भूतनाथ - खण्ड 2 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8361
आईएसबीएन :978-1-61301-019-8

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भूतनाथ - खण्ड 2 पुस्तक का ई-संस्करण

पाँचवाँ बयान


दयाराम की खोज निकालने की धुन में तीन आदमी अपने-अपने स्थान से बाहर निकले। निरंजनी को दारोगा साहब से नागर की बदौलत कुछ घनिष्ठ संबंध था और नागर निरंजनी को बहुत प्यार करती थी अस्तु निरंजनी पहिले नागर ही के घर की तरफ रवाना हुई। भूतनाथ यद्यपि दारोगा से कुछ लड़ गया था परन्तु उसे इतना जरूर विश्वास था कि यदि मैं दारोगा के घर उसका दोस्त बनकर जाऊँगा तो वह मेरी खुशामद करने के लिए तैयार मिलेगा और चाहेगा कि मुझे किसी तरह अपना दोस्त बनावे, इसलिए दारोगा नि:सन्देह डरता था और यह बात इन्द्रदेव को मालूम थी परन्तु इन्द्रदेव का विश्वास था कि यदि मैं दयाराम के विषय में दारोगा से कुछ कहूँगा तो वह जरूर अनजान बनकर इनकार कर जायगा और कहेगा कि उनके बारे में मैं कुछ नहीं जानता, इस खयाल से इन्द्रदेव ने दारोगा को अपने घर ही बुला कर कुछ कार्रवाई करना मुनासिब समझा और अपने एक सवार को चीठी देकर दारोगा के पास रवाना किया जिसमें मजमून लिखा हुआ था :-

‘‘मेरे परम प्रिय गुरुभाई,

पत्र देखते ही हजार काम छोड़ कर मेरे पास चले आइये, मैं खुद आपसे मिलने के लिए आता परन्तु अपने स्वास्थ्य के बिगड़ जाने से बिलकुल लाचार हो रहा हूँ, नहीं तो आपको कष्ट न देता।

यदि कार्यवश महाराज भी आपको रोकें तो उनसे मेरी तरफ से क्षमा-प्रार्थना करना परन्तु आने में विलम्ब न करना।

आपका- इन्द्रदेव।’’

इस पत्र को लेकर सवार तेजी से के साथ जमानिया की तरफ रवाना हुआ और इन्द्रदेव दारोगा के आने का इन्तजार करने लगे।

तीसरे दिन संन्ध्या के समय दारोगा साहब इन्द्रदेव के घर पहुँचे और उन्होंने बड़ी खातिर से दारोगा को अपने कैलाश-भवन के एक सुन्दर कमरे में उतारा जो उस मकान या खण्ड से बिलकुल ही निराले में पड़ता था जिसमें इन्द्रदेव की गृहस्थी और जमना, सरस्वती तथा इन्दुमति वगैरह रहती थीं।

खातिरदारी से छुट्टी पाने के बाद जब दोनों आदमी निश्चिन्ती से एकान्त में बैठे तो इन्द्रदेव और दारोगा से इस तरह बातचीत होने लगी :-

दारोगा : कहो क्या मामला है जो तुमने इस तरह यकायक जल्दी के साथ मुझे बुला भेजा? तुम्हारी चीठी पाकर तो मैं बहुत ही घबड़ा गया था फिर भी ईश्वर को धन्यवाद है कि यहाँ आकर तुम्हें तन्दुरुस्त पाता हूँ।

इन्द्र : नहीं, मैं तंदुरुस्त नहीं हूँ। यद्यपि उस दिन बनिस्बत जिस दिन मैंने आपको चीठी लिखी थी आज कुछ अच्छा दिखाई देता हूँ और मुझमें चलने-फिरने तथा घोड़े पर चढ़ने की भी हिम्मत हो गई है परन्तु फिर भी मैं अपने को तन्दुरुस्त नहीं मानता और वैद्य की बात पर विश्वास करता हूँ जिसने मुझे संकोच छोड़ कर यह कह दिया है कि इन्द्रदेव, अगर तुम पन्द्रह दिन तक जीते बच गए तो फिर तुम्हें इस बीमारी से किसी तरह का डर न रहेगा।’

दारोगा : (आश्चर्य और दुख के साथ) हैं ऐसी बात है! आखिर तुम्हें बीमारी क्या है सो भी तो कुछ मालूम हो!

इन्द्र : मुझे एक अजीब तरह की बीमारी हो गई है! मेरे पैरों में सख्त दर्द रहता है। कभी-कभी वह दर्द आठ-आठ दस-दस घण्टे तक बन्द रहता है और जब यकायक उभरता है तो अधमुआ करके छोड़ देता है। इसी तरह दिन में दो-तीन मरतबे कलेजे में दर्द होता है और उस समय तो मैं अपने जीवन से बिलकुल ही निराश हो जाता हूँ। खाना-पीना बिल्कुल ही नष्टप्राय हो रहा है, केवल मूँग की दाल खाने की आज्ञा वैद्यजी दे गए हैं!

दारोगा : बड़े दु:ख की बात सुना रहे हो!

इन्द्र : आप जानते हैं कि मेरा कोई लड़का नहीं हैं और मैं एक भारी तिलिस्म का दारोगा हूँ।

दारोगा : हाँ यह तो मैं बखूबी जानता हूँ।

इन्द्न : यद्यपि मेरे घर लड़का होने की उम्मीद है सही नहीं कह सकता कि लड़का होगा या लड़की अथवा दोनों की उम्मीद जाती रहेगी।

दारोगा : परमात्मा न करे ऐसा हो!

इन्द्न : भविष्य के गर्भ में क्या है सो कोई नहीं जानता।

दारोगा : बेशक ऐसा ही है।

इन्द्न : अतएव चाहता हूँ कि आपको तिलिस्म में ले चल कर वहाँ के कुछ भेद समझाने के साथ-ही-साथ एक वसीयतनामा और तिलिस्म की तालियों का गुच्छा आपके हवाले कर दूँ। ईश्वर की कृपा से यदि अच्छा रहा तो पन्द्रह-बीस दिन बाद तालियों का गुच्छा आपसे वापस लूँगा नहीं तो उस वसीयतनामे के पढ़ने से आपको तिलिस्म का सब हाल मालूम हो जायगा, तथा और भी जो कुछ मैंने उस वसीयतनामे में लिख रक्खा है उसे आप बखूबी पूरा करेंगे, ऐसी आशा केवल आप ही से रख सकता हूँ।

इन्द्रदेव की बीमारी का हाल सुन कर दारोगा साहब को दु:ख हुआ सही परन्तु इन्द्रदेव जिस तिलिस्म का दारोगा है वहाँ का भेद मालूम हो जायगा और वहाँ की तालियाँ भी मिल जायेंगी इस आशा से वह दिल में बहुत ही खुश भी हुआ मगर इस खुशी को अपने चेहरे से जाहिर न होने दिया।

सराहना तो इन्द्रदेव की करनी चाहिये कि इतनी दुष्टता देख कर भी उससे जाहिरदारी तोड़ने का विचार नहीं करता। यद्यपि वह दारोगा को चार दिन के लिये कैद करके अपना काम निकालना चाहता है मगर दारोगा साहब को दु:ख देना अथवा उससे जबर्दस्ती करना नहीं चाहता और न यही चाहता है कि दारोगा को उसके ऊपर किसी तरह का शक हो।

दारोगा ने दिल की प्रसन्नता के भाव को छिपाया और जाहिर में अपने चेहरे को रंजीदा बना कर इन्द्रदेव से कहा-

दारोगा : इन्द्रदेव, तुम्हारी इन बातों को सुन कर मेरा दिल डूबा जाता है। जो कुछ कहोगे उसे मैं करूँगा परन्तु इस दु:खमय बातों को सुन कर मेरे कलेजे में चोट लगती है। इस दुनिया में मेरा मददगार सिवाय तुम्हारे और कोई भी नहीं है इसलिए तुम्हारी बात अगर सच निकली तो तुम्हारे बाद मेरी क्या दशा होगी यह तो जरा सोचो।

इन्द्न : ईश्वर सब अच्छा ही करेगा। दुनिया में किसी के बिना किसी का काम अटका नहीं रहता है। अब भोजन करके आराम कीजिए, कल प्रात: काल आपको साथ लेकर मैं तिलिस्म की तरफ रवाना हो जाऊँगा।

दारोगा : तुम्हारी बातों ने मेरी भूख-प्यास बिल्कुल नष्ट कर दी है, अब मैं कुछ भोजन न करूँगा।

इन्द्र : नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।

इन्द्रदेव ने दारोगा के लिए भोजन इत्यादि का सामान ठीक कराया, दारोगा के साथ-ही-साथ इन्द्रदेव ने भी कुछ भोजन किया और तब दोनों आराम करने के लिए अलग-अलग कमरे में चले गये।

दूसरे दिन सुबह कोई दो घड़ी रात रहते इन्द्रदेव उठे और उन्होंने दारोगा साहब को नींद से होशियार किया। घण्टे भर के अन्दर ही दोनों आदमी जरूरी कामों से निपट सफर करने के लिए तैयार हो गये। हुक्म के मुताबिक दो घोड़े तैयार करके हाजिर किए गये जिन पर सवार होकर दारोगा तथा इन्द्रदेव घर से बाहर निकले तथा उत्तर की तरफ रवाना हुए।

दोपहर दिन चढ़े तक ये दोनों आदमी मामूली चाल पर बराबर चले गए। इसके बाद इनको पहाड़ों की तराई मिली और सुन्दर तथा साफ जल से भरा हुआ एक कुदरती तालाब भी नजर आया।

इन्द्रदेव ने दारोगा से कहा कि अब यहाँ पर उतर कर स्नान और कुछ भोजन कर लेना चाहिए, रात को मैंने अपने एक शागिर्द को आज्ञा दे दी थी कि वह यहाँ पर कुछ भोजन की सामग्री तैयार रक्खे, सम्भव है कि वह यहाँ आ चुका हो अथवा आते ही हो।

यद्यपि दारोगा वहाँ ठहरा नहीं चाहता था और तिलिस्म के अन्दर शीघ्र पहुँचने के लिए उसका जी बेचैन हो रहा था तथापि इन्द्रदेव की इच्छानुसार उसे रुकना ही पड़ा। दोनों आदमी उस तालाब के पास चले गये और एक सायेदार पेड़ की नीचे पहुँच घोड़े पर से उतर पड़े। दोनों ने अपने-अपने घोड़े (कुछ टहलाने और शान्त करने के बाद) पेड़ से बाँध दिए और जरूरी कामों से निपटने की फिक्र करने लगे।

थोड़ी देर में सब कामों से निश्चिन्त होकर दोनों आदमी पुन: वहाँ पहुँचे जहाँ उनके घोड़े पेड़ से बँधे हुए थे और जीनपोश बिछा कर बैठ गए। उसी समय एक आदमी सर पर एक छोटी-सी दौरी रक्खे उनकी तरफ आता हुआ दिखाई दिया। इन्द्रदेव ने दारोगा से कहा, ‘‘लीजिये जलपान का सामान भी आ पहुँचा।’’

उस आदमी के पास पहुँच कर जल पान की दौरी उनके सामने रख दी और पानी का बंदोबस्त करके पेड़ की आड़ में चला गया तथा ये दोनों भोजन करने लगे। इन्द्रदेव ने बीमारी का पाखण्ड रच ही रक्खा था इसलिए केवल एक-दो फल खाकर रह गए, मगर दारोगा ने तरह-तरह की चीजों पर खूब ही हाथ फेरा।

जलपान से छुट्टी पाकर जब दोनों आदमी निश्चिन्त हुए तब उनमें इस तरह बातचीत होने लगी -

इन्द्र : बीमारी ने मेदा ऐसा कमजोर कर दिया है कि एक-दो फल खाना भी भारी हो रहा है, छाती में बोझ-सा हो गया और सर घूमने लगा।

दारोगा : अफसोस तुम्हारी तन्दरुस्ती बहुत खराब हो गई है।

इन्द्र : (लेट कर) बैठना मुश्किल हो गया, सर पर चक्कर बढ़ता जाता है।

दारोगा : सर तो मेरा भी घूम रहा है। (कुछ ठहर कर) ऐसा मालूम होता है कि खाने की चीजों में बेहोशी की दवा मिली हुई थी।

इन्द्रदेव : मुझे भी ऐसा ही शक होता है। किसी ऐयार ने मेरे आदमी को धोखा तो नहीं दिया? उस आदमी की जाँच करनी चाहिए जो खाने का सामान लाया है।

इतना कहकर इन्द्रदेव उठ कर बैठे और ‘रामा-रामा’ कह उस आदमी को पुकारने लगे। वह पास ही पेड़ की आड़ में था, पुकारने से सामने आकर खड़ा हो गया और बोला, ‘‘आपका रामा मेरी बदौलत जहन्नुम की सैर कर रहा है। मैं तुम्हारे दुश्मन का ऐयार हूँ और अब तुम दोनों को गिरफ्तार करके अपने मालिक के पास ले जाऊँगा।’’

इतना कह कर वह कुछ दूर पीछे हट गया। उसकी बात सुन दारोगा के तो होश उड़ गए, उधर इन्द्रदेव ने जान-बूझ कर जमीन पर लेट के आँखें बन्द कर लीं। दारोगा ने समझा कि वह बेहोश हो गए, क्रोध में आकर उठ खड़ा हुआ और तलवार खैंच कर उस ऐयार की तरफ बढ़ा मगर कुछ कर न सका, थोड़ी ही दूर जाकर जमीन पर गिर पड़ा और बेहोश हो गया। दारोगा को बेहोश देखकर वह आदमी इन्द्रदेव के पास आया और धीरे से बोला, ‘‘उठिये, दारोगा साहब बेहोश हो गए।’’

इन्द्रदेव उठ खड़े हुए और अपने शागिर्द से बोले, ‘‘अब इन्हें हमारे मकान में ले जाकर कैद करो। जहाँ मैं तुम्हें बता चुका हूँ उस जगह पर इन्हें रखना और खाने-पीने का ख्याल रखना। इनको यह न मालूम होने पावे कि ये कहाँ पर और किसके यहाँ कैद हैं। इन्हें मैं घोड़े पर लाद देता हूँ, तुम भी उसी पर सवार हो जाओ, जंगल की राह से धीरे-धीरे जाओ जिसमें रात्रि के समय घर पहुँचो। मैं किसी काम के लिए तिलिस्म में जाता हूँ।’’

शागिर्द के साथ मिल कर इन्द्रदेव ने दारोगा को घोड़े पर लादा और शागिर्द को भी उसी पर चढ़ा कर घर की तरफ रवाना करने के बाद स्वयं उसी तरफ को चल पड़े जिधर जा रहे थे।

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