भूतनाथ - खण्ड 2 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8361
आईएसबीएन :978-1-61301-019-8

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भूतनाथ - खण्ड 2 पुस्तक का ई-संस्करण

तीसरा बयान


जमना, सरस्वती और इन्दुमती उस दरीची में से झाँक कर देख रही थीं और इस आशा में थीं कि अब शंकरसिंह शीघ्र यहाँ आकर हम लोगों को इस कैद से छुटकारा देंगे। जब शंकरसिंह दारोगा को साथ लिए हुए उस मकान की तरफ बढ़े तब उन तीनों औरतों ने अपने विचार की पुष्टि समझी और जमुना के मुँह से निकल पड़ा ‘लो अब तो वे हमारी तरफ चले आ रहे हैं!’’

हम ऊपर लिख आये हैं कि जमना, सरस्वती और इन्दुमति के पीछे दारोगा के दो आदमी नंगी तलवार लिये खड़े हो गये थे और वे तीनों खिड़की के नीचे झाँक रही थीं। अस्तु उन दोनों नकाबपोशों ने भी झाँक कर नीचे की अवस्था देख ली थी। दारोगा का दिल चाहे कैसा ही मजबूत हो परन्तु उन दोनों नकाबपोशों के कलेजे हिल गये और उन दोनों ने निश्चय कर लिया कि अगर शंकरसिंहजी हम दोनों को यहाँ देख लेंगे तो निश्चय ही हम जान से मारे जायेंगे, यह विचार उनका मजबूत होता चला गया और जब उन दोनों ने देखा कि दारोगा को साथ लिये हुए शंकरसिंह इसी तरफ चले आ रहे हैं तब वे दोनों एकदम से ही भाग खड़े हुए, जमना, सरस्वती और इन्दुमती को मालूम भी न हुआ कि हमारे निगहबान कब और कहाँ भाग गये। शंकर सिंह को अपनी तरफ आते देख प्रसन्नता के साथ घूम कर जमना ने इन्दुमति से कुछ कहने के लिये पीछे की तरफ देखा तब मालूम हुआ कि वे दोनों नकाबपोश गायब हो गये। तीनों को आश्चर्य हुआ मगर साथ ही यह भी विश्वास हो गया कि शंकरसिंह के डर से वे दोनों भाग गये।

कई क्षण आश्चर्य करने के बाद जमना ने इन्दुमति और सरस्वती की तरफ देखकर कहा—

जमना० :क्या हम लोगों को इसी जगह पर खड़े रहना चाहिये?

सरस्वती : फिर और क्या किया जायगा?

जमना० :अगर उस कमरे में जहाँ हम कैद थे चलें तो क्या हर्ज है? शायद हमारे नारायणजी उसी तरफ आवें।

इन्दु० : इसका कौन ठिकाना है? देखो इधर भी तो एक दरवाजा है। शायद इसी राह से आवें, इसके अतिरिक्त उन्होंने इस ठिकाने हम लोगों को देख लिया है इसलिये उनका सबसे ज्यादा विचार इसी स्थान पर आने का होगा, दूसरी जगह चले जाने से कदाचित मुलाकात में देर हो!

सरस्वती : तुम्हारा विचार बहुत ठीक है।

जमना० :बेशक हम लोगों को इसी जगह अटकना चाहिए। (रुक कर और किसी आहट की तरफ ध्यान देकर) मालूम नहीं क्या बात है, उन्हें आने में इतनी देर क्यों हुई!

इन्दु० : बेशक देर तो जरुर हुई, कहीं दारोगा को साथ लिए दूसरी तरफ तो नहीं चले गये।

सरस्वती : ईश्वर ही जाने!

इसी तरह के विचारों के साथ जमना, सरस्वती और इन्दुमति को इन्तजार करते हुए कई घण्टे बीत गये मगर शंकरसिंह उनके पास न आये। अन्त में पहर-भर से ज्यादे रात बीत जाने के बाद लाचार हो कर वे तीनों वहाँ से हटीं और धीरे-धीरे से उस कमरे की तरफ रवाना हुईं जिसमें कैद थीं मगर उसी समय पीछे की तरफ से किवाड़ खुलने की आवाज आई और जब घूमकर पीछे की तरफ देखा तो नकाबपोशों पर निगाह पड़ी।

बात-की-बात में वे दोनों नकाबपोश जमना, सरस्वती इन्दुमति के पास जा पहुँचे, बिना कुछ कहे-सुने दोनों ने अपनी कमर से एक-एक चादर खोलकर उन तीनों औरतों के ऊपर फेंक दी और चेहरे पर दो-तीन दफे लपेट कर हाथ से कुछ क्षण के लिए थाम लिया। उन चादरों में से एक तरह की बहुत तेज खुशबू आ रही थी जो बेहोशी पैदा करने वाली थी, अस्तु उसकी खुशबू से बहुत जल्द बेहोश होकर जमना, सरस्वती और इन्दुमति जमीन पर गिर पड़ीं और जब कई पहर बीत जाने के बाद उनकी बेहोशी दूर हुई और उन्होंने आँखें खोलकर आश्चर्य से चारों तरफ देखा तो अपने को एक भयानक जंगल में पड़े और भूतनाथ को सामने खड़े पाया। अनुमान से इस समय दिन एक पहर से ज्यादा चढ़ चुका था।

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