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भूतनाथ - खण्ड 3

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :300
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8362
आईएसबीएन :978-1-61301-020-4

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भूतनाथ - खण्ड 3 पुस्तक का ई-संस्करण

आठवाँ बयान


मिर्जापुर में भूतनाथ के रहने के लिए जो मकान उसके मालिक रणधीरसिंह ने दिया है वह बहुत ही सुन्दर तथा आलीशान है। मकान के पिछवाड़े की तरफ एक छोटा-सा नजरबाग भी है जो पहले तो बहुत ही गुंजान, सुहावना और हरा-भरा रहा करता था मगर आजकल भूतनाथ का आना-जाना तथा रहना कम होने के कारण बहुत अच्छी हालत में नहीं है। इस नजरबाग के बीचोबीच में एक छोटा-सा दोमंजिला कमरा (या बंगला) है जिसमें आज रात के समय हम भूतनाथ और उसकी स्त्री शांता को बैठे देख रहे हैं। बहुत दिनों के बिछुड़े हुए प्रेमियों में जिस प्रकार की बातें हुआ करती हैं उसी तरह की प्रेम-मुहब्बत तथा उलाहना की बातें दोनों में हो रही हैं।

कुछ देर बाद यकायक शांता ने कुछ मुस्कुरा कर कहा, ‘‘मगर मैंने तो सुना है कि काशी में जाकर आप एक और भी बड़े तरद्दुद में पड़ गए थे?’’

भूत० : (आश्चर्य से) सो क्या!

शान्ता : मुझे पता लगा है कि वहाँ रामदेई नाम की कोई औरत बेतरह आपके पीछे पड़ी हुई है और आप उससे इतना घबड़ा गए हैं कि वह जगह छोड़ मेरे पास आने की हिम्मत नहीं कर सकते।

भूत० : (मुस्कुराकर) जरूर तुमसे यह बात रामेश्वर ने कही होगी।

भूतनाथ के इस जवाब ने बातचीत का ढंग बदल दिया और शांता ने पूछा, ‘‘मगर यह आपने अभी तक नहीं बताया कि अपनी जगह पर आपने रामेश्वरचन्द्र को यहाँ क्यों भेज दिया है और सो भी अपनी ही सूरत में! मैंने उससे बहुत पूछा पर कोई ठीक-ठीक जवीब नहीं मिला।’’

भूत० : इसका सबब यही है कि मैं कुछ दिन अभी और बाहर रहूँगा।

शान्ता : तो क्या अभी आपका काम समाप्त नहीं हुआ? पिछली दफे जब आप आए थे तो आपने कहा था कि सब काम निपट गया और अब मैं मिर्जापुर के बाहर न जाऊँगा, इस बात के न-जाने कितने दिनों बाद आज आपके दर्शन हुए हैं और अब फिर आप कहते हैं कि मैं कुछ दिन बाहर रहूँगा। आखिर कोई कारण भी तो मालूम हो कि आपको घर छोड़ने की इतनी क्या जरूरत पड़ रही है कि आप महीने-दो महीने भी टिककर यहाँ नहीं रह सकते?

भूत० : यह कुछ दयाराम वाला मामला है!

दया राम का नाम सुन शांता की आँखें भर आई और उसने अपने को सम्हाल कर कहा, ‘‘मरे हुए आदमी का क्या मामला बच गया? जब राजसिंह ने उन्हें मार ही डाला तो अब इस झगड़े को उठाने की जरूरत ही क्या रह गई? क्या रणधीरसिंह ने कुछ कहा है?’’

भूत० : नहीं वे बेचारे तो कुछ भी नहीं बोलते, दयाराम के मरने के बाद से एकदम उदासीन हो गए और इस बात का जिक्र छिड़ने पर दु:ख के साथ मुँह फेर कर कह देते हैं कि अब इस विषय को जाने दो, पर मेरा ही जी नहीं मानता और मैं अभी तक उनके शत्रुओं के पीछे पड़ा हुआ हूँ। इसके साथ ही वे सब भी मेरे पीछे पड़े हुए हैं कि मुझे दम मारने की फुरसत नहीं देते खैर कोई हर्ज नहीं, इस बार मैं उन सभी को अच्छी तरह समझ लूँगा।

इतना कहकर भूतनाथ चुप हो गया और थोड़ी देर तक कुछ सोचता रहा। शांता भी चुपचाप अपने पति के मुँह की तरफ देखती रही, इसके बाद दोनों में दूसरे विषय पर बातें होने लगीं।

इस बंगले के बाहर की तरफ दो आदमी नकाब डाले तथा काले कपड़ों से अपना बदन छिपाये न-मालूम कब से खड़े इन दोनों की बातें सुन रहे थे। भूतनाथ को दयाराम का विषय छोड़ दूसरी बातें देखते एक ने बहुत धीरे से अपने साथी से कहा, ‘‘देखिए अब इसने बातों का ढंग बदल दिया।मैंने आपसे कहा न कि गदाधरसिंह अपने मामूली भेदों की खबर भी अपनी स्त्री को नहीं करता फिर ऐसा गूढ़ विषय वह क्यों उस पर जाहिर करने लगा।

दूसरा : हाँ यही मालूम होता है, खैर अब यहाँ ठहरने की कोई जरूरत नहीं है।

पहिला : हाँ, अब चलना चाहिए, मगर यदि कहिए तो कोई शिगूफा छोड़ते चलें?

दूसरा : नहीं, इसके घर में खासकर इसकी स्त्री के सामने यह सब मैं पसन्द नहीं करता, अकेले में या केवल इसके साथियों या ऐयारों के सामने इसे तंग करने में कोई हानि नहीं है, पर यहाँ ऐसा करना उचित नहीं और इन्द्रदेव तथा भैयाराजाजी की भी यही आज्ञा है अस्तु इस समय यहाँ से चुपचाप चले चलना ही ठीक है।

इतना कह वह आदमी वहाँ से हटा, दूसरा भी दबे पाँव उसके पीछे-पीछे रवाना हुआ। बंगले के बाहर निकल वे दोनों बगीचे की चहारदीवारी की तरफ बढ़े और उसे पार करने के बाद तेजी के साथ एक तरफ को रवाना हुए। रास्ते में उन दोनों में पुन: इस प्रकार बातें होने लगीं :–

एक : जहाँ तक मालूम होता है भूतनाथ यहाँ एक रात से ज्यादा न रहेगा और कल ही फिर बाहर निकलेगा।

दूसरा : हाँ, यह तो उसकी बातों से ही प्रकट हो गया है। हम लोगों को इसी शहर में ठहर कर उसका इन्तजार करना चाहिए।

पहिला : बेशक, भला वह भी क्या कहेगा कि किसी से वास्ता पड़ा था, वह अगर छका है तो हमीं लोगों से।

दूसरा : हाँ, इसमें क्या शक है, मगर हम लोगों को मदद भी तो बड़ी ऊँची जगह से मिली है।

पहिला : अभी तक वह इस बात को बिलकुल नहीं समझ सका कि ‘‘चन्द्रशेखर’ या ‘सर्वगुण सम्पन्न चाँचला सेठ’ कौन है!

दूसरा : हाँ, ऐसी ही बात है, अभी उस दिन काशी में लाटभैरव वाले कूएं पर मेरी उसकी देखादेखी हो गई थी। उसकी आधी जान तो ‘चन्द्रशेखर’ नाम से ही सूख गई और मेरी बातें सुन अन्त में वह यहाँ तक घबड़ाया और डरा कि बेहोश हो गया।

दूसरा : जब से तलवार की लड़ाई में वह मुझसे जक उठा चुका है तब से मुझसे बड़ा ही डरने लगा है और खासकर इस बात से तो वह भी घबड़ाता है कि मुझे उसके करीब-करीब सब गुप्त भेदों की खबर है और वह मेरा कुछ भी हाल नहीं जानता।

पहिला : मगर आश्चर्य तो इस बात का है कि वह इतनी दफे आपको देखने और आपसे बातें कर चुकने पर भी इस बात का गुमान नहीं कर पाता कि ‘चन्द्रशेखर’ के पर्दे के अन्दर वास्तव में कौन है।

दूसरा : इसका असली सबब यही है कि मुझे मरा हुआ समझता है। एक तो ऐसे ही बरसों से उसने मुझे असली सूरत में नहीं देखा दूसरे अपनी कार्रवाइयों से मैं उसे यह भी विश्वास दिला चुका हूँ कि अब मैं इस दुनिया में नहीं रहा।

पहिला : अच्छा इसके कुछ कागजात भी तो आपके कब्जे में हैं?

दूसरा : उसके बटुए में से कुछ चिट्ठियाँ मुझे मिली थीं मगर उन्हें मैंने इन्द्रदेव के हवाले कर दिया।

पहिला : इन्द्रदेव भी विचित्र आदमी हैं, सब कुछ होने पर भी वे दारोगा और भूतनाथ से अपनी दोस्ती का हक निबाहे जा रहे हैं। यदि उनकी जगह कोई दूसरा आदमी होता या किसी दूसरे के कब्जे में उतनी बेइन्तहा ताकत और दौलत होती जितनी उनके कब्जे में है तो वह इन लोगों को बर्बाद करके छोड़ देता।

दूसरा : हाँ, इसमें क्या शक है, भूतनाथ या दारोगा जैसों को बरबाद कर देना या उनकी ताकत को तोड़ देना इन्द्रदेव ऐसे व्यक्ति के लिए कुछ भी कठिन नहीं। दारोगा के विषय में तो मैं नहीं कह सकता कि उनके क्या विचार हैं मगर गदाधरसिंह के विषय में बात छोड़ने पर वे बराबर मुझसे यही कहा करते हैं कि वह आदमी बहुत ही अच्छा है मगर लालच और ऐयाशी ने उसे खराब कर रक्खा है, अगर किसी तरह भी सुधर जाए तो अपने ढंग का एक ही ऐयार निकलेगा।

पहिला : हाँ और इसी खयाल से उन्होंने हम लोगों को इसके पीछे लगा रक्खा है कि शायद ठोकरें खाने और दु:ख उठाने से किसी दिन वह सम्हल जाए और बुरे रास्ते को छोड़कर भली राह पर आ जाए। (रुककर) मगर देखिए तो, यह आवाज कैसी आ रही है?

दोनों नकाबपोश रुक गए। पास ही किसी जगह से कुछ इस प्रकार की आवाज आ रही थी मानों दो आदमी आपुस में लड़ रहे हों। बीच-बीच में तलवारों की झनझनाहट और पत्तों के चरमराने की आवाज भी आती थी। कुछ देर तक दोनों आदमी आश्चर्य के साथ वहाँ खड़े रहे, इतने ही में एक हलकी चीख फिर धमाके की आवाज आई और तब एकदम सन्नाटा हो गया।

दोनों आदमी पाँव दबाए हुए धीरे-धीरे उस तरफ बढ़े जिधर से यह आवाज आई थी। पचास कदम भी न गए होंगे कि पेड़ों की झुरमुट के बीच में आग बलती हुई दिखाई दी जिसके अन्दर कोई चीज जलती हुई नजर आ रही थी। उस आँच के पास ही एक आदमी जमीन पर गिरा हुआ था और एक दसूरा आदमी छाती पर सवार खंजर उसके कलेजे के पार किया ही चाहता था।

ये दोनों आदमी यह विचित्र दृश्य देख आश्चर्य में पड़ गए और उस जमीन पर गिरे आदमी की मदद के लिए कुछ किया ही चाहते थे कि इतने ही में वह आदमी जो छाती पर सवार था अपना हाथ रोककर यह कहता हुआ कि ‘जा आज फिर तुझे छोड़ देता हूँ, मगर अब कभी अपनी नापाक सूरत मुझे न दिखाइयो उठ खड़ा हुआ और अपना खंजर कमर में खोंसने के बाद एक तरफ को रवाना हो गया। उस जगह पेड़ों के झुरमुट के कारण इतना अन्धकार छाया हुआ था कि वे दोनों आदमी बहुत गौर करने पर भी न तो उसकी सूरत देख सके और न पहिचान ही सके।

मालूम होता है कि वह जमीन पर गिरा हुआ आदमी डर या किसी और कारण से बेहोश हो गया था, क्योंकि अपने ऊपर वाले आदमी के चले जाने के बाद भी वह अपनी जगह से न तो हिला और न उसने अपना हाथ-पाँव इत्यादि कोई अंग ही हिलाया। दोनों नकाबपोश यह देख धीरे-धीरे उस तरफ बढ़े और उस आदमी के पास जाकर खड़े हो गए।

अन्धकार बहुत था इस कारण पास से देखने पर भी उस बेहोश आदमी की सूरत-शक्ल साफ-साफ दिखाई नहीं देती थी। एक नकाबपोश ने यह देख आसपास से सूखी लकड़ियाँ और पत्ते आदि इकट्ठे किए और पास जलती हुई आग पर डाल उसे तेज किया।

रोशनी होते ही उन दोनों नकाबपोशों ने उस आदमी को पहिचान लिया और आश्चर्य-भरी आवाज में एक ने दूसरे से कहा, ‘‘हैं, यह तो भूतनाथ है!

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