उपन्यास >> सुमति सुमतिगुरुदत्त
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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।
‘‘जिस गीत के गाने के लिए मैं आया था, वह मैं अभी गा नहीं सका। गाने की इच्छा मन में है परन्तु अभी तक स्वर ही साध रहा हूँ। सारा दिन आसन बिछाने में ही व्यतीत हो गया है, सायंकाल होने को आई है, मैं दीपक भी नहीं जला पाया, अब उसे कैसे बुलाऊँ? उसके आने की आशा तो है पर अभी आया नहीं। मैं उसके स्वागत के लिए तैयार भी नहीं हुआ।’’
‘‘तो निष्ठा अभी अपने मेहमान के स्वागत की तैयारी नहीं कर सकी।’’ हँसते हुए सुदर्शन ने कहा, ‘‘सुमति! कुछ तुम भी इसकी सहायता कर दो। आसन तो इसने बिछा दिया है, तुम दीपक जला दो।’’
‘‘वह तो मैं कर रही थी किन्तु मैं भी तो अभी इससे सफल नहीं हो पाई।’’
‘‘क्या तुम भी किसी की प्रतीक्षा कर रही हो?’’
‘‘मैं प्रतीक्षा की बात नहीं कर रही। मेरा अभिप्राय है कि मैं अपने अन्तर का दीप प्रकाशित नहीं कर पाई। फिर अभी हमारी, मेरा मतलब है निष्ठा और मेरी, संध्या भी नहीं आई। कदाचित् उससे पूर्व दीप जलाने में समर्थ हो सकें।’’
‘‘इन अन्तरदीपों के प्रकाशित होने से क्या होगा?’’
‘‘जब ये दीप जल उठते हैं तो सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते।’’
अर्थात् तब वह सबमें स्वयं को देखने लगता है और इस प्रकार किसी से घृणा नहीं करता।’’
‘‘सुमति! मेरी समझ में तुम्हारी बातें नहीं आतीं?’’
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