भूतनाथ - खण्ड 1 - देवकीनन्दन खत्री Bhootnath - Vol. 1 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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भूतनाथ - खण्ड 1

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8360
आईएसबीएन :978-1-61301-018-1

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भूतनाथ - खण्ड1 पुस्तक का ई-संस्करण

सातवाँ बयान

प्रभाकरसिंह को इस घाटी में आए यद्यपि आज लगभग एक सप्ताह के हो गया मगर दिली तकलीफ के सिवाय और किसी बात की उन्हें तकलीफ नहीं हुई। नहाने-धोने, खाने-पीने, सोने-पहिरने इत्यादि सभी तरह का आराम था परन्तु इन्दु के लिए वे बहुत ही बेचैन और दुःखी हो रहे थे। जिस समय वे उस घाटी में आये थे उस समय बल्कि उसके दो-तीन घंटे बाद तक वे बड़े ही फेर और तरद्दुद में पड़े रहे क्योंकि कला बिमला ने उनके साथ बड़ी दिल्लगी की थी, मगर इसके बाद उनकी घबराहट कम हो गई जब कला और बिमला ने उन्हें बता दिया कि वे दोनों वास्तव में जमना और सरस्वती हैं।

पेड़ के पास लटकते हुए हिंडोले पर बैठने वाली औरत ने उन्हें थोड़ी देर के लिए बड़े ही धोखे में डाला। जब उन्होंने पेड़ पर चढ़ने का इरादा दिया तो वहाँ पहरा देने वाले दोनों नौजवान लड़कों ने गड़बड़ मचा दिया दौड़ते हुए और कई आदमियोंको बुला लाए जिन्होंने प्रभाकरसिंह को घेर लिया मगर किसी तरह की तकलीफ नहीं दी और न कोई कड़ी बात ही कही।

दोनों नौजवान लड़कों के हल्ला मचाने पर जितने आदमी इकट्ठे हो गए थे वे सब कद में छोटे बल्कि उन्हीं दोनों नौजवान सिपाहियों के बराबर थे जिन्हें देख प्रभाकरसिंह ताज्जुब करने लगे और विचारने लगे कि क्या वे लोग वास्तव में मर्द हैं?

पहिले तो क्रोध के मारे प्रभाकरसिंह की आँखें लाल हो गईं मगर जब कुछ सोचने-विचारने पर उन्हें मालूम हो गया कि ये सब मर्द नहीं औरतें हैं तब उनका गुस्सा कुछ शान्त हुआ और उन सभों की इच्छानुसार वे उस बंगले के अन्दर चले गए जिसमें छोटे-बड़े सब मिला कर ग्यारह कमरे थे।

बीच वाले बड़े कमरे में साफ और सुथरा फर्श बिछा हुआ था। वहाँ पहुँचने के साथ ही बिमला पर उनकी निगाह पड़ी और वे पहिचान गए कि मुझे भुलावा देकर यहाँ लाने वालियों में से यह भी एक औरत है जो बड़ी ढिठाई के साथ इस अनूठे ढंग पर इस्तकबाल कर रही है।

प्रभाकरसिंह ने बिमला से कहा, ‘‘मालूम होता है कि यह मकान आप ही का है!’’

बिमला : जी हाँ, समझ लीजिए कि आप ही का है।

प्रभाकर : अच्छा तो मैं पूछता हूँ कि तुमने मेरे साथ ऐसा खोटा बर्ताव क्यों किया?

बिमला : मैंने आपके साथ कोई बुरा बर्ताव नहीं किया बल्कि सच तो यों है कि आपको एक भयानक खोटे बेईमान और झूठे ऐयार के पंजे से बचाने का उद्येग किया जो कि सिवाय बुराई के कभी कोई भलाई का काम आपके साथ नहीं कर सकता था। अफसोस, आपको तो हम उसके फन्दे से निकाल लाए मगर बेचारी इन्दु फँसी रह गई जिसे बचाने के लिए हम लोग तन-मन-धन सभी अर्पण कर देंगे।

प्रभाकर : इसमें कोई सन्देह नहीं कि इन्दु के लिए मुझे बहुत बड़ी चिन्ता है और मैं यह नहीं चाहता कि वह किसी अवस्था में भी मुझसे अलग हो, मगर मैं इस बात का कभी विश्वास नहीं कर सकता कि भूतनाथ हम लोगों के साथ खोटा बर्ताव करेगा। मैं गुलाबसिंह की बात पर दृढ़ विश्वास रखता हूँ जिसने उसकी बड़ी तारीफ मुझसे की थी।

बिमला : नहीं, ऐसा नहीं है, वह...

प्रभा० : (बात काट कर) तुम्हारी बात मान लेना सहज नहीं है जिसने खुद मेरे साथ बुराई की! (क्रोध की मुद्रा से) बेशक तुमने मेरे साथ दुश्मनी की कि इन्दु को मुझसे जुदा करके एक आफत में डाल दिया! क्या जाने इस समय उस पर क्या बीत रही होगी!! हा, कहां है वह जिसे मैं अपनी साली समझता था जिसकी बात मान कर मैंने यह कष्ट उठाया! क्या अब वह अपना मुँह न दिखलावेंगी?

बिमला : आप क्रोध न करें, आपकी साली जरूर आपके सामने आवेगी और उसके साथ-साथ मैं भी इस बात को साबित कर दूँगी कि हम लोग आपके साथ दुश्मनी नहीं करते। इन्दु हमारी बहुत ही प्यारी बहिन है और उसे हम लोग हद्द से ज्यादे प्यार करते हैं, जिस तरह...

प्रभाकर : (सिर हिला कर) नहीं-नहीं, अगर तुम इन्दु को प्यार करती होतीं तो इस तरह मुझसे अलग कर के संकट में न डालतीं। कुछ देर के लिए यह भी मान लिया जाय कि भूतनाथ हमारा दुश्मन है, गुलाबसिंह ने हमसे जो कुछ कहा वह झूठ था, और तुमने वास्तव में हमें एक दुश्मन के हाथ से बचाना चाहा, मगर फिर भी यह कहना पड़ेगा कि वहाँ से बचा लाने के लिए वह ढंग अच्छा न था जो तुमने किया।

अच्छा होता यदि तुम मुझे यहाँ ले आने के बदले में उस जगह केवल इतना ही कह देतीं कि ‘देखो खबरदार हो जाओ, भूतनाथ का विश्वास मत करो, इन्दु को लेकर निकल भागो और फलानी राह से मेरे पास चले आओ’। बस अगर तुम ऐसा करतीं तो मैं तुम्हारी इज्जत करता।

बिमला : ठीक है मगर मुझे विश्वास नहीं था कि आप यकायक मेरी बात मान जायंगे।

‘‘यह सब तुम्हारी बनावटी बातें हैं।’’ इतना कह कर प्रभाकरसिंह एक उचित स्थान पर बैठ गए और बिमला भी उनके सामने बैठ गई।

प्रभाकर : (कई सायत तक कुछ सोचने के बाद) खैर पहिले यह बताओ कि जमना कहाँ है जिसके कारण मैं यहाँ तक आया?

बिमला : वे भी इसी जगह कहीं हैं, डर के मारे आपके सामने नहीं आतीं। उन्होंने मुझे यह कह कर आपके पास भेजा है कि ‘जीजाजी से मेरा प्रणाम कहो और यह कहो कि मैं यहाँ बड़े संकट में पड़ी हुई ग्रहदशा के दिन काट रही हूँ।

किसी कारणवश हर वक्त अपनी सूरत बदले रहती हूँ, दुश्मन पड़ोस में है जिसका हर दम डर ही लगा रहता है, अस्तु यदि आप मेरी रक्षा करने और मेरा भेद छिपाये रहने की प्रतिज्ञा करें तो मैं आपके सामने आऊं नहीं तो...

प्रभाकर : (आश्चर्य से) वाह वाह वाह!! (कुछ देर तक सोच कर) खैर जो कुछ हो, जमना को मैं इज्जत के साथ प्यार करता हूँ, वह मेरी बहुत ही नेक साली है। यद्यपि उसका यहाँ होना मेरे लिए ताज्जुब की बात है तथापि उसे देख कर मैं बहुत प्रसन्न होऊँगा। यदि यह उसी का मकान है तो मैं विशेष चिन्ता भी न करूंगा। तुम शीघ्र जाकर उसे कह दो कि मेरे सबब से तुम्हें किसी तरह की तकलीफ नहीं हो सकती, तुम्हारे भेद तुम्हारी इच्छानुसार मैं जरूर छिपाऊँगा।

प्रभाकरसिंह की बात समाप्त होते ही प्रसन्नता के साथ बिमला ने अपने चेहरे से झिल्ली उतार कर अलग रख दी और प्रभाकरसिंह के पैरों पर गिर पड़ी।

प्रभाकर : (बिमला को पैरों पर से उठा कर) जमना! अहा, क्या तुम वास्तव में जमना हो?

बिमला : जी हां, मैं वास्तव में जमना हूँ, इसमें आप कुछ भी संदेह न करें। ज्यादे देर तक तरददुद में न डाल कर मैं अभी आपका भ्रम दूर कर देती हूँ!

अपने जमना होने के सबूत में मैं आपको उस दिन की चिकोटी याद दिलाती हूँ जिस दिन मेरे यहाँ सत्यनारायण की कथा थी और जिसका हाल सिवाय आपके और किसी को नहीं मालूम है।

प्रभाकर : (प्रसन्न होकर) बेशक, बेशक, अब मुझे कुछ भी सन्देह नहीं रहा, परन्तु आश्चर्य! आश्चर्य!! तुम्हारे ससुर ने हाल ही में अपने हाथ से मुझे चीठी लिखी थी कि जमना और सरस्वती दोनों मर गई हैं! मैंने यह हाल अभी तक तुम्हारी बहिन इन्दु से नहीं कहा क्योंकि इस संकट के जमाने में इस खबर को सुना कर उन्हें और दुःख देना मैंने उचित नहीं जाना। मगर अब मुझे कहना पड़ा कि तुम्हारे ससुर ने झूठ लिखा, न मालूम क्यों?

बिमला : नहीं-नहीं, उन्होंने झूठ नहीं लिखा, उन्हें यही मालूम है कि जमना-सरस्वती दोनों मर गईं, मगर वास्तव में हम दोनों जीती हैं।

प्रभाकर : यह तो तुम और भी आश्चर्य की बात सुनाती हो!

बिमला : आपके लिए बेशक आश्चर्य की बात है। इसी से तो मैंने आपसे प्रतिज्ञा करा ली कि मेरे भेद आप छिपाये रहें, जिनमें से एक यह भी बात है कि हमारा जीते रहना किसी को मालूम न होने पाये।

इतना कह कर बिमला ने ताली बजाई। उसी समय तेजी के साथ सरस्वती (कला) एक दरवाजा खोल कर कमरे के अन्दर आई और प्रभाकरसिंह के पैरों पर गिर पड़ी। प्रभाकरसिंह ने प्रेम से उसे उठाया और कहा, ‘‘आह! मैं इस समय तुम दोनों को देख कर बहुत ही प्रसन्न हुआ क्योंकि सुरंग में तुम दोनों को देखना विश्वास के योग्य न था।

अब यह मालूम होना चाहिये कि तुम लोग यहाँ क्यों, किसके भरोसे पर और किस नीयत से रहती हो, तथा बाहर मौलसिरी (मालश्री) के पेड़ पर मैंने किसे देखा? नहीं-नहीं, वह इस सरस्वती के सिवाय कोई और न थी, मैं पहिचान गया, इसी की सूरत इन्दु से विशेष मिलती है!’’

बिमला : बेशक वह सरस्वती ही थी, क्षण-भर के लिए इसने आपके साथ दिल्लगी की थी।

कला : (मुस्कराती हुई) मगर जो कुछ मैं किया चाहती थी वह न कर सकी।

प्रभाकर : वह क्या?

कला : बस अब उसका कहना ठीक नहीं।

प्रभाकर : अच्छा यह बताओ कि तुम लोग यहाँ छिप कर क्यों रहती थीं?

बिमला : इसलिए कि कम्बख्त भूतनाथ से बदला लेकर कलेजा कुछ ठंडा करें, आपको नहीं मालूम कि वह मेरे पति का घातक है। उसने अपने हाथ से उन्हें मार कर हम दोनों बहिनों को विधवा बना दिया!!

प्रभाकर : (आश्चर्य से) यह तुम क्या कह रही हो?

बिमला : बेशक ऐसा ही है आपने उस कमीने को पहिचाना नहीं। वह वास्तव में गदाधरसिंह हैं, सूरत बदले हुए चारों तरफ घूम रहा है। आजकल वह अपनी नौकरी पर अर्थात् मेरे ससुर के यहाँ नहीं रहता।

प्रभाकर : यह तो मुझे भी मालूम है, गदाधरसिंह लापता हो रहा है और किसी को उसका ठीक हाल मालूम नहीं है, मगर यह बात मेरे दिल में नहीं बैठती कि भूतनाथ वास्तव में वही गदाधरसिंह है।

बिमला : मैं जो कहती हूँ बेशक ऐसा ही है।

प्रभाकर : (सिर हिलाकर) शायद हो। (कुछ सोच कर) खैर पहिले मैं इन्दु को उसके यहाँ से हटाऊँगा और तब साफ-साफ उससे पूछूँगा कि बताओ तुम गदाधरसिंह हो या नहीं? मगर फिर भी इसका सबूत मिलना कठिन होगा कि दयाराम को उसी ने मारा है।

बिमला : नहीं-नहीं, आप ऐसा कदापि न करें नहीं तो हमारा सब उद्योग मिट्टी में मिल जायगा।

प्रभाकर : नहीं, मैं जरूर पूछूंगा और यदि तुम्हारा कहना ठीक निकला तो मैं स्वयं उससे लड़ूँगा।

बिमला : (उदासी से) ओह! तब तो आप और भी अँधेर करेंगे!!

प्रभाकर : नहीं, इस विषय में मैं तुमसे राय न लूँगा।

बिमला : तब आप अपनी प्रतिज्ञा भंग करेंगे।

प्रभाकर : ऐसा भी न होने पावेगा (कुछ सोच कर) खैर यह तो पीछे देखा जायगा पहिले इन्दु की फिक्र करनी चाहिए। यद्यपि गुलाबसिंह उसके साथ है अभी यकायक उसे किसी तरह की तकलीफ नहीं हो सकती।

बिमला : मैं उसके लिए बन्दोबस्त कर चुकी हूँ।

प्रभाकर: आप यहाँ से जाने दो, भूतनाथ के घर जाकर सहज ही में यदि तुम चाहती हो तो उसे यहाँ तुम्हारे पास ले आऊँगा!

बिमला : जी नहीं, ऐसा करने से मेरा भेद खुल जायगा। वह बड़ा ही कांइयाँ है, बात-ही-बात में आपसे पता लगा लेगा कि उसकी घाटी के साथ एक और स्थान है जहाँ कोई रहता है। अभी उसे यह मालूम नहीं।

प्रभाकर : नहीं-नहीं, मैं किसी तरह तुम्हारा भेद खुलने न दूँगा।

बिमला : अस्तु इस समय तो आप रहने दीजिए, पहिले जरूरी कामों से निपटिए, ध्यान, पूजा-पाठ कीजिए, भोजन इत्यादि से छुट्टी पाइए, फिर जैसी राय होगी देखा जाएगा। मैं कुछ इन्दु बहिन की दुश्मन तो हूं नहीं जो उसे तकलीफ होने दूँगी आपसे मुझे खुटका लगा हुआ है, अगर वह यहाँ न आई तो मैंने किया ही क्या!

प्रभाकर : खैर जैसी तुम्हारी मर्जी, थोड़ी देर के लिए ज्यादे जोर देने की भी अभी जरूरत नहीं।

बिमला : अच्छा तो अब आप कुछ देर के लिए हम दोनों को छुट्टी दीजिए, मैं आपके लिए खाने-पीने का इन्तजाम करूँ, तब तक आप इस (उंगली का इशारा करके) कोठरी में जाइए और फिर बंगले के बाहर जाकर मैदान और कुदरती बाग में जहाँ चाहिए घूमिए-फिरिये। मैं बहुत जल्द हाजिर होऊँगी, मगर आप इस बात का खूब ख्याल रखिएगा कि अब हम दोनों को जमना और सरस्वती के नाम से सम्बोधित न कीजिएगा और न हम दोनों घड़ी-घड़ी जमना और सरस्वती की सूरत में आपको दिखाई देंगी। हम दोनों का नाम बिमला और कला बस यही ठीक है।

उसके बाद और भी कुछ समझा-बुझा कर कला को साथ लिए हुए बिमला कमरे के बाहर चली गई।

प्रभाकरसिंह भी उठ खड़े हुए और कुछ सोचते हुए उस कमरे में टहलने लगे-वे सोचने लगे—क्या जमना का कहना सच है? क्या भूतनाथ वास्तव में गदाधरसिंह ही है? फिर मैंने उसे पहिचाना क्यों नहीं! संभव है कि रात का समय होने के कारण मुझे धोखा हुआ हो या उसी ने कुछ सूरत बदली हुई हो! मेरा ध्यान भी तो इस तरफ नहीं था कि गौर से उसे देखता और पहिचानने की कोशिश करता, लेकिन अगर वह वास्तव में गदाधर सिंह है तो निःसन्देह खोटा है और कोई भारी घात करने के लिए उसने यह ढंग पकड़ा है।

ऐयार भी तो पहले दर्जे का है, वह जो न कर सके थोड़ा है, मगर ऐसा तो नहीं हो सकता कि उसने दयाराम को मारा हो। अच्छा उसने रणधीरसिंह का घर क्यों छोड़ दिया जिनका ऐयार था और जो बड़ी खातिर से उसे रखते थे? सम्भव है कि दयाराम के मारे जाने पर उसने उदास होकर अपना काम छोड़ दिया हो, या यह भी हो सकता है कि दयाराम के दुश्मन और खूनी का पता लगाने के लिए ही उसने अपना रहन-सहन का रंग-ढंग बदल दिया हो। अगर ऐसा है तो रणधीरसिंहजी इस बात को जानते होंगे। गुलाबसिंह ने वह भेद मुझ पर क्यों नहीं खोला!

हो सकता है कि उन्हें यह सब मालूम न हो या वे धोखे में आ गए हों, परन्तु नहीं, गदाधरसिंह तो ऐसा आदमी नहीं था। अस्तु जो हो, बिना विचारे और अच्छी तरह हकीकत किए किसी पक्ष को मजबूती के साथ पकड़ लेना उचित नहीं है। इसके अलावे यह भी तो मालूम करना चाहिए कि जमना और सरस्वती इस तरह स्वतंत्र क्यों हो रही हैं और उन्होंने अपने को मुर्दा क्यों मशहूर कर दिया तथा यह अनूठा स्थान इन्हें कैसे मिल गया और यहाँ किसका सहारा पाकर ये दोनों रहती हैं। भूतनाथ से दुश्मनी रखना और बदला लेने का व्रत धारण करना कुछ हंसी-खेल नहीं है और इस तरह रहने से रुपये-पैसे की भी कम जरूरत नहीं है।

आखिर यह है क्या मामला! यह तो हमने पूछा ही नहीं कि यह स्थान किसका है और तुम लोग आजकल किसकी होकर रहती हो। खैर सब पूछ लेंगे। कोई-न-कोई भारी आदमी इनका साथी जरूर है, उसे भी भूतनाथ से दुश्मनी है।

क्या इन दोनों पर व्याभिचार का दोष भी लगाया जा सकता है। कैसे कहें ‘हाँ’ या ‘नहीं’ ऐसे खोटे दिल की तो ये दोनों थीं नहीं। मगर ये सती और साध्वी हैं तो इनका मददगार भी कोई इन्हीं का रिश्तेदार जरूर होगा, मगर वह भी कोई साधारण व्यक्ति न होगा जिसका यह अनूठा स्थान है। हाँ यह भी तो है कि यदि ये व्याभिचारिणी होती तो मुझे यहाँ न लातीं और इन्दु को भी लाने की चेष्टा न करतीं...मगर अभी यह भी क्योंकर कह सकते हैं कि इन्दु को यहाँ लाने की चेष्टा कर रही हैं! अच्छा जो होगा देखा जायगा, चलो पहिले मैदान में घूम आवें तब फिर उन दोनों के आने पर बातचीत से सब मामले की थाह लेंगे।’’

प्रभाकरसिंह दरवाजा खोल कर उस कोठरी में घुस गए जिसकी तरफ बिमला ने इशारा किया था। उसके अंदर नहाने तथा सन्ध्या-पूजा करने का पूरा-पूरा सामान रक्खा हुआ था, बल्कि एक छोटी-सी आलमारी में कुछ जरूरी कपड़े और भोजन करने के अच्छे-अच्छे पदार्थ भी मौजूद थे। प्रभाकरसिंह ने अपनी ढाल-तलवार एक खूँटी से लटका दी और तीर-कमान भी एक चौकी पर रख कर कपड़े का कुछ बोझ हलका किया और जल से भरा हुआ लोटा उठा कर कोठरी के बाहर निकले। कई कदम आगे गए होंगे कि कुछ सोचकर लौटे और उस कोठरी में जाकर अपनी तलवार खूँटी पर से उतार लाये और बंगले के बाहर निकले।

दिन पहर भर से ज्यादा चढ़ चुका था और धूप मैं गर्मी ज्यादे आ चुकी थी मगर उस सुन्दर घाटी में जिसमें पहाड़ी से सटा हुआ एक छोटा-सा चश्मा भी बह रहा था, जंगली गुलबूटे और सुन्दर पेड़ों की बहुतायत होने के कारण हवा बुरी नहीं मालूम होती थी। प्रभाकरसिंह पूरब तरफ मैदान की हद तक चले गए और नहर लाँघ कर पहाड़ी के कुछ ऊपर बढ़ गए जहाँ पेड़ों का एक बहुत अच्छा छोटा-सा झुरमुट था।

जब कुछ देर बाद वहाँ से लौटे तो नहाने और सन्ध्या पूजा के लिए इन्हें वह चश्मा ही प्यारा मालूम हुआ अस्तु वे उसके किनारे एक सुन्दर चट्टान पर बैठ गए। घंटे-डेढ़ घंटे के अंदर ही प्रभाकरसिंह सब जरूरी कामों से निश्चिंत हो गए तथा अपने कपड़े भी धोकर सुखा लिए।

इसके बाद उस बंगले में पहुँचे और इस आशा में थे कि जमना और सरस्वती यहाँ आ गई होंगी मगर एक लौंडी के सिवाय वहाँ और किसी को भी न देखा जिसकी जुबानी मालूम हुआ कि ‘उनके आने में अभी घंटे भर की देर है, तब तब तक आप कुछ जल-पान खा लीजिए जिसका सामान उस नहाने वाली कोठरी में मैजूद है।’

‘‘अच्छा’’ कह कर प्रभाकरसिंह ने उस लौंडी को तो बिदा कर दिया और आप एक किनारे फर्श पर तकिए का सहारा लेकर लेट गए और कुछ चिन्ता करने लगे।

घंटे भर क्या कई घंटे बीत गये पर जमना और सरस्वती न आईं और प्रभाकरसिंह तरह-तरह की चिन्ता में डूबे रहे, यहाँ तक कि उन्होंने कुछ जलपान भी न किया। जब थोड़ा-सा दिन बाकी रह गया तब वह घबड़ा कर बंगले के बाहर निकले और मैदान में घूमने लगे। अभी उन्हें घूमते हुए कुछ ज्यादे देर नहीं हुई थी कि एक लौंडी बँगले के अंदर से निकली और दौड़ती हुई प्रभाकरसिंह के पास आई तथा एक चीठी उनके हाथ में देकर जवाब कि इन्तजार किए बिना ही वापस चली गई।

प्रभाकरसिंह ने चीठी खोलकर पढ़ी, यह लिखा हुआ था :-

‘‘श्रीमान् जीजाजी,

मैं एक बड़े ही तरद्दुद में पड़ गई हूँ। मुझे मालूम हुआ है कि इन्दु बहिन बुरी आफत में पड़ा चाहती हैं, अस्तु मैं उन्हीं की फिक्र में जाना चाहती हूँ। लौटकर सब समाचार कहूँगी। आशा है कि तब तक आप सबके साथ यहाँ रहेंगे।

बिमला

इस चीठी ने प्रभाकरसिंह को बड़े ही तरद्दुद में डाल दिया और तरह-तरह की चिन्ता करते हुए वह उस मैदान में टहलने लगे। उन्हें कुछ भी सुध न रही कि किस तरफ जा रहे हैं और किधर जाना चाहिए। उत्तर तरफ का मैदान समाप्त करके वे पहाड़ी के नीचे पहुँचे और कई सायत तक रुके रहने के बाद एक पगडंडी देख ऊपर की तरफ चलने लगे।

लगभग तीस या चालीस कदम के ऊपर गये होंगे कि एक छोटा-सा काठ का दरवाजा नजर आया जिस पर साधारण जंजीर चढ़ी हुई थी।

वे इस दरवाजे को देख कर चौंके और चारों तरफ निगाह दौड़ा कर सोचने लगे, ‘‘हैं! यह दरवाजा कैसा? मैं तो बिना इरादा किये ही यकायक यहाँ आ पहुँचा मालूम होता है कि यह कोई सुरंग है। मगर इसके मुँह पर किसी तरह की हिफाजत क्यों नहीं है? यह दरवाजा तो एक लात भी नहीं सह सकता। शायद इसके अन्दर किसी तरह की रुकावट हो जैसी कि उस सुरंग के अंदर थी जिसकी राह से मैं यहाँ आया था? खैर इसके अन्दर चल के देखना तो चाहिए कि क्या है। कदाचित इस कैदखाने के बाहर ही निकल जाऊँ, बेशक यह स्थान सुन्दर और सुहावना होने पर भी मेरे लिए कैदखाना ही है।

यदि इस राह से मैं बाहर निकल गया तो बड़ा ही अच्छा होगा, मैं इन्दु को जरूर बचा लूँगा जो हो, मैं इस सुरंग के अन्दर जरूर चलूँगा मगर इस तरह निहत्थे जाना तो उचित नहीं पहिले बँगले के अन्दर चल कर अपनी पूरी पोशाक पहिरना और अपने हरबे लगा लेना चाहिये, न मालूम इसके अन्दर चल कर कैसा मौका पड़े! न भी मौका पड़े तो क्या? कदाचित् इस घाटी के बाहर ही हो जायें तो अपने हर्बे क्यों छोड़ जायें?’’

इस तरह सोच-विचार कर प्रभाकरसिंह वहाँ से लौटे और तेजी के साथ बँगले के अन्दर चले गये। बात-की-बात में अपनी पूरी पोशाक पहिर और हर्बे लगा कर वे बाहर निकले और मैदान तय करके फिर उसी सुरंग के मुहाने पर जा पहुँचे।

दरवाजा खोलने में किसी तरह की कठिनाई न थी अतएव वे सहज ही में दरवाजा खोल कर उस सुरंग के अन्दर चले गये। सुरंग बहुत चौड़ी-ऊँची न थी, केवल एक आदमी खुले ढंग से उसमें चल सकता था, अगर सामने से कोई दूसरा आदमी आता हुआ मिल जाय तो बड़ी मुश्किल से दोनों एक-दूसरे को निकाल कर अपनी-अपनी राह ले सकते थे। हाँ लम्बाई में यह सुरंग बहुत छोटी न थी बल्कि चार-साढ़े चार सौ कदम लम्बी थी।

सुरंग में पूरा अंधकार था और साथ ही इसके वह भयानक भी मालूम होता थी, मगर प्रभाकरसिंह ने इसकी कोई परवाह न की और हाथ फैलाये आगे की तरफ बढ़े चले गए। जैसे-जैसे आगे जाते थे सुरंग तंग होती जाती थी।

जब प्रभाकरसिंह सुरंग खतम कर चुके तो आगे का रास्ता बन्द पाया, लकड़ी या लोहे का कोई दरवाजा नहीं लगा हुआ था जिसे बन्द कहा जाय बल्कि अनगढ़ पत्थरों ही से वह रास्ता बन्द था। प्रभाकरसिंह ने बहुत अच्छी तरह टटोलने और गौर करने पर यही निश्चय किया कि बस अब आगे जाने का रास्ता नहीं है, मालूम होता है कि सुरंग बनाने वालों ने इसी जगह तक बना कर छोड़ दिया है और यह सुरंग अधूरी रह गई।

इस विचार पर भी प्रभाकरसिंह का दिल न जमा, उन्होंने सोचा कि जरूर इसमें कोई बात है और यह सुरंग व्यर्थ नहीं बनाई गई होगी। उन्होंने फिर अच्छी तरह आगे की तरफ टटोलना शुरू किया। मालूम होता था कि आगे छोटे-बड़े कई अनगढ़ पत्थरों का ढेर लगा हुआ है, इस बीच में दो-तीन पत्थर कुछ हिलते हुए भी मालूम पड़े जिन्हें प्रभाकरसिंह ने बलपूर्वक उखाड़ना चाहा। एक पत्थर तो सहज में ही उखड़ आया और जब उन्होंने उसे उठा कर अलग रक्खा तो छोटे-छोटे दो छेद मालूम पड़े जिनमें से उस पार की चीजें दिखाई दे रही थीं और यह भी मालूम होता था कि अभी कुछ दिन बाकी है, अब उन्हें और भी विश्वास हो गया कि अगर इस तरह और दो-तीन पत्थर अपने ठिकाने से हटा दिए जायें तो जरूर रास्ता निकल आयेगा अस्तु उन्होंने फिर जोर करना शुरू किया।

तीन पत्थर और भी अपने ठिकाने से हटाये गए और अब छोटे-छोटे कई सूराख दिखाई देने लगे मगर इस बात का निश्चय नहीं हुआ कि कोई दरवाजा भी निकल आवेगा।

उन सुराखों से प्रभाकरसिंह ने गौर से दूसरी तरफ देखना शुरू किया। एक बहुत ही सुन्दर घाटी नजर पड़ी और कई आदमी भी इधर-उधर चलते-फिरते नजर आये।

यह वही घाटी थी जिसमें भूतनाथ रहता था, जहाँ जाते हुए यकायक प्रभाकरसिंह गायब हो गए थे, और जहाँ इस समय गुलाबसिंह और इन्दुमति मौजूद हैं।

प्रभाकरसिंह ने उस घाटी को देखा नहीं था इसलिए बड़े गौर से उसकी सुन्दरता को देखने लगे। उन्हें इस बात की क्या खबर थी कि यह भूतनाथ का स्थान है और इस समय इसी में इन्दुमति विराज रही है तथा इस समय उनके देखते-ही-देखते वह एक भारी आफत में फँसा चाहती है।

प्रभाकरसिंह बराबर उद्योग कर रहे थे कि कदाचित् पत्थरों के हिलाने-हटाने से कोई दरवाजा निकल आये और साथ ही इसके घड़ी-घड़ी उन सुराखों की राह से उस पार की तरफ देख भी लेते थे। इस बीच में उनकी निगाह यकायक इन्दुमति पर पड़ी जो पहाड़ की उँचाई पर से धीरे-धीरे नीचे की तरफ उतर रही थी। बस फिर क्या था! उनका हाथ पत्थरों को हटाने के काम से रुक गया और वे बड़े गौर से उसकी तरफ देखने लगे, साथ ही इसके उन्हें इस बात का विश्वास हो गया कि यही भूतनाथ का वह स्थान है जहाँ हम इन्दुमति के साथ आने वाले थे।

थोड़ी ही देर में इन्दु भी नीचे उतर आई और धीरे-धीरे उस कुदरती बगीचे में टहलती हुई उस तरफ बढ़ी जिधर प्रभाकरसिंह थे और अन्त में एक पत्थर की चट्टान पर बैठ गई जो प्रभाकरसिंह से लगभग पचास-साठ कद की दूरी पर होगी।

अब प्रभाकरसिंह उससे मिलने के लिए बहुत बेचैन हुए मगर क्या कर सकते थे, लाचार थे, तथापि उन्होंने उसे पुकारना शुरु किया। अभी दो ही आवाज दी थी कि उनकी निगाह और भी दो आदमियों पर पड़ी जो इन्दु से थोड़ी दूर पर एक मुहाने या सुरंग के अन्दर से निकले थे और इन्दु की तरफ बढ़ रहे थे। उन्हें देखते ही इन्दु भी घबराकर उनकी तरफ लपकी और पास पहुँच कर एक आदमी के पैरों पर गिर पड़ी जो शक्ल-सूरत में बिलकुल ही प्रभाकरसिंह से मिलता था या यों कहिए कि वह सचमुच का एक दूसरा प्रभाकरसिंह था।१

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१. देखिए तीसरा बयान, नकली प्रभाकरसिंह का भोलासिंह और इन्दु को धोखा देना।

प्रभाकरसिंह के कलेजे में एक बिजली-सी चमक गई। अपनी-सी सूरत बने हुए एक ऐयार का वहाँ पहुंचना और इन्दु का उसके पैरों पर गिर पड़ना उनके लिए कैसा दुखदायी हुआ इसे पाठक स्वयं विचार सकते हैं। केवल इतना ही नहीं उनके देखते-ही-देखते नकली प्रभाकरसिंह ने अपने साथी को विदा कर दिया और इसके बाद वह इन्दुमति को कुछ समझा कर अपने साथ ले भागा।

प्रभाकरसिंह चुटीले साँप की तरह पेंच खाकर रह गए, कर ही क्या सकते थे? क्योंकि वहाँ तक इतना पहुँचना बिलकुल असम्भव था।

उन्होंने पत्थरों को हटाकर रास्ता निकालने का फिर एक दफे उद्योग किया और जब नतीजा न निकला तो पेचोताब खाते हुए वहाँ से लौट पड़े। जब सुरंग के बाहर हुए तो देखा कि सूर्य भगवान अस्त हो चुके हैं और अंधकार चारों तरफ से घिरा आ रहा है अस्तु तरह-तरह की बातें सोचते और विचारते हुए प्रभाकरसिंह बंगले की तरफ लौटे और जब वहाँ पहुंचे तो देखा कि हर एक स्थान में मौके-मौके से रोशनी हो रही है।

प्रभाकरसिंह उसी कमरे में पहुँचे जिसमें बिमला से मुलाकात हुई थी और फर्श पर तकिए के सहारे बैठ कर चिन्ता करने लगे। वे सोचने लगे—

‘‘वह कौन आदमी होगा जिसने आज इन्दु को इस तरह से धोखे में डाला? इन्दु की बुद्धि पर भी कैसा पर्दा पड़ गया कि उसने उसे बिल्कुल नहीं पहिचाना! पर वह पहिचनाती ही क्योंकर? एक तो वह स्वयं घबड़ायी हुई थी दूसरे संध्या होने के कारण कुछ अंधकार-सा भी हो रहा था, तीसरे वह ठीक-ठीक मेरी सूरत बन कर वहाँ पहुँचा भी था, मुझमें और उसमें कुछ भी फर्क नहीं था, कम्बख्त पोशाक भी इसी ढंग की पहिने हुए थे, न मालूम इसका पता उसे कैसे लगा! नहीं, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि इस समय भी मेरी पोशाक वैसी ही है जैसी हमेशा रहती थी, इससे मालूम होता है कि वह आदमी मेरे लिए कोई नया नहीं हो सकता। अस्तु जो हो मगर इस समय इन्दु मेरे हाथ से निकल गई। न मालूम अब उस बेचारी पर क्या आफत आवेगी!

हाय, यह सब खराबी बिमला की बदौलत हुई है न वह मुझे बहका कर यहाँ लाती और न यह नौबत पहुँचती। हाँ, यह भी सम्भव है कि यह कार्रवाई बिमला ही ने की हो क्योंकि अभी कई घंटे बीते हैं कि उसने मुझे लिखा भी था कि इन्दु किसी आफत में फँसना चाहती है, उसकी मदद को जाती हूँ। शायद उसका मतलब इसी आफत से हो! क्या यह भी हो सकता है कि बिमला ही ने यह ढंग रचा हो और उसी ने किसी आदमी को मेरी सूरत बना कर इन्दु को निकाल लाने के लिए भेजा हो!

नहीं, अगर ऐसा होता तो वह यह न लिखती ‘इन्दु बहिन बुरी आफत में पड़ना चाहती है।’ हाँ, यह हो सकता है कि इस होने वाली घटना का पहिले से उसे पता लगा हो और इसी दुष्ट के कब्जे से इन्दु को छुड़ाने के लिए वह गई हो, जो हो, कौन कह सकता है कि इन्दु किस मुसीबत में गिरफ्तार हो गई! अफसोस इस बात का है कि मेरी आँखों के सामने यह सब कुछ हो गया और मैं कुछ न कर सका।’’

इसी तरह की बातें प्रभाकरसिंह को सोचते कई घंटे बीत गए मगर इस बीच में कोई शान्ति दिलानेवाला वहाँ न पहुँचा। कई नौजवान लड़के जो बँगले के बाहर पहरे पर दिखाई दिए थे इस समय उनका भी पता न था। दिनभर उन्होंने कुछ भोजन नहीं किया था मगर भोजन करने की उन्हें कोई चिन्ता भी न थी, वे केवल इन्दुमति की अवस्था और अपनी बेबसी पर विचार कर रहे थे, हाँ, कभी-कभी इस बात पर भी उनका ध्यान जाता कि देखो अभी तक किसी ने भी सुध न ली और न खाने-पीने के लिए ही किसी ने पूछा!

चिन्ता करते-करते उनकी आँख लग गई और नींद में भी वे इन्दुमति के विषय में तरह-तरह के भयानक स्वप्न देखते रहे। आधी रात जा चुकी जब एक लौंडी ने आकर उन्हें जगाया!

प्रभाकर : (लौंडी से) क्या है?

लौंडी : मैं आपके लिए भोजन की सामग्री लाई हूँ।

प्रभाकर : कहाँ है?

लौंडी : (उँगली से इशारा करके) उस कमरे में।

प्रभाकर : मैं भोजन न करूँगा, जो कुछ लाई हो उठा ले जाओ।

लौंडी : मैं ही नहीं कला जी भी आई हैं जो कि उसी कमरे में बैठी आपका इन्तजार कर रही हैं।

कला का नाम सुनते ही प्रभाकर उठ बैठे और उस कमरे में गए जिसकी तरफ लौंडी ने इशारा किया था। यह वही कमरा था जिसको दिन के समय प्रभाकरसिंह देख चुके थे और जिसमें नहाने-धोने का सामान तथा जलपान के लिए भी कुछ रखा हुआ था।

कमरे के अन्दर पैर रखते ही कला पर उनकी निगाह पड़ी जो एक कम्बल पर बैठी हुई थी। प्रभाकरसिंह को देखते ही वह उठ खड़ी हुई और उसने बड़े आग्रह से उन्हें उस कम्बल पर बैठाया जिसके आगे भोजन की सामग्री रक्खी हुई थी। बैठने के साथ ही प्रभाकरसिंह ने कहा—

प्रभा० : कला, आज तुम लोगों की बदौलत मुझे बड़ा ही दुःख हुआ।

कला : (बैठ कर) सो क्या?

प्रभा० : (चिढ़े हुए ढंग से) मेरी आँखों के सामने से इन्दु हर ली गई और मैं कुछ न कर सका!!

कला : ठीक है, आपने किसी सुरंग से यह हाल देखा होगा,

प्रभा० : सो तुमने कैसे जाना?

कला : यहाँ दो सुरंगें ऐसी हैं जिनके अन्दर से भूतनाथ की घाटी बखूबी दिखायी देती है। उनमें से एक के अन्दर के सुराख पत्थर के ढोकों से मामूली ढंग से बन्द किए हुए हैं और दूसरी के सूराख खुले हुए हैं जिनकी राह से हम लोग बराबर भूतनाथ के घर का रंग-ढंग देखा करती हैं।

प्रभाकर : ठीक है, इत्तिफाक से मैं उसी सुरंग के अन्दर पहुँच गया था जिसमें देखने के सूराख पत्थर के ढोकों से बन्द किए हुए थे।

कला : जी हाँ, मगर हम लोगों को आपसे पहिले इस बात की खबर लग चुकी थी।

प्रभाकर : तब तुम लोगों ने क्या किया?

कला : यही किया कि इन्दु बहिन को उस आफत से छुड़ा लिया।

प्रभा० : (प्रसन्नता से) तो इन्दु कहाँ है?

कला : एक सुरक्षित और स्वतंत्र स्थान में। अब आप भोजन करते जाइए और बातें किए जाइए, नहीं तो मैं कुछ नहीं कहूँगी, क्योंकि आप दिन-भर के भूखे हैं बल्कि ताज्जुब नहीं कि दो दिन ही के भूखे हों। यहाँ जो कुछ खाने-पीने का सामान पड़ा हुआ था उसके देखने से मालूम हुआ कि आपने दिन को भी कुछ नहीं खाया था।

मजबूर होकर प्रभाकरसिंह ने भोजन करना आरम्भ किया और साथ-ही-साथ बातचीत भी करने लगे।

प्रभाकर : अच्छा तो मैं इन्दु को देखना चाहता हूँ।

कला : जी नहीं, अभी देखने का उद्योग न कीजिए। कल जैसा होगा देखा जायगा क्योंकि इस समय उसकी तबीयत खराब है, दुश्मनों के हाथ से चोट खा चुकी है, यद्यपि उसने बड़े साहस का काम किया और अपने तीरों से कई दुश्मनों को मार गिराया।

इस खबर ने भी प्रभाकरसिंह को तरद्दुद में डाल दिया। वे इन्दु को देखना चाहते थे और कला समझाती जाती थी कि अभी ऐसा करना अनुचित होगा और वैद्य की भी यही राय है।

बड़ी मुश्किल से कला ने प्रभाकरसिंह को भोजन कराया और कल पुनः मिलने का वादा करके वहां से चली गई, प्रभाकरसिंह को इस बात का पता न लगा कि वह किस राह से आई थी और किस राह से चली गई।

क्या हम कह सकते हैं कि प्रभाकरसिंह इन्दु की तरफ से बेफिक्र हो गए? नहीं कदापि नहीं! उन्हें कुछ ढाढ़स हो जाने पर भी कला की बातों पर पूरा विश्वास न हुआ। उनका दिल इस बात को कबूल नहीं करता था कि यदि कला और बिमला दूर से या किसी छिपे ढंग से इन्दु को दिखला देतीं तो कोई हर्ज होता, बात तो यह है कि कला तथा बिमला का इस तरह गुप्त रीति से आना-जाना और रास्ते का पता उन्हें न देना भी उन्हें बुरा मालूम होता था और उन लोगों पर विश्वास नहीं जमने देता था, हां, इस समय इतना जरूर हुआ कि उनकी विचार-प्रणाली का पक्ष कुछ बदल गया और वे पुरानी चिन्ता के साथ-ही-साथ किसी और चिन्ता में भी निमग्न होने लगे।

कई घंटे तक कुछ सोचने-विचारने के बाद वे उठ खड़े हुए और दालानों, कमरों तथा कोठरियों में घूमने-फिरने और टोह लगाने के साथ-ही-साथ दीवारों, आलों और आलमारियों पर भी निगाहें डालने लगे।

पिछली रात का समय, इनके सिवाय कोई दूसरा आदमी बँगले के अन्दर न होने के कारण सन्नाटा छाया हुआ था, मगर आज जहाँ तक देखने में आता था कमरों और कोठरियों में रोशनी जरूर हो रही थी।

कमरों और कोठरियों में छोटी-बड़ी आलमारियाँ देखने में आईं जिनमें से कई में तो ताला लगा हुआ था कई बिना ताले की थीं कई में किवाड़ के पल्ले भी न थे। इन्हीं कोठरियों में से एक कोठरी ऐसी भी थी जिसमें अंधकार था अर्थात् चिराग नहीं जलता था अतएव प्रभाकरसिंह ने चाहा कि इस कोठरी को भी अच्छी तरह देख लें, उसके पास वाली कोठरी में एक फर्शी शमादान जल रहा था जिसे उन्होंने उठा लिया मगर जब उस कोठरी के दरवाजे के पास पहुँचे तो अन्दर से कुछ खटके की आवाज आई।

वे ठमक गये और उस तरफ ध्यान देकर सुनने लगे। आगमी के पैरों की चाप-सी मालूम हुई जिससे गुमान हुआ कि कोई आदमी इसके अंदर जरूर है, मगर फिर कुछ मालूम न हुआ और प्रभाकरसिंह शमादान लिए हुए उस कोठरी के अन्दर चले गए और कोठरियों की तरह यह भी साफ और सुथरी थी तथा जमीन पर एक मामूली फर्श बिछा हुआ था।

हाँ छोटी-छोटी आलमारियाँ इसमें बहुत ज्यादे थीं जिनमें से एक खुली हुई थी और उसका ताला ताली समेत उसकी कुण्डी के साथ अड़ा हुआ था। वह सिर्फ एक ही ताली न थी बल्कि तालियों का एक गुच्छा ही था।

ये शमादान लिए हुए उस आलमारी के पास चले गये और उसका पल्ला अच्छी तरह खोल दिया। उसमें तीन दर बने हुए थे जिनमें से एक में हाथ की लिखी हुई कई किताबें थीं, दूसरे में कागज-पत्र के छोटे-बड़े कई मुट्ठे थे, और तीसरे में लोहे की कई बड़ी-बड़ी तालियाँ थीं और सब के साथ एक-एक पुर्जा बंधा हुआ था। उन्होंने एक ताली उठाई और उसके साथ का पुर्जा खोल कर पढ़ा और फिर ज्यों-का-त्यों उसी तरह रख देने के बाद क्रमशः सभी तालियों के साथ वाले पुर्जे पढ़ डाले और अन्त में एक ताली पुर्जे सहित उठाकर अपनी जेब में रख ली।

तालियों की जाँच करने के बाद उन कागज के मुट्ठों पर हाथ डाला और घंटे-भर तक अच्छी तरह देखने – जाँचने के बाद उनमें से भी तीन मुट्ठे लेकर अपने पास रख लिए और फिर किताब की जाँच शुरू की। इसमें उनका समय बहुत ज्यादे लगा मगर इनमें से कोई किताब उन्होंने ली नहीं।

उस अलमारी की तरफ से निश्चिन्त होने के बाद फिर उन्होंने किसी और आलमारी को जाँचने या खोलने का इरादा नहीं किया। वे वहाँ से लौटे और शमादान जहाँ से उठाया था वहाँ रख कर अपने उसी कमरे में चले आये जहाँ आराम कर चुके थे। वहाँ भी वे ज्यादे देर तक नहीं ठहरे सिर्फ अपने कपड़ों और हर्बों की दुरुस्ती करके बंगले के बाहर निकले। आसमान की तरफ देखा तो मालूम हुआ कि रात बहुत कम बाकी है और आसमान पर पूरब तरफ सफेदी फैलना ही चाहती है।

‘‘कुछ देर तक और ठहर जाना मुनासिब है,’’ यह सोचकर वे इधर-उधर घूमने और टहलने लगे। जब रोशनी अच्छी तरह फैल चुकी तब दक्खिन और पश्चिम कोण की तरफ रवाना हुए, जब मैदान खतम कर चुके और पहाड़ी के नीचे पहुँचे तो उन्हें एक हल्की-सी पगडण्डी दिखाई पड़ी जो कि बहुत ध्यान देने से पगडण्डी मालूम होती थी, हाँ, इतना कह सकते हैं कि उस राह से पहाड़ों के ऊपर कुछ दूर तक चढ़ने में सुभीता हो सकता था।

अस्तु प्रभाकरसिंह पहाड़ी के ऊपर चढ़ने लगे। लगभग पचास कदम चढ़ जाने के बाद उन्हें एक छोटी-सी गुफ़ा दिखाई दी जिसके अन्दर वे बेधड़क चले गए और फिर कई दिनों तक वहाँ से लौट कर बाहर न आए।

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