भूतनाथ - खण्ड 2 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8361
आईएसबीएन :978-1-61301-019-8

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भूतनाथ - खण्ड 2 पुस्तक का ई-संस्करण

छठवाँ बयान


आधी रात का समय है, चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है, सिर्फ गली-कूचों में कभी-कभी पहरा देने वालों की आवाज ‘जागते रहियो, होशियार रहियो’ सुनाई दे जाती है। जमानिया तिलिस्म के दारोगा साहब भी, जिनका दिमाग तरह-तरह के तरद्दुओं का शिकार हो रहा है बहुत देर तक जाग कर और सैकड़ों करवटें बदल कर अब सो गये हैं मगर थोड़ी-थोड़ी देर में उनका शरीर चौंक जाता और क्षणभर के लिए निद्रा भंग हो जाती है।

जिस कमरे में दारोगा साहब सो रहे हैं वह बहुत ही खूबसूरती के साथ बेशकीमती सामान से सजा हुआ है। चारों तरफ की दीवारों पर बहुत अच्छा रंगसाजी का काम किया हुआ है, दरवाजों पर किमख्वाब के पर्दे पड़े हुए हैं, मौके-मौके पर दीवारों के साथ बिल्लौरी दीवारगीरें लगी हुई हैं, तथा छत के साथ बेशकीमत कन्दीलें और झाड़ लटक रहे हैं। आलों पर सुन्दर जड़ाऊ गुलदस्ते सजाये हुए हैं जिनमें रक्खे हुए खुशबूदार फूल-पत्तों के गुच्छे तमाम कमरे को मुअत्तर कर रहे हैं, इस समय यहाँ रोशनी बहुत कम है क्योंकि सिर्फ दो ही तीन दीवारगीरों में काफूरी मोमबत्ती जल रही है।

कई घण्टे तक बेआरामी की नींद लेने के बाद दारोगा चौंक कर जाग पड़ा और उठ कर चारपाई के ऊपर बैठ गया, उसे ऐसा मालूम हुआ मानों उसके पैर में किसी जानवर ने काट लिया परन्तु उठ कर बैठ जाने पर उस कमरे की अवस्था देख कर वह घबड़ा गया और आँखें फाड़ चारों तरफ देखने लगा। उसने देखा कि जिन दीवारगीरों में काफूरी बत्तियाँ जल रही थीं वे बुझी हुई हैं और सिर्फ एक बत्ती जल रही है मगर उस पर भी किसी ने स्याह चादर या इसी तरह की कोई चीज डाल दी है जिससे रोशनी बहुत गंदली हो रही है यहाँ तक कि कमरे की चीजें साफ नहीं दिखाई देतीं।

दारोगा के दिल में एक प्रकार का डर पैदा हो गया और उस समय तो उसका कलेजा और भी उछलने लग गया जब उसे कमरे के कोने में कोई स्याह रंग की मूरत धुँधली-सी दिखाई दी।

निःसन्देह पापियों का हृदय बड़ा ही छोटा, बहुत ही कमजोर और अत्यन्त डरपोक होता है, दारोगा कोई बहादुर आदमी नहीं था, बहादुर लोग ऐसे नीच कामों को पसन्द नहीं करते जिन्हें दारोगा ने अपना नित्यकर्म ही समझ रक्खा था। दारोगा केवल चालाकी और दगाबाजी से अपना काम निकालता था। यद्यपि किसी की जान लेने के विषय में वह बड़ा निर्दय था परन्तु इस काम में उसका दिल उन बहादुरों का-सा न था जो लड़ाई के मैदान में खुल्लमखुल्ला लड़ कर दुश्मनों का सिर काटते हैं बल्कि उसका दिल उन पापियों का-सा था जो केवल लाभ के लिए निर्दोष पुरुषों को अंधकार के समय छिप कर मारते हैं या जहर से किसी की जान लेकर छिपे फिरते हैं और डरते हैं कि हमारा यह भेद किसी पर खुल न जाय। इन दोनों दिलों में जमीन-आसमान का फर्क है, मगर इससे भी बढ़ कर उस आदमी का दिल पापमय और कमीना है जो अपने मालिक के साथ नमकहरामी और राजा के साथ दगाबाजी करता है। शंकरसिंह के साथ दगाबाजी करके और उनको जमीन के अन्दर दफन करके दारोगा का दिल बहुत ही घबड़ाया और बेचैन हुआ। उसे दिन-रात की साठ घड़ियों में से कोई बेफिक्री की नसीब नहीं होती थी। शंकरसिंह की लाश को जमीन के अन्दर पहुँचाने के बाद दूसरे दिन वह दरबार में राजा साहब के पास गया परन्तु उसके दिल ने घण्टे-भर भी उसे बैठने की इजाजत न दी। राजा साहब के मुँह से एक दफे केवल इतना ही निकल गया, ‘‘आज भैया राजा नहीं दिखाई दिये, क्या मामला है!’’ बस दारोगा के हवास जाते रहे और वह सरदर्द तथा बीमारी का बहाना करके वहां से चलता बना। घर आने पर भी उसका दिल बड़ी बेचैनी के साथ गुजरा और रात को जब वह खा-पीकर सोने के लिए अपने पलंग पर गया तो बड़ी मुश्किल से उसे नींद आई। दूसरा दिन भी उसका उसी तरह बेचैनी के साथ गुजरा और वह राजा साहब के पास दरबार में न जा सका। सिर्फ अपनी बीमारी का सन्देशा कहला भेजा। वहाँ आज भी शंकरसिंह के न होने से बड़ी बेचैनी फैली हुई थी और सैंकड़ों आदमी उनकी खोज में चारों तरफ भेजे जा चुके थे। रात्रि के समय आज भी दारोगा की वही दशा रही अर्थात् बड़ी कठिनता से नींद आई और किसी कारण से जब उसकी आँख खुली तो उसने वही कैफियत देखी जो हम ऊपर कह चुके हैं।

धुंधली-सी स्याह रंग की मूरत देख कर वह डर गया। अपने सिरहाने से उसने तलवार उठा ली और कुछ देर तक एकटक उस मूरत की तरफ देखता रहा। अब वह मूरत हिलती दिखाई दी और फिर धीरे-धीरे दारोगा की तरफ बढ़ने लगी यहाँ तक कि चारपाई के पास आकर खड़ी हो गई। इस बीच में दारोगा ने कई दफे उठ कर चारपाई के नीचे खड़े होने की कोशिश की मगर कृतकार्य न हुआ, अर्थात् उसके पैरों ने उसे हिलने की इजाजत न दी, मालूम हुआ कि जैसे पैरों में कुछ दम नहीं रह गया है। इस कैफियत से दारोगा का डर और भी बढ़ गया तथा वह घबड़ाना-सा होकर एकटक उस मूरत की तरफ देखने लगा क्योंकि उसे ऐसा मालूम हुआ मानो कोई आदमी सिर से पैर तक काला कपड़ा ओढ़े सामने खड़ा है।

कुछ सायत के बाद उस मूरत ने अपने चेहरे पर से स्याह कपड़ा हटा दिया, अब दारोगा को ठीक शंकरसिंह की सूरत दिखाई दी जिसे देखने के साथ ही वह चिल्ला उठा, उसके सर में चक्कर आने लगे और वह घूम कर चारपाई पर गिरने के साथ ही बेहोश हो गया।

अबकी दफे जब दारोगा होश में आया अर्थात् उसकी आँख खुली तो उसने देखा कि सवेरा हो चुका है और कमरे के अन्दर कुदरती रोशनी पहुँच कर वहाँ की हर चीज को अच्छी तरह दिखा रही है मगर वह मूरत वहाँ नहीं दिखाई देती और न-किसी दीवारगीर के ऊपर स्याह कपड़ा ही दिखाई पड़ता है। दीवारगीरों के ऊपर निगाह डालने से यह भी मालूम होता था कि सभी बत्तियाँ जो संध्या के समय जलाई गई थीं रात-भर जल कर बुझी हैं क्योंकि कोई काफुरी बत्ती का टुकड़ा इतना बड़ा नहीं दिखाई देता था जिससे यह समझा जाय कि वह थोड़ी देर तक जलने के बाद बुझा दी गई थी।

कमरे की ऐसी अवस्था देखकर दारोगा तरह-तरह की बातें सोचने लगा, ‘‘क्या मैंने कोई स्वप्न देखा है? नहीं नहीं, यह स्वप्न नहीं हो सकता। वह स्याह मूरत स्वप्न में नहीं देखी थी! जरूर वह कोई आदमी था, साथ ही इसके मैंने यह भी देखा था कि दीवारगीरों की मोमबत्तियाँ एक को छोड़ कर बाकी की सभी बुझा दी गई हैं, परन्तु अब उन बचे हुए टुकड़ों पर ध्यान देने से जाना जाता है कि सभी बत्तियाँ एक साथ रात-भर जली हैं, इससे विश्वास होता है कि मैंने जरूर कोई स्वप्न देखा है। मगर नहीं, देखो यह तलवार जो कि मेरे सिरहाने थी इस समय बगल में पड़ी है क्योंकि मैंने उस स्याह मूरत को देखकर सिरहाने से उठा ली थी, तो क्या वास्तव में यह बात सच थी? लेकिन सच भी क्योंकर हो सकती है? शंकरसिंह को मैं अपने हाथ से जमीन के अन्दर दफन कर आया हूँ, अब वह मेरे सामने क्योंकर आ सकते हैं? तो क्या कोई ऐयार उनकी सूरत बन कर आया?

नहीं, किसी ऐयार को यह बात मालूम ही कैसे हो सकती है जो वह मुझे डराने के लिए शंकरसिंह की सूरत बन कर आवेगा। तब क्या मेरे दोनों साथी ऐसा कर सकते हैं? नहीं नहीं, राम राम! उन बेचारों पर किसी तरह का शक करना अपने ही ऊपर शक करने के बराबर है, फिर क्या शंकरसिंह भूत बन कर मेरे कमरे में आये थे? छिः छिः, भला भूत-प्रेत का शक करने से हम लोगों का काम कैसे चल सकता है? भूत कोई पदार्थ नहीं है और जरूर वह स्वप्न था जो कि मैंने देखा।’’

दारोगा चारपाई के ऊपर बैठा हुआ बड़ी देर तक इसी प्रकार की चिन्ताएँ करता रहा और आखिर उसने निश्चय कर लिया कि जो कुछ उसने देखा वह जरूर स्वप्न था।

आखिर आँखें मलता हुआ दारोगा चारपाई से नीचे उतरा और धीरे-धीरे चल कर कमरे के बाहर आया जहाँ कई खिदमतगार खड़े उसके आने का इन्तजार कर रहे थे। हाथ-मुँह धोने के बाद कुर्सी पर बैठा ही था कि राजा साहब का एक चोबदार आ पहुँचा जिसने उनसे कहा कि ‘महाराज ने आपको याद किया है’।

दारोगा: (चोबदार से) क्यों क्यों? आज यह गैरकानूनी बात कैसी! खैरियत तो है?

चोब० : सो तो मुझे कुछ मालूम नहीं सिर्फ यही हुक्म हुआ है कि आपको जल्द हाजिर होने के लिए इत्तिला दी जाय। मगर हाँ, महाराज कुछ चिन्तित से जरूर दिखलाई देते हैं, सूर्योदय के पहिले ही स्नान तथा सन्ध्योपासन से निवृत हो आया करते थे परन्तु आज उन्होंने चारपाई से उठ कर मुँह तक नहीं धोया है, चारपाई से उठ कर सीधे ‘मुक्ता भवन’ में चले आये हैं और वहीं आपको भी याद किया है। आज्ञा है कि बिना कुछ विलम्ब किये शीघ्र उनके पास पहुँचें।

दारोगा : निःसन्देह कोई जरूरी बात है?

चोब० : जी हाँ, तभी तो यह अवस्था है।

चोबदार की बातें सुन दारोगा साहब और परेशान हुए। महाराज के पास जाने की इच्छा तो नहीं होती थी परन्तु लाचार थे, बिना वहाँ गये रह भी नहीं सकते थे। कई क्षण तक चिन्ता करने के बाद वे उठे और अपने तोशेखाने वाले कमरे में चले गये। कुछ देर बाद मरीजों की-सी सूरत बनाये हुए दारोगा साहब कमरे के बाहर निकले और चोबदार के साथ महाराज की तरफ रवाना हुए।

जमानिया के राजा गिरधरसिंह अपने मुक्ता-भवन में चाँदी की एक आराम कुर्सी पर बैठे हुए दारोगा के आने का इन्तजार कर रहे हैं। यह स्थान खास महाराज के रहने का है, जनाना महल या दरबार अथवा खास बाग से इसका कोई सम्बन्ध नहीं। हाँ, जनाना महल इस मकान के साथ ही सटा हुआ है तथा खास बाग जाने का एक रास्ता भी इस मकान में से है।

इस मकान के पीछे की तरफ एक छोटा-सा नजर बाग तथा एक सुन्दर बारह-दरी है। इसी बारहदरी में इस समय महाराज उदास और विषण्ण बदन बैठे न-मालूम किस विषय की चिन्ता कर रहे हैं। उनके पास किसी तरह की भीड़-भाड़ नहीं है, केवल खास-खास चार-पाँच आदमी और पाँच-सात खिदमतगार नजर आते हैं और वे सब भी महाराज की उदासी के कारण उदास हो रहे हैं।

कुछ देर बाद दारोगा साहब आ पहुँचे। महाराज से कुछ हट कर एक कुर्सी रक्खी हुई थी जिस पर बैठने के लिए महाराज ने इशारा किया और दारोगा साहब बैठ गये। महाराज ने कहा, ‘‘आपको कुछ भैयाराजा की खबर है?’

दारोगा : जी मुझे तो कुछ खबर नहीं, क्या उनका पता नहीं लगता?

महाराज : हाँ, दो दिन से पता नहीं लगता, मगर क्या आपको किसी ने खबर नहीं दी? आश्चर्य है कि आप हम लोगों की तरफ से इस तरह बेखबर रहते हैं!

दारोगा : (हाथ जोड़ कर) महाराज, मैं सरकार की तरफ से बेफिक्र नहीं रह सकता परन्तु यह एक साधारण-सी बात थी जिसके विषय में मैंने कुछ विचार नहीं किया। इसके अतिरिक्त मुझे किसी ने इस मामले की खबर भी नहीं दी। शायद इसका सबब हो कि मैं दो दिन से सख्त बीमार हूँ, सर और पेट-दर्द ने मुझे अधमुआ कर डाला है। मगर महाराज, भैयाराजा के लिए आपको इतनी चिन्ता नहीं करनी चाहिए। आप जानते ही हैं कि वे प्रायः ही गायब रहा करते हैं और जब आते हैं तो दस-दस, पन्द्रह-पन्द्रह दिन तक घर की खबर नहीं लेते..।

महा० : ठीक है मगर वे ऐसा कभी नहीं करते कि मुझसे आज्ञा लिए बिना या मुझे इत्तिला दिये बिना कहीं चले जाते हों। अगर कभी ऐसा मौका पड़ भी गया है कि दो एक दिन लिए कह कर कहीं गये हैं और कई दिन लग गये हैं तो बाहर रहने पर भी नित्य अपने कुशल-मंगल का समाचार भेजते रहे हैं, परन्तु अबकी दफे इनका गायब होना मामूल के खिलाफ है..।

महाराज ने इतना ही कहा था कि बाहर से एक चोबदार आया और हाथ जोड़कर सामने खड़ा हो गया। जब महाराज ने उसकी तरफ देखा और इशारे में इजाजत दी तब उसने अर्ज किया कि इन्द्रदेवजी आये हैं और सरकार में हाजिर हुआ चाहते हैं।

इस समय इन्द्रदेव के आने से महाराज खुश हुए और उन्हें बहुत जल्द ले आने के लिए चोबदार से कहा। खिदमतगार ने महाराज की मर्जी समझ कर एक कुर्सी वहाँ लाकर रख दी और जब इन्द्रदेव हाजिर हुए तो सलाम करने के बाद इशारा पाकर उसी कुर्सी पर बैठ गये।

मामूली कुशल-मंगल पूछने के बाद महाराज ने प्रश्न किया—

महाराज : अबकी तो बहुत दिनों बाद तुम्हारा आना हुआ!

इन्द्रदेव : जी हाँ, कई झंझटों में फँसे रहने के कारण मैं बहुत दिनों तक हाजिर न हो सका, इधर कई दिनों से मेरे श्वसुर किसी कार्यवश मुझे बुला रहे थे, कल उनका बहुत शिकायत भरा हुआ पत्र पहुँचा तो लाचार होकर आना पड़ा, सबसे पहिले महाराज का दर्शन करना फर्ज था इसलिये हाजिर हुआ हूँ परन्तु महाराज कुछ खिन्न से दिखाई पड़ते हैं जिससे आश्चर्य होता है..।

महा० : हाँ ठीक है, मैं जरूर उदास और दुःखी हो रहा हूँ और इसका कारण यह है कि आज तीन दिन से भैयाराजा का कहीं पता नहीं लगता। उनकी यह आदत नहीं थी कि मुझसे पूछे बिना एक दिन से ज्यादा के लिये कहीं जाते।

इन्द्रदेव : निःसन्देह यह आश्चर्य की बात है, परन्तु महाराज, वे कुछ नादान बालक तो हैं ही नहीं, होशियार हैं, बुद्धिमान हैं, बहादुर तथा नीति-कुशल हैं, अतएव उनका गायब होना जरूर किसी खास कारण से होगा।

महाराज : खयाल तो मेरा भी ऐसा है परन्तु न-मालूम क्यों उनके लिये मेरा जी बहुत बेचैन हो रहा है।

इन्द्र : यह केवल सच्चे प्रेम के कारण है।

महाराज : इसके अतिरिक्त एक बात और भी है।

इन्द्रदेव : वह क्या?

महाराज : तुम लड़के हो, दामोदरसिंह के लिहाज तथा तुम्हारी लियाकत, हमदर्दी और प्रेम के कारण मैं तुम्हें अपने लड़के के बराबर ही समझता हूँ, इसके अतिरिक्त मेरे लड़के के तुम मित्र भी हो इसलिए भी तुम लड़के के बराबर ही हुए अतएव तुमसे कोई बात छिपाना पसन्द नहीं करता। आज रात को जबकि मैं अपने कमरे में बेखबर सो रहा था एक अजीब घटना देखने में आई।

इन्द्र० : (आश्चर्य प्रकट करता हुआ) वह क्या महाराज?

महाराज : (कुछ सोच कर) मैं चाहता हूँ कि गोपाल भी आ जाय तो मैं इस किस्से को बयान करूँ।

इन्द्रदेव : क्या चिन्ता है जरा देर के लिए ठहर जाइये, गोपालसिंहजी भी आते ही होंगे, मैं यहाँ ड्योढ़ी तक उनके साथ-ही-साथ आया था, किसी कार्यवश वे महल में चले गये और मुझसे कह गये कि तुम महाराज के पास चलो मैं अभी आता हूँ! (चौंक कर) वह देखिये वे भी आ गए!

इतने में ही गोपालसिंह भी आ गए, उनके लिए भी कुर्सी लाई गई और वे महाराज को प्रणाम करके कुर्सी पर बैठ गये।

महाराज : (गोपालसिंह से) तुम तो जानते ही हो कि आज तीन दिन से भैया राजा गायब हैं।

गोपाल : (हाथ जोड़ के) जी हाँ, आज तीसरा दिन है। बिना इत्तिला दिये कहीं चले जाने की आदत तो चाचाजी में नहीं थी। यह बड़े आश्चर्य की बात है। उनका पता लगाने के लिए मैं बहुत उद्योग कर रहा हूँ। परन्तु अभी तक मेरी मेहनत का कोई नतीजा नहीं निकला।

महाराज : इसके अतिरिक्त मैं रात की एक अजीब घटना का बयान करने वाला हूँ जिसके लिए तुम्हारा इन्तजार कर रहा था।

गोपाल : आज्ञा।

महाराज : रात को भैयाराजा की चिन्ता में डूबा हुआ मैं समय के कुछ पहिले ही सोने के लिये अपने कमरे में चला गया था। बहुत देर तक पड़ा तरह-तरह की बातें सोचता रहा पर अन्त में नींद आ गई और मैं बेखबर सो गया। दो पहर रात बीत जाने के बाद मेरी आँख खुली तो सोने वाले कमरे में अन्धकार पाया, सिर्फ पूरब तरफ वाली खिड़की खुली हुई थी और उसमें से आती हुई चन्द्रमा की चाँदनी फर्श के ऊपर पड़ रही थी जिससे कमरे के अन्दर इतना उजाला हो रहा था कि नित्य मिलने-जुलने वाले आदमी को मैं पहिचान सकता था। उसी चाँदनी के पास खड़ा मुझे एक आदमी दिखाई पड़ा। मुझे आश्चर्य हुआ कि इस समय छिप कर मेरे कमरे में कौन आया, अस्तु मैं बगल से तलवार लेकर उठ खड़ा हुआ और धीरे-धीरे उस आदमी की तरफ बढ़ने लगा। मुझे अपनी तरफ बढ़ते देख वह आदमी चन्द्रमा की रोशनी में चला गया और इस ढंग से खड़ा हो गया कि चन्द्रमा की रोशनी बखूबी उसके चेहरे पर पड़ने लगी। मैंने साफ-साफ पहिचाना कि यह भैयाराजा हैं।’’

भैयाराजा को देख कर मैं बहुत ही प्रसन्न हुआ, मगर जब उनके पास जाने लगा तो उन्होंने हाथ के इशारे से मुझे मना किया और जब मैंने इसका सबब पूछा तो उन्होंने अपनी उँगली से फर्श के ऊपर लिख कर जवाब दिया, चाँदनी में काले हरूफ अच्छी तरह पढ़े जाते थे, मैंने पढ़ा, यह लिखा हुआ था, ‘‘मैं जीता नहीं हूँ, मुझे दारोगा ने मार कर अपने मकान में गाड़ दिया है।’’

बस इतना लिख कर वह खिड़की के बाहर कूद गये। मैं बड़ी देर तक खड़ा-खड़ा उन बड़े-बड़े हरूफों को देखता रहा, इसके बाद झाँक कर खिड़की के बाहर देखा तो किसी की सूरत दिखाई नहीं पड़ी। मैं घबड़ाया हुआ चारपाई पर जाकर लेट रहा और इस खयाल से खिड़की की तरफ देखने लगा कि शायद वह सूरत पुनः दिखाई दे मगर फिर कुछ दिखाई न दिया और बहुत जल्द मुझे नींद आ गई। फिर जब आँख खुली तो सवेरा हो चुका था। जहाँ पर वे अक्षर लिखे गये थे वहाँ जाकर देखा तो फर्श पर एक अक्षर भी दिखाई न पड़ा तभी से इस समय तक मेरे दिल की विचित्र अवस्था हो रही है।

इस किस्से को सुन कर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ मगर जब गोपालसिंह की निगाह दारोगा पर पड़ी तो उन्होंने देखा कि उनके चेहरे का रंग उड़ा हुआ है और बदन काँप रहा है। महाराज ने भी दारोगा की यह अवस्था देख आश्चर्य में आकर पूछा, ‘‘यह क्या, आपका शरीर इतना काँप क्यों रहा है?’’

दारोगा : मैं निवेदन कर चुका हूँ कि दो-तीन दिन से बुखार ने मुझे पीड़ित कर रक्खा है, मैं यहाँ आने के योग्य नहीं था परन्तु महाराज की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकता था इसीलिए किसी तरह उठता-बैठता चला आया, इस समय पुनः सर्दी मालूम हो रही है, जान पड़ता है फिर बुखार चढ़ेगा।

महाराज : ठीक है, अच्छा तो इस समय आप घर जाइये; जब आपकी तबीयत ही ठीक नहीं है तो मेरे इस तरह तरद्दुद में आप किस तरह शरीक हो सकते हैं।

दारोगा : (हाथ जोड़ता हुआ) जो आज्ञा, तो मैं बिदा होता हूँ, जी ठिकाने होने पर पुनः हाजिर हो जाऊँगा मगर आपने जो कुछ रात का हाल बयान किया है उसे सुन कर तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैं वास्तव में इस समय कुछ भी निश्चय नहीं कर सकता कि यह क्या मामला है।

आश्चर्य नहीं कि यह किसी ऐयार की ऐयारी हो और वह आपको अथवा भैयाराजा को धोखे में डालने के इरादे से किसी विशेष घटना की भूमिका बाँध रहा हो अथवा किसी ढंग का स्वप्न आपने देखा हो जो कि ..।मैं क्या कहूँ कुछ समझ में नहीं आता। आश्चर्य तो यह है कि उसने बदनाम करने के लिए मुझी को चुना!

महाराज : आपको भला कोई क्या बदनाम करेगा! मुझे कब विश्वास हो सकता है कि आप हम ही लोगों की जान के ग्राहक हो जायँगे! नहीं-नहीं-नहीं, मुझे ऐसा खयाल कभी नहीं हो सकता, परन्तु यह मामला क्या है इसका पता जरूर लगाना चाहिये।

दारोगा : (जोर देने के ढंग पर) जरूर इसका पता लगाया जायगा, जरा मेरी तबीयत ठिकाने हो जाय तो मैं उद्योग करूँ।

महाराज : (इन्द्रदेव से) कहो बेटा, तुम इस बारे में क्या खयाल करते हो!

इन्द्र० : महाराज, मैं इस विषय में यकायक अपनी राय नहीं दे सकता हूँ, पर दुनिया में भूत-प्रेत तथा आत्मा के विषय में जो कुछ कहानियाँ लोग कहते हैं मैं उन्हें अवश्य मानता हूँ, मुझे पूर्ण विश्वास है कि आदमी मरने के बाद नाश नहीं होता, इस पंचभौतिक स्थूल शरीर को छोड़ने के साथ ही आत्मा को जो अविनाशी और अमर है एक दूसरा सूक्ष्म शरीर मिल जाता है जिसे पाकर वह जीव इधर-उधर घूमा या उड़ा करता है अथवा अपने कर्मानुसार तब तक दुख-सुख का भोग करता है जब तक वह किसी ऊँचे पद को प्राप्त न करे अथवा पुनः पंचभौतिक शरीर में प्रवेश न करे अर्थात् जब तक उसका पुनर्जन्म नहीं होता तब तक उसकी वासनानुसार उसको तरह-तरह के तमाशे दिखाई दे सकते हैं और यदि मरते समय कोई प्रबल वासना उसके अन्दर रह गई हो तो निश्चय रूप से किसी के शरीर में प्रवेश करके अथवा यों ही छाया की तरह वह लोगों को दिखाई भी दे जाता है अथवा इसी ढंग पर कभी अपनी थोड़ी-बहुत वासना भी पूरी कर लेता है। इस विषय में मेरे पिताजी ने मुझे बड़े-बड़े तमाशे दिखलाये हैं और बहुत-सी बातें सिखलाई भी हैं जिनको खयाल में रखते हुए मैं निश्चय रूप से कह सकता हूँ कि ईश्वर न करे यदि चाचाजी (भैयाराजा) की अकाल मृत्यु हुई है और किसी ने धोखा देकर उन्हें मार डाला है तो उनकी आत्मा बदला लेने की नीयत से इस रूप में जरूर दिखाई दे सकती है जैसाकि आपने रात को देखा। । अगर वह वास्तव में भैयाराजा जी की आत्मा है तो कम-से-कम एक-दो दफे आपको और जरूर दिखाई देगी क्योंकि भूत-प्रेत जब दिखाई देता है तब केवल एक ही दफे नहीं दिखाई देता, और अगर वह राजाभैया की आत्मा नहीं किसी ऐयार की है तो मैं बहुत जल्द इसका पता लगा कर आप से निवेदन करूँगा।

महा० : (आश्चर्य से) क्या तुम भूत-प्रेतादि का होना मानते हो?

इन्द्र० : निःसन्देह! जैसाकि मैं अर्ज कर चुका हूँ उन पर मेरा दृढ़ विश्वास है और मैंने इस सम्बन्ध में बहुत से खेल देखे भी हैं, यही नहीं, यदि महाराज देखा चाहेंगे तो मैं इस विषय के अपूर्व तमाशे दिखा सकूँगा।

महा० : मैं तो समझता हूँ कि तुम्हारे खयाल से भैयाराजा का मारा जाना सम्भव है।

इन्द्रदेव : जी सम्भव भी है, असम्भव भी है, दोनों बातों में से किसी पर मैं जोर नहीं दे सकता, दो दिन की मोहलत मुझे मिले इसके बाद मैं निश्चय करके जवाब दूँगा। (दारोगा की तरफ देख कर) भाई साहब, आपकी तबीयत अब बहुत खराब होती जाती है, आप अब पधारिये।

महा० : (दारोगा से) हाँ-हाँ, अब आप जाइये, फिर देखा जायगा।

दारोगा उठ खड़ा हुआ और सलाम करके धीरे-धीरे बीमारों की-सी नकल करता हुआ वहाँ से रवाना हुआ। उसके चले जाने के बाद इन्द्रदेव ने महाराज से कहा, ‘‘महाराज, यदि पुनः आपको वह जीव दिखाई पड़े तो आप उससे बातचीत चाहे जिस तरह की करें परन्तु उसे छूने या पकड़ने का उद्योग न करें, यही मेरी प्रार्थना है।’’

महा० : क्यों?

इन्द्र० : सम्भव है कि वह कोई प्रेत हो और आपको धोखा देने के लिए भैयाराजा की सूरत बन कर आपके पास आया हो या पुनः भी आवे। जो लोग उपासक होते हैं और सन्ध्योपासन से विमुख नहीं होते उनके शरीर को प्रेत स्पर्श नहीं कर सकता और ऐसी अवस्था में अपने को भी उसे स्पर्श करने का उद्योग न करना चाहिये क्योंकि ऐसा करने से उसके पुनः आने की आशा नहीं रहती।

महा० : हाय, भैयाराजा के विषय मैं कोई भी निश्चय नहीं रख सकता और कोई भी पता नहीं लगा सकता! जरूर यह हमारे मन्द भाग्य की निशानी है..।

इतना कहते-कहते उनकी आँखें डबडबा आयीं और आँसू की बूँदे टपाटप गिरने लगीं।

इन्द्र० : महाराज, आप हताश क्यों होते हैं! मैं कह चुका हूँ कि दो -तीन दिन के अन्दर ही उनका ठीक-ठीक पता लगा कर आपको समचार दूँगा, मुझे विश्वास है और मैं जोर देकर कहता हूँ कि भैयाराजा जीते हैं परन्तु किसी कष्ट में पड़ गये हैं।

महा० : (रूमाल से आँसू पोंछते हुए) अच्छा मैं तुम्हारे भरोसे पर और भी दो-तीन दिन किसी तरह बिताऊँगा।

इन्द्रदेव ने महाराज को बहुत समझाया और हर तरह दिलजमई करके वहाँ से विदा हुए। जाते समय वे कुँवर गोपालसिंह को भी अपने साथ लेते गये।

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