उपन्यास >> सुमति सुमतिगुरुदत्त
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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।
‘‘भैया! यह भैरवी थी। यह सप्त स्वरों का राग है। भक्ति में जब अगाध निष्ठा हो जाती है, तो यह गाया जाता है।’’
‘‘ओह! वह तो तुम्हारी देवी समझी होगी।’’ सुदर्शन ने सरस्वती की मूर्ति की ओर देख मुस्कराते हुए कहा, ‘‘मैं तो बोलों के अर्थ की बात पूछ रहा था।’’
‘‘वह मूर्ति क्या समझ सकती है। वह तो मैंने अपना ध्यान केन्द्रित करने के लिए अपने सम्मुख रखी है। इन स्वरों का अर्थ तो मेरा मन अनुभव करता है। हाँ, आपके कानों को भाषा के स्वर ही सुनाई देते हैं, उनका अर्थ आपको भाभी बता देंगी।’’
‘‘तो तुम भी अब अपनी भाभी की-सी बातें करने लगी हो!’’
यह सुन निष्ठा और सुमति दोनों हँसने लगीं। सुदर्शन बोला, ‘‘मतलब यह हुआ कि तुम भी इसका अर्थ नहीं जानती?’’
‘‘आज आप संगीत सुनने के लिए चले आए हैं। आपको यह विचित्र प्रतीत नहीं हुआ क्या?’’ सुमति ने बात बदलने के लिए पूछा।
‘‘हाँ, लगता तो विचित्र ही। मैं समझता हूँ कि निष्ठा आज मन से गा रही थी। इस कारण इसके गायन में आकर्षण था।
‘‘तो उस गायन की ही बात पूछिए। इन बोलो ने तो आपको आकर्षित किया नहीं।’’
‘‘वह तो निष्ठा ने बताया है। किन्तु जब उसने इतनी कुशलता से गाया है तो अवश्य ही गीत के भाव भी अनोखे ही होंगे।’’
‘‘हाँ, हैं तो। सुनिए कवि ने कहा है–
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