भूतनाथ - खण्ड 2 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 2 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 2

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8361
आईएसबीएन :978-1-61301-019-8

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भूतनाथ - खण्ड 2 पुस्तक का ई-संस्करण

दूसरा बयान


दिन दो दोपहर से ज्यादे ढल चुका है। धूप की गर्मी हवा की तेजी को यद्यपि कम कर रही है तथापि नाजुक-मिजाजों के बर्दाश्त के बाहर है। भूतनाथ अपनी असली सूरत में मामूली ढंग पर शाहराह और सड़क छोड़ कर जंगल-ही-जंगल जमानिया की तरफ जा रहा है, मगर उसके चेहरे पर उदासी, नाउम्मीदी और बेचैनी छाई हुई है, उसको अपने इधर-उधर या आगे-पीछे की कुछ भी परवाह नहीं है, सर झुकाये हुए बराबर चला जा रहा है, हाँ, कभी-कभी सर उठाकर इस खयाल से देख लेता है कि रास्ता भटकने न पावे।

दो घण्टे तक बराबर चले जाने के बाद उसे कुछ आदमियों की बातचीत की आहट मालूम हुई जिससे वह खड़ा हो गया और ध्यान देकर सुनने लगा कि किधर से आवाज आ रही है। कुछ ही सायत में उसे मालूम हो गया कि बात करने वाले उससे ज्यादे दूरी पर नहीं हैं, भूतनाथ को उस आवाज पर कुछ शक मालूम हुआ और उन आदमियों को देखने तथा उनकी बातें सुनने की अपनी प्रबल इच्छा को रोक न सका अतएव वह जमीन पर बैठ गया और बहुत धीरे-धीरे पत्तियों की खड़खड़ाहट को बचाता हुआ उस तरफ बढ़ा जिधर से आवाज आ रही थी, यहाँ तक कि वह उन लोगों के इतना पास पहुँच गया कि वहाँ से उनकी बातचीत बखूबी सुन-समझ सकता था।

उन आदमियों को इसकी कुछ भी आहट नहीं लगी कि कोई आदमी उनकी बातें सुनने के लिए पास ही में आकर छिपा हुआ है अतएव भूतनाथ बड़ी बेफिक्री के साथ उनकी बातें सुनने लगा, साथ ही इसके उसने झाड़ियों में रास्ता करके यह भी देख लिया कि बातें करने वालों में दो मर्द और एक औरत है जिसकी उम्र बीस या पचीस वर्ष से ज्यादा न होगी।

यद्यपि वह मर्दों की तरह चपकन पायजामा पहिरे हुए हैं और सर पर मुँडासा भी उसने बाँध रखा है परन्तु उसकी आवाज और भूतनाथ की चालाक निगाहों के सामने उसका मर्दानापन कायम न रहा। उसी जगह पर पेड़ों के सहारे तीन घोड़े बागडोर के साथ बँधे हुए थे। अब सुनिये कि उन लोगों में कैसी भेद-भरी बातें हो रही हैं।

एक : जमना और सरस्वती को यदि यह भेद मालूम हो जाय तो वे दोनों उद्योग करके उन्हें बहुत जल्द छुड़ा लें। हम लोगों की मेहनत उनका मुकाबला नहीं कर सकती क्योंकि इन्द्रदेव और प्रभाकरसिंह उन दोनों के पक्षपाती हैं।

दूसरा : अजी नहीं, इन्द्रदेव को जमना और सरस्वती से क्या मतलब? वह दारोगा साहब के गुरुभाई हैं, दारोगा साहब भूतनाथ की मदद करते हैं और भूतनाथ इन दोनों औरतों का जानी दुश्मन है, इसी से समझ रखना चाहिये कि इन्द्रदेव क्योंकर दारोगा साहब के खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं।

पहिला : तुम्हें कुछ बसंत की भी खबर है या यों ही बकवाद कर रहे हो! बेईमान दारोगा के सबब से क्या धर्मात्मा इन्द्रदेव रणधीरसिंह का मुलाहिज़ा तोड़ देंगे या दयाराम को जान-बूझ कर अपने हाथ से भाड़ में झोंक देंगे?

औरत : (दूसरे की तरफ देख कर) नहीं-नहीं, ऐसा कदापि नहीं हो सकता, तुमको इस बात की खबर ही नहीं है कि इन्द्रदेव ही की बदौलत आज तक जमना और सरस्वती की जान बची हुई है नहीं तो दारोगा साहब और भूतनाथ अब तक उन दोनों का खात्मा कर चुके होते। इन्द्रदेव हर तरह से उन दोनों की मदद कर रहे हैं और करेंगे।

दूसरा : (आश्चर्य से) ऐसी क्या बात है?

पहिला : बेशक ऐसी ही बात है। इन्द्रदेव साधू और महात्मा आदमी हैं जो अभी तक दारोगा से गुरुभाई का रिश्ता और भूतनाथ से दोस्ती का नाता भी निभाए जाते हैं नहीं तो इन लोगों को जहन्नुम में पहुँचाना उनके लिए एक अदनी बात थी।

दूसरा : अगर यह बात है तो बेशक पता लग जाने पर इन्द्रदेव की सहायता से जमना और सरस्वती अच्छा काम कर सकती हैं।

औरत : नि:सन्देह! क्या तुम्हें मालूम नहीं कि जमना और सरस्वती ने भी इन्द्रदेव से ऐयारी सीखी है? मगर यह बात बहुत गुप्त है।

दूसरा : भला मुझे इस बात का पता क्योंकर लग सकता है, मगर आश्चर्य है कि तुम्हें यह बात कैसे मालूम हुई?

औरत : अकस्मात् ही मुझे यह बात मालूम हो गई।

दूसरा : क्योंकर?

औरत : उन दोनों को मैंने परसों भेष बदल कर घोड़े पर सवार काशी की तरफ जाते देखा था।

पहिला : जब भेष बदले हुए थीं तब तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि ये दोनों वे ही हैं?

औरत : मैं उस समय घोड़े पर सवार मामूली तौर पर केवल मर्दाना कपड़ा पहिरे हुए रणधीरसिंह के यहाँ जा रही थी, यकायक रास्ते में मेरा और उन दोनों का मुकाबला हो गया। सरस्वती ने मुझे पहिचान लिया और नाम लेकर पुकारा। मैं उन दोनों को पहिचान न सकी परन्तु पुकारने और अपना नाम सुन कर रुक गई। उन दोनों ने बड़ी मुहब्बत से मुझे अपने पास बुलाया। मैं डरती हुई उनके पास गई, मगर तब तक जमना ने मुझे कहा, ‘‘छन्नो, तू कहाँ जाती है? मैं तुझे पहिचान गई, तू हम दोनों को बिना बताएँ नहीं पहचान सकती। मेरा नाम जमना और इसका सरस्वती है, ओफ ओह, बहुत दिनों के बाद तुझे देखा। तुझे देखकर मेरे दिल में इस समय वही लड़कपन की मुहब्बत पैदा हो गई है। मेरी प्यारी छन्नो, क्या आजकल तू मेरे ससुराल में नहीं रहती?’’

पहिले तो मुझे उन दोनों के जमना और सरस्वती होने का विश्वास नहीं हुआ मगर जब उन्होंने लड़कपन की दो-एक बातें याद दिलाईं तब मुझे विश्वास हो गया और मुहब्बत से मेरा जी भी उमड़ आया क्योंकि मैं बहुत दिनों तक उन दोनों के साथ रह चुकी हूँ। हम तीनों में बड़ी ही मुहब्बत रही। जब वे दोनों अपने ससुराल से गायब हो गईं और उनके मरने की खबर मशहूर हुई तब मैंने भी रणधीरसिंह का घर छोड़ दिया था।

पहिला: यह तो बड़ी अजीब बात तुम सुना रही हो! अच्छा तब क्या हुआ?

औरत : मैं तुरंत घोड़े पर से उतर पड़ी और जमना के पैर के साथ लिपट गई। वे दोनों भी घोड़े पर से उतर पड़ीं और मुझे गले से लगा लिया। वहाँ बिल्कुल ही सन्नाटा था, सड़क के दोनों तरफ जंगल था और बड़े-बड़े साखू, आसन तथा सलई के पेड़ लगे हुए थे। हम तीनों सड़क के किनारे होकर पेड़ों की आड़ में चली गईं और देर तक बातें करती रहीं। बस उसी समय मुझे मालूम हुआ कि उन दोनों ने भी इन्द्रदेव से ऐयारी सीखी है।

पहिला : यह तो तुमने बड़ी बेढ़ब बात सुनाई। मुझे नहीं मालूम था कि उन दोनों से तुम्हारी मुहब्बत है।

औरत : सो भला कैसे मालूम होता, इस बात का कभी जिक्र तो आया नहीं था।

दूसरा : अच्छा तो तुमने क्या दयाराम वाला सब भेद उनसे कह दिया?

औरत : अभी नहीं, मैं ऐसा पसन्द नहीं करती कि काम अधूरा रहने पर किसी से ऐसा कठिन मामला कहूँ।

पहिला :मगर क्या तुम उन दोनों से यह भेद कहोगी?

औरत : सो मैं अभी नहीं कह सकती।

दूसरा : मगर नहीं। उन दोनों को इसका भेद नहीं कहना चाहिए, नहीं तो हम लोगों का मेहनत करना ही व्यर्थ हो जायगा तुम्हारे कहने ही से हम लोग इस मामले में उद्योग करने के लिए तैयार हुए हैं। यद्यपि इसके साथ-ही-साथ लालच का पल्ला भी हम लोगों ने पकड़ा हुआ है तथापि ईमानदारी का ख्याल भी हम लोगों के दिल से दूर नहीं हो सकता। इसलिए कदाचित् तुम्हारा यह विचार हो कि यह भेद अथवा खुशखबरी जमना, सरस्वती या इन्द्रदेव से कहो तो मदद लेने की जरूरत पड़े। और यदि ऐसा न कर सको तो आज ही हम लोगों को साफ-साफ जवाब दे दो, जो कुछ मेहनत कर चुके हैं उसी पर सन्तोष करेंगे।

औरत : (मुस्कराती हुई) नहीं-नहीं, हताश मत होवो, यदि मुझे ऐसा ही करना होता तो तुम लोगों को अपना साथी क्यों बनाती? तुम इस बात का विश्वास रक्खो। क्योंकि इस मामले में मुझे रुपये-पैसे की कुछ भी लालच नहीं है।मैं तो जो कुछ कर रही हूँ और जो तकलीफ उठा रही हूँ वह सब जमना, सरस्वती और दयाराम की मुहब्बत के कारण है। तुम लोगों को भी यही उचित है कि जिसमें काम जल्दी हो वही उपाय करो और इस बात का खयाल करो कि किसी भी दूसरे को यह भेद न मालूम हो अथवा किसी भी दूसरे का हाथ इस मामले में न लगे, क्योंकि केवल तुम्हीं दोनों के भरोसे पर रह जाना यह नीति के विरुद्ध है, सम्भव है कि तुम दोनों की मेहनत का कोई अच्छा नतीजा न निकले और देर हो जाने के कारण दयाराम की जान पर आ बने...।

दूसरा : (कुछ बिगड़ कर और बात काट कर) इतने दिन बीत गये दयाराम की जान पर नौबत न आई और अब महीने-पन्द्रह दिन को देर होने से उनकी जान चली जायगी! यह भी कैसा खयाल है? हाँ यह कहो कि तुम्हारा दिल ही डगमगा रहा है और हम लोगों पर तुमको भरोसा नहीं होता। मगर इस बात को खूब समझ रखना कि ऐयार होने के अतिरिक्त जिस शहर में दयाराम है हम दोनों भी उस शहर के रहने वाले हैं। घर-घर का भेद जो हम लोगों को मालूम हो सकता है वह किसी दूसरे को मालूम नहीं हो सकता।

औरत : इसी से तो मैं तुम्हें मेहनत करने के लिए कह रही हूँ और समझती हूँ कि इस काम को तुम जल्द कर सकोगे।

दूसरा : नहीं, अगर ऐसा समझती तो किसी आदमी का पुछल्ला हमारे साथ न लगातीं और यह भेद किसी दूसरे को कहने का ही इरादा न करतीं। क्या इस बात का ध्यान तुम्हें नहीं है कि ज्यादे आदमियों को इस बात की खबर हो जाने से धीरे-धीरे यह बात दुश्मन के कान तक भी पहुँच सकती है और दुश्मन चौकन्ना हो सकता है।

औरत : (मुस्कुरा कर) अगर इस बात का खयाल न होता तो मैं इस काम में जल्दी क्यों करती?

पहिला : असल तो यह है कि तुम दिल का भाव छिपाकर बातें करती हो, तुम्हें उचित यही है कि अपना इरादा साफ जाहिर कर दो।

औरत : मैं अपने दिल का भाव तुमसे नहीं छिपाती, इसका शक तो तुम अपने दिल से दूर कर दो और इरादे की जो कहते हो सो इरादा तो मेरा वही होता है कि यह भेद जमना, सरस्वती और इन्द्रदेव से कह दूँ वे जिसमें वे उस काम की धुन में लगें और तुम उनकी मदद करो।

दूसरा : मगर हम दोनों को यह बात पसन्द नहीं है।

औरत : (कुछ सोच कर) खैर पसन्द नहीं है तो जाने दो, तुम ही दोनों इस काम को कर डालो और दयाराम को खोज निकालो, मैं किसी और से इसका जिक्र नहीं करूँगी।

पहिला : अच्छा तो दयाराम के विषय में जो-जो बातें तुम्हें मालूम हो चुकी हैं वह सब हमें सुनाओ।

औरत : यह मामला कल पर रहने दो। इतना मैं कह चुकी हूँ कि फलाने शहर में दयाराम पड़े हुए हैं, बाकी और जो कुछ भेद की बातें मुझे मालूम होने वाली हैं उनका आज निश्चय करके तब कल तुमसे कहूँगी, तुम दोनों कल पुन: इसी समय इसी जगह आकर मिलना।

दोनों : बहुत अच्छा, कल जरूर आवेंगे।

इतनी बातें होने के बाद तीनों वहाँ से उठ खड़े हुए और अपने-अपने घोड़ों पर सवार होकर चले जाने की फिक्र करने लगे। भूतनाथ बड़ी फुर्ती और चालाकी से खिसकता हुआ एक घनी झाड़ी के अन्दर जा छिपा और जब वे लोग वहाँ से चले गए तो उसने उस औरत को छोड़कर दोनों मर्दों का पीछा किया जो बड़ी खुशी-खुशी आपुस में बातें करते हुए धीरे-धीरे पश्चिम की तरफ जा रहे थे।

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