भूतनाथ - खण्ड 1 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 1 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 1

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8360
आईएसबीएन :978-1-61301-018-1

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भूतनाथ - खण्ड1 पुस्तक का ई-संस्करण

नौवाँ बयान

तीन दिन नहीं बल्कि पाँच दिन तक मेहमानी का आनन्द लूट कर आज प्रभाकरसिंह उस अद्भुत खोह के बाहर निकले हैं। इन पाँच दिनों के अन्दर उन्होंने क्या-क्या देखा-सुना, किस-किस स्थान की सैर की, किस-किस से मिले-जुले, सो हम यहाँ पर कुछ भी नहीं कहेंगे सिवाय इसके कि वे इन्दुमति को बिमला और कला के पास छोड़ गए हैं और इस काम से बहुत प्रसन्न भी हैं। साथ ही इसके यह भी कह देना उचित जान पड़ता है कि अब उनके विचारों में बहुत परिवर्तन हो गया है।

दिन पहर भर से कुछ कम बाकी है। प्रभाकरसिंह सिर झुकाये कुछ सोचते हुए पहाड़ के किनारे भूतनाथ की घाटी की तरफ धीरे-धीरे चले जा रहे हैं, वे जानते हैं कि भूतनाथ की घाटी का दरवाजा अब दूर नहीं है तथा उन्हें यह भी गुमान है कि भूतनाथ या गुलाबसिंह ताज्जुब नहीं कि बाहर ही मिल जायें। इसलिए वे धीरे-धीरे कदम उठाते हैं, इधर-उधर चौकन्ने होकर देखते हैं और कभी-कभी पत्थर की किसी सुन्दर चट्टान पर बैठ जाते हैं।

प्रभाकरसिंह का सोचना बहुत ठीक निकला। वे एक पत्थर की चट्टान पर बैठ कर कुछ सोच रहे थे कि भूतनाथ ने उन्हें देख लिया और तेजी से लपक कर इनके पास आया, मगर इन्हें सुस्त और उदास देख कर उसे ताज्जुब और दुख हुआ क्योंकि जिस तपाक के साथ वह प्रभाकरसिंह से मिलना चाहता था उस तपाक के साथ प्रभाकरसिंह उससे नहीं मिले, न तो उसका इस्तकबाल किया और न उसे आवभगत के साथ लिया। हाँ, इतना जरूर किया कि भूतनाथ को देख उठ खड़े हुए और एक लम्बी साँस लेकर बोले, ‘‘बस भूतनाथ!

तुमसे मुलाकात हो गई अब केवल गुलाबसिंह से मिलने की अभिलाषा है! इसके बाद फिर कोई भी मुझे प्रभाकरसिंह की सूरत में नहीं देख सकेगा!’’

भूत० : (आश्चर्य से) क्यों-क्यों, सो क्यों?

प्रभा० : तुम जानते हो कि इस दुनिया में मेरा कोई भी नहीं है, एक इन्दुमति थी सो वह भी ऐसे ठिकाने पहुँच गई, जहाँ कोई भी जाकर उससे मिल भी नहीं सकता।

भूत० : नहीं–नहीं प्रभाकरसिंह, ये शब्द बहादुरों के मुँह से निकलने योग्य नहीं हैं! क्या इन्दुमति का कुछ हाल आपको मालूम हुआ?

प्रभा० : कुछ क्या बल्कि बहुत।

भूत० : किस रीति से?

प्रभा० : आश्चर्यजनक रीति से।

भूत० : किसकी जुबानी?

प्रभा० : एक निर्जीव मूरत की जुबानी।

भूत० : बस इस पहेली से तो काम नहीं चलता, खुलासा कहिए नहीं तो...

प्रभा० : अच्छा बैठो और सुनो।

दोनों बैठ गए और तब भूतनाथ ने प्रभाकर से पूछा—

भूत० : अच्छा अब कहिये कि क्या हुआ और किसकी जुबानी आपको इन्दुमति का हाल मालूम हुआ?

प्रभा० : मैं कह चुका हूँ कि एक निर्जीव मूरत की जुबानी मुझे बहुत कुछ हाल मालूम हुआ जिसे सुनकर तुम ताज्जुब करोगे। सुनो और आश्चर्य करो कि तुम्हारे पड़ोस में कैसा एक विचित्र स्थान है! (रुक कर) नहीं नहीं, यह मेरी भूल है कि मैं ऐसा कहता हूँ, निःसन्देह उस विचित्र स्थान का हाल सबसे ज्यादा तुम्हीं को मालूम होगा, मैं तो नया मुसाफिर हूँ।

भूत० : आखिर किस स्थान के विषय में आप कह रहे हैं? कुछ समझाइए भी तो।

प्रभा० :(हाथ का इशारा करके) बस इसी तरफ थोड़ी दूर पर एक शिवालय है जिसके अन्दर शिवजी की नहीं बल्कि किसी तपस्वी ऋषि की मूर्ति है जो कि पूरे आदमी के कद की...

भूत० : हाँ-हाँ, ठीक है इस तरफ के जंगली लोग उसे अगस्त मुनि की मूर्ति कहते हैं, खूब लम्बी-लम्बी जटा है और मूर्ति के आगे एक छोटा-सा कुण्ड है जिसमें हरदम जल भरा रहता है, न मालूम वह जल कहाँ से आता है कि चाहे जितना भी खर्च करो कम होता ही नहीं, वह स्थान ‘अगस्ताश्रम’ के नाम से पुकारा जाता है।

प्रभा० : बस-बस, वही स्थान है।

भूत० : फिर, उससे क्या मतलब?

प्रभा० : उसी मूर्ति की जुबानी मुझे कई बातें मालूम हुईं हैं, तुम्हें तो मालूम ही होगा कि उसमें बात करने की शक्ति है।

भूत० : (दिल्लगी के तौर पर हँस कर) बहुत खासे! यह आपसे किसने कह दिया कि भूतनाथ ऐसा पागल हो गया है कि जो कुछ उसे कहोगे वह विश्वास कर लेगा!

प्रभा० : तो क्या मैं गप्प उड़ा रहा हूँ?

भूत० : अगर गप्प नहीं तो दिल्लगी ही सही!

प्रभा० : कदापि नहीं, मुझे आश्चर्य होता है कि तुम यहाँ के रहने वाले होकर उस मूर्ति का हाल कुछ नहीं जानते और यदि मैं कुछ कहता भी हूँ तो दिल्लगी उड़ाते हो! अस्तु जाने दो मैं इस विषय में कुछ भी नहीं कहूँगा हाँ, तुम चाहोगे तो साबित कर दूँगा कि वह मूर्ति बोलती है और त्रिकालदर्शी है! अच्छा जाओ गुलाबसिंह को जल्द भेजो कि मैं उससे मिल कर बिदा होऊँ।

भूत० : तो आप मेरे स्थान पर ही क्यों नहीं चलते? उस जगह आपको बहुत आराम मिलेगा, गुलाबसिंह से मुलाकात भी होगी और साथ ही इसके मेरा भ्रम भी दूर हो जायेगा।

प्रभा० : नहीं, अब मैं वहाँ न जाऊँगा, मैं उसी शिवालय में चल कर बैठता हूँ तुम गुलाबसिंह को उसी जगह भेज दो मैं मिल लूँगा, बस अब इस विषय में जिद न करो।

भूत० : प्रभाकरसिंहजी, मैं खूब जानता हूँ कि आप क्षत्रिय हैं और सच्चे बहादुर हैं, आपकी वीरता मौरूसी है, खानदानी है, निःसन्देह आपके बड़े लोग जैसे वीर पुरुष होते आए हैं वैसे ही आप भी हैं, मगर आश्चर्य है कि आप मुझे कुछ ऐयारी ढंग की बातें करके धोखे में डालना चाहते हैं...अच्छा-अच्छा, मेरी बातों से यदि आपकी भृकुटि चढ़ती है तो जाने दीजिए, मैं कुछ न कहूँगा, जाता हूं और गुलाबसिंह को बुलाए लाता हूँ।

इतना कह कर भूतनाथ ने जफील बजाई जिसकी आवाज सुनकर उसके तीन शागिर्द बात-की-बात में में वहाँ आ पहुँचे। भूतनाथ उन्हें इशारे में कुछ समझा कर विदा हुआ और अपनी घाटी की तरफ चला गया। प्रभाकरसिंह को मालूम हो गया कि भूतनाथ इन तीनों ऐयारों को मेरी निगरानी के लिए छोड़ गया है।

कुछ सोच-विचार कर प्रभाकरसिंह उठ खड़े हुए और धीरे-धीरे ईशानकोण की तरफ जाने लगे। एक घड़ी बराबर चले जाने के बाद वह उस शिवालय के पास पहुँचे जिसका जिक्र अभी थोड़ी देर हुई भूतनाथ से कर चुके थे और जिसका नाम भूतनाथ ने अगस्त मुनि का आश्रम बतलाया था।

यह स्थान बहुत ही सुन्दर और सुहावना था और पहाड़ की तराई में कुछ ऊँचे की तरफ बढ़ कर बना हुआ था, इस जगह दूर-दूर तक बेल के पेड़ बहुतायत के साथ लगे हुए थे और बेलपत्र की छाया से यह जगह बहुत ठण्डी जान पड़ती थी। मन्दिर यद्यपि बहुत बड़ा न था मगर एक खूबसूरत छोटी-सी चारदीवारी से घिरा हुआ था। आगे की तरफ एक मामूली सभामण्डप और बीच में मूर्ति के आगे एक छोटा-सा कुण्ड बना हुआ था जिसमें पानी हरदम भरा रहता था।

वह कुण्ड यद्यपि बहुत छोटा अर्थात् डेढ़ हाथ चौड़ा तथा लम्बा और उसी अन्दाज का गहरा था मगर उसके साफ और निर्मल जल से सैकड़ों आदमियों का काम चल सकता था। किसी पहाड़ी सोते का मुँह उसके अन्दर जरूर था जिसमें से जल बराबर आता और बह कर ऊपर की तरफ निकलता जाता था, इस कुण्ड के विषय में लोग तरह-तरह की गप्पें उड़ाया करते थे, जिसके लिखने की यहाँ कोई आवश्यकता नहीं।

प्रभाकरसिंह आकर इस मन्दिर के सभामण्डप में बैठ गए और भूतनाथ तथा गुलाबसिंह का इन्तजार करने लगे। उन्होंने देखा कि भूतनाथ के शागिर्द ऐयारों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा है बल्कि इधर-उधर चलते-फिरते दिखाई दे रहे हैं।

संध्या हुआ ही चाहती थी जब गुलाबसिंह को लिए भूतनाथ वहाँ आ पहुँचा जहाँ प्रभाकरसिंह बैठे उन दोनों का इन्तजार कर रहे थे। प्रभाकरसिंह को देख कर गुलाबसिंह ने प्रसन्नता प्रकट की और दो-चार मामूली बातचीत के बाद कहा—

‘‘भूतनाथ की जुबानी आपका हाल सुन कर मुझे बड़ा ही आश्चर्य हुआ। आपने भूतनाथ को यह समझाने की कोशिश की थी कि यह अगस्त मुनि की मूर्ति बोलती है और इसकी जुबानी आपको इन्दुमति का बहुत कुछ हाल मालूम हुआ है।’’

प्रभा० : निःसन्देह! मेरा कहना केवल आश्चर्य बढ़ाने के लिए नहीं है बल्कि इस विषय पर विश्वास दिलाने के लिए है, अब तुम आ ही गए हो तो अपने कानों से सुन लेना की मूर्ति क्या कहती है। मुझे यह बात अकस्मात मालूम हुई, मैं जानता था कि इस मूर्ति में ऐसे गुण भरे हुए हैं, मगर अफसोस इस बात का है कि यह मूर्ति रोज नहीं बोलती और न हर वक्त किसी के सवाल का जवाब देती है।

इसके बोलने का खास-खास दिन मुकर्रर है जिसका ठीक हाल मुझे मालूम नहीं है मगर इतने मैं जान गया हूँ कि बातचीत करते समय यह मूर्ति अन्त में खुद बता देती है कि अब आगे के दिन और किस समय बोलेगी। इसकी जुबानी सुन कर मैं कहता हूँ कि आज ग्यारह घड़ी रात जाने के बाद यह मूर्ति पुनः बोलेगी और इसके बाद पुनः रविवार के दिन बातचीत करेगी। आह, ईश्वर की लीला का किसी को भी अन्त नहीं मिलता! मेरी अक्ल हैरान है और कुछ भी समझ में नहीं आता कि क्या मामला है?

गुलाब० : निःसन्देह यह आश्चर्य की बात है! खैर अब जो कुछ होगा हम लोग देख ही सुन लेंगे परन्तु यह तो बताइये कि आप इस मूर्ति की जुबानी क्या-क्या सुन चुके हैं?

प्रभा० : सो मैं अभी कुछ नहीं कहूँगा, थोड़ी ही देर की तो बात है सब्र करो, समय आना ही चाहता है, जो कुछ पूछना हो खुद इस मूर्ति से पूछ लेना। तब तक मैं जरूरी कामों से निपट कर सन्ध्योपासन में लगता हूँ, अगर उचित समझिये तो आप लोग भी निपट लीजिए।

भूत० : मैं आपके लिए खाने-पीने की सामग्री लेता आया हूँ।

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