भूतनाथ - खण्ड 2 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8361
आईएसबीएन :978-1-61301-019-8

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भूतनाथ - खण्ड 2 पुस्तक का ई-संस्करण

तीसरा बयान


भूतनाथ ने जो कुछ बातें छिप कर सुनीं वह उसके लिए बड़े ही ताज्जुब की थीं। हम इस जगह पर यह नहीं कह सकते कि इन बातों को सुनकर भूतनाथ के दिल की क्या अवस्था हुई अथवा इससे उसके दिल पर क्या असर पड़ा, हाँ इतना जरूर मालूम होता है कि इस समय भूतनाथ का दिल उसके काबू में नहीं है और वह बहुत ही बेचैन हो रहा है।

भूतनाथ इस फिक्र में था कि किसी तरह दोनों को गिरफ्तार करना चाहिए परन्तु इस समय वह किसी तरह की ऐयारी नहीं कर सकता था, क्योंकि जिनको वह गिरफ्तार किया चाहता था वे घोड़े पर सवार जा रहे थे और भूतनाथ अपनी असली सूरत में था। इसलिए कोई अच्छी कार्रवाई करना बहुत कठिन था परन्तु इस मौके को वह छोड़ भी नहीं सकता था।

कई सायत तक वह खड़ा सोचता और उन दोनों सवारों की तरफ देखता रहा। इस बीच में उसे कोई बात याद आ गई। वह झट से एक पेड़ के नीचे बैठ गया और जो कुछ उसे करना था बड़ी तेजी और फुर्ती के साथ किया अर्थात् बटुए में से नकाब निकाल कर अपने चेहरे पर लगाई, इसके बाद एक शीशी निकाली जिसमें बहुत-सी गोलियाँ भरी हुई थीं, उनमें से एक गोली निकाल कर अपने मुँह में रक्खी और दो चीठियाँ जो लिफाफे में बन्द थीं और दो चाँदी की डिबियाएँ निकाल कर जेब में रखने के बाद बटुआ बन्द कर उन दोनों सवारों का पीछा किया जो आपुस में बातें करते हुए धीरे-धीरे चले जा रहे थे।

थोड़ी ही देर में भूतनाथ उन दोनों सवारों के पास पहुँचा और सामना रोक कर दोनों को सलाम किया, साथ ही जेब में से डिबिया और चीठी निकाल कर एक-एक डिबिया और एक-एक चीठी दोनों के हाथ में देते हुए कहा, ‘‘एक औरत ने जो अभी-अभी (हाथ का इशारा करके) उस तरफ जा रही है ये चीजें आपको देने के लिए मुझे भेजा है और कहा है कि बातचीत करने की धुन में यह डिबिया और चीठी आप लोगों को देना मैं बिलकुल ही भूल गई थी।’’

दोनों सवारों ने ताज्जुब के साथ भूतनाथ के हाथ से डिबिया और चीठी ले ली और कुछ पूछा, ‘‘तुम कौन हो और उन्हें कहाँ मिले? वे तो वहाँ हम लोगों के पास अकेली ही आई थीं!’’

भूत० :इसका जवाब देना मैं उचित नहीं समझता। जो कुछ काम मेरे सुपुर्द किया गया उसे पूरा कर चुका और जाता हूँ।

एक सवार० :ठहरो ठहरो, इस डिबिया और चीठी को देख तो लेने दो, शायद कुछ जवाब देने की जरूरत पड़े।

भूत० :बहुत अच्छा मैं ठहरता हूँ, आप देख लीजिए।

इतना कह कर भूतनाथ एक किनारे खड़ा हो गया और उन दोनों का तमाशा देखने लगा। उन्होंने पहिले तो डिबिया खोली और देखा कि उसमें नर्म मोम की तरह कोई खुशबूदार चीज भरी हुई है। डिबिया खुलने के साथ ही उसके अन्दर की खुशबू ने उन लोगों का दिमाग मुअत्तर कर दिया, यहाँ तक कि उन डिबियों को अच्छी तरह सूघें बिना उनसे रहा न गया। इसके बाद डिबियाँ बन्द करके जेब में रक्खीं और चीठी खोल कर पढ़ने लगे।

उन चीठियों में कुछ अजीब कुढंगे हर्फ लिखे हुए थे जो बिल्कुल ही समझ में नहीं आते थे। समझ लेना चाहिए कि वे चीठियाँ खाली बारीक लकीरों ही से भरी हुई थीं और केवल लोगों को धोखा देने के लिए भूतनाथ के बटुए में पड़ी रहा करती थीं। चीठी पढ़ते-पढ़ते उन्हें देर हो गई मगर फिर भी वे दोनों कुछ समझ न सके, आखिर एक ने भूतनाथ की तरफ देख के कहा, ‘‘यह आखिर क्या है?’’

भूत० :सो मैं क्या जानूँ!

एक : उसने क्या कह कर तुम्हें हमारे पास भेजा है?

भूत० :कुछ भी नहीं, जो कुछ होगा उसी चीठी में लिखा होगा।

दूसरा : यह चीठी तो पढ़ी ही नहीं जाती!

भूत० :तो मैं क्या करूँ?

पहिला : मालूम होता है कि तू हमसे चालाकी खेलता है!

भूत० :शायद ऐसा ही हो।

इतना कह कर भूतनाथ कई कदम पीछे हट गया और गौर से उन दोनों की तरफ देखने लगा।

भूतनाथ के ढंग और उसकी बातों ने उन दोनों को क्रोधित कर दिया और उन्हें इस बात का शक हो गया कि हो-न-हो यह कोई ऐयार है क्योंकि डिबिया के अन्दर की खुशबूदार चीज के सूँघने से उनके ऊपर धीरे-धीरे बेहोशी का असर होता जा रहा था। बातचीत करते-करते यद्यपि दोनों बेकार हो चुके थे तथापि क्रोध में भर अपने को रोक न सके और घोड़ा बढ़ा कर भूतनाथ पर हमला किया।पैंतरा बदल कर भूतनाथ ने उनका वार बचा लिया और इधर-उधर घूम-फिर कर उन दोनों को चक्कर लगाने और शरीर हिलाने का मौका दिया। कुछ ही देर बाद वे अपने को सम्भाल न सके और दोनों बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े।

सबके पहिले भूतनाथ ने दोनों घोड़ों पर कब्जा किया और उन्हें किनारे ले जाकर बागडोर के सहारे एक पेड़ के साथ बाँध दिया, इसके बाद बारी-बारी से उन दोनों आदमियों को उठा कर घोड़ों के पास ले गया।

धीरे-धीरे बड़ी होशियारी और मुस्तैदी के साथ भूतनाथ ने उन दोनों को घोड़ों पर रख कर बागडोर से बाँधा और दोनों घोड़ों की लगाम थामे हुए अपने घर का रास्ता लिया। इस समय वह अपनी कार्रवाई पर दिल-ही-दिल में खुश होता हुआ सोच रहा था कि ‘कल इन दोनों के बदले मैं अपने किसी शागिर्द को लेकर उस औरत से मिलूँगा और देखूँगा कि किस्मत क्या रंग दिखाती है।’’

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