अतिरिक्त >> आराधना आराधनासूर्यकान्त त्रिपाठी निराला
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जीवन में सत्य, सुंदर को बखानती कविताएँ
नील नील पड़ गये प्राण वे
नील नील पड़ गये प्राण वे
जहाँ उठे थे शुभ्र गान वे।
जीवन की विजया से चढ़कर,
उड़े पताका सहित गढ़-गढ़ पर,
आज प्रहत निर्वात अपढ़ कर,
शिथिल हुए जो तान-मान वे!
तंग हुआ पतंग जलता है,
मानवदेव हाथ मलता है,
कैसा यह विरोध पलता है,
मौन हो रहे ज्ञान-ध्यान वे!
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