लोगों की राय

मूल्य रहित पुस्तकें >> भूतनाथ - खण्ड 3

भूतनाथ - खण्ड 3

देवकीनन्दन खत्री

Download Book
प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :300
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8362
आईएसबीएन :978-1-61301-020-4

Like this Hindi book 9 पाठकों को प्रिय

421 पाठक हैं

भूतनाथ - खण्ड 3 पुस्तक का ई-संस्करण

चौथा बयान


भरथसिंह को साथ लिए हुए कुंअर गोपालसिंह अपने कमरे में गये और एक कुर्सी पर बैठे, उन्हें भी एक कुर्सी पर बैठने का इशारा किया।

यह कमरा बहुत बड़ा और बहुत ही खूबसूरती के साथ सजा हुआ था, झाड़-फानूस, कँवल और दीवारगीर इत्यादि रोशनी की चीजों के अलावे जगह-जगह पर पहाड़, जंगल तथा लड़ाई इत्यादि के चित्र लगे हुए थे जो बहुत ही खूबसूरती और कारीगरी के साथ बनाए गये थे। कमरे का पिछला भाग बाग की तरफ पड़ता था और उस तरफ की खिड़कियों से बाग की पूरी-पूरी कैफियत देखने में आती थी।

गोपालसिंह कुछ देर तक चुपचाप दीवाल के साथ लटकती हुई एक तस्वीर की तरफ देखते रहे जिस पर परदा था, इसके बाद भरथसिंह की तरफ देख धीमे स्वर से बोले, ‘‘आज मैं चाचाजी से मिलने गया था।’’

भरथसिंह ने चौंककर कहा, ‘‘हाँ! तो क्या सवेरे वहीं से लौट रहे थे जब आप पर उन लोगों ने हमला किया था?’’

गोपाल : हाँ।

भरथ० : उनसे क्या बातें हुईं?

गोपाल : सुनो मैं सब कहता हूँ।

इतना कहकर गोपालसिंह उठे और कमरे के कोने में रक्खे लोहे के एक सन्दूक के पास पहुँचे। कोई खटका दबाकर उन्होंने उसका ताला खोला और उसमें से एक गठरी निकाल हाथ में लिए हुए फिर भरथसिंह के पास आए, यह गठरी वही थी जिसे आज सवेरे भूतनाथ ने नाले में से लिए हुए निकलते देखा था।

गठरी जमीन पर रखकर गोपालसिंह फिर कुर्सी पर बैठ गए और तब यों कहने लगे–

गोपाल : चाचाजी जब दारोगा साहब के विषय में पिताजी से नाराज होकर चले गए तो रास्ते में मैंने रोक लिया १ और एकान्त में ले जाकर सब हाल उनसे सुना। उन्होंने सब बातें साफ-साफ मुझसे कहीं और अन्त में जब मैंने यह पूछा कि मुझे कभी आवश्यकता पड़ी तो मैं किस तरह आपसे मिल सकूँगा? उन्होंने मुझे एक स्थान का पता बताकर कहा कि उस स्थान पर जब भी जाऊँगा मेरी उनकी मुलाकात हो सकेगी। (१. देखिए भूतनाथ, छठवाँ भाग, पाँचवाँ बयान)

इसके कुछ दिन बाद जब मेरी माता का देहान्त हुआ तो उस समय उन्हें यहाँ आना पड़ा। उस वक्त उन्होंने मुझे तरह-तरह की बातें बताईं तथा एक ग्रंथ भी मुझे दिया जिसके पढ़ने से तिलिस्म का बहुत कुछ हाल जाना जा सकता था। उस समय मैं माँ के गम में बिल्कुल पागल हो रहा था इससे मैंने उनकी बातों तथा उस पुस्तक पर ज्यादा ध्यान न दिया मगर बाद में मैं उस किताब को अच्छी तरह पढ़ गया और उसमें लिखी बातों को भी अपने दिल में अच्छी तरह नक्श कर लिया।

आज यकायक मेरे मन में उनसे मिलने की इच्छा हुई और मैं उनके बताए हुए ठिकाने पर रवाना हुआ। अजायबघर वाली इमारत के पास घने और भयानक जंगल में एक नाले के किनारे उनके बताए हुए ठिकाने पर मैं पहुँचा और उस जगह पहुँचने की चेष्टा करने लगा जहाँ चाचाजी से मिलने की आशा थी।

चाचाजी की जुबानी मुझे मालूम हुआ था कि उस स्थान पर नाले की तह में एक कड़ी लगी हुई है और जल में गोता मारकर उस कड़ी को खींचने से अन्दर जाने का रास्ता खुल जाता है। मैं गोता मारने के लिए अपने कपड़े उतारना ही चाहता था कि यकायक जल के खलबलाने से मालूम हुआ कि कोई आदमी अन्दर से बाहर आना चाहता है क्योंकि जल की खलबलाहट इस बात की सूचना देती थी कि इस छोटे-से तिलिस्म में जाने का विचित्र दरवाजा खुल गया है।

मुझे यह ख्याल हुआ कि कदाचित चाचाजी ही न हों जो बाहर आना चाहते हैं और इस ख्याल से फौरन नाले में कूद पड़ा कि अन्दर का कुछ हाल जानने के सिवाय चाचाजी से तिलिस्म के अन्दर ही मुलाकात कर सकूँगा क्योंकि नाले के बाहर जंगल में मुलाकात करने से लोगों की निगाह पड़ने का डर था।

नाले में कूदते ही मैं नीचे चला गया और जब तह में पहुँचा तो मालूम हुआ कि यहाँ दोनों बगल की दीवारें तथा सतह पत्थर की संगीन बनी हुई हैं, बाई बगल की दीवार में एक बड़ा-सा छेद मालूम पड़ रहा था जिसकी राह नाले का पानी अन्दर जा रहा था, खिंचाव के कारण पानी के साथ-ही-साथ मैं भी उसी खिड़की की राह दीवार के अन्दर चला गया।

ज्यादा दूर जाना न पड़ा और जरा ही देर बाद मैं एक स्थान में पहुँचा जो चारों तरफ़ से बन्द कोठरी-सा मालूम होता था और लगभग दस हाथ के चौड़ा इतना ही लम्बा, और करीब चार हाथ के ऊँचा होगा। छत के पास तीन-चार रोशनदान ऐसे बने हुए थे जिनकी राह रोशनी और हवा बाखूबी आ रही थी। मैंने देखा कि उस जगह जहाँ से पानी के साथ मैं इस कोठरी के निचले हिस्से में पहुँचा दीवार के साथ लगा हुआ एक छोटा-सा दरवाजा है जिसकी राह नाले का पानी इस समय भी तेजी के साथ आ रहा है और जमीन में बनी एक चौड़ी तथा गहरी नाली में से होता हुआ सामने की तरफ वाले उसी किस्म के एक दूसरे मगर कुछ बड़े दरवाजे की राह कहीं निकल जा रहा है।

मुझे मालूम था कि तिलिस्म में जाने का रास्ता यहाँ समाप्त होगा और अभी सामने की दीवार वाली राह से पानी के साथ बहते हुए मुझे कुछ दूर और जाना होगा। यह सोचकर कुछ देर सुस्ताने के बाद मैं फिर पानी में उतरने का इरादा कर ही रहा था कि यकायक बगल की एक दीवार में खटके की-सी आवाज आई और दीवार का एक पत्थर हटकर किवाड़ के पल्ले की तरह बगल में जा लगा। इस दरवाजे के खुलने के साथ ही नाले का पानी बहकर इस कोठरी में आना भी बन्द हो गया।

दरवाजा खुलने के कुछ ही सायत बाद चाचाजी उसी तरफ से कोठरी में आते दिखाई पड़े। मुझे देखते ही वे बड़ी प्रसन्नता के साथ मेरी तरफ लपके और मुझे गले से लगाकर बोले, ‘‘बेटा, तुम आ गए! मैं इस समय स्वयं तुमसे ही मिलने के लिए बाहर निकल रहा था!

मैंने उनके चरण छूए और पूछा, ‘‘आपको मुझसे मिलने की क्या आवश्यकता आ पड़ी? मगर आपके चेहरे से प्रसन्नता प्रकट होती है, कदाचित् आप कोई खुशखबरी मुझे सुनाना चाहते हैं।’’

भैया० : बेशक इधर दो-तीन बातें ऐसी ही गई हैं जिन्हें जानने से तुम्हें प्रसन्नता हो सकती है, मगर मैं यदि उन्हें तुमको सुनाऊँगा तो साथ ही में कुछ ऐसी खबरें भी तुम्हें सुननी पड़ेंगी जो उतनी अच्छी नहीं है। लेकिन तुम अभी लड़के हो, मैं तुम्हें उन सब पेचीले मामलों में घसीटा नहीं चाहता और न उन तरद्दुदों में तुम्हारा शरीक होना ही मुझे पसन्द है, अस्तु किसी दूसरे समय पर मुनासिब मौके पर इन बातों की खबर तुम्हें दूँगा, इस समय मैं सिर्फ इतना जानना चाहता हूँ कि अजायबघर के विषय में तुम्हें क्या मालूम है?

मैं : अजायबघर के विषय में मैं सिर्फ यही जानता हूँ कि वहाँ एक-से-एक नायाब चीजें रक्खी हुई हैं जिनकी हिफाजत के लिए छोटा-सा तिलिस्म बनाकर ऊपर साधारण रीति से रहने लायक एक छोटा-सा स्थान या बंगला बनवा दिया गया है। इससे ज्यादा उसके विषय में मैं और कुछ नहीं जानता। हाँ एक बात जरूर कह सकता हूँ कि महाराज ने वह बँगला रहने के लिए दारोगा साहब को दे दिया है। उसकी दो तालियाँ महाराज के पास थीं- एक तो पहले ही दारोगा साहब को दे दी गई थी जो उनसे कहीं गिर या खो गई और दूसरी कल या परसों वे यह कहकर ले गए हैं कि राजविद्रोही दो-तीन कैदी वहाँ जायँगे।

भैया० : मगर यह तुम कैसे कहते हो कि अजायबघर दारोगा को दे दिया गया है?

मैं : पिताजी ने ही जिक्र होने पर एक दफे कहा था कि ‘दारोगा यह इमारत रहने और सन्ध्या-भजन करने के लिए माँगता है और मैं सोच रहा हूँ कि उसे दे दूँ’। पर मैं निश्चय रूप से नहीं कह सकता, यदि आप कहें तो महाराज से दरियाफ्त करके सही-सही पता आपको दूँ।

भैया० : हाँ जरूर, क्योंकि अगर तुम्हारा कहना ठीक है और वह जगह महाराज ने दारोगा को दे दी है तो मुझे अपने इरादे में बहुत बड़ा परिवर्तन करना पड़ेगा। (कुछ सोचकर) अच्छा तुम एक काम करो- अजयाबघर की दो तालियाँ थीं और दोनों ही तुम कहते हो कि दारोगा के कब्जे में चली गई हैं!

मैं : जी हाँ।

भैया० : उनमें से एक तो हम लोगों को मिल गई और दूसरी मैं समझता था कि महाराज के पास होगी मगर मालूम हुआ कि वह भी दारोगा के पास पहुँच गई। (रुककर) अच्छा तो मैं तुम्हें एक किताब देता हूँ। उसमें उस अजायबघर का पूरा-पूरा हाल और उसके दरवाजों को (बगैर किसी ताली की मदद के) खोलने और बन्द करने की तरकीब लिखी है, तुम इस किताब को शुरू से आखीर तक अच्छी तरह पढ जाओ इससे तुम अजायबघर का सब हाल जान जाओगे और वहाँ जब चाहे आ-जा सकोगे। महाराज से तुम अजायबघर के विषय में सब निश्चय करके परसों को मुझसे वहीं मिलना और बताना कि वास्तव में वह स्थान महाराज ने दारोगा को दे दिया हो या देने का वचन दे दिया हो तो जहाँ तक हो सके तुम ऐसा करने से उन्हें रोकना और फिर परसों जैसा हो कहना।

मैं : बहुत अच्छा, मैं महाराज से उस विषय की सब बातें दरियाफ्त करके परसों शाम अजायबघर पहुँचूँगा। आप वहाँ मुझसे किस जगह मिलेंगे?

भैया० : तुम इमारत के अन्दर किसी जगह भी रहना मैं तुम्हें खोज लूँगा, क्योंकि मुमकिन है कि तुम्हें लोगों की निगाहों से अपने को छिपाने की जरूरत पड़े, और ऐसी हालत में बंगले के बाहर रहना ठीक न होगा, उस किताब की मदद से जो मैं तुम्हें दूँगा तुम बंगले के अन्दर बहुत-सी छिपने लायक जगहें पा सकते हो।

मैं : बहुत अच्छा, पर यदि महाराज ने वह जगह दारोगा साहब को दे ही दी होगी और उन्होंने वहाँ अपना कब्जा कर लिया होगा तो मैं कैसे बंगले के अन्दर जा सकूँगा या आप ही कैसे वहाँ आ सकेंगे?

भैया० : जहाँ तक मैं समझता हूँ वह बंगला मिल जाने पर भी दारोगा हमेशा वहाँ रहता न होगा, और यदि वह ऐसा करता ही हो तो तुम्हें अपनी चालाकी से काम लेना होगा बिना दारोगा या उसके साथियों की नजर पर चढ़े बंगले के अन्दर पहुँचने की कोशिश करनी होगी। बंगले के अन्दर जाने की कई गुप्त राहें भी हैं जिनसे तुम काम ले सकते हो और जिनका भेद तुम्हें इस किताब में मिलेगा। बाकी रहा मेरे लिए, सो तुम कोई चिन्ता न करो मैं किसी-न-किसी तरह वहाँ पहुँच ही जाऊँगा बल्कि मेरे साथ एक व्यक्ति और भी होगा जिसे देख तुम बहुत प्रसन्न होगे।

मैं : वह कौन?

भैया० : यह भी तुम्हें परसों ही मालूम होगा। अच्छा ठहरो, तुम्हें वह किताब दे दूँ।

इतना कहकर चाचाजी मेरे पास से हटकर दीवार के पास गये और वहाँ कोई खटका दबाया जिससे एक छोटी-सी आलमारी दीवार में दिखाई देने लगी। उस आलमारी में से यही गठरी में वह किताब है तथा एक-दो कपड़े भी हैं जिन पर पानी का कुछ असर नहीं होता। ये तुम्हारे काम आवेंगे और इन्हें पहिन कर अपनी पोशाक जो बिलकुल गीली हो गई है सूखने को डाल सकते हो। बस अब तुम जाओ, परसों शाम मुझसे मिलने का ख्याल रखना।’

इतना कह उस पुस्तक तथा उस जगह के बाहर निकलने के विषय में कुछ और बातें बतलाने के बाद चाचाजी मुझसे विदा हो उसी दरवाजे की राह जिससे कि वे आये थे कहीं चले गए। उनके जाते ही दरवाजा बन्द हो गया और मैं कोठरी के बाहर आने की कोशिश में लगा।

चाचाजी की बताई तरकीब से मैंने वह छोटी खिड़की जिसकी राह कुछ ही देर पहले उस कोठरी में दाखिल हुआ था खोली। नाले का पानी पूर्ववत् बह कर आने लगा जिसकी तेजी के कारण इस तरफ से गोता मारकर दूसरी तरफ बाहर जा निकलना कठिन था, मगर मुझे एक पीतल की जंजीर मिल गई जो शायद इसी काम के लिए लगी हुई थी और उसी के सहारे मैं बाहर निकल आया, रास्ता बन्द किया और नाले के ऊपर निकला।

भरथ० : और शायद उसी समय उन लोगों ने आप पर हमला किया?

गोपाल० : उसी समय तो नहीं हाँ जब कपड़े इत्यादि सुखाकर वहाँ से चलने लगा तो थोड़ी दूर आ जाने के बाद वे लोग मिले जिन्होंने मुझ पर हमला किया, मगर न-मालूम उन्होंने ऐसा क्यों किया! मैंने तो कभी उनकी सूरत तक भी नहीं देखी थी। देखे महाराज और दारोगा साहब उस विषय में क्या करते हैं?

भरथ० : (कुछ ठहरकर) तो आप परसों चाचाजी से मिलने जायेंगे?

गोपाल : हाँ अवश्य जाऊँगा।

भरथ० : महाराज से अजायबघर के विषय में आपने पूछा?

गोपाल : दारोगा साहब ने आज मेरी जान बचाई इससे प्रसन्न होकर महाराज ने वह स्थान एकदम से उन्हें दे दिया। फिर इस विषय में ज्यादा कुछ पूछना या कहना-सुनना उचित न जानकर मैंने कुछ न कहा हाँ, पूछकर इस बात का निश्चय जरूर कर लिया कि उस किताब का हाल जो चाचाजी से मुझे मिली है उन्हें कुछ नहीं मालूम है। ठहरिए आपको वह किताब दिखलाऊँ।

इतना कहकर गोपालसिंह गठरी की तरफ झुके मगर भरथसिंह ने रोककर कहा, ‘‘इस समय आप उसे रहने दीजिए मुझे एक जरूरी काम है जिसके लिए मैं आपसे इस वक्त इजाजत लूँगा फिर किसी समय वह किताब देखूँगा।’’

‘‘खैर ऐसा ही सही’’ कहकर गोपालसिंह ने वह गठरी फिर उसी लोहे के सन्दूक में रख दी। भरथसिंह भी उठ खड़े हुए और उनसे विदा हो खास बाग के बाहर निकल गए।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book