भूतनाथ - खण्ड 2 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8361
आईएसबीएन :978-1-61301-019-8

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भूतनाथ - खण्ड 2 पुस्तक का ई-संस्करण

पाँचवाँ बयान


शंकरसिंह को धोखा देकर दारोगा निकल गया और उन्हें उसी भूलभुलैया में उलझा हुआ छोड़ गया जिसका कारण यह था कि इनका वह किसी तरह भी मुकाबला नहीं कर सकता था और उसका भेद इन पर प्रकट हो जाने से उसे विश्वास हो गया कि ये अब मुझे सताये बिना न रहेंगे।यदि ये महाराज से इन बातों की शिकायत कर देंगे तो उनके दिल से तो मैं उतर ही जाऊँगा और ताज्जुब नहीं कि फिर मुझे जन्म-भर के लिए कैदखाने की अंधेरी कोठरी नसीब हो।

दारोगा कमबख्त बड़ा ही बेरहम आदमी था, किसी की जान ले लेना तो उसके लिये एक अदनी बात थी, अस्तु बहुत कुछ सोच-विचार कर शंकरसिंह के विषय में भी उसने यही मुनासिब समझा कि इन्हें गुप्त रीति से मार कर बखेड़ा तय किया जाय क्योंकि तब किसी को इस मामले की खबर ही न होगी। यही सबब था कि वह अब शंकरसिंह की जान लेने की फिक्र करने लगा।

आखिर दारोगा अपने उस कमरे में गया जो उसका गुप्त घर था और जिसमें वह तरह-तरह की दवाइयाँ, ऐयारी का सामान, अजीब ढंग की पोशाकें, तरह-तरह के औजार और हर्बे तथा इसी तरह के और बहुत-से सामान रक्खा करता था, यद्यपि वह घबड़ाया हुआ था परन्तु फिर भी यहाँ एकान्त में आकर बैठ गया और सोचने लगा कि अब क्या करना चाहिये, बहुत जल्द उसने यह निश्चय कर लिया कि फलाने ढंग से शंकरसिंह को मार कर बखेड़ा तै कर डालना ही अब सबसे अच्छा है, फिर जो कुछ होगा देखा जायगा। ऐसा निश्चय करने के साथ ही वह उठ खड़ा हुआ, जो कपड़े पहिने हुए था उन्हें उतार कर दूसरी स्याह पोशाक पहिनी और मामूली तौर पर अपना चेहरा रंग कर ऊपर से स्याह नकाब डाली। इसके बाद एक छुरा, एक खंजर और एक तमंचा तथा एक चोर लालटेन लेकर वह कमरे के बाहर निकला और अपने विचित्र मकान की कोठरियों में घूम-घूम कर शंकरसिंह को खोजने लगा। उसके दोनाली तमंचे में गोलियाँ भरी हुई थीं और रात पहर-भर से ज्यादे जा चुकी थी।

शंकरसिंह घूमते-फिरते किस जगह तक पहुँचे होंगे या किस अवस्था में होंगे इसे वह नहीं कह सकता था, अस्तु उनका पता लगाने के लिए दारोगा विचित्र ढंग से उन्हें खोजने लगा। उस मकान की बहुत-सी कोठरियाँ और दालानों में कोई-न-कोई सूराख, दरीची, रोशनदान या बालाखाना जरूर था, जिसमें से झाँक कर दारोगा उन कोठरियों और कमरों की अवस्था दूर से ही देख रहा था, इस समय उसने निश्चय किया कि पहिले उन्हीं कोठरियों और कमरों में देखना चाहिये जिनमें मैं दूर से देख सकता हूं, अगर वहाँ पता न लगेगा तब बाकी कोठरियों में घूम कर देखा जायगा।

आखिर उस अंधकार के समय में भी घूम-फिर कर दारोगा ने थोड़ी ही देर की मेहनत में शंकरसिंह को खोज निकाला, ऊपर-ही-ऊपर वह एक ऐसे बालाखाने में पहुँचा जिसके नीचे की तरफ एक छोटा-सा चौखूटा कमरा बना हुआ था, चोर लालटेन के जरिये से देखने पर मालूम हुआ कि इसी कमरे में शंकरसिंह जमीन के ऊपर बेहोश पड़े हुए हैं। दारोगा ने उनके चेहरे पर लालटेन की रोशनी डाली परन्तु शंकरसिंह की निद्रा भंग नहीं हुई, साथ ही इसके यह भी दिखाई दिया कि उनका दाहिना हाथ छाती के ऊपर है और वहाँ से निकला हुआ बहुत-सा खून चारों तरफ फैल रहा है। शंकरसिंह की ऐसी अवस्था देखते ही दारोगा चौंक पड़ा और बोल उठा, ‘‘मालूम होता है कि इन्होंने आत्महत्या कर ली! घूमते-घूमते जब निकल जाने के लिए कहीं रास्ता न मिला तब घबड़ा कर ऐसा किया होगा। खैर यह भी अच्छा हुआ, मुझे इनके खून से अपना हाथ रंगना न पड़ा।’’

जिस जगह पर दारोगा खड़ा होकर शंकरसिंह को देख रहा था उसके दोनों बगल दो छोटे-छोटे दरवाजे थे। एक दरवाजा जिसमें से होकर दारोगा यहाँ आया था खुला हुआ था मगर दूसरा बन्द था। दारोगा ने उस बन्द दरवाजे को खोला और अन्दर जाकर एक सुरंग में पहुँचा जो दस-बारह हाथ से ज्यादे लम्बी न थी। सुरंग के अन्त में भी एक दरवाजा था जिसे दारोगा ने खोला। यहाँ पर नीचे उतर जाने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। उन्हीं की राह से नीचे उतर कर दारोगा उस कमरे में पहुँचा जिसमें शंकरसिंह पड़े हुए थे। दारोगा को इस बात का निश्चय नहीं था कि वे मर गये या जीते हैं इसलिए एकाएक पास जाते वह डरा और दूर ही से कुछ सायत तक देखता रहा, इसके बाद हाथ में भरा हुआ तमंचा लिए आगे बढ़ा, कुछ देर लालटेन की रोशनी उनके चेहरे पर डाल कर गौर से देखता रहा। अन्त में उसे निश्चय हो गया कि ये जीते नहीं बल्कि मरे हुए हैं, तब पास गया और नब्ज पर हाथ रख कर अपना शक मिटाने के बाद देखा कि दाहिने हाथ में छुरे का कब्जा है और छुरा कलेजे में अन्दर घुसा हुआ है।

‘‘अब इन्हें ठिकाने पहुँचाना चाहिये।’’ कह कर दारोगा वहाँ से लौट पड़ा और थोड़ी देर में और दो आदमियों को साथ लिए पुनः शंकरसिंह की लाश के पास पहुँचा। इन दोनों के चेहरे पर भी नकाब पड़ी हुई थी। दारोगा की आज्ञानुसार दोनों नकाबपोशों ने शंकरसिंह की लाश उठाई और दारोगा के पीछे रवाना हुए।इस कमरे में तीन दरवाजे थे, एक तो वह जिस राह से दारोगा आया था, दूसरा दरवाजा वह था जिस राह शंकरसिंह आये थे, और तीसरा दरवाजा इस समय बन्द था। उसी तीसरे दरवाजे को खोलकर दारोगा उसके अन्दर गया और लाश उठाये हुए दोनों नकाबपोश भी उसके पीछे-पीछे चले गए। यह भी पहिले कमरे की तरह का ही एक चौखूटा कमरा था पर उसके चारों तरफ दीवार में चार बड़ी-बड़ी आल्मारियाँ थीं जिन्हें खोलने या बन्द करने के लिए कोई खास खटका बना हुआ था। दारोगा ने एक अलमारी का पल्ला खोला, उसमें किसी तरह का कोई सामान न था और न वह वास्तव में आलमारी ही थी बल्कि उसके अन्दर एक छोटी-सी कोठरी थी जिसमें मुश्किल से चार या पाँच आदमी खड़े हो सकते थे। कोठरी में से ही नीचे उतर जाने के लिये सीढ़ियाँ बनी हुई थीं, शंकरसिंह की लाश उठवाये हुए दारोगा नीचे तहखाने में उतर गया जो एक गोल कमरे के ढंग का बना हुआ था। इस कमरे के नीचे एक और तहखाना था जिसमें उतर जाने के लिए कमरे के बीचोंबीच में रास्ता बना हुआ था और उसका मुँह लकड़ी के तख्ते से ढका हुआ था। दारोगा ने तख्ता उठाया और शंकरसिंह की लाश उसके अन्दर फेंक देने के लिये अपने दोनों आदमियों को कहा।

शंकरसिंह की लाश उसके अन्दर फेंक दी गई, तख्ता गिरा कर तहखाने का मुँह ढक दिया गया और तीनों आदमी नाक दबाये हुए जल्दी-जल्दी ऊपर की तरफ रवाना हुए क्योंकि तख्ता खोलने के साथ ही उसके अन्दर से बदहवास कर देने वाली ऐसी सड़ी बदबू निकली कि जिससे वे तीनों ही आदमी परेशान हो गये थे।

अपने पीछे के सब दरवाजे बन्द करते हुए तीनों आदमी ऊपर चले आये जहाँ दारोगा ने अपने दोनों साथियों को विदा किया और तब अपने गुप्त कैदखाने में चला गया जहाँ पहिले ही से भूतनाथ बैठा हुआ उसका इन्तजार कर रहा था। दारोगा वहाँ ठहरा नहीं बल्कि भूतनाथ को लेकर उसी तरफ पलट पड़ा जहाँ जमुना, सरस्वती और इन्दुमति शंकरसिंह के आने का इन्तजार कर रही थीं और उन तीनों औरतों के साथ जो कुछ सलूक इन दोनों ने किया वह पहिले के बयान में लिखा जा चुका है, मतलब यह कि दारोगा ने जमना, सरस्वती और इन्दुमति को भूतनाथ के हवाले कर दिया।

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