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भूतनाथ - खण्ड 4

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :300
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8363
आईएसबीएन :978-1-61301-021-1

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भूतनाथ - खण्ड 4 पुस्तक का ई-संस्करण

दसवाँ बयान


सांवलसिंह को बिदा करने के बाद गौहर एक साफ जगह बैठ गई और गिल्लन के साथ धीरे-धीरे बातें करने लगी।

गौहर : रामदेई से मिलने पर मुझे एक ऐसी बात मालूम हुई जिसे तुम सुनोगी तो ताज्जुब करोगी।

गिल्लन : वह क्या?

गौहर : मगर इस बात को खूब छिपाये रखना।

गिल्लन : मुझसे ज्यादा छिपाकर तुम भी रख न सकोगी, मगर कुछ कहो भी तो!

गौहर : रामदेई अपने शौहर को नहीं पहिचानती!

गिल्लन : क्या कहा! रामदेई गदाधरसिंह को नहीं जानती।

गौहर : हाँ।

गिल्लन : भला यह भी कोई बात है, जिसके संग बराबर रहना उसे जानेगी नहीं!

गौहर : बेशक मैं जो कुछ कहती हूँ बहुत ठीक कह रही हूँ। बात यह है कि रामदेई समझती है कि उसका गदाधरसिंह वास्तव में रघुबरसिंह है।

गिल्लन : रघुबरसिंह कौन? वही तो नहीं जिसे लोग जैपालसिंह कहकर पुकारते हैं और जो जमानिया के दारोगा साहब का बड़ा दोस्त है?

गौहर : हाँ-हाँ वही, यह बड़ी दिल्लगी की बात हुई है। वास्तव में हुआ यह कि इस रामदेई को वह रघुबरसिंह इसके घर से फुसला कर निकाल ले भागा।

इस बीच ही में गदाधरसिंह उसकी सूरत बनकर या न जाने किस तरह से उसे उड़ा ले गया और तब से उसी के पास है। रघुबरसिंह समझता है कि उसकी रामदेई मर गई और रामदेई समझती है कि यह गदाधरसिंह ही उसका रघुबरसिंह है और किसी सबब से अपना नाम-भेष बदलकर गदाधरसिंह बना हुआ है!

गौहर : तुम्हें विश्वास करना पड़ेगा, जो कुछ मैं कह चुकी उसमें रत्ती भर भी गलती नहीं और इसके सबूत में मैं खास गदाधरसिंह के हाथ की चीठी तुम्हें दिखा सकती हूँ।

इतना कह गौहर ने अपनी चोली में छिपी हुई एक चीठी निकाली और गिल्लन के हाथ में देकर बोली, ‘‘लो इसे पढ़ो।’’

गिल्लन ने वह चीठी पढ़ी, यह लिखा हुआ था :-

‘‘मेरे प्यारे दोस्त,

तुम्हारी कारीगरी काम कर गई। रामदेई को मैं उड़ा लाया और कम्बख्त रघुबर को रत्तीभर शक न हुआ। मगर अब इतनी मदद तुम्हें करनी चाहिए कि कोई ऐसी कार्रवाई हो जाय जिसमें वह अपनी रामदेई को मरा हुआ समझकर निश्चिन्त हो जाय, नहीं तो कभी न कभी शिकार के निकल जाने का डर बना ही रहेगा।

तुम्हारा वही--गदाधर

गिल्लन ने बड़े गौर से दो-तीन दफे उस चीठी को पढ़ा और तब कहा, ‘‘बेशक, यह लिखी हुई तो गदाधरसिंह ही के हाथ की है।’’

गौहर : क्यों, अब तो तुम्हें मेरी बातों पर विश्वास हुआ?

गिल्लन : बेशक, इससे बढ़ कर सबूत क्या मिल सकता है, मगर यह चीठी तुम्हारे हाथ क्योंकर लगी?

गौहर : सो मैं अभी तुम्हें न बताऊँगी।

गिल्लन: क्यों सो क्यों, क्या मैं तुम्हें धोखा दूँगी

गौहर : नहीं सो बात नहीं है, अच्छा सुनो।

गौहर ने झुककर गिल्लन के कान में कहा, जिसके सुनते ही वह चमक उठी और बोली, ‘‘ओफ ओह, यहाँ तक मामला बढ़ चुका है? मगर उसने तुम्हें यह चीठी दे दी क्योंकर?’’

गौहर : क्योंकि यह मेरे मतलब की है और इससे मैं गदाधरसिंह को अपने कब्जे में कर सकती हूँ।

गिल्लन : सो तो जरूर कर सकती हो, मगर मेरे सवाल का मतलब यह है कि यह उसने दे दी क्योंकर! ऐसा सबूत जल्दी कोई अपने हाथ से निकालता नहीं।

गौहर : बस दे ही तो दी, समझ जाओ कैसे!

गिल्लन : (पुन: उस चीठी को पढ़कर) मगर अब तुम इस चीठी को क्या करोगी?

गौहर : इससे एक बहुत बड़ा काम निकलेगा, मगर अभी तो इसे कुछ दिन तक अपने पास रक्खूँगी फिर जो कुछ होगा देखा जायगा।

गिल्लन : यह चीठी अगर जैपालसिंह को दिखा दो तो गजब हो जाय।

गौहर : (हँसकर) भला इसमें कोई शक है! और सिर्फ यही नहीं, अभी देखो तो मैं क्या-क्या करती हूँ! अभी तो श्रीगणेश ही है, मगर...

गिल्लन : मगर क्या?

गौहर : मुझे फिर भी डर बना रहेगा कि कहीं पुन: भूतनाथ के कब्जे में न पड़ जाऊँ। वह कम्बख्त बड़ा ही शैतान है।

गिल्लन : अगर ऐसा ही है तो तुम अपने घर ही क्यों नहीं लौट चलतीं?

गौहर : घर जाकर क्या करूँगी?

गिल्लन : आखिर कब तक इस तरह जंगल-जंगल मारी फिरोगी।

गौहर : जब तक मेरी मर्जी चाहेगी।

गिल्लन : तुम्हारे माँ-बाप क्या कहेंगे?

गौहर : मेरे पिता कुछ न कहेंगे!

गिल्लन : और तुम्हारी माँ?

गौहर : उसकी मुझे फिक्र ही क्या है? वह मेरा कर ही क्या सकती है!

गिल्लन : ऐसा न हो, वे तुम्हें बहुत प्यार करती हैं, मुझे उन्हीं के सबब से आना पड़ा है!

गौहर : बस रहने दीजिये, जैसा प्यार करती हैं वह मैं बखूबी जानती हूँ।

गिल्लन : नहीं सो बात तुम नहीं कर सकतीं। मैं खूब जानती हूँ कि उनका प्यार तुम पर सच्चा और उनकी आज्ञा तुम्हारे ही फायदे के लिए है, फिर भी...

गौहर : (बात काटकर) सांवलसिंह का पुछल्ला तो मेरे पीछे लगा ही दिया था, अब तुम्हें भी भेज दिया कि मैं और भी बेबस हो जाऊँ और कुछ करने-धरने लायक न रहूँ! मैं समझती हूँ कि तुम्हें उसने यह जरूर कहा होगा कि जिस तरह हो समझा-बुझाकर मुझे घर लौटा ले आना।

गिल्लन : (गम्भीरता से) हाँ यह उन्होंने जरूर कहा है और मैं समझती हूँ कि तुम्हारे लिए यही करना मुनासिब है। क्या इसमें कोई हर्ज है? तुम यह तो देखो कि वह तुम्हें चाहती कितना हैं।

गौहर : कितना चाहती हैं वह मैं जानती हूँ।

गिल्लन : नहीं-नहीं, ऐसा न कहो!

गौहर : क्यों न कहूँ, अब भी मुझे क्या सांवलसिंह का डर बना हुआ है कि जाकर चुगली खा देगा? मैं कम्बख्त को जरा भी नहीं चाहती।

गिल्लन : वे तुम्हारी माँ हैं, कम से कम तुम्हें उनकी इज्जत तो करनी ही चाहिए।

गौहर : मगर सौतेली ही माँ तो!

गिल्लन : फिर भी क्या हुआ, माँ ही तो कही जायँगी?

गौहर : मुझे पैदा करने और प्यार करने वाली माँ मर गई, अब कोई दुनिया में मुझे चाहने वाला नहीं है! खैर इन सब बातों को जाने दो, इस समय तो मैं स्वतंत्र हूँ, न मां के कब्जे में हूँ न बाप के, जो चाहूँगी करूँगी। तुम अगर चाहो तो मेरे साथ रहो और नहीं तो लौट जाओ और अपनी मालकिन से कह दो कि तुम्हारी लड़की नहीं आती।

गिल्लन : वाह, अब तो तुम मुझसे भी बिगड़ खड़ी हुई? मैं क्या भला तुम्हारा साथ छोड़ सकती हूँ?

गौहर : फिर इस तरह की बातें मुझसे न करो।

गिल्लन : अच्छा न करूँगी। मगर कुछ बताओ भी तो सही कि तुमने क्या करने का इरादा किया है? कम से कम तुम उस बात का तो खयाल रक्खो जो अपने पिता से कर आई हो, उन्होंने तुम्हारे सुपुर्द जो काम किया है उसे तो पहिले करो।

गौहर : वही बलभद्रसिंह वाली चीठी तो? मैं आज ही वह चीठी बलभद्रसिंह के पास पहुँचाने का उद्योग करूँगी क्योंकि मुझे पता लगा है कि वह आजकल जमानिया ही में है।

गिल्लन : हाँ मुझे भी यही पता लगा है। खैर वह चीठी तो तुम्हारे पास मौजूद है न?

गौहर : हाँ-हाँ, यह देखो!

यह कह गौहर ने अपने कपड़ों के अंदर हाथ डाला और साथ ही चौंक कर बोली, ‘‘हैं, वह चीठी क्या हुई? इसी जगह तो छिपाई हुई थी!’’

गौहर घबड़ा गई और उस चीठी को तलाश करने लगी जो उसके बाप ने बलभद्रसिंह के हाथ में देने के लिए सुपुर्द की थी। पर तमाम जगह खोज डालने पर भी उसे वह चीठी कहीं न मिली और उसने बेचैनी के साथ कहा, ‘‘बेशक मेरी बेहोशी की हालत में वह चीठी गदाधरसिंह ने निकाल ली। अब क्या होगा?

गिल्लन : यह तो बड़ा बुरा हुआ!

गौहर : बेशक बड़ा बुरा हुआ, उस चीठी में कुछ बहुत ही गुप्त बात लिखी हुई थी क्योंकि मेरे बाप ने मुझे देते समय उसे बहुत हिफाजत से रखने के लिए बार-बार कहा था। अब तो मुझे मालूम होता है कि जरूर उसी चीठी के लिए भूतनाथ ने मुझे गिरफ्तार किया था।

गिल्लन : हाँ, मैं भी ऐसा ही सोचती हूँ और जरूर उसी ने वह चीठी निकाली है, मगर रामदेई वाली चीठी तो...

गौहर : उसे मैंने बहुत छिपाकर रक्खा हुआ था शायद इसी से उसके हाथ न लगी। मगर अफसोस, अगर मैं जानती तो इस चीठी को भी ज्यादा हिफाजत से रख सकती थी, पर मुझे यह गुमान कब था कि इस तरह पर गदाधरसिंह के कब्जे में पड़ जाऊँगी!

गिल्लन : खैर अब अफसोस करना तो बिलकुल फ़िजूल है, मेरी समझ में तो, चीठी नहीं है भी तो एक बार बलभद्रसिंह से मिलो और उससे सब हाल कहो।

गौहर : हाँ जरूर ऐसा ही करना पड़ेगा, साँवलसिंह लौटे तो अब चलना चाहिए।

गिल्लन : लो वह भी आ पहुँचा।

वास्तव में साँवलसिंह इन्हीं लोगों की तरफ चला आ रहा था। उसे देख ये दोनों उठ खडी हुईं और जब वह वापस पहुँचा तो गौहर ने पूछा, ‘‘कहो क्या कर आये?’’

साँवल : उन दोनों में से सिर्फ एक को मैं पहिचान सका।

गौहर : वह मर्द कौन था?

साँवल० : वे प्रभाकरसिंह थे पर उनके साथ की औरत को मैं बिलकुल जानता न था। वे दोनों बात करते हुए जा रहे थे, कुछ दूर जाने के बाद घोड़े तेज कर निकल गये, लाचार मैं भी लौट आया।

इन तीनों में कुछ देर बातें होती रहीं और तब पुन: ये लोग उधर ही को रवाना हुए जिधर जा रहे थे।

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