भूतनाथ - खण्ड 1 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 1 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 1

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8360
आईएसबीएन :978-1-61301-018-1

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भूतनाथ - खण्ड1 पुस्तक का ई-संस्करण

आठवाँ बयान

आज प्रभाकरसिंह उस छोटी-सी गुफा से बाहर आए हैं और साधारण रीति पर प्रसन्न मालूम होते हैं। हम यह नहीं कह सकते कि वे इतने दिनों तक निराहार या भूखे रह गए होंगे क्योंकि उनके चेहरे से किसी तरह की कमजोरी नहीं मालूम होती। जिस समय वे गुफा के बाहर निकले सूर्य भगवान उदय हो चुके थे। उन्होंने बँगले के अन्दर जाना कदाचित उचित न जाना या इसकी कोई आवश्यकता न समझी हो अस्तु वे उस सुन्दर घाटी में प्रसन्नता के साथ चारों तरफ टहलने लगे। नहीं-नहीं, हम यह भी नहीं कह सकते कि वे वास्तव में प्रसन्न थे क्योंकि बीच-बीच में उनके चेहरे पर गहरी उदासी छा जाती थी और वे एक लम्बी साँस लेकर रह जाते थे।

सम्भव है कि यह उदासी इन्दुमति की जुदाई से सम्बन्ध रखती हो और वह प्रसन्नता किसी ऐसे लाभ के कारण हो जिसे उन्होंने उस गुफा के अन्दर पाया हो। तो क्या उन्हें उस गुफा के अन्दर कोई चीज मिली थी या उस गुफा की राह से वे इस घाटी के बाहर हो गए थे अथवा उन्हें किसी तिलिस्म का दरवाजा मिल गया जिसमें उन्होंने कई दिन बिता दिए? जो हो, बात कोई अनूठी जरूर है और घटना कुछ आश्चर्यजनक अवश्य है।

बहुत देर तक इधर-उधर घूमने के बाद वे एक पत्थर की सुन्दर चट्टान पर बैठ गए और साथ ही किसी गम्भीर चिन्ता में निमग्न हो गए इसी समय इन्हें इन्दुमति ने पहाड़ी के ऊपर से देखा था मगर इस बात की प्रभाकरसिंह को कुछ खबर न थी। बहुत देर तक चट्टान पर बैठे कुछ सोचने-विचारने के बाद उन्होंने सर उठाया और इस नीयत से बँगले की तरफ देखा कि चलें उसके अन्दर चल कर किसी और विषय की टोह लगावें।

परन्तु उसी समय बँगले के अन्दर से आती हुई तीन औरतों पर उनकी निगाह पड़ी जिनमें से एक इन्दुमति, दूसरी बिमला और तीसरी कला थी।

इन्दुमति को देखते ही वे प्रसन्न होकर उठ खड़े हुए, उधर इन्दुमति भी इन्हंन देखते ही दीवानी-सी हो कर दौड़ी और प्रभाकरसिंह के पैरों पर गिर पड़ी।

प्रभा० : (इन्दु को उठा कर) अहा इन्दे! इस समय तुझे देख मैं कितना प्रसन्न हुआ यह कहने के लिए मेरे पास केवल एक ही जुबान है अस्तु मैं कुछ कह नहीं सकता।

इन्दु० : नाथ, मुझे आपने धोखे में डाला! (मुस्कराती हुई) मुझे तो इस बात का गुमान भी न था कि आप मेरे साथ चलते हुए रास्ते में किसी चुलबुली औरत को देख कर अपने आपे से बाहर हो जायेंगे और मेरा साथ छोड़ कर उसके साथ दौड़ पड़ेंगे! क्या इस विपत्ति के समय में मुझे अपने साथ लाकर ऐसा ही बर्ताव करना आपको उचित था? क्या आप की उन प्रतिभाओं का यही नमूना था!

प्रभा० : (हँसते हुए) वाह, तुम अपनी बहिन को और अपने ही मुँह से चुलबुली बनाओ! क्या मैं किसी चुड़ैल के पीछे दौड़ा था? तुम्हारी बहिन इस बिमला ही ने तो मुझे रोका और कहा कि जरूरी बात कहनी है। मैंने समझा कि यह अपनी हैं जरूर कुछ भलाई की बातें कहेंगी, अस्तु इनके फेर में पड़ गया और तुम्हें खो बैठा। तुम्हारे साथ गुलाबसिंह मौजूद ही थे और इधर बिमला से मैं कुछ सुनना चाहता था।

ऐसी अवस्था में यह कब आशा हो सकती थी कि साधारण मामले पर इतना पहाड़ टूट पड़ेगा! सच तो यह है कि तुम्हारी बहिन ने मुझे धोखा दिया जिसका मुझे बहुत रंज है और उसके लिए इनसे बहुत बुरा बदला लेता मगर आज इन्होंने तुमसे मुझे मिला दिया इसीलिए मैं इनका कसूर माफ करता हूँ मगर इस बात की शिकायत जरूर करूंगा कि मुझे यहाँ फँसा इन्होंने भूखों मार डाला, खाने तक को न पूछा, आओ-आओ बैठ जाओ, सब कोई बैठ कर बातें करें।

बिमला : वाह! बहुत अच्छी कही, आपने तो मानो अनशन व्रत ग्रहण किया था! साफ-साफ क्यों नहीं कहते कि किसी की फिक्र और तरद्दुद के कारण खाना-पीना कुछ अच्छा ही नहीं लगता था।

कला : (मुस्कराती हुई) रात-रात भर जाग के कोने-कोने की तलाशी लिया करते थे कि शायद कहीं छेद-सुराख और आले-आलमारी में से इन्दुमति निकल आवे।

प्रभा० : (चौंक कर, कला से) सो क्या?

बिमला : बस इतना ही तो! खैर इन बातों को जाने दीजिए यह बताइए आप मुझसे सन्तुष्ट हुए कि नहीं? अथवा आपको इस बात का निश्चय हुआ या नहीं कि हम लोगों ने जो कुछ किया वह नेकनीयती के साथ था?

प्रभा० : चाहे यह बात ठीक हो, चाहे तुम हर तरह से निर्दोष हो, चाहे तुम दोनों बहिनों पर किसी तरह के ऐब का धब्बा लगाना कठिन अथवा असम्भव ही क्यों न हो, परन्तु इतना तो मैं जरूर कहूँगा कि तुम्हारी कार्रवाई बदनीयती के साथ नहीं तो बेवकूफी के साथ जरूर हुई।

सम्भव था कि जिस दुश्मन पर फतह पा के तुम इन्दुमति को छुड़ा लाईं वह और जबर्दस्त होता या तुम पर फतह पा जाता तो फिर इन्दुमति पर कैसी मुसीबत गुजरती! मेरी समझ में नहीं आता कि इस अनुचित और टेढ़ी बात से तुम्हें या हमें क्या फायदा पहुँचा, हाँ, इन्दुमति जख्मी हुई यह मुनाफा जरूर हुआ। जिस तरह तुमने मुझे बहकाया था उस तरह वहाँ यही समझा दिया होता कि इन्दुमति को साथ लेकर वहाँ से हट जाना मुनासिब है, तो....

बिमला : (बात काट कर) नहीं-नहीं, यदि मैं ऐसा करती तो आप मुझ पर कदापि विश्वास न करते और भूतनाथ तथा गुलाबसिंह का साथ न छोड़ते, साथ ही इसके यह भी असम्भव था कि वहाँ पर मैं सविस्तार अपना हाल कह कर आपको समझाती, भूतनाथ के ऐबों को दिखाती अथवा अचित-अनुचित बहस करती, बल्कि....

इन्दु० : (बात काट कर, प्रभाकरसिंह से) खैर इन सब बातों से क्या फायदा, जो कुछ हुआ सो हुआ अब आगे के लिए सोचना चाहिए कि हम लोगों का कर्त्तव्य क्या है और क्या करना उचित होगा।

मैं इतना जरूर कहूंगी कि हमारी ये दोनों जमाने के हाथों से सताई हुई बहिनें इस योग्य नहीं हैं कि इन पर बदनीयती का धब्बा लगाया जाय हाँ यदि कुछ भूल समझी जाय तो वह बड़े-बड़े बुद्धिमान लोगों से भी हो जाया करती है। साथ ही इसके यह भी मानना पड़ेगा कि ग्रहदशा के फेर में पड़े हुए कई आदमी एक साथ मिल कर मुसीबत के दिन काटना चाहें तो सहज में काट सकते हैं बनिस्बत इसके कि वे सब अलग-अलग होकर कोई कार्यवाई करें, आप यह सुन ही चुके हैं कि ये दोनों (कला और बिमला किस तरह जमाने अथवा भूतनाथ के हाथों से सताई जा चुकी हैं अस्तु हम लोगों का एक साथ रहना लाभदायक होगा।

प्रभाकर : (इन्दु से) तुम्हारा कहना कुछ-कुछ जरूर ठीक है, मैं इस बात को पसन्द करता हूँ कि तुम यहाँ रहो जब तक कि मैं अपने दुश्मनों पर फतह पाकर स्वतन्त्र और निश्चिन्त न हो जाऊँ, मुझे इस बात की जरूर खुशी है कि तुम्हारे लिए एक अच्छा ठिकाना निकल आया है। मगर मैं हाथ-पैर तुड़ाकर नहीं रह सकता।

इन्दु० : मगर आपको इन दोनों की मदद जरूर करनी चाहिए।

प्रभा० : इसके लिए मैं दिलोजान से तैयार हूँ, मगर मैं भूतनाथ के साथ दुश्मनी न करूंगा जब तक कि अच्छी तरह जाँच न लूँ और अपने दोस्त गुलाबसिंह से राय न मिला लूँ।

बिमला : (कुछ घबराहट के साथ) तो क्या आप हम लोगों के बारे में गुलाबसिंह से कुछ जिक्र करेंगे?

प्रभा० : बेशक!

बिमला : तब तो आप चौपट ही करेंगे क्योंकि गुलाबसिंह भूतनाथ का दोस्त है और उससे हमारा हाल जरूर कह देगा। ऐसी अवस्था में मेरे मनसूबों पर बिलकुल ही पाला पड़ जाएगा बल्कि ताज्जुब नहीं कि सहज ही मैं इस दुनिया से...(लम्बी साँस लेकर) ओफ!

यदि मैं आपसे भलाई की आशा न करूँ तो दुनिया में किससे कर सकती हूँ? वह कौन-सा दरख्त है जिसके साये तले मैं बैठ सकती हूँ और वह कौन-सा मकान है जिसमें स्वतन्त्र रूप से रह कर जिन्दगी बिता सकती हूँ?

एक इन्द्रदेव जिन्होंने अपना हाथ मेरे सिर पर रक्खा है, और दूसरे आप जिनसे मैं भलाई की उम्मीद कर सकती हूँ। यदि आप ही मेरी प्रतिज्ञा भंग करने का कारण हो जाएंगे तो हमारी रक्षा करने वाला और हमारे सतीत्व को बचाने वाला, हमारे धर्म का प्रतिपालन करने वाला और कुम्हलाई हुई शुभ मनोरथलता में जीवन संचार करने वाला और कौन होगा?

मैं कसम खाकर कह सकती हूँ कि भूतनाथ कदापि आपके साथ भलाई न करेगा चाहे गुलाबसिंह आपका दिली दोस्त हो और चाहे भूतनाथ गुलाबसिंह को इष्टदेव के तुल्य मानता हो, साथ ही इसके मैं डंके की चोट पर कह सकती हूँ कि यदि आप मुझे धर्म-पथ से विचलित हुई पावें, यदि आपको मेरे निर्मल आँचल में किसी तरह का धब्बा दिखाई दे, और यदि जाँच करने पर मैं झूठी साबित होऊँ तो आपको अख्तियार है और होगा कि मेरे साथ ऐसा बुरा सलूक करें जो किसी अनपढ़, उजड्ड और अधर्मी दुश्मन के किए भी न हो सके, बेशक आप मुझे...

इतना कहते-कहते बिमला का गला भर आया और उसकी आँखों से आंसू की धारा बह चली।

प्रभा० : (बात काट कर दिलासे के ढंग से) बस-बस बिमला बस, मुझे विश्वास हो गया कि तू सच्ची है और दिल का गुबार निकालने के लिए तेरी प्रतिज्ञा सराहने के योग्य है। मैं शपथपूर्वक कहता हूँ कि तेरे भेदों को तुझसे ज्यादा छिपाऊँगा और तेरी इच्छा के विरुद्ध कभी किसी पर प्रकट न करूँगा चाहे वह मेरा कैसा ही प्यारा क्यों न हो, साथ ही इसके मैं विश्वास दिलाता हूँ कि तू मुझसे स्वप्न में भी बुराई की आशा न रखियो। मगर हाँ, मैं भूतनाथ की जाँच जरूर करूँगा कि वह कितने पानी में है।

बिमला : (खुशी से प्रभाकरसिंह को प्रणाम करके) बस मैं इतना ही सुनना चाहती थी, आपकी इतनी प्रतिज्ञा मेरे लिए बहुत है। आप शौक से भूतनाथ की बल्कि साथ ही इसके मेरी भी जाँच कीजिए मैं इसके लिए कदापि न रोकूँगी, मगर मैं खुद जानती हूँ कि भूतनाथ परले सिरे का बेईमान, दगाबाज और खुदगर्ज ऐयार है और ऐयारी के नाम पर धब्बा लगाने वाला है। मैं आपको एक चीज दूँगी जो समय पड़ने पर आपको बचावेगी, वह चीज मुझे इन्द्रदेव ने दी है और वह आप ऐसे बहादुर के पास रहने योग्य है। यदि आपकी इच्छा के विरुद्ध न हो तो मैं इन्द्रदेव से भी आपकी मुलाकात कराऊँगी।

प्रभाकर : मैं बड़ी खुशी से इन्द्रदेव से मिलने के लिए तैयार हूँ, उनसे मिलकर मुझे कितनी खुशी होगी मैं बयान नहीं कर सकता। वे निःसन्देह महात्मा हैं और मुझे उनसे मिलने की सख्त जरूरत है! मैं यह भी जानता हूँ कि वह मुझ पर कृपादृष्टि रखते हैं और ऐसे समय में मेरी भी पूरी सहायता कर सकते हैं।

बिमला : निःसन्देह ऐसा ही है। आप इस घाटी में तीन दिन के लिए मेरी मेहमानी कबूल करें इन तीन दिनों में कई अद्भुत चीजें आपको दिखाऊँगी और इन्द्रदेवजी से भी मुलाकात कराऊँगी क्योंकि कल वे यहाँ जरूर आवेंगे।

कला : (मुस्कराती हुई दिल्लगी के साथ) मगर ऐसा न कीजिएगा कि उस रात की तरह ये तीन दिन भी आप इस स्थान की तलाशी में ही बिता दें और हर रोज सुबह को एक नई घाटी से बाहर निकला करें।

प्रभा० : मैं पहिले ही आवाज देने पर समझ गया था कि तुमने उस रात की कार्रवाई देख ली है, इसे दोहराने की जरूरत न थी! अगर खुशी से तुम अपना घर न दिखाओगी तो मैं बेशक इसी तरह जबर्दस्ती देखने का उद्योग करूँगा।

कला : जबर्दस्ती से कि चोरी से!

इतना कह कर कला खिलखिला कर हँस पड़ी और तब कुछ देर तक इन सभों में इधर-उधर की बातें होती रहीं, इसके बाद धूप ज्यादा निकल आने के कारण सब कोई उठ कर बँगले के अन्दर चले गये और वहाँ भी कई घंटे तक हँसी-दिल्लगी तथा ताने और उलाहने की बातें होती रहीं।

इस बीच इन्दु ने अपनी दर्दनाक कहानी कह सुनाई और प्रभाकरसिंह ने भी अपनी बेबसी में जो कुछ देखा-सुना था इससे बयान किया।

दो पहर से ज्यादे दिन चढ़ चुका था जब बिमला सभों को लिए हुए अपने महल में आई, इतनी देर तक खुशी में किसी को भी नहाने-धोने अथवा खाने की सुध न रही।

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