लोगों की राय

मूल्य रहित पुस्तकें >> भूतनाथ - खण्ड 2

भूतनाथ - खण्ड 2

देवकीनन्दन खत्री

Download Book
प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8361
आईएसबीएन :978-1-61301-019-8

Like this Hindi book 1 पाठकों को प्रिय

366 पाठक हैं

भूतनाथ - खण्ड 2 पुस्तक का ई-संस्करण

।। पाँचवाँ भाग ।।

 

पहिला बयान


भूतनाथ ने क्रोध में आकर जमना, सरस्वती और इन्दुमति पर हमला तो किया मगर कुछ कर न सका क्योंकि वह बाग, मकान चबूतरा तिलिस्म से संबंध रखता था और इन्द्रदेव के कब्जे में था, अतएव कोई अनजान आदमी लापरवाही के साथ उस बाग और इमारत की सैर पूरी तरह से नहीं कर सकता था और न उस चबूतरे पर ही जा सकता था जिस पर जमना, सरस्वती और इन्दुमति बैठी हुई थीं, अस्तु नतीजा यह निकला कि भूतनाथ उस चबूतरे पर चढ़ने के साथ ही पछाड़ खाकर पीछे की तरफ जमीन पर गिर पड़ा और कुछ देर के लिए बेहोश हो गया। जब होश में आया तो उसने आश्चर्य के साथ उस चबूतरे की तरफ देखा परन्तु वे औरतें दिखाई न पड़ीं क्योंकि भूतनाथ की बेहोशी दूर होने के पहिले ही वे सब वहाँ से कहीं चली गई थीं।

भूतनाथ पुन: उस चबूतरे पर जाने की हिम्मत न कर सका और कुछ सोचता-विचारता बाग के उस हिस्से की तरफ रवाना हुआ जिधर इमारत थी और दो चार-आदमी भी टहलते दिखाई दे रहे थे। भूतनाथ घड़ी-घड़ी आश्चर्य के साथ यह सोचता था कि जमना ने यह क्योंकर कहा कि भैयाराजा ने तुम्हारे ऐयारी के बटुए पर कब्जा कर लिया था और अब वह मेरे पास मौजूद है। यह क्योंकर संभव हो सकता है कि वह बटुआ मेरे शार्गिद के हाथ से भैयाराजा के कब्जे में चला गया हो! बेशक जमना ने मुझे धोखा देने के लिए ऐसा कहा होगा।

धीर-धीरे भूतनाथ इस इमारत के पास जा पहुँचा और वहाँ उसने देखा कि इमारत के आगे एक बहुत बड़ा सहन है जिस पर भैयाराजा धीरे-धीरे टहल रहे हैं और हाथ में नंगी तलवारें लिए सात-आठ आदमी उसके पीछे-पीछे हैं। भूतनाथ पर निगाह पड़ते ही भैयाराजा ने मुस्करा कर कहा, ‘‘भूतनाथ, अब तुम्हारा क्या इरादा है? मुझे इस बात का बहुत ही दु:ख है कि तुम्हारी कसम सच्ची नहीं निकली।’’

भूत० :सो क्या? आपको कैसे मालूम हुआ कि मेरी कसम कोई सच्ची नहीं निकली?’’

भैयाराजा : यही आजमाने के लिए तो जमना, सरस्वती और इन्दुमति तुम्हारे सामने बैठाई गई थीं। आखिर तुम ने उन पर हमला किया ही तो? यह न सोचा कि मैं कहाँ और किसके कब्जे में हूँ। जब मेरे बाग में रह कर तुमने ऐसा किया तो यदि किसी दूसरी जगह वे दोनों तुम्हें मिल जातीं तो उन्हें कब जीता छोड़ते!

भूतनाथ ने भैयाराजा की इस बात का कुछ भी जवाब न दिया और शर्म से सर नीचा करके कुछ सोचने लगा। भैयाराजा ने पुन: कहा, ‘‘गदाधरसिंह, शायद तुमको यह मालूम नहीं कि इस बाग में पहुँचने के पहिले जिसने तुम्हारे कसम खाने पर तुम्हें ताड़ना की थी वह मैं ही हूँ, और जिसने अपनी ताड़ना पर तुम्हारे मुँह से ये शब्द निकालते हुए सुने थे कि- ‘‘नहीं, मैंने जो कुछ कहा है उसकी सच्चाई में किसी तरह भी फर्क नहीं पड़ सकता, मैं यहाँ तक तैयार हो चुका हूँ कि अपने ऐयारी के फन को भी तिलाँजलि दे दूँगा और दुनिया से एकदम किनारे हो जाऊँगा’- वह भी मैं ही हूँ।’’

भूत० :(आश्चर्य से भैयाराजा का मुँह देख कर) और वह त्रिशूल तथा डमरूधारी शिवरूपी महात्मा भी आप ही थे जिन्होंने मेरे बदन पर से त्रिशूल छुआ कर मुझे बेहोश कर दिया था?

भैयाराजा : नहीं।

भूत० :वह कौन था?

भैयाराजा : यह मैं नहीं कह सकता।

भूत० :और यह बाग किसका है?

भैयाराजा : इसका भी जवाब तुम नहीं पा सकते।

भूत० :(सिर झुका कर देर तक कुछ सोचने के बाद दोनों घुटने जमीन पर टेक कर और हाथ जोड़ कर) नि:सन्देह मैं अपराधी हूँ! मेरे पापों का कोई प्रायश्चित्त नहीं। अपनी चादर का एक धब्बा मिटाने की कोशिश करते हुए मैंने अपनी तमाम चादर को गंदला कर डाला जिसका साफ होना अब बहुत कठिन है। मैं जानता हूँ कि मेरे प्यारे दोस्त और मुझ पर अत्यन्त अनुग्रह करने वाले इन्द्रदेव से और आपसे दोस्ती है, नहीं-नहीं, आप दोनों अंतरंग मित्र हैं, और मुझे विश्वास है कि इन्द्रदेव ने जिस तरह मेरे अपराधों को क्षमा किया है और अपनी आँखों से मेरे कठोर प्रायश्चित्त को देखते हुए भी मुँह फेर लिया है तथा मेरे सब अपराधों पर मिट्टी डाल कर भी मुझे ठीक रास्ते पर चलाने की नीयत रखते हैं उसका नमूना दिखलाने वाला दुनिया में कोई भी नहीं होगा। हाँ, मुझ अभागे को इन्द्रदेव ने कई दफ़े समझाया कि ‘दयाराम का कलंक तेरे सिर से दूर कर दूंगा’ मगर मैंने इसका कुछ भी खयाल न किया। हा खेद, अब मैं इस दुनिया में मुँह दिखाने योग्य न रहा, जो कुछ मैं अब कह रहा हूँ यह भी मेरी बेहयाई है। (अपनी डबडबाई हुई आँखों को पोंछ कर) मैं इस योग्य नहीं कि आपसे क्षमा माँगूँ परन्तु आप इस योग्य हैं कि मुझे क्षमा करें और क्षमा करने के लिए इन्द्रदेव से भी सिफारिश करें।

इतना कहकर भूतनाथ पैरों पर गिर पड़ा और उसकी आँखों से आँसू की धारा बह चली। भैयाराजा ने उसे जल्दी से उठा कर छाती से लगा लिया परन्तु भूतनाथ ने जोर करके अपने को छुड़ा लिया और हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘हा खेद, मैं इस योग्य नहीं हूँ कि मुझे भाई की तरह छाती से लगावें और दया करें, बल्कि मैं इस योग्य हूँ कि आप मुझे अपने जूते के तले रौंदे और हजार लानत करें।’’

भैयाराजा : नहीं-नहीं गदाधरसिंह, तुम ऐसा खयाल मत करो। इन्द्रदेव की तरह मैं भी तुम्हें माफ करता हूँ। तुम्हारी इस समय की अवस्था देख कर मुझे विश्वास होता है कि अब तुमसे कोई अपराध न होगा। ईश्वर तुम्हारा दिल सदैव के लिए नेक करें। अच्छा मैं तुम्हें इस समय एक दवा पिलाना चाहता हूं, पिओगे?

भूत० :आप अब मुझे जहर हलाहल भी देंगे तो खुशी से पी लूँगा क्योंकि मैं इसी के योग्य हूँ और दुनिया में मुँह दिखलाने की इच्छा नहीं रखता।

भैयाराजा : ईश्वर तुम्हें नेकी दे। मैं तुम्हारे साथ कदापि बुराई नहीं कर सकता परन्तु हाँ इस समय जो दवा मैं तुम्हें पिलाऊँगा उससे तुम बेहोश जरूर हो जाओगे।

इतना कहकर भैयाराजा ने अपने एक आदमी की तरफ देख कुछ इशारा किया।

भूत० :मुझे इसकी कोई भी परवाह नहीं है कि मैं आपकी दी हुई दवा पीकर बेहोश हो जाऊँगा और न मैं इसके विषय में आपसे कुछ पूछने की ही इच्छा रखता हूँ।

भैयाराजा का इशारा पाकर वह आदमी किसी प्रकार की दवा से भरी हुई एक बोतल और चाँदी का छोटा-सा कटोरा ले आया और भैयारजा के हाथ में दिया। भैयाराजा ने उस बोतल की दवा से कटोरा भरा और भूतनाथ के हाथ में दिया, भूतनाथ ने खुशी-खुशी मुँह से कटोरा लगाया और दवा पीकर पुन: वह कटोरा इस विचार से भैयाराजा की तरफ़ बढ़ाया कि और दवा दीजिए मैं पीने के लिए तैयार हूँ, मगर भैयारजा ने यह कह कर कि ‘बस अब और पीने की कोई जरूरत नहीं’ कटोरा वापस लेने के लिए भूतनाथ की तरफ हाथ बढ़ाया।

भूतनाथ ने उनके हाथ में झूठा कटोरा देना उचित न जान कर उनके आदमी के हाथ में दिया और पुन: हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘मुझे क्षमा कीजिए और गुप्त हो जाने की आज्ञा दीजिए।’’

भैयाराजा : मैं यह नहीं चाहता कि तुम गायब हो जाओ, यह तुम्हारे लिए उचित नहीं है। मैं सच्चे दिल से तुम्हें सलाह देता हूँ कि तुम लोगों में मिले-जुले रह कर सभों का उपकार करो जिसमें ईश्वर तुम्हारे अपराधों को क्षमा कर दे।

भूत० :जो आज्ञा।

इतना कहते-कहते भूतनाथ की आँखें बन्द हो गईं और वह बेहोश हो जमीन पर लेट गया। जब उसकी आँखें खुलीं तो उसने अपने को उसी कोठरी में पाया जिसमें त्रिशूल के छू जाने से बेहोश होकर इस बाग में आया था।

कोठरी से बाहर निकलने पर उसने अपने ऐयारी के बटुए के सहित कई शागिर्दों को पाया जो उसके लिए चिन्तित और उदास उससे मिलने का इन्तजार कर रहे थे।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book