्र नहीं हूँ और बहुत जल्द कोई दूसरी कार्रवाई करूंगा।

दारोगा : उसका डर मुन्दर को भी बहुत ज्यादा है। आज वह अजायबघर में मुझसे मिलने आई थी और उसने जो दो-एक बातें कहीं वह बेशक घबराहट पैदा करने वाली थीं, उसका कहना था कि इन्द्रदेव दो-तीन रोज हुआ गोपालसिंह से मिलने आया था और तखलिये में बहुत देर तक न-जाने क्या बातें करता रहा। मैंने उसे इन्द्रदेव का सामना करने से मना किया हुआ है क्योंकि वह लक्ष्मीदेवी को बखूबी पहचानता है इसलिए वह खुद उन लोगों के पास न जा सकी मगर छिपकर उनकी बातें जानने की कोशिश उसने जरूर की। ज्यादा तो सुन न सकी मगर जो कुछ उसने सुना वही उसे घबरा देने के लिए काफी था।

जैपाल० : वह क्या?

दारोगा: उसने गोपालसिंह को यह कहते सुना-‘‘अगर हेलासिंह को पकड़ कर सताया जाए तो वह जरूर बता देगा कि लक्ष्मी....’’बस इतना ही वह सुन पाई मगर इसी से जाहिर हो गया कि इन दोनों में लक्ष्मीदेवी के विषय में ही बातों हो रही थीं।

जैपाल० : बेशक ऐसा ही है लेकिन अगर उन लोगों के मन में मुन्दर के बारे में कुछ शक हो गया तो उसे दूर करना तो उनके लिए मुश्किल न होगा। और कुछ नहीं अगर किसी बहाने से एक दफे गोपालसिंह इन्द्रदेव ही को मुन्दर की शक्ल दिखा दें तो सब भंडाफोड़ हो जाएगा। इसका इन्तजाम आपने किया है? मेरी समझ में तो उन सब आदमियों को जो लक्ष्मीदेवी को पहचानते हैं रास्ते से हटा देना ही आपके लिए सबसे मुनासिब बात है।

दारोगा : हाँ, ठीक तो यही है और यह बात मैं कई दफे सोच भी चुका मगर अभी ऐसा करने की जरूरत नहीं है। मुन्दर के पहचाने जाने का अभी तुरन्त कोई ज्यादा डर नहीं है। तुमसे मैं कह चुका हूँ कि जमानिया के राजकुटुम्ब में यह रिवाज है कि जो लड़की ब्याह कर आती है वह फिर जन्मभर अपने मायके लौटकर नहीं जाती यही नहीं बल्कि पाँच बरस तक मायके का कोई आदमी औरत या नौकर-मजदूरनी तक भी महल में नहीं आ सकते। फिर मुन्दर अब जमानिया की महारानी यानी मायारानी है और तिलिस्म पर भी उसकी हुकूमत है इस लिए तिलिस्मी कायदे के मुताबिक कोई भी मायारानी अपने पति या देवरों के सिवाय और किसी भी गैर मर्द के सामने नहीं हो सकती। तिलिस्मी नियम कितने कड़े होते हैं तथा गोपालसिंह उनसे कितना डरता है और इन्द्रदेव उन्हें कैसा मानता है यह तुम जानते ही हो इसलिए जल्दी इस तरफ कोई डर नहीं है....

जैपाल० : मगर मुन्दर भरथसिंह के सामने तो अक्सर आती-जाती है!

दारोगा : भरथसिंह को गोपालसिंह अपना भाई समझते और कहते हैं तथा इस तरह पर मुन्दर ने उससे देवर का रिश्ता लगाया था मगर मैंने जैसे ही यह बात सुनी वैसे ही होशियार कर दिया और अब वह कभी भी किसी मर्द के सामने न होगी। बलभद्रसिंह के महल में बहुत कड़े पर्दे का रिवाज था और हेलासिंह भी मुन्दर को बहुत हिफाजत से रखता था अस्तु बहुत संभव नहीं कि कोई गैर मर्द इन लोगों को सहज ही पहचान सके मगर इस सबका यह मतलब भी नहीं है कि इस बात का खतरा ही नहीं। खतरा है और बहुत बड़ा है और हम लोगों को हर वक्त होशियार रहना चाहिए।

जैपाल० : तब इस खतरे को दूर करने की तरकीब?

दारोगा : तरकीब है और सिर्फ एक ही है।

जैपाल० : सो क्या?

दारोगा : गोपालसिंह को किसी मौके से ....(हाथ मारने का इशारा करता है)!

जैपाल० : (चौंककर) हैं ऐसा।

दारोगा : हाँ ऐसा ही मगर अभी इसका वक्त नहीं आया है। अभी तो शादी हुए थोड़ा ही जमाना हुआ है जरा दो एक साल और बीत जाएँ तब ऐसा करना मुनासिब होगा। अभी तो फिलहाल (धीरे से) हेलासिंह को रास्ते से दूर करना चाहिए।

जैपाल० : हाँ, इधर से डर तो जरूर है मगर मुन्दर कब इसकी इजाजत देगी!

दारोगा : उसे तुम जानते नहीं! इजाजत की तो बात क्या खुद उसी ने इस बात का इशारा किया।

जैपाल० : क्या खुद उसने....?

दारोगा : हाँ, उसने मुझसे कहा कि गोपालसिंह ने अगर मेरे पिता पर कुछ जोर-जबरदस्ती की और उन्हें सताया तो वे बहुत कमजोर दिल के आदमी है, ताज्जुब नहीं कि सब बातें खोल दे, अस्तु उन्हें किसी ऐसी जगह पहुंचा देना चाहिए जहाँ गोपालसिंह का हाथ उन तक पहुंच न सके।

जैपाल० : क्या सचमुच उसने ऐसा कहा?

दारोगा : हाँ, और वह यह भी बोली कि ‘मैंने उन्हें कहीं दूर जाकर बसने को कहा था पर मालूम नहीं वे किस लालच में पड़े हैं कि अभी तक अपने मकान पर ही बने हुए हैं जहाँ न-जाने कब गोपालसिंह का धावा हो जाय’! जब वह स्वयं यह कह रही है तो मेरी राय है कि हेलासिंह को बहुत जल्द अपने रास्ते से दूर कर देना चाहिए।

जैपाल० : अगर आपका हुक्म हो तो मैं इस काम को उठा लूं, मगर क्या उसे....?

दारोगा ने झुककर जैपाल के कान में कुछ कहा जिसे सुनकर वह बोला, ‘‘हाँ, ठीक है, यही मुनासिब है, मगर इसके लिए मुन्दर की लिखी हुई इजाजत आपके पास रहनी चाहिए। आपने उसे बहुत ऊंचे रुतबे पर बैठा दिया है और उसकी लोगों से या मुझसे फिरन्ट हो जाय और कहे कि मैंने ऐसा करने को थोड़ी ही कहा था। उस वक्त अगर आपके लिए नहीं तो कम-से-कम मेरे लिए मुश्किल होगी।

दारोगा : तुम्हारा ख्याल सही है, अब की दफे भेंट होने पर मुन्दर से इस बारे में कुछ लिखवा लूंगा।

दारोगा ने जैपाल से धीरे-धीरे और भी कुछ बातें कहीं और तब आखिर में कहा, ‘‘बस, अब इससे ज्यादा तुमसे कुछ कहने की जरूरत नहीं क्योंकि तुम खुद होशियार हो। अच्छा, अब यह बताओ बेगम से मिले थे? उसने कुछ किया!’’

जैपाल० : जी हाँ, मिला था। वह पुनः मिर्जापुर गई थी और दलीपशाह से मिलने की भी बहुत कोशिश की मगर कुछ काम न हुआ और उसे बैरंग लौट जाना पड़ा। उसका यह भी कहना है कि इस बारे में दलीपशाह को उस पर पूरा शक हो गया है। उसने अपने कई शागिर्द उसके पीछे ऐसे लगा दिये हैं जो पल-भर के लिए भी उसका साथ नहीं छोड़ते और न उसे कोई कार्रवाई करने का ही मौका देते हैं। उसका तो यहाँ तक कहना है कि उसके मकान के अन्दर भी दलीपशाह के आदमी अक्सर घुस आते और टोह लिया करते हैं और इस बात से वह इस कदर घबराई हुई थी कि मुझसे भी पूरी तरह से बातें करते डर रही थी। कहती थी मैं अपना घर छोड़ कहीं दूसरी जगह चली जाऊँगी। मगर जरूर यह उसका शक है, ऐसा भला कैसे हो सकता है! (१. भूतनाथ बीसवें भाग के चौथे बयान में इन्हीं आदमियों का जिक्र आया है।)

दारोगा : नहीं-नहीं, बहुत मुमकिन है कि उसका शक ठीक हो। जब से इन्द्रदेव के यहाँ मेरी दलीपशाह की कहा-सुनी हो गई है तब से वह जरूर चौकन्ना हो गया और सब तरह की टोह लेता रहता होगा। इसी नीयत से बेगम के यहाँ भी उसने अपने जासूसों को लगा दिया हो तो कोई ताज्जुब नहीं। (२. चन्द्रकान्ता सन्तति में अपना किस्सा बयान करती समय इस बात का जिक्र दलीपशाह ने किया है। (सन्तति २३ वाँ भाग ११ वाँ बयान देखिए))

जैपाल० : उस कम्बख्त को आपने फजूल ही छोड़ दिया। वह बड़ा ही शैतान और कांइयां है और उसकी जान-पहचान भी बहुत दूर-दूर तक है।

दारोगा : क्या बतावें उस रोज कुछ ऐसा हो ही गया। रिक्तगन्थ वाले मामले में मुझे उस पर गुस्सा चढ़ा ही हुआ था, उसकी जली-कटीं बातें बर्दाश्त न हो सकीं।

जैपाल० : खैर, यह तो बताइये कि रिक्तगन्थ उसके कब्जे में से लेने के लिए अब आप क्या कर रहे हैं? मायासिंह और गोविन्द को इस फेर में भेजा गया था पर तब से फिर उनका पता ही नहीं लगा। मालूम नहीं कहाँ चले गये....

दारोगा : चले कहाँ गये, जरूर उसी कम्बख्त का कैदखाना आबाद कर रहे होंगे! मुश्किल तो यह है कि जब तक मैं रिक्तगन्थ काबू में नहीं कर लेता उस कम्बख्त के साथ कोई सख्ती भी नहीं कर सकता। कौन ठिकाना वह शैतान उस किताब को ऐसा गायब कर दे कि फिर वह मेरे हाथ ही नहीं लगे, तब तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी। इसीलिए मैं उसे गिरफ्तार भी नहीं करवा रहा हूँ। नहीं तो वह है क्या चीज! मैं उसे बात की बात में मिट्टी में मिला सकता हूँ!!

जैपाल० : हाँ, सो तो सही है, आपका-उसका मुकाबला ही क्या है, मगर कहीं ऐसा न हो कि रिक्तगन्थ के ख्याल से आप तो उस पर तरह देते जाएं और वह आपकी जड़ काटने पर आमादा हो जाए! लेकिन सच तो यह है कि मुझे अभी तक इस बारे में अन्देशा बना ही हुआ है कि नागर के हाथ से रिक्तगन्थ लेना उसी का काम है, आपने मुझे अभी तक कुछ ठीक-ठीक बताया भी नहीं कि वह विश्वास आपको किस तरह हुआ, कहीं ऐसा तो नहीं की आपका शक झूठा हो और वह ....

दारोगा : नहीं-नहीं, मुझे, बहुत पक्के तौर पर यह खबर लगी है।

जैपाल० : आखिर किसने कहा! क्या मैं उसका नाम नहीं जान सकता?

दारोगा : क्यों नहीं जान सकते! मैं बहुत जल्दी ही तुम्हें उसका सब हाल बताऊंगा।

जैपाल० : (झुंझलाकर) तो आज ही क्यों नहीं बताते। मालूम होता है आपको मुझ पर विश्वास नहीं है या आप मुझे धोखेबाज समझते हैं!!

दारोगा : (दांत तले जीभ दबाकर) राम-राम-राम! कैसी बात कहते हो! भला मैं तुम पर अविश्वास करूंगा!

जैपाल० : (सिर हिलाकर) तो फिर बताते क्यों नहीं! आज क्या है और दो रोज बाद कौन-सी नई बात पैदा हो जायगी?

दारोगा : अच्छा मैं बता दूँगा।

जैपाल० : नहीं, मैं आज ही सुनूंगा और नहीं तो फिर कभी न सुनूंगा। इतना कह जैपाल ने अपना मुंह लटका लिया और अफसोस की मुद्रा बनाकर बैठ गया। आखिर दारोगा ने कहा, ‘‘अच्छा-अच्छा, तो मैं बताये देता हूँ मगर इसको अपनी जान की तरह छिपाकर रखना और कभी प्रकट न करना नहीं तो मैं कही का न रहूँगा। लो सुनो-इस बात की खबर कि नागर के हाथ से रिक्तगन्थ ले लेना दलीपशाह का काम है और गुलाबसिंह ने इस मामले में उसकी मदद की है, मेरे भाई ने मुझे दी थी!’’

जैपाल० : आपका भाई! क्या वह तो नहीं जिसे आपने एक दफे भैयाराजा के धोखे में महाराज के बाग में गिरफ्तार कर लिया था और बाद में छोड़ दिया और जो आजकल अपना नाम ‘पहाड़ी भेड़िया’ रखे हुए पागलों और वहशियों की तरह जंगल-जंगल पहाड़-पहाड़ मारा फिरता है! (१. देखिए भूतनाथ चौथा, तेरहवाँ बयान।)

दारोगा : हाँ, वही! उस समय दया करके मैंने उसे छोड़ दिया जिसका नतीजा यह हुआ कि वह अपने को बहादुर और ऐयार समझने लगा, मेरे कामों की टोह रखने लगा और मौके पर तरह-तरह से मुझे बदनाम और बेइज्जत करने लगा। तरह-तरह के आदमियों से उसने दोस्ती की हुई है और ऐसा रूपक साधे हुए है कि बहुत-से लोग तो उसे पूरा औलिया या पहुँचा हुआ फकीर और जादूगर समझ उसकी इज्जत करते और उससे सलाह या आशीर्वाद लेते रहते हैं, मगर इसी कारण उसे कभी-कभी ऐसी बातों का भी पता लग जाया करता है जिन्हें हम लोग किसी तरह जान नहीं पाते।

जैपाल० : ठीक है, मैं समझ गया। शायद उन्हीं के बारे में मनोरमा जी कहती थीं कि एक दिन आये और मुझे खबर दे गये कि भूतनाथ लोहगढ़ी के उड़ने पर भी बच गया और रिक्तगंथ पर भी उसने काबू पा लिया। जिक्र तो उनका मैं अक्सर सुना करता था पर यह मुझे नहीं मालूम था कि वे आपके वही भाई हैं! अच्छा, तो उन्होंने आपको यह खबर दी! मगर कौन ठिकाना, उनकी खबर गलत भी तो हो सकती है। (१. देखिए भूतनाथ उन्नीसवाँ भाग, पहला बयान।)

दारोगा : नहीं, यही तो उसकी एक खूबी है जिसके सबब से मुझे बार-बार तरह दे जाना पड़ता है कि वह कोई खबर गलत अभी मुझे नहीं देता, जो बात कहता है सही कहता है और पते की कहता है, आज तक कभी एक बात भी उसकी झूठी न निकली!

जैपाल० : मगर भूतनाथ की खबर उन्हें कैसे लगती है?

दारोगा : इस बात का कुछ पता नहीं चलता। मैंने बहुत कोशिश की मगर वह कुछ बताता नहीं, बस आता है और एक-न-एक मनहूस खबर देकर चला जाता है।

जैपाल० : मगर क्या ऐसा आदमी किसी दिन आपके लिए खतरनाक नहीं साबित हो सकता?

दारोगा : जरूर! और इसलिए मैं बराबर उसको अपने कब्जे में करने की तरकीब सोचा करता हूँ मगर वह हाथ आवे तब तो! उस खास बाग वाली घटना के बाद से वह कभी मेरे पास रुकता नहीं। हाँ, यह जरूर है कि अब तक उसने कभी मेरा कोई गुप्त भेद किसी गैर पर जाहिर नहीं किया है। यही सबब है कि मैं भी उस पर तरह दे जाया करता हूँ और उसके साथ किसी तरह की जोर-जबरदस्ती नहीं करता।

जैपाल० : मगर वे आपको दूसरों के गुप्त भेद क्यों बताते रहते हैं?

दारोगा : यह भी मैं कुछ कह नहीं सकता, शायद इसलिए कि....

दारोगा और कुछ कहना ही चाहता था कि यकायक नागर घबराई हुई उस जगह आ पहुँची और बोली।‘‘पहरे वालों को डरा-धमकाकर एक अजीब आदमी भीतर घुस आया है जो आपसे मिलना चाहता है और कहता है कि मैं बिना मिले किसी तरह जाऊंगा ही नहीं। वह यह भी कहता है कि अगर उससे तुरन्त न मिलेगे तो आपका बड़ा भारी नुकसान हो जाएगा बल्कि जान पर भी आ बने तो ताज्जुब नहीं।

दारोगा : (चौंककर) वह कौन आदमी है और उसे कैसे पता लगा कि मैं यहाँ हूँ? तुम्हारे पहरेदारों ने उसे अन्दर आने ही क्यों दिया?

नागर : वह उन्हें तरह-तरह की बातें कहकर डराने और खुलेआम आपका नाम ले-लेकर सड़क ही पर से पुकारने लगा जिससे उन लोगों ने उसे भीतर कर लेना ही मुनासिब समझा।

जैपाल : आखिर वह है कौन?

नागर : सो मैं कुछ भी नहीं कह सकती क्योंकि वह न तो अपना नाम बताता है न कुछ अपना हाल, हाँ, इतना कह सकती हूँ कि यह वही आदमी है जो एक दिन मेरे सामने ही मनोरमा बहिन के यहाँ आया था और अपने को ‘पहाड़ी भेड़िया’ कहता था।

‘पहाड़ी भेड़िया’ यह नाम सुनते ही दारोगा चौंक उठा और उसने एक गहरी निगाह जैपाल पर डालते हुए कहा, ‘‘तुम खुद जाओ और उसे यहीं ले आओ।

नागर : मगर वह यहाँ आने पर भी राजी नहीं होता और कहता है कि दारोगा साहब से कहो कि नीचे उतरकर मुझसे मिलें। मैंने कहा भी कि भला वह कैसे आ सकते हैं, तो बोला कि आयें तो उनसे कह देना कि ‘रोहतासमठ का पुजारी’ आया है।

‘रोहतासमठ का पुजारी’ यह शब्द सुनते ही दारोगा चौंक पड़ा, उसकी सूरत से हवाई उड़ने लगीं। बड़ी मुश्किल से अपने को सम्हाला उसने कहा, ‘‘अच्छा, चलो मैं ही चलता हूँ देखता हूँ कि कम्बख्त मुझसे क्या चाहता है।’’

घबराये हुए दारोगा साहब जिनके चेहरे से परेशानी और बेचैनी साफ जाहिर हो रही थी जैपाल का हाथ पकड़े हुए जल्दी-जल्दी सीढ़ियां उतरे और नीचे उस जगह पहुँचे जहाँ दरवाजे के पास ही वह विचित्र मनुष्य खड़ा हुआ था जिसे कई दफे पहले भी हमारे पाठक देख चुके हैं। इस समय भी वह उसी सूरत-शक्ल और लिबास में था जिसमें कि पहले कई बार दिखाई पड़ चुका है लेकिन इतना फर्क था कि इस समय उसके हाथ में एक छोटी-सी डलिया मौजूद थी जिसमें कोई चीज रखी हुई थी। जैसे ही दारोगा साहब उसके सामने आये, वह जोर से खिलखिला-कर हँस पड़ा और बोला, ‘‘आइये भाई साहब! आप तो अब इतना छिपकर रहते हैं कि आसमान में उड़ने वाली चिड़िया को भी आपका पता लगाना मुश्किल पड़ जाए, वह तो कहिये कि मैं आपका अड्डा जानता था इसलिए शिकारी बाज की तरह मैंने आपको घोंसले के अन्दर ही पकड़ा और अब यहाँ से जाकर एक ऐसे समुद्र के अन्दर डाल देना चाहता हूँ जिसके....

वह न-जाने क्या-क्या बकता पर दारोगा साहब ने उसका हाथ पकड़ लिया और एक तरफ निराले में ले जाकर धीरे-से बोले, ‘‘अपनी बकबक बन्द करो और जल्द बताओ कि क्या खबर देने आये हो। ‘रोहतासमठ के पुजारी’ का नाम तुमने क्यों लिया?

विचित्र मनुष्य : (जोर से हँसकर) हो-हो-हो-हो। क्या नब्ज पर हाथ रखा है, मैं जानता था कि ऐशमहल से बाहर निकालने के लिए आपको धतूरे की गोली ही देनी पड़ेगी नहीं तो....

दारोगा : बस-बस, बको मत और तुरन्त बताओ कि क्या मामला है? तुम नहीं जानते कि इस शब्द ने मुझको किस तरह घबरा दिया है।

वि० म० : अभी क्या, अभी तो आगे देखिये क्या होता है! जब आप मेरे मुँह से आगे की खबरें सुनेंगे उस वक्त अपनी घबराहट देखियेगा!!

दारोगा : खैर, तो कुछ सुनाओ भी तो सही, या खाली यों ही मेरा कलेजा जलाओगे! जो कुछ भी कहना हो कह डालो मगर जल्दी कहो!!

वि० म० : अच्छा, तो सुनो मैं कहता हूँ, मगर देखो जरा इस तिनके का सहारा लिए रहना, नहीं तो गिरोगे और चोट-चपेट खा जाओगे! लो, कान फटफटा-कर अच्छी तरह सुन लो कि तुम्हारा सोचा-विचारा और करा-धरा सब पड़ा रह गया और लोहगढ़ी के कैदी बाहर आ ही गये।

दारोगा : हैं, सो कैसे? और कौन-कौन?

वि० म० : सो भी सुन लो- जमना एक, सरस्वती दो, दयाराम तीन, इन्दुमति चार, प्रभाकरसिंह पांच, मालती छः, अहिल्ला सात, भुवनमोहिनी आठ, कामेश्वर नौ....

विचित्र मनुष्य अपनी लम्बी फिहरिस्त भी पूरी न कर पाया था कि दारोगा घबराकर लड़खड़ाता हुआ पीछे हटा। अगर दीवार का सहारा उसे न मिल जाता तो इसमें शक नहीं कि वह जरूर बदहवास होकर जमीन पर गिर जाता। बड़ी मुश्किल से कांपते हुए ये शब्द उसके मुँह से निकले-‘‘मालती, अहिल्या, भुवनमोहिनी....!!’’ मगर विचित्र मनुष्य पर दारोगा की इस बेचैनी का कोई भी असर न पड़ा! वह उसकी हालत देख खिलखिलाकर हँस पड़ा और बोला, ‘‘अभी एक नाम तो आपने सुना ही नहीं दारोगा साहब! उसे जब सुनियेगा तो आपके होशहवास और भी काफूर हो जाएंगे!!’’

दारोगा इस तरह उस आदमी की तरफ देखने लगा जिस तरह जाल में फंसी चिड़िया बहेलिये की तरफ देखती है, उसका चेहरा पीला पड़ गया था और तमाम बदन थर-थर कांप रहा था। उसमें बोलने की ताकत न रह गई थी और उसकी लड़खड़ाती हुई जुबान ने बड़ी मुश्किल से पूछा, ‘‘सो कौन?’’

विचित्र मनुष्य आगे बढ़ा और उसके कान के पास अपना मुँह ले जाकर बोला, ‘‘आपका दोस्त और लंगोटिया साथी- श्यामलाल!’’

जैसे मरता हुआ आदमी बिच्छू के डंक की चोट खाकर तड़प उठता है उस तरह लहर खाकर दारोगा ने कहा। ‘‘श्यामलाल! नहीं, नहीं, वह अब कहाँ। नहीं, तुम गलत कहते हो और झूठी खबरें सुनाकर मुझे परेशान करने की नीयत से ही ऐसे नाम मेरे आगे ले रहे हो!!’’

हँसकर उस आदमी ने कहा, ‘‘नहीं, ऐसा नहीं है दारोगा साहब मैं केवल आपको परेशान करने की नीयत से यह नहीं कह रहा हूँ बल्कि बहुत ठीक खबरें दे रहा हूँ। आप विश्वास रखिये कि आपके द्वारा हद दर्जे की तकलीफ भोगने और मौत से भी बढ़कर कष्ट उठाने के बाद भी श्यामलाल जीता बच गया और अब तिलिस्म के बाहर होकर आपकी अगवानी करने की तैयारी कर रहा है।’’

यद्यपि इतना सुन दारोगा का मुँह और भी सूख गया मगर न-जाने किस कारण से उसने फिर अपना सिर हिलाया और कहा, ‘‘नहीं, मैं इस बात को मान नहीं सकता।‘‘

विचित्र आदमी यह सुन जोर से हँसा और दारोगा के और पास होकर बोला, ‘‘मैं जानता था कि आपको जल्दी मेरी बात पर यकीन न होगा इसलिए मैं उसके जीते होने का सबूत भी अपने साथ लेता आया हूँ।’’

इतना कह उसने हाथ की डलिया रोशनी की तरफ उठाई और दारोगा को उसके अन्दर देखने को कहा। उसने अन्दर गुलाब के फूलों से दबी कोई एक चमकती हुई चीज थी जिस पर घबराये हुए दारोगा की डरती-डरती निगाहें पड़ीं मगर न-जाने वह क्या चीज थी कि उसे देखते ही दारोगा का तमाम बदन कांप उठा और उसके मुँह से बेतहाशा एक चीख की आवाज निकल पड़ी जिसके बाद ही वह बदहवास होकर जमीन पर गिर गया।

वह विचित्र मनुष्य दारोगा की हालत देख डरावने से ढंग से हँसा और तब अपने उस चंगेर को सावधानी से कपड़ों के अन्दर छिपाने के बाद घूमकर मस्तानी चाल से चलता हुआ फाटक की ओर बढ़ा। दूर से नागर, जैपाल तथा और कई नौकर-चाकर दारोगा और उस विचित्र मनुष्य की मुलाकात को ताज्जुब के साथ देख रहे थे और दारोगा की हालत देख वे लोग उस तरफ लपके मगर उस विचित्र मनुष्य को रोकने की हिम्मत किसी की न हुई और वह उसी तरह धीरे-धीरे कदम रखता हुआ फाटक तक पहुँच उसके बाहर निकल गया।

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