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भूतनाथ - खण्ड 7

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :290
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8366
आईएसबीएन :978-1-61301-024-2

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भूतनाथ - खण्ड 7 पुस्तक का ई-संस्करण

चौथा बयान


इन लोगों को वहाँ से गए मुश्किल से आधी घड़ी बीती होगी कि उसी बड़े कमरे के अन्दर से जहाँ अभी-अभी बैठे दारोगा, मनोरमा, गौहर और नन्हों बातें कर रहे थे, एक आदमी बाहर निकला और नहर के ऊपर वाले बरामदें में आकर टहलने लगा। हम नहीं कह सकते कि यह अब तक कहाँ छिपा हुआ था या इसने दारोगा वगैरह की बातें भी सुनीं या नहीं और न हम इसकी सूरत-शक्ल के बारे में ही कुछ कह सकते हैं क्योंकि एक काले लबादे से इसने अपने को इस तरह ढंका हुआ है कि इसके बदन का कोई भी भाग जाहिर नहीं हो रहा है।

इसे बाहर आये अभी कुछ ही सायत बीती होगी कि नाले के उस पार से किसी चिड़िया के बोलने की आवाज दो बार आई जिसे सुनते ही यह चौंक गया और जवाब में इसने भी विचित्र प्रकार का शब्द मुंह से निकाला, कुछ देर के लिए सन्नाटा हो गया और तब पैरों की आहट ने बताया कि कोई आदमी अजायबघर की सीढ़ियां चढ़कर इधर ही आ रहा है। आहट सुनते ही यह खुद भी उसी तरफ को बढ़ा, जिससे कोने में पड़ने वाली कोठरी में ही दोनों की भेंट हो गई। आने वाले ने धीरे से कहा, ‘चामूपति’ इस आदमी ने जवाब दिया- ‘छायापुत्र’ और तब दोनों एक-दूसरे के गले लग गये, मगर फिर तुरन्त ही अलग होकर उस पहले आदमी ने इस नये आने वाले का हाथ पकड़ लिया और कहा, ‘‘यहाँ हम लोग निश्चिन्ती से बातें न कर सकेंगे, मेरे साथ आओ,’’ वह पुनःउसी बीच वाले कमरे में गया जहाँ से अभी-अभी निकला था और उसके दक्खिन तरफ वाली एक अलमारी के पास जाकर उसका पल्ला खोला। यह अलमारी भीतर से किसी तरह के साजोसामान से बिल्कुल खाली थी और साथ ही इतनी लम्बी-चौड़ी भी थी कि तीन आदमी इसके भीतर बखूबी खड़े हो सकें। नये आने वाले को इसने अपने साथ अलमारी के भीतर ले लिया और तब पल्ला बन्द कर लिया। कोई खटका दबाते ही उस अलमारी की जमीन नीचे की तरफ जाने लगी, कुछ देर बाद नीचे उतरना बन्द हुआ और एक खटके की आवाज आई।अपने साथी का हाथ पकड़े वह पहला आदमी एक तरफ को हट गया और तब अन्दाज से मालूम हुआ कि इन्हें उतार लाने वाली चीज फिर ऊपर चली गई। इस आदमी ने अपने पास से सामान निकाल रोशनी की और अपना भारी लबादा उतारते हुए कहा, ‘‘यद्यपि इस जगह गर्मी है मगर यहाँ बैठकर हम लोग निश्चिन्ती से बातें कर सकेंगे,’’ जवाब में उस नये आने वाले ने भी अपना लबादा उतार नकाब जो मुंह पर पड़ी हुई थी उलट दी और अब हमने पहचाना कि यह आदमी तो भूतनाथ है और वह पहला आदमी उसका गुरुभाई शेरसिंह।

शेर० : बहुत दिनों के बाद तुमसे मुलाकात हुई! पर तुम अपने वायदे के सच्चे निकले, मैं तो समझता था कि शायद तुम न आओ!

भूत० : भला ऐसा भी कभी हो सकता है! मैं तो खुद आपसे मिलने के लिए व्याकुल था और इस बात की राह देख रहा था कि किसी तरह कम्बख्त दारोगा का दौरा यहाँ से हो जाए और आपसे भेंट हो। क्योंकि मुझे-बहुत-सी बातें आपसे दरियाफ्त करनी थीं।

शेर० : जब तुमने दारोगा को देखा तो शायद उन लोगों को भी देख लिया होगा जिनसे वह यहाँ बातें कर रहा था।

भूत० : हाँ, नन्हों, गौहर और मनोरमा तीनों को ही मैंने देखा, मगर यह न मालूम हो सका कि ये कम्बख्त यहाँ बैठे क्या बांध रहे थे।

शेर० : इसका कुछ हाल मैं तुम्हें बता सकूंगा, क्योंकि इसी इमारत में छिपा हुआ तुम्हारी ही तरह मैं भी उन लोगों के जाने की राह देख रहा था और उनकी बातें भी यद्यपि पूरी-पूरी तो नहीं मगर कुछ-कुछ मैंने सुनीं, पर उनका जिक्र पीछे होगा, पहले तुम अपना हाल कह सुनाओ कि तुमने क्या-क्या किया? लक्ष्मीदेवी का कुछ पता लगा?

भूत० : (अफसोस के साथ) नहीं, कुछ नहीं और न बलभद्रसिंह का ही कहीं पता लगा। मगर इसमें भी शक नहीं कि वे दोनों हैं इसी कम्बख्त दारोगा के ही कब्जे में और अभी तक जीते भी हैं!

शेर० : इसमें कोई शक नहीं, मगर मुझे जो सन्देह है और जिस लिए मैं इन दोनों का पता लगाने को व्याकुल हो रहा हूँ वह यही है कि अपना काम हो जाने पर दारोगा कहीं उन दोनों को मार न डाले, क्योंकि जब तक वे दोनों जीते रहेंगे मुन्दर का भेद प्रकट हो जाने का डर बना ही रहेगा।

भूत० : बेशक ऐसा ही है और इसीलिए तो मैं भी परेशान हो रहा हूँ मगर क्या बताऊं कुछ पता ही नहीं लगता! बेचारी सरयू मर ही गई और इन्दिरा भी मेरे कब्जे में आकर पुनः कहीं गायब हो गई। जो शायद आपने सुन ही लिया होगा।

शेर० : हाँ, तुम्हारे शागिर्द ने संक्षेप में यह हाल भी मुझसे कहा था, मगर मुझे ठीक-ठीक मालूम न हो पाया कि इन्दिरा कहाँ चली गई!

भूत० : मैं खुद इस बात को नहीं समझ सका। मालूम होता है कि मेरा ही कोई आदमी दगा दे गया। अपने उन शागिर्दों को जिनके सुपुर्द उस लड़की को कर गया था मैंने सख्त सजा भी दी पर उसका कोई नतीजा न निकला। बात यह हुई कि दारोगा के घर से इन्दिरा को छुड़ाकर मैं अपनी पिपलिया घाटी में रख गया था १ और उसके साथ उसकी धाय ‘अन्ना’ को छोड़ स्वयं सरयू का पता लगाने चला गया था। वहाँ दारोगा के घर पर ही सरयू के होने का हाल मायाप्रसाद की जुबानी सुन मुझे रुक जाना पड़ा। जब सरयू वाले मामले का बिल्कुल हेस-नेस हो गया अर्थात उसका देहान्त हो गया और उसके क्रियाकर्म से मैं खाली हुआ, तब कहीं जाकर मुझे इतनी फुरसत मिली कि किसी दूसरी तरफ अपना ध्यान दे सकूं। तब मैं अपनी घाटी की तरफ लौटा और वहाँ जाते ही सुना कि इन्दिरा गायब हो गई। (१. इन्दिरा को दूसरी बार दारोगा के कब्जे से निकालकर ले जाने तथा नकली सरयू की मृत्यु दारोगा के यहाँ देखने का पूरा-पूरा हाल चन्द्रकान्ता सन्तति में भूतनाथ खुद बयान कर चुका है। (देखिये चन्द्रकान्ता सन्तति इक्कीसवाँ भाग, दूसरा बयान।)

शेर० : (अफसोस के साथ) और फिर कहीं उसका पता न लगा?

भूत० : बिल्कुल नहीं! मैंने बहुत कुछ खोजा। बल्कि अब तक उसी फिराक में हूँ मगर कुछ भी पता न लगा और तब से मैं उस तरफ से बिल्कुल ही निराश हो गया जब से इन्द्रदेव की बातों ने मेरा दिल तोड़ दिया।

शेर० : सो क्या?

भूत० : सरयू की दाह-क्रिया कर मैं पूरे हाल-चाल की खबर देने खुद इन्द्रदेव के पास गया था। वे आजकल अपनी एक तिलिस्मी घाटी में रहते हैं जिसके अन्दर आने-जाने का रास्ता बहुत ही गुप्त है और सिवाय उनके खास-खास आदमियों के और कोई भी वहाँ आ-जा नहीं सकता। बड़ी मुश्किल से दिन-भर राह देखने के बाद शाम को कहीं जाकर उनके ऐयार छन्नूसिंह की मदद से इत्तिला हुई और मैं अन्दर पहुंच सका। इन्द्रदेव से जब भेंट हुई तो उनकी बातें और भी रूखी निकली।

सब बातों का कलंक उन्होंने मेरे ही माथे थोपना शुरू किया बल्कि यहाँ तक कह दिया कि सरयू और इन्दिरा की यह दुर्दशा भी मेरे सबब से हुई। मैंने कितना ही समझाया और कहा कि इन बातों में मेरा कसूर कुछ नहीं है, पर वे कुछ भी न माने और अन्त में यहाँ तक कह गए कि बेहतर यही था कि तुम जिस तरह दुनिया में मरे हुए मशहूर हो वैसे ही बने रहो और कहीं जंगल, पहाड़ों में रहकर

ही अपनी जान दे दो, अगर फिर दुनिया में प्रकट होगे तो पुनः अंधेर मचाना शुरू करोगे। वह बात सुनकर मेरा जी एकदम खट्टा हो गया और मैं उनसे यह कहकर कि ‘जब आपकी यही मर्जी है तो ठीक है, अब मैं अपना काला मुंह आपको कभी न दिखाऊंगा’, उनके पास से उठ आया।

शेर० : अफसोस, न-जाने उन्होंने ऐसा बर्ताव तुम्हारे साथ क्यों किया! मालूम होता हैं उन्हें किसी ने तुम्हारे बारे में उल्टी-सीधी खबरें पहुंचाई हैं।

भूत० : बेशक यही बात है, मुझे यह कार्रवाई दलीपशाह की मालूम होती है। वह आजकल मेरा दुश्मन बन बैठा है और सब तरफ मेरी बदनामी फैलाता फिरता है।

शेर० : नहीं-नहीं, तुम्हारा ख्याल बिल्कुल गलत है। दलीपशाह तो तुम्हारा दोस्त और रिश्तेदार है, वह ऐसा भला क्योंकर कर सकता है!!

आप सीधे-सादे आदमी हैं और उसके दिल का हाल नहीं जानते! कामेश्वर और भुवनमोहिनी का असली भेद जब से उसे मालूम हुआ है तब से वह मेरा दुश्मन हो गया है!

यह बात सुनकर शेरसिंह चौंक पड़े और भूतनाथ से कुछ पूछना ही चाहते थे कि न-जाने क्या समझकर चुप हो रहे और मन-ही-मन कुछ सोचने लगे। थोड़ी देर बाद उन्होंने कहा, ‘‘अच्छा, इन्द्रदेव से तुमने मुन्दर के बारे में कोई जिक्र किया था?’’

भूत० : नहीं, मैंने तो नहीं किया, पर खुद वे ही मुझसे बोले थे कि तुम्हारे सबब से बेचारी लक्ष्मीदेवी की जगह एक चुड़ैल जमानिया की रानी बन बैठी है।

शेर० : मगर वे इस बारे में कुछ कर रहे हैं या नहीं इसका कुछ पता चला?

भूत० : कुछ भी नहीं, मगर जहाँ तक मैं समझता हूँ जब तक लक्ष्मीदेवी का पता न लगा जायेगा वे इस बात को उभाड़ेंगे नहीं, क्योंकि बात-ही-बात में उन्होंने कहा कि मुन्दर का जादू गोपालसिंह पर ऐसा चल गया है कि इस मामले में हाथ देना अब व्यर्थ है, मगर उनका यह ख्याल केवल गलत ही नहीं बल्कि खतरनाक भी है क्योंकि मुन्दर अपना जाल फैलाती जा रही है और अगर उसका कोई इलाज न किया गया तो ताज्जुब नहीं कि बेचारे गोपालसिंह की जान पर आ बने!

शेर० : (चौंककर) सो क्या?

भूत० :जमानिया के रईस भरथसिंह को इस मामले में कुछ शक हो गया था। उनके पुराने नौकर हरदीन से मेरी मित्रता है, उसी के जोर देने पर मैं जाकर भरथसिंह से मिला था और उनसे मुन्दर और दारोगा की सब बातें कहीं थीं। उन्होंने यह हाल गोपालसिंह से कहा, मगर गोपालसिंह को उन पर कुछ भी विश्वास न हुआ, उल्टा उन्होंने सब बातें मुन्दर से कह डालीं, नतीजा यह निकला कि दारोगा और जैपाल भरथसिंह की भी जान के दुश्मन बन बैठे और कब उन्हें जहन्नुम में पहुंचा दें, कोई ठिकाना नहीं। (१. भरथसिंह का पूरा हाल चन्द्रकान्ता सन्तति में लिखा जा चुका है देखिये चन्द्रकान्ता सन्तति तेरहवाँ भाग नौवाँ बयान।)

शेर० : अफसोस! वह बेचारा सीधा-सादा आदमी, इन लोगों के हथकंडों से अपने को किसी तरह भी बचा न सकेगा! तब? तुमने इस बारे में कुछ किया?

भूत० : मैं कर ही क्या सकता हूँ। उन्हें होशियार अलबत्ता कर दिया है और दारोगा वगैरह की जिस नई कार्रवाई का पता लगता है वह हरदीन से कहता जाता हूँ! इसके सिवाय मेरे हाथ हई क्या है? क्योंकि मुझे भी बहुत बचकर चलना पड़ता है। अगर खुलेआम बाहर निकलकर कोई कार्रवाई करूं तो लोगों में आमतौर पर जो यह मशहूर है कि भूतनाथ मर गया, वह बात जाती रहे और फिर मैं कुछ भी करने लायक न रहूँ। मगर हाँ, इतना मैं आपसे भी कह देना चाहता हूँ कि गोपालसिंह की जान बहुत खतरे में है और अगर उनकी हिफाजत का पूरा प्रबन्ध न किया गया तो कम्बख्त दारोगा उन्हें ले बीतेगा फिर वह चाहे उन पर रहम भी कर जाए मगर शैतान की खाला मुन्दर जो उनके सिर बैठी हुई है, वह कभी उन्हें छोड़ने की नहीं। मैंने उड़ती खबर सुनी है कि उसने तिलिस्मी मामलों में भी हाथ डालना शुरू कर दिया है और जमानिया की सच्ची रानी बना चाहती है, कौन ठिकाना कि लालच उसकी आंखों पर पर्दा डाल दे और उसे स्वतन्त्रतापूर्वक जिन्दगी के ऐशोआराम का लुफ्त उठाने पर उतार लावें! आखिर वह बदकार, पाजी तो एक ही नम्बर की है।

शेर० : इसमें क्या शक है। खैर, मैं इस बारे में इन्द्रदेव से बातें करूंगा और अगर हो सका तो गोपालसिंह को भी होशियार करने की कोशिश करूंगा मगर तुम भी इस मामले में बेफिक्र न रहो अगर तुम चाहते हो कि पिछली बदनामी की कालिख को धो बहाओ, तो आजकल ईश्वर ने जो स्वतन्त्रता तुम्हें दे रखी है उसका पूरा फायदा तुम्हें उठाना होगा।

भूत० : जो कुछ मुझसे बन पड़ेगा मैं करने से कुछ बाकी न रखूंगा।

कुछ देर के लिए सन्नाटा हो गया जिसके बीच दोनों आदमी न-जाने क्या-क्या सोचते रहे, इसके बाद भूतनाथ ने कुछ हिचकिचाते हुए शेरसिंह से पूछा, ‘‘आपने मेरा काम कुछ किया?’’

शेर० : (चौंककर) तुम्हारा कौन-सा काम?

भूत० : वही कामेश्वर के बारे में! आपने कहा था कि पता लगाकर बतलायेंगे कि कहाँ गया या क्या कर रहा है।

शेर० : हाँ, ठीक है, उसका जिक्र तो मैं तुमसे करना ही भूल गया। मुझे उसका पता लगा और पूरी तरह से लगा, अब तुमको उससे डरने या घबराने की कोई भी जरूरत नहीं रह गई।

भूत० : (चौंककर) सो क्या?

शेर० : मैं उस आदमी से मिला और उससे अच्छी तरह बातें कीं पहले तो उसने बहुत कुछ कावा काटा पर अन्त में मुझे पता लग ही गया कि वह कामेश्वर नहीं बल्कि उसका भेष बनाये हुए राजा शिवदत्त का कोई ऐयार है जो तुम्हें धोखे में डालकर अपना कोई काम साधने की नीयत से आया था।

भूत० : अगर आपकी बात सही है तो इससे बढ़कर कोई खुशखबरी मेरे लिए नहीं हो सकती। मगर क्या मैं खुद उस आदमी से मिल नहीं सकता? बार-बार जिस तरह की बातें उसने मुझसे कहीं मुझे सहज में यह विश्वास नहीं हो सकता। अगर वह खुद कामेश्वर नहीं है तो कम-से-कम उसका कोई संगी-साथी तो जरूर ही है क्योंकि मेरे कई बहुत ही गुप्त नुकसान पहुंचाने वाले भेद उसे बहुत अच्छी तरह मालूम हैं।

शेर० : मैं खुशी से उसके साथ तुम्हारी मुलाकात भी करा देता क्योंकि वह मेरे कब्जे में आ गया था, पर अफसोस अब ऐसा होना सम्भव नहीं।

भूत० : सो क्यों?

शेर० : एक तिलिस्मी चक्कर में पड़कर वह तिलिस्म के अन्दर चला गया और वहीं बन्द हो गया। अब जीते-जी उसके बाहर आने की कोई उम्मीद नहीं और न अब कोई उससे भेंट ही कर सकता है।

भूत० : (खुश होकर) ऐसा! मगर क्या आप सही कह रहे हैं?

शेर० : मैं बिल्कुल सही कह रहा हूँ, क्या तुम समझते हो कि मैं झूठ बोलकर तुम्हें धोखा दूंगा और सो भी एक ऐसे मामले में!!

भूत० : नहीं, मैंने इस तात्पर्य से ऐसा कहा कि ऐसी खबर जो वास्तव में मेरे लिए बहुत बड़ी खुशखबरी है, सुनकर भी जल्दी उस पर विश्वास नहीं होता! खैर, तो अब मैं उस तरफ से अपने को निश्चिन्त समझ लूं?

शेर० : पूरी तरह से और हमेशा के लिए!

भूत० : बहुत अच्छी बात है। (कुछ रुककर) अच्छा, अब आप यह बताइये कि आपने आज यहाँ मुझे किसलिए बुलाया था?

शेरसिंह यह सुन भूतनाथ के कुछ पास खिसक आए और धीरे-धीरे कुछ बातें करने लगे। हम नहीं कह सकते कि वे बातें क्या या किस विषय पर थी। हाँ, इतना कह सकते हैं कि रात आधी से कुछ ज्यादा ही जा चुकी थी जब बातों का यह सिलसिला खत्म हुआ और दोनों आदमी उस इमारत के बाहर आये।

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