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उपन्यास >> सुमति

सुमति

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :265
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 7598
आईएसबीएन :9781613011331

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बुद्धि ऐसा यंत्र है जो मनुष्य को उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मिला है, जिनमें प्रमाण और अनुभव नहीं होता।


वह भैरवी के स्वर आलापने लगी। आलापों के तारतम्य के बीच उसने गाना आरम्भ किया–

हे था ये गान गाइते आसा आमार
हयनिसे गान गावा
आजे केवलि सुर साधा आमार केकल गाइते चावा
हयनिसे गान गावा।
शुधु आसन पाता हल आमार साराटि दिन धरे
धरे हयनि प्रदीप ज्वाला, तारे डाकव के मन करे
आछि आवार आसा निये तारे
हय न आमार पावा
हयनिसे गान गावा ।।


बीच-बीच में तानालाप भी चल रहे थे। डॉ० सुदर्शन उठकर अध्ययन पर बैठा तो उसका चित्त अध्ययन में नहीं लगा। बहुत यत्न से निष्ठा ने इस गीत की स्वर-साधना की थी। अपने संगीत सिखाने वाले गुरु से उसने संशोधन भी करवाया था। इससे गीत के स्वर और भी मधुर हो गए थे। बरबस डॉ० सुदर्शन अपनी पुस्तक छोड़ निष्ठा के कमरे में चला गया।

निष्ठा के अभ्यास करने के कमरे में ही सरस्वती की रजत मूर्ति रखी थी। उसके सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित था और चरणों में पुष्प बिखरे हुए थे। भाई के आने पर एक क्षण को निष्ठा रुकी और उसके चुपचाप बैठ जाने पर उसने पुनः गाना आरम्भ कर दिया।

गाना समाप्त होने पर सुदर्शन ने पूछा, ‘‘यह किस भाषा का गति था?

‘‘बंगला भाषा का गीत था, रवि बाबू की ‘गीतांजलि से लिया है।’’

‘‘इसका अर्थ क्या था?’’

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