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भूतनाथ - खण्ड 5

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :277
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8364
आईएसबीएन :978-1-61301-022-8

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भूतनाथ - खण्ड 5 पुस्तक का ई-संस्करण

दसवाँ बयान


आज शुक्ल पक्ष की एकादशी है। रात आधी के करीब बीत चुकी है और चन्द्रदेव ने अपनी शीतल किरणों से जंगल, मैदान और पहाड़ों में एक अजीब सुहावना दृश्य पैदा कर रक्खा है जिसे घण्टों तक देखने पर भी मन नहीं भर सकता। अजायबघर के पास वाले जंगल के उस विचित्र कुएँ पर जिसमें पिछली एकादशी को भूतनाथ ने श्यामा के पीछे कूदकर एक विचित्र तमाशा देखा था आज एक पेड़ की आड़ में कई आदमी खड़े हैं जो बार-बार उस कुएँ की तरफ देखते और कुछ बातें करते जाते हैं। (१. देखिए भूतनाथ बारहवाँ भाग, अन्तिम बयान।)

रंग-ढंग और आकृति से उनका लक्ष्य वह औरत मालूम होती है जो अभी उस कुएँ के बाहर आई और जगत पर पैर लटका कर उदास भाव से बैठी गाल पर हाथ रक्खे सोच रही है।

पाठक इस औरत को पहिचानते हैं क्योंकि यह वही श्यामा है जिससे उस दिन भूतनाथ से भेंट हुई थी और जिसके पीछे-पीछे भूतनाथ ने अपने को कुएँ में डाल दिया था।

यह तो हम नहीं कह सकते कि वह औरत क्या सोच रही है पर यकायक एक घोड़े के टापों की आवाज ने उसे चैतन्य जरूर कर दिया और उसने गर्दन उठाकर सामने की तरफ देखा जिधर से किसी सवार के आने की आहट मिल रही थी। थोड़ी देर में वह सवार भी उसी जगह आ पहुँचा और घोड़े से कूद लगाम एक डाल से लटकाने के बाद कुएँ के ऊपर पहुँचा।

श्यामा उस समय न जाने किस तकलीफ के कारण आँखें बन्द किए हुए धीरे-धीरे उसांसें और आहें ले रही थी। किसी के कूएँ पर आने की आहट पाकर उसने आँखें खोलीं और भूतनाथ को अपने सामने खड़ा देख एक हलकी चीख मारकर उसकी तरफ हाथ बढ़ाया। भूतनाथ भी उसे देख उसकी तरफ झपटा और दोनों एक-दूसरे के हाथों में गुथ गये। श्यामा ने भूतनाथ से बहुत ही प्रेम दिखाया और भूतनाथ ने भी कोई कसर बाकी न रक्खी।

थोड़ी देर बाद दोनों प्रेमी अलग हुए और तब श्यामा ने भूतनाथ के हाथ को प्रेम के साथ दबाते हुए पूछा, ‘‘तुमने आने में कुछ देर कर दी।’’

भूत० : हाँ, मैं बहुत दूर से आ रहा हूँ, देखो मेरे घोड़े की हालत क्या हो रही है, और अभी मुझे बहुत लम्बा सफर करना बाकी है।

श्यामा : (गौर से देख कर) ओह! तुम तो एकदम पसीने से लथपथ हो रहे हो! जरूर बहुत दूर से आ रहे हो। ठहरों मैं कपड़े उतार कर हवा कर देती हूँ। पहिले ठंडे होओ और सुस्ताओ, तब कहीं जाने का नाम लेना।

इतना कह उस औरत ने कूएँ की तरफ मुँह करके कहा, ‘‘कूपदेव, एक पंखा तो देना!’’ आवाज के साथ ही कूएँ के अन्दर से एक हाथ निकला जिसकी उँगलियों में एक नाजुक सुनहरी डण्डी की पंखी थी। श्यामा ने पंखी उस हाथ से ले ली और तब कहा, ‘‘ठंडा पानी भी लाना।’’ हाथ नीचे चला गया और थोड़ी ही देर बाद जब पुन: ऊपर आया तो उस पर चाँदी का कटोरा साफ ठण्डे पानी से भरा रक्खा नजर आया।

भूतनाथ ताज्जुब के साथ वह विचित्र हाल देख रहा था। जिस समय श्यामा ने उस हाथ से कटोरा लेकर भूतनाथ की तरफ बढ़ाया तो उसने कटोरा ले लिया और ताज्जुब के साथ कहा, ‘‘बड़ा विचित्र कूँआ है।’’

भूतनाथ की बात सुन श्यामा ने अफसोस के साथ एक लम्बी साँस खींची और कहा, ‘‘हाँ, दूसरों की निगाह में यह विचित्र, अद्भुत्, मनोरंजक सभी कुछ है, मगर मेरे लिए तो एक खौफनाक कैदखाना है। महीने भर में केवल एक आज की रात को कुछ देर के लिए यह मेरे हुक्म में है, नहीं तो बराबर मैं ही इसके पंजे में रहती हूँ। खैर मेरे दोस्त, तुम मेरी फिक्र छोड़ो, कपड़े उतारो और ठण्डे होओ।’’

भूतनाथ के इनकार करने पर भी श्यामा ने उसके कपड़े उतार कर अलग कर दिये, ‘ठण्डा पानी पीने को दिया और पंखा झलने लगी। दोनों में बातचीत भी होने लगी।

भूत० : क्या आज भी तुम हर रोज की तरह कैदी ही हो?

श्यामा : (अफसोस के साथ) क्यों इसमें भी कोई सन्देह है?

भूत० : मगर मेरी समझ में नहीं आता कि कूँआ क्योंकर तुम पर कब्जा रख सकता है जबकि मैं तुम्हें हर तरह से स्वतंत्र देख रहा हूँ?

श्यामा : मालूम होता है कि आप उस दिन की बात भूल गये जब उस बेरहम पंजे ने जबर्दस्ती मुझे खींचा था और आपका खंजर उस पर लग कर टूट गया था!

भूत० : हाँ ठीक है, बेशक यह एक विचित्र कूँआ है, मगर तुम इसके फंदे में पड़ क्योंकर गईं?

श्यामा : जाने दो मेरे दोस्त! एक औरत का हाल जानने के लिए इतनी उत्कंठा तुम्हें क्यों है? जब तुम उसे मुसीबत में बल्कि मौत के पंजे से छुड़ाने के लिए अपनी उँगली भी हिलाना पसन्द नहीं करते तब बेकार इस तरह के सवाल करने से सिवाय तकलीफ बढ़ने के और क्या हो सकता है?

भूत० : नहीं नहीं श्यामा, यहाँ तुम्हारा बहुत गलत ख्याल है। मैं तुम्हारे लिए सब कुछ करने को तैयार हूँ, यहाँ तक कि तुम्हारे ही छुड़ाने का प्रबन्ध करने के लिए मैं अपने सबसे बड़े दुश्मन दारोगा के पास जाने को तैयार...

श्यामा : (खुश होकर) हाँ, तुम दारोगा साहब के पास जाने को तैयार हो? वे अगर चाहे तो मुझे सहज ही में इस मुसीबत से छुड़ा सकते हैं और अगर वे तुम्हारी मदद करें तो तुम बहुत ही सहज में यहाँ का तिलिस्म तोड़कर मुझे रिहाई दे सकते हो।

भूत० : यह तो उन्होंने नहीं कहा पर यह जरूर कहा कि मेरे पास एक छोटी किताब है जिसमें इस जगह का कुछ हाल लिखा हुआ है। यह किताब पढ़कर अगर कुछ काम चल जाय तो ठीक ही हैं नहीं तो बिना राजा गोपालसिंह की मदद के कुछ नहीं हो सकता।

श्यामा : (काँप कर) गोपालसिंह! अरे वह तो बड़े ही दुष्ट हैं, उसी ने तो.... खैर, वह किताब तुम्हें देने का वादा दारोगा साहब ने किया है?

भूत० : केवल वादा ही नहीं किया बल्कि किताब मुझे दे भी दी है।

इतना कह भूतनाथ ने अपना बटुआ उठा लिया जो सामने रक्खा हुआ था और उसमें से रेशमी कपड़े में लपेटी हुई एक छोटी किताब निकालकर श्यामा के हाथ पर रख दी। उस किताब को देखते ही श्यामा ने खुश होकर भूतनाथ के गले में हाथ डाल दिया और कहा, ‘‘बस मेरे दोस्त! इसी किताब की मुझे जरूरत थी। इसकी मदद से तुम अगर चाहो तो बहुत जल्द मुझे छुड़ा सकोगे। (कूएँ की तरफ देख कर) यह जालिम कैदखाना अब मुझे ज्यादा दिनों तक तकलीफ न दे सकेगा।’’

मानों इस बात के जवाब ही में कूएँ के अन्दर से शंख बजने की आवाज आई जिसे सुनते ही श्यामा काँप उठी। उसने फुरती से वह किताब भूतनाथ के हवाले कर दी और कहा, ‘‘मुझे अपने कैदखाने में जाने का हुक्म हो गया-अब मैं बाहर नहीं रह सकती। तुम यह किताब लो, इसमें इस जगह का सब हाल लिखा है। जब तुम्हें फुरसत हो या जब तुम्हें इस बेकस की याद आवे तो इसी जगह आना, यह किताब तुम्हें रास्ता बतायेगी।’’

इतना कह श्यामा उठने लगी मगर भूतनाथ ने हाथ पकड़ कर उसे रोका और कहा, ‘‘ठहरो और मेरी दो बातें सुनकर जाओ।’’

श्यामा : (बैठ कर) कहो, मगर जल्दी कहो।

भूत० : अगर मैं तुम्हें छुड़ाना चाहूँ तो मुझे क्या करना होगा?

श्यामा : इस किताब को दो-तीन बार पढ़ जाने से तुम्हें स्वयं सब हाल मालूम हो जाएगा।

भूत० : खैर, मगर मैं चाहता हूँ कि पहिले तुम्हारा हाल सुन लूँ।

श्यामा : क्यों? (कुछ चुप रह कर) अच्छा ठीक है, मैं समझ गई! तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं, तुम शायद समझ रहे हो कि मैं कोई चालाक औरत या ऐयार हूँ और तुम्हें धोखे में डाल कर अपना कोई काम निकालना चाहती हूँ! अच्छी बात है मेरे दोस्त, तुम चाहे मुझे जो कुछ समझो पर सिर्फ कभी-कभी याद करते रहो यही मेरी प्रार्थना है, बस और मैं कुछ भी नहीं चाहती।

भूत० : नहीं, मेरा मतलब यह नहीं है, मैं तो...

श्यामा : बस-बस अब झूठी बातें न करो! जो तुम्हारे दिल में था मैं समझ गई। अब तुम्हें कुछ भी तकलीफ करने की जरूरत नहीं-- तुम्हें मुनासिब है कि यह किताब जिससे लाए हो उसी को वापस कर दो और बेफिक्री के साथ नागर और मनोरमा की सोहबत का मजा उठाते हुए आराम की जिन्दगी बसर करो। फजूल एक बे-जान-पहिचान की अजनबी औरत के लिए कष्ट क्यों उठाओगे! मैं जाती हूँ मगर तुम्हारी बेवफाई की याद अपने दिल में लिए जाती हूँ।

इतना कह श्यामा उठ खड़ी हुई और कूएँ की तरफ लपकी पर भूतनाथ ने पुन: उसे रोका और कहा, ‘‘तुम फजूल मुझे ऐब लगा रही हो। मैं जरूर तुम्हारी मदद करूँगा और तुम्हें इस तिलिस्म से छुड़ाऊँगा! तुम ही जरा सोचो कि अगर मुझे तुम्हें छुड़ाना मंजूर न होता तो क्यों तुम्हारे लिए ऐसे आदमी की मदद चाहता जिसका मुँह देखना भी मंजूर न था! अफसोस की बात है कि तुम बिना मेरा मतलब समझे ही गुस्से में आ रही हो और मुझ पर झूठा इलजाम लगा रही हो!’’

श्यामा : (ठंडी होकर) माफ करो, मुझसे भूल हुई, तुम बेशक मेरे खैरखाह हो इसमें शक नहीं है। मैं अपना सब हाल तुम्हें सुनाऊँगी मगर इस वक्त नहीं-- जब तुम मुझे स्वतंत्र कर दोगे तब, इस समय मौका नहीं है।

भूत० : मैं तो किस दिन आऊँ?

श्यामा : जब तुम्हारी इच्छा हो आ सकते हो, पर आना अकेले आना और अपने हाथ कोई हर्बा जरूर लाना।

भूत० : मैं तो आज ही चलता पर इस समय बहुत ही जरूरी काम से कहीं जा रहा हूँ। रुकने से बहुत हर्ज होगा, इसलिए आज से एक सप्ताह के...

इसी समय कूएँ के अन्दर से पुन: शंख बजने की आवाज आई जिसे सुनते श्यामा उठ खड़ी हुई और यह कहती हुई कि ‘मैं जाती हूँ’ कूएँ के पास जाकर उसमें कूद पड़ी।

भूतनाथ कुछ देर तक वहाँ बैठा न जाने क्या-क्या सोचता रहा। इसके बाद वह उठा और कूएँ के पास जाकर अन्दर की तरफ झाँकने लगा परन्तु उसी समय उसे अपने पीछे की कुछ आहट मालूम पड़ी और जब उसने घूम कर देखा तो पाँच आदमियों को एक-एक करके सीढ़ी की राह उस कूएँ की जगत पर चढ़ते हुए पाया। ये पाँचों ही हाथ-पाँव से बहुत मजबूत कद्दावर और हर्बो से अच्छी तरह लैस थे। भूतनाथ उन्हें देख कर यद्यपि डरा तो नहीं पर कुछ चौकन्ना अवश्य हुआ और कूएँ के पास से एक ओर हट कर बड़े गौर से उन आदमियों की तरफ देखने लगा।

हम नहीं कह सकते कि ये नये आने वाले पाँचों आदमी वे ही थे या कोई दूसरे जो पहिले जंगल में दिखाई पड़े थे और न यही कह सकते हैं कि उनकी सूरत-शक्ल कैसी थी क्योंकि इन सबों ही ने अपनी-अपनी सूरत को नकाब के अन्दर ढाँक रखा था। भूतनाथ को सन्देह था कि ये लोग उसे छेड़ेंगे या उससे कुछ बातचीत करेंगे पर उन्होंने भूतनाथ की तरफ निगाह उठाकर भी न देखा और सब के सब उसी कूएँ के पास हो कर नीचे की तरफ झाँकने और आपस में कुछ बातें करने लगे।

इस नीयत से कि शायद बातचीत से उन्हें पहिचान सके या इन लोगों के यहाँ आने का कारण जान सके, भूतनाथ बड़े गौर से इन सभों की बातें सुनने लगा, पर उसकी समझ में कुछ भी न आया क्योंकि वे लोग जिस विचित्र भाषा में बोल रहे थे उसका एक शब्द भी भूतनाथ समझ न सकता था।

थोड़ी देर बाद यकायक कूएँ के अन्दर से शंख की आवाज आई जिसे सुनते ही वे सब चौकन्ने हो गये। उनमें से एक ने जो सरदार मालूम होता था अपने एक साथी की तरफ इशारा करके कुछ कहा जिसे सुनते ही उसने सलाम किया और कूएँ से नीचे उतर किसी तरफ को रवाना हो गया। थोड़ी ही देर बाद भूतनाथ ने उसे एक बड़ी गठरी पीठ पर लादे वापस आते देखा जिसके विषय में उसकी चालाक निगाहों ने तुरन्त बता दिया कि इसमें कोई आदमी या औरत बँधी है।

दो आदमियों ने वह गठरी उसकी पीठ पर से उतारी और कूएँ के पास ले आये। सरदार ने कूएँ से झाँका और अपनी विचित्र भाषा में कुछ कहा जिसके जवाब में भीतर से पुन: शंख की आवाज आई, आवाज सुनते ही उन दोनों ने यह गठरी उसी तरह बँधी-बँधाई कूएँ में फेंक दी और उसके बाद सबके सब कूएँ से उतर कर जिधर से आये थे उधर ही को चल पड़े। जाती समय भी भूतनाथ की तरफ किसी ने आँख उठाकर न देखा।

ताज्जुब के साथ भूतनाथ यह सब हाल देख रहा था। वे आदमी कौन थे, गठरी में कौन बँधा था, यह कूँआ कैसा है? आदि बातें वह बहुत देर तक सोचता रहा। अन्त को उसका मन न माना, उसने अपने बटुए में से सामान निकाल कर रोशनी की और उसकी मदद से वह किताब जिसे दारोगा से पाया था खोल कर पढ़ने लगा।

उलट-पुलट कर जल्दी-जल्दी कई जगह से पढ़ा और तब रोशनी बुझा बटुए में रख तथा उस किताब को कमर में बाँध कमन्द हाथ में ली तब एक निगाह चारों तरफ देख और सन्नाटा पा कूएँ के पास पहुँचा। कमन्द का एक सिरा पत्थर के खम्भे के साथ बाँध दिया और दूसरा कूएँ में लटका दिया, कुछ देर तक खड़ा सोचता रहा और तब कमन्द के सहारे कूएँ में उतर गया।

भूतनाथ के जाने के कुछ ही देर बाद न जाने कहाँ से वे पाँचों आदमी पुन: उसी जगह आ मौजूद हुए। सरदार ने झाँककर कूएँ के अन्दर देखा, कुछ हलकी-हलकी आवाज आ रही थी जिस पर गौर किया और तब अपने आदमियों से कुछ बातें कीं, इसके बाद एक-एक करके वे चारों उसी कमन्द के सहारे कूएँ के अन्दर उतर गये, केवल वह सरदार बाहर रह गया जिसने कमन्द को खम्भे से खोल लिया और कमर में लपेट लेने के बाद हँसकर कहा, ‘‘वह मारा! ये बचाजी कहाँ जा सकते हैं। इनकी सब ऐयारी ताक पर रह जायगी और हम लोग अपना काम कर गुजरेंगे।’’ इतना कह वह फिर जोर से हँसा और तब स्वयं भी उसी कूएँ में कूद पड़ा।

।। तेरहवाँ भाग समाप्त ।।

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