भूतनाथ - खण्ड 2 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8361
आईएसबीएन :978-1-61301-019-8

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भूतनाथ - खण्ड 2 पुस्तक का ई-संस्करण

चौथा बयान


आँख खुलने के साथ ही भूतनाथ को सामने देख कर जमना, सरस्वती और इन्दुमति चौंक पड़ीं और घबरा कर अपनी अवस्था की तरफ देखने लगीं। कपड़े से उन तीनों के हाथ-पैर बँधे हुए थे और कलम-दवात तथा कागज का एक सादा टुकड़ा जमना के सामने पड़ा हुआ था।

भूत० : (तीनों की तरफ देख के) बस मुझे विशेष कहने की कोई जरूरत नहीं जितना ही तुम लोगों का मुलाहिजा किया गया उतना ही तुम लोग शेर होती गईं, अस्तु अब तुम लोगों के साथ अन्तिम व्यवहार किया जाता है। यह कलम-दवात और कागज का टुकड़ा तुम लोगों के सामने पड़ा हुआ है, तुम तीनों में से कोई एक इस कागज पर जो कुछ मैं कहूँ सीधी तरह लिख दो तब तो तुम लोगों को छोड़ दूँगा नहीं तो खूब समझ रखना की बेंत और कमचियों से मार-मार कर तुम लोगों की खाल उधड़वा दूँगा और तड़पा कर तुम लोगों की आत्मा को उस तरफ रवाना कर दूँगा जहाँ को जाने वाला फिर इस सूरत में लौट कर नहीं आता ।।।

जमना० : बस-बस, अपना लम्बा-चौड़ा व्याख्यान रहने दे, हम लोगों को तेरे हाथ से जान बचाने की अब कोई जरूरत नहीं।

सर ०: चाहे किसी तरह की मौत मिले हम लोगों को वह जरूर प्यारी होगी।

इन्दु० : हम लोग इस दुनिया को छोड़ जाना ही पसन्द करती हैं, इस दुनिया से कूच कर जायँगे मगर तुझे खुश करने के लिए पूरा सामान छोड़ जायेंगे।

जमना० :इन लोगों के साथ वैसा ही सलूक कर जैसा कि तू बर्दाश्त कर सके, उतना ही मार जितना कि तेरे शरीर सह सके, और उसी जगह भेज जहाँ जाना तू पसन्द करे।

भूत० (क्रोध से दाँत पीस कर) मालूम होता है कि तुम लोगों का दिमाग खराब हो गया है, तुम लोगों को।।।

भूतनाथ और कुछ कहा है चाहता था कि पीछे से आवाज आई, ‘‘जरा ठहरना, जल्दी न करना।’’ भूतनाथ ने पीछे फिरकर देखा तो दारोगा साहब के प्यारे दोस्त जैपालसिंह पर निगाह पड़ी। थोड़ी दूर आगे बढ़कर जैपाल रुक गया और उसने हाथ का इशारा करके भूतनाथ को अपने पास बुलाया।

भूतनाथ ने समझा कि वह कोई ऐसा सन्देश कहने के लिए आया है जो जमना, सरस्वती और इन्दुमती के सुनने लायक नहीं और इसीलिए वह इन लोगों के पास से हटकर मुझे अलग बुला रहा है, अस्तु वह तेजी के साथ जैपाल १ के पास चला गया और बोला, ‘‘कहो क्या बात है?’’ (१। जैपाल का कुछ परिचय चन्द्रकान्ता सन्तति में दिया जा चुका है।)

जैपाल : मैं दारोगा साहब का भेजा आपके पास आया हूँ।

भूत० : क्या उनके पास कोई आदमी उस वक्त न था जो उन्होंने आपको परेशान किया?

जैपाल : आदमी तो बहुत थे मगर मामला कैसा नाजुक है इसे भी तो सोचिये!

भूत० : बेशक इस मौके पर दूसरे आदमी का आना अच्छा न होगा। जमना, सरस्वती और इन्दुमति पर किसी की भी निगाह न पड़नी चाहिये।

जैपाल : आप समझते हैं तो फिर ऐसा सवाल क्यों करते हैं?

भूत० : (मुस्कराता हुआ) बेशक मेरी भूल थी जो मैंने ऐसा पूछा, अच्छा बताइये आपका आना किस लिए हुआ? क्या कोई पत्र लाये हैं?

जैपाल : नहीं, पत्र तो नहीं लाया हूँ परन्तु जुबानी सन्देश के साथ-साथ एक डिबिया है जिसके विषय में दारोगा साहब ने कहा है कि इसे खोल कर जमना, सरस्वती और इन्दुमती को दिखा देना और अगर इस पर भी वे तुम्हारी बात न मानें तो उन्हें अवश्य कत्ल कर डालना। इसके अतिरिक्त यह भी कहा है कि ‘सन्ध्या समय मुझसे ‘बसन्त बाग’ में जरूर मिलना’।

इतना कह कर जैपाल ने अपनी कमर से चाँदी की एक डिबिया निकाली और भूतनाथ के हाथ में दी। डिबिया का ढकना बहुत सख्त बैठा हुआ था परन्तु भूतनाथ ने उसे जोर से खोला, देखा कि उसके अन्दर मरहम की तरह जंगारी रंग का कोई जमाया हुआ पदार्थ है जिसके बीचोबीच में रक्खा हुआ एक हीरे का टुकड़ा अपनी तड़प दिखा रहा है। यह मरहम निहायत ही खुशबूदार था, बिना नाक के साथ लगाये ही उसकी खुशबू से दिमाग मुअत्तर हो रहा था और खुश्बू भी ऐसी प्यारी थी कि बिना सूँघे भूतनाथ से रहा न गया। उसके नाक के साथ डिबिया लगा कर उसको सूँघा और साथ ही चक्कर खाकर जमीन पर गिर के बेहोश हो गया।

भूतनाथ यदि नाक लगा कर उस मरहम को न भी सूँघता तो भी बेहोश हो जाता, परन्तु कुछ समय के बाद, क्योंकि बेहोश करने वाली उस मरहम की खुशबू से उसका दिमाग मुअत्तर हो चुका था।

जमना, सरस्वती और इन्दुमति दूर से इस तमाशे को देख रही थीं। बेहोश भूतनाथ को उसी जगह छोड़ जैपाल जमना, सरस्वती और इन्दुमति के पास गया और बोला, ‘‘मैं हूँ आदित्यमण्डल!’’ यह अनूठा शब्द सुनते ही वे तीनों प्रसन्न हो गईं, उनकी आँखें डबडबा आईं और तीनों ने सर झुका कर नकली जैपाल को प्रणाम किया। इस जैपाल ने फुरती के साथ उनके हाथ-पैर खोल दिये और तीनों को साथ लिये हुए घने जंगल में घुस कर बात-की-बात में नजरों से गायब हो गया।

इस वारदात को दो घण्टे गुजर गये, भूतनाथ अभी तक बेहोश पड़ा हुआ है, यद्यपि दोपहर की करारी धूप बड़ी ही दुखदायी हो रही थी परन्तु भूतनाथ एक घने पेड़ के नीचे है जहाँ और भी दो घण्टे धूप के आने की उम्मीद नहीं। पाठक महाशय, देखिये एक बार पुनः जमना,सरस्वती और इन्दुमति उसी स्थान की तरफ आ रही हैं जहाँ उनकी बेहोशी दूर हुई थी या जहाँ आँख खुलने के साथ ही उन्होंने अपने सामने भूतनाथ को मौजूद पाया था।

मगर ये जमना, सरस्वती और इन्दुमति अपनी खुशी से वहाँ नहीं आ रही हैं बल्कि जबरदस्ती के साथ लाई जा रही हैं, तीन आदमी मजबूती के साथ पकड़े हुए उन्हें उसी स्थान पर ले आये तथा पहिले की तरह मजबूती के साथ फिर उनके हाथ-पैर बाँध कर उसी तरफ जमीन पर बैठा दिया। उसी समय एक चौथा आदमी भी आया जो अपनी पीठ पर बेहोश जैपाल को लादे हुए था, उसने भूतनाथ के पास पहुँच कर गठरी उतारी और जैपाल को जमीन पर सुला जिधर से आया था उधर ही चला गया, ये तीनों आदमी भी जो जमना, सरस्वती और इन्दुमति को गिरफ्तार कर लाये थे अपना काम पूरा करके चले गये और फिर लौट कर न आये।

कुछ देर और बीतने के बाद भूतनाथ की बेहोशी दूर हुई, उसने करवट बदली और दो-चार दफे अंगडाई लेकर उठ खड़ा हुआ। थोड़ा विचार करते ही उसे विश्वास हो गया कि जरूर उसके साथ चालाकी खेली गई और जैपाल की सूरत बन कर जरूर कोई ऐयार आया जो उसको धोखा देकर बेहोश करने के बाद अपना काम कर गया, परन्तु उसी समय उसकी निगाह बेहोश जैपाल पर पड़ी और साथ ही इसके जमना सरस्वती और इन्दुमति को भी उसने देखा जो हाथ-पैर बँधे रहने के कारण ज्यों-की-त्यों बैठी हुई लम्बी साँसें ले रही थीं, अस्तु उसका विचार पलट गया और अब वह सोचने लगा कि ‘नहीं, जैपाल ने मुझे कोई धोखा नहीं दिया, अगर वह कोई ऐयार होता तो जरूर अपना काम कर यहाँ से चला जाता। मगर मैं देखता हूँ कि उसके साथ-साथ जमना, सरस्वती और इन्दुमति भी ज्यों-की-त्यों मौजूद हैं और मेरी अवस्था में भी किसी तरह का फर्क नहीं पड़ा है यहाँ तक कि ऐयारी का बटुआ भी कमर में मौजूद है, साथ ही इसके जैपाल भी इसी जगह बेहोश पड़ा हुआ है जिससे मालूम होता है कि जिस डिबिया को सूँघ कर मैं बेहोश हो गया उसी खुशबू ने जैपाल को भी बेहोश कर दिया है। (कुछ सोच कर और चौंक कर) मगर आश्चर्य की बात है कि वह डिबिया दिखाई नहीं देती। शायद जैपाल ने उठा कर अपने पास रख ली है, अब इसे होश में लाया जाय तो पता लगे’। इत्यादि बातें सोच कर भूतनाथ जैपाल के पास गया और अपने बटुए में से लखलखा निकाल कर उसे सुँघाने लगा मगर वह होश में न आया, भूतनाथ बोल उठा, ‘‘ओफ बड़ी कड़ी बेहोशी है! ईश्वर की ही कृपा थी कि मैं इतनी जल्दी होश में आ गया।’’

दो-तीन बार लखलखा सुँघाने पर भी जब जैपाल होश में न आया तो भूतनाथ ने उसे छोड़ दिया और जमना, सरस्वती और इन्दुमति के पास जाकर क्रोध-भरी निगाहों से उनकी तरफ देख के बोला, ‘‘बस अब मैं ज्यादे इन्तजार नहीं कर सकता, साफ जवाब दो कि जो कुछ मैंने कहा था वह लिख देने के लिए तुम तैयार हो या नहीं।’’

इसके जवाब में उन औरतों ने मुँह से कुछ नहीं कहा मगर हाथ से जरूर कुछ इशारा किया जिसे भूतनाथ कुछ समझ न सका। उसे विश्वास हो गया कि मेरे कहे के मुताबिक ये औरतें कदापि न लिखेंगी। अस्तु उसने चिन्ता और क्रोध से व्याकुल होकर तलवार खैंच ली और यह कह कर कि, अच्छा फिर जो कुछ होगा देखा जायगा, एक ही तलवार में जमना का सर अलग कर दिया, इतने पर भी भूतनाथ को सब्र न हुआ और लगे हाथ सरस्वती और इन्दुमति को भी मार कर अपने हिसाब से निश्चिन्त और बेफिक्र हो गया।

हाय हाय, भूतनाथ ने कैसी संगदिली का काम किया! कैसी बेदर्दी के साथ इन बेचारियों पर तलवार का वार किया! उसका कलेजा कैसा पत्थर का-सा था बल्कि ऐसा अंधेर करते समय भी जरा न हिला और मामूली ढंग पर बकरी या भेंड़ समझ कर उसने उन्हें लापरवाही के साथ मार डाला। आह भूतनाथ, तूने यह काम अच्छा नहीं किया, निःसन्देह इसका बहुत बुरा नतीजा तुझको भोगना पड़ेगा।

उस भयानक जंगल में इन लोगों को गाड़ने के लिए एक गड्हा भी भूतनाथ ने पहिले से तजवीज कर रक्खा था जो उस स्थान से थोड़ी ही दूर पड़ता था। तीनों लाशों को उसी गड्हे में फेंक कर भूतनाथ ने ऊपर से मिट्टी और कतवार वगैरह डाल कर अच्छी तरह ढंक दिया और तब जहाँ-जहाँ पर उनका खून गिरा था वहाँ की मिट्टी रगड़ कर उसका निशान भी मिटा दिया।

इन सब बातों से निश्चिंत होकर भूतनाथ पुनः जैपाल के पास आया, उसे उसी तरह बेहोश पाया, पुनः लखलखा सुँघाया मगर कुछ फायदा न हुआ, नब्ज पर हाथ रख कर देखा तो बहुत बारीक और सुस्त चल रही थी जिससे भूतनाथ को गुमान हुआ कि कहीं इस बेहोशी के कारण यह मर ही न जाय, मगर ऐसा नहीं हुआ और कुछ देर बाद दो-चार करवटें बदल कर जैपाल उठ बैठा। अपने सामने भूतनाथ को देख उसने सलाम किया। भूतनाथ ने उससे मिजाज का हाल पूछा मगर उसने कुछ जवाब न दिया, भूतनाथ ने समझा कि अभी इसका मिजाज ठिकाने नहीं हुआ, कुछ देर और ठहर जाने पर यह इस लायक हो जायगा कि मेरी बातों का जवाब दे, अस्तु कुछ समय और ठहर जाने के बाद पुनः उसके मिजाज का हाल पूछा, इस बार वह कुछ इशारा करके उठ खड़ा हुआ आश्चर्य के साथ चारों तरफ देखने लगा, उसी समय दूर से कई सवारों के आने की आहट मिली, कुछ ही देर बाद जिन्हें भूतनाथ ने भी देखा और तुरत वहाँ से हट जाने का इरादा किया। जैपाल को इशारे में और जुबानी भी यह कह कर कि ‘खैर तुम दारोगा साहब के पास लौट जाओ, मैं कल उनसे मिलूँगा’, भूतनाथ ने एक तरफ का रास्ता लिया और उसका इशारा समझ जैपाल भी वहाँ से कहीं हट गया।

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